UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 9 स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के अभिकरण के रूप में

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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 9 स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के अभिकरण के रूप में

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Chapter: 9

विरत उत्तरीय प्रश्न

1. स्थानीय संस्थाओं से आप क्या समझते हैं? स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व को भी स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: स्थानीय संस्थाओं का अर्थ (Meaning of Local Institutions):

स्थानीय संस्थाएँ वे संगठन या निकाय हैं जो किसी विशिष्ट क्षेत्र या स्थान के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने, समस्याओं का समाधान करने और विकास के कार्यों को संचालित करने के लिए बनाए जाते हैं।

सरल शब्दों में — “जो संस्थाएँ ग्राम, नगर या जिले के स्तर पर जनता की आवश्यकताओं को पूरा करने का कार्य करती हैं, उन्हें स्थानीय संस्थाएँ कहा जाता है।”

इन संस्थाओं में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद, नगर पालिका, नगर परिषद, नगर निगम आदि शामिल हैं।

स्थानीय संस्थाओं का महत्त्व (Importance of Local Institutions):

(i) जनसहभागिता का माध्यम: स्थानीय संस्थाएँ जनता को अपने क्षेत्र के प्रशासन और विकास कार्यों में भाग लेने का अवसर देती हैं।

(ii) स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति: ये संस्थाएँ अपने क्षेत्र की वास्तविक आवश्यकताओं जैसे जल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, स्वच्छता आदि की देखभाल करती हैं।

(iii) लोकतांत्रिक प्रशिक्षण: इन संस्थाओं के माध्यम से नागरिकों को लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों — चुनाव, जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व — का अभ्यास करने का अवसर मिलता है।

(iv) शैक्षिक विकास में सहयोग: स्थानीय संस्थाएँ विद्यालयों की स्थापना, भवन निर्माण, शिक्षकों की नियुक्ति और शिक्षा के प्रसार में सहयोग देती हैं।

(v) सामाजिक एवं आर्थिक विकास: ये संस्थाएँ क्षेत्र में रोजगार सृजन, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक न्याय की दिशा में कार्य करती हैं।

(vi) जनता और सरकार के बीच सेतु: स्थानीय संस्थाएँ जनता और राज्य सरकार के बीच संवाद और सहयोग का कार्य करती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion): स्थानीय संस्थाएँ लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करती हैं। ये नागरिकों को अपने क्षेत्र के विकास में सक्रिय भागीदारी का अवसर देती हैं और समाज में स्वावलंबन तथा उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न करती हैं।

संक्षेप में: “स्थानीय संस्थाएँ लोकतंत्र की आधारशिला हैं, जो जनता को शासन और विकास में प्रत्यक्ष भाग लेने का अवसर प्रदान करती हैं।”

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्यों का सामान्य विवरण दीजिए।

उत्तर: नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य। (Educational Functions of Local Bodies in Urban Areas):

नगरीय क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बड़े नगरों में नगरपालिका, नगर महापालिका या नगर निगम बनाए गए हैं। उपनगरों या कस्बों के लिए टाउन एरिया कमेटी एवं नोटीफाइड एरिया कमेटी हैं। इन प्रशासनिक इकाइयों की शासन-व्यवस्था हेतु अधीक्षक के अन्तर्गत विशेष विभागों को संगठन बनाया गया है। 

इन संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य निम्न प्रकार हैं –

(i) नगरों की स्थानीय संस्थाएँ प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना करती हैं। ये शासन की शिक्षा नीति के अन्तर्गत बालक-बालिकाओं के लिए माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा का प्रबन्ध भी करती हैं।

(ii) 6 – 14 वर्ष आयु वर्ग के समस्त बालक-बालिकाओं को अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित और विवश करती हैं। ‘

(iii) राज्य सरकार द्वारा प्राप्त आर्थिक सहायता को विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में वितरित करने की व्यवस्था करती हैं।

(iv) निजी शासन-प्रबन्ध के अन्तर्गत संचालित विद्यालयों में योग्य एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति करती हैं।

(v) नगरों की स्थानीय संस्थाएँ समय-समय पर विभिन्न विद्यालयों के क्रियाकलापों का शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण कराती हैं।

(vi) ये प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल स्तर पर परीक्षाओं का संचालन कर परीक्षा परिणाम घोषित कराती हैं।

(vii) शैक्षिक प्रचार-प्रसार की दृष्टि से उपयुक्त स्थानों पर सार्वजनिक पुस्तकालय तथा वाचनालय खोलती हैं, उनकी देखभाल करती हैं तथा उन्हें आर्थिक सहायता भी देती हैं।

(viii) प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत रात्रि-पाठशालाएँ तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र स्थापित करने हेतु धन प्रदान करती हैं।

(ix) ये संस्थाएँ चलचित्र, प्रदर्शन और प्रतियोगिताओं के माध्यम से जनता में शिक्षा के अधिकाधिक प्रचार-प्रसार की व्यवस्था करती हैं।

(x) राज्य सरकार की शैक्षिक-नीतियों का अनुपालन करते हुए स्थानीय स्तर पर सभी के लिए श्रेष्ठ एवं हितकारी शिक्षा का प्रबन्ध करती हैं।

2. ग्रामीण क्षेत्र में जिला-परिषद के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: जिला-परिषद के शैक्षणिक कार्य (Educational Functions of District Councils):

नगरीय क्षेत्रों की भाँति ग्रामीण क्षेत्रों में जिला- परिषदें शिक्षा की व्यवस्था करती हैं। प्रत्येक जिले में शिक्षा के सुप्रबन्ध तथा विकास हेतु एक शिक्षा विभाग स्थापित किया गया है जो जिला विद्यालय निरीक्षक तथा उपविद्यालय निरीक्षक की सहायता से शिक्षा का प्रबन्ध करता है। 

जिला परिषद् के शैक्षणिक कार्य इस प्रकार हैं –

(i) जिला-परिषद् अपने क्षेत्र के अन्तर्गत ग्रामों में आवश्यकतानुसार प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल खोलने की व्यवस्था करती है।

(ii) यह इन विद्यालयों के लिए भवन, शिक्षण-सामग्री तथा अन्य साधनों का प्रबन्ध भी करती है।

(iii) शिक्षा सम्बन्धी अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु जिला-परिषद् को शिक्षा शुल्क लगाने का अधिकार प्राप्त।

(iv) परिषद् इन विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति करती है तथा उनके वेतन आदि का प्रबन्ध करती।

(v) विद्यालयों के अन्तर्गत खेलकूद एवं व्यायाम, सांस्कृतिक एवं पाठ्य सहगामी क्रियाओं तथा अन्य लाभकारी गतिविधियों का क्रियान्वयन भी परिषद् ही करती है। यह परीक्षा लेने का दायित्व भी निभाती है।

(vi) जिला-परिषद् ग्रामीण अंचलों में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम संचालित करती है तथा उनके लिए धन की व्यवस्था करती है।

(vii) जिला परिषद् प्रदेश के शासन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार ही शिक्षा की व्यवस्था करती है। शिक्षा व्यवस्था के निरीक्षण एवं मूल्यांकन कार्य में यह राज्य द्वारा नियुक्त अधिकारियों की मदद लेती है।

(viii) जिला-परिषदें अपने विद्यालयों को शासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।

3. ग्रामीण स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: ग्राम पंचायत के शैक्षणिक कार्य (Educational Functions of Gram Panchayat):

हमारे देश में पंचायती राज्य संशोधित अधिनियम (1954) के अनुसार, 250 से अधिक आबादी वाले प्रत्येक ग्राम में एक ग्राम सभा की व्यवस्था की गई है। इससे कम आबादी वाले ग्रामों को पास के ग्राम में मिलाने का प्रावधान है। कई गाँवों को मिलाकर जिस कार्यकारिणी का गठन होता है उसे ग्राम पंचायत कहते हैं। वस्तुत: ग्राम पंचायत ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति है जो निजी क्षेत्र की उन्नति हेतु विविध कार्यक्रमों की व्यवस्था करती है। 

ग्राम पंचायत के शिक्षा सम्बन्धी कार्य संक्षेप में इस प्रकार हैं –

(i) मात्र ग्राम के अन्तर्गत शिक्षा प्रबन्ध तक सीमित रहने वाली ग्राम पंचायत, बालक-बालिकाओं के लिए प्राथमिक विद्यालय स्थापित कर उनका संचालन करती है।

(ii) यह ग्रामवासियों के शैक्षिक विकास हेतु ग्राम पंचायत वाचनालय और पुस्तकालय खोलती है।

(iii) ग्रामीण अंचल के लोगों को देश-विदेश के समाचार उपलब्ध कराने की दृष्टि से ग्राम में रेडियो तथा टी० वी० का प्रबन्ध करती है।

(iv) अनपढ़ लोगों के लिए रात्रि पाठशालाएँ चलवाती है।

(v) ग्रामवासियों की शैक्षणिक प्रगति में सहायक विभिन्न कुटीर उद्योगों का प्रबन्ध करती है।

(vi) शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु मेले, प्रदर्शनियाँ, चलचित्र, नाटक, सम्मेलन, व्याख्यान तथा समारोह आयोजित करती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

1. स्थानीय संस्थाओं का व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: किसी क्षेत्र-विशेष की शासन – व्यवस्था के लिए गठित की गई प्रशासनिक संस्था को स्थानीय संस्था (Local Body) कहा जाता है। स्थानीय संस्थाओं के वर्गीकरण का मुख्य आधार नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्र है। प्रथम वर्ग में हम उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित करते हैं जिनका गठन नगरीय क्षेत्र की व्यवस्था एवं समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाओं को पुनः दो वर्गों में बाँटा गया है। प्रथम वर्ग में उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जो बड़े नगरों में गठित की जाती हैं। इस वर्ग की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ हैं–नगरपालिका नगर महापालिका तथा नगर निगम नगरीय।

क्षेत्र की दूसरे वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ छोटे नगरों एवं कस्बों से सम्बन्धित हैं। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ हैं-टाउन एरिया कमेटी तथा नोटीफाइड एरिया कमेटी। ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ दो हैं—जिला-परिषद् तथा ग्राम पंचायत।

2. शिक्षा के प्रसार में स्थानीय संस्थाओं का क्या योगदान है?

उत्तर: स्थानीय संस्थाओं का एक मुख्य कार्य अपने क्षेत्र में शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना है। इसके लिए स्थानीय संस्थाएँ अपने उपलब्ध साधनों एवं सुविधाओं के अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करती हैं। तथा उनका संचालन करती हैं। इसके अतिरिक्त ये स्थानीय संस्थाएँ अपने क्षेत्र में रहने वाले समस्त परिवारों को अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित भी करती हैं। इसके लिए प्रचार-कार्य तथा कुछ प्रलोभन भी दिए जाते हैं, जैसे कि बच्चों को मुफ्त पुस्तकें या वर्दी देना। बच्चों की शिक्षा के अतिरिक्त प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार एवं प्रचार में भी स्थानीय संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

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