UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 5 शिक्षा के अभिकरण

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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 5 शिक्षा के अभिकरण

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Chapter: 5

वस्तुत उतरीय प्रश्न

1. शिक्षा के अभिकरण (साधन) से क्या आशय है? शिक्षा के अभिकरणों का एक व्यवस्थित?

या

वर्गीकरण प्रस्तुत करते हुए औपचारिक तथा अनौपचारिक अभिकरणों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।

या

शिक्षा के औपचारिक साधन कौन-कौन से हैं?

या

शिक्षा के ‘औपचारिक’ एवं ‘अनौपचारिक’ अभिकरण का क्या तात्पर्य है?

या

शिक्षा के अनौपचारिक साधन कौन-कौन से हैं?

या

‘शिक्षा के अभिकरणों (साधनों) का वर्गीकरण’ पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: शिक्षा के अभिकरण (साधन) से आशय –

 शिक्षा के अभिकरण या साधन से अभिप्राय उन संस्थाओं, माध्यमों या संगठनों से है जिनके द्वारा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास हेतु शिक्षा प्रदान की जाती है।

अर्थात् – “वे सभी माध्यम जिनके द्वारा व्यक्ति में ज्ञान, कौशल, मूल्य तथा व्यवहार में परिवर्तन लाया जाता है, शिक्षा के अभिकरण कहलाते हैं।”

शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह घर, समाज, धार्मिक संस्था, खेलकूद, मीडिया आदि के माध्यम से भी प्राप्त होती है। अतः शिक्षा के अभिकरण अनेक प्रकार के होते हैं।

शिक्षा के अभिकरणों का वर्गीकरण (Classification of Agencies of Education): शिक्षा के अभिकरणों को सामान्यतः तीन भागों में बाँटा जाता है —

(i) औपचारिक अभिकरण (Formal Agencies)।

(ii) अनौपचारिक अभिकरण (Informal Agencies)।

(iii) अर्ध-औपचारिक अथवा अनौपचारिक (Non-Formal / Semi-Formal Agencies)।

(क) औपचारिक अभिकरण (Formal Agencies of Education): ये वे संस्थाएँ हैं जो निश्चित उद्देश्य, समय-सारणी, पाठ्यक्रम और परीक्षा प्रणाली के अंतर्गत संगठित रूप से शिक्षा प्रदान करती हैं।

उदाहरण:

(i) विद्यालय (Schools)।

(ii) महाविद्यालय (Colleges)।

(iii) विश्वविद्यालय (Universities)।

(iv) तकनीकी एवं व्यावसायिक संस्थाएँ।

मुख्य विशेषताएँ:

(i) नियोजित एवं संगठित शिक्षा।

(ii) निश्चित पाठ्यक्रम व समय-सारिणी।

(iii) योग्य शिक्षकों द्वारा शिक्षण।

(iv) परीक्षा एवं प्रमाणपत्र प्रणाली।

(v) सरकार या निजी संस्था द्वारा संचालन।

उद्देश्य: व्यक्ति के बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक, व्यावसायिक तथा शारीरिक विकास को सुनिश्चित करना।

(ख) अनौपचारिक अभिकरण (Informal Agencies of Education): ये वे साधन हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति स्वाभाविक रूप से, बिना किसी निश्चित पाठ्यक्रम या समय-सारणी के शिक्षा प्राप्त करता है।

उदाहरण: 

(i) परिवार।

(ii) समाज या समुदाय।

(iii) मित्रगण।

(iv) जनसंचार माध्यम (टी.वी., रेडियो, समाचार पत्र, इंटरनेट आदि)।

(v) धार्मिक संस्थाएँ।

(v) यात्राएँ एवं जीवनानुभव।

मुख्य विशेषताएँ:

(i) स्वतःस्फूर्त एवं स्वाभाविक शिक्षण।

(ii) कोई निश्चित समय या परीक्षा नहीं।

(iii) जीवन के अनुभवों पर आधारित।

(iv) व्यक्ति के चरित्र, आदतों एवं संस्कारों का विकास।

उद्देश्य: व्यक्ति को सामाजिक जीवन के लिए तैयार करना, नैतिकता एवं व्यवहारिकता का विकास करना।

(ग) अर्ध-औपचारिक (Non-Formal / Semi-Formal Agencies): ये औपचारिक और अनौपचारिक अभिकरणों के मध्य की कड़ी हैं। इनका उद्देश्य उन लोगों को शिक्षा देना है जो नियमित विद्यालयी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

उदाहरण:

(i) प्रौढ़ शिक्षा केंद्र।

(ii) साक्षरता अभियान।

(iii) खुला विद्यालय (Open School)।

(iv) दूरस्थ शिक्षा (Distance Education)।

(v) रेडियो/टी.वी. द्वारा शैक्षिक कार्यक्रम।

मुख्य विशेषताएँ:

(i) लचीला पाठ्यक्रम व समय।

(ii) परीक्षा का वैकल्पिक स्वरूप।

(iii) समाज के सभी वर्गों के लिए उपयोगी।

संक्षेप में तुलनात्मक दृष्टि से:

पक्षऔपचारिक अभिकरणअनौपचारिक अभिकरण
प्रकृतिसंगठित एवं नियोजितअसंगठित एवं स्वाभाविक
स्थानविद्यालय, महाविद्यालय आदिघर, समाज, मीडिया आदि
पाठ्यक्रमनिश्चितअनिश्चित
शिक्षकप्रशिक्षित शिक्षकमाता-पिता, मित्र, समाज
नियंत्रणसरकार या संस्था द्वाराव्यक्तिगत अनुभवों द्वारा

निष्कर्ष: शिक्षा के अभिकरण व्यक्ति के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। औपचारिक अभिकरण जहाँ बौद्धिक विकास करते हैं, वहीं अनौपचारिक अभिकरण व्यक्ति के सामाजिक एवं नैतिक पक्ष को मजबूत बनाते हैं। दोनों का समन्वय ही सच्चे अर्थों में पूर्ण शिक्षा प्रदान करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शिक्षा के औपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोष (Merits and Demerits of Formal Means of Education):

अर्थ: वे सभी संगठित संस्थाएँ जो निश्चित पाठ्यक्रम, समय-सारिणी, परीक्षा तथा प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करती हैं, उन्हें औपचारिक अभिकरण कहा जाता है — जैसे विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि।

औपचारिक अभिकरणों के गुण (Advantages):

(i) संगठित व्यवस्था: शिक्षा नियोजित, व्यवस्थित एवं उद्देश्यपूर्ण ढंग से दी जाती है।

(ii) प्रशिक्षित शिक्षक: शिक्षण कार्य योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा किया जाता है।

(iii) निश्चित पाठ्यक्रम: पाठ्यक्रम का निर्धारण विद्यार्थियों की आयु, क्षमता और स्तर के अनुसार किया जाता है।

(iv) मूल्यांकन व्यवस्था: परीक्षा प्रणाली द्वारा शिक्षार्थियों की प्रगति का परीक्षण होता है।

(v) सामाजिक विकास: विद्यालय में सहयोग, अनुशासन और सामाजिक व्यवहार सीखा जाता है।

(vi) समग्र विकास: बौद्धिक, शारीरिक, नैतिक, सौंदर्यबोध आदि का विकास होता है।

औपचारिक अभिकरणों के दोष (Disadvantages):

(i) यांत्रिकता: शिक्षा अधिकतर पुस्तक-आधारित व परीक्षा-केंद्रित होती है।

(ii) व्यक्तिगत भिन्नताओं की उपेक्षा: सभी छात्रों को एक समान समझा जाता है।

(iii) अनुशासन की कठोरता: कठोर नियमों और अनुशासन से विद्यार्थियों की स्वतंत्रता सीमित होती है।

(iv) जीवन से असंबंध: पाठ्यक्रम कभी-कभी वास्तविक जीवन की आवश्यकताओं से अलग हो जाता है।

(v) व्यय की अधिकता: विद्यालयी शिक्षा महँगी होती जा रही है, जिससे सबको अवसर नहीं मिलता।

संक्षेप में: औपचारिक अभिकरण संगठित और योजनाबद्ध शिक्षा प्रदान करते हैं, परंतु इनमें लचीलापन व जीवनोपयोगिता का अभाव देखा जाता है।

2. शिक्षा के अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शिक्षा के अनौपचारिक साधनों या अभिकरणों के गुण-दोष (Merits and Demerits of Informal Means of Education):

अर्थ: वे सभी प्राकृतिक या सामाजिक माध्यम जिनसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से शिक्षा प्राप्त करता है, अनौपचारिक अभिकरण कहलाते हैं — जैसे परिवार, समाज, मित्र, धार्मिक संस्था, मीडिया आदि।

अनौपचारिक अभिकरणों के गुण (Advantages):

(i) स्वाभाविक एवं स्वतःस्फूर्त: व्यक्ति जीवन के अनुभवों से सहज रूप में शिक्षा प्राप्त करता है।

(ii) सर्वसुलभ: समाज के प्रत्येक व्यक्ति को बिना खर्च के शिक्षा मिलती है।

(iii) व्यक्तिगत विकास: प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि, क्षमता और गति के अनुसार सीखता है।

(iv) नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास: परिवार, समाज और धर्म के प्रभाव से नैतिकता, संस्कार एवं परंपराएँ विकसित होती हैं।

(v) जीवनोपयोगी शिक्षा: यह शिक्षा व्यवहारिक जीवन से सीधे जुड़ी होती है।

अनौपचारिक अभिकरणों के दोष (Disadvantages):

(i) असंगठित एवं अनियोजित: इसमें कोई निश्चित पाठ्यक्रम या समय-सारिणी नहीं होती।

(ii) असमानता: सभी को समान अवसर या समान गुणवत्ता की शिक्षा नहीं मिलती।

(iii) अंधविश्वास की संभावना: धार्मिक या सामाजिक परंपराएँ कभी-कभी तर्कहीन शिक्षाएँ देती हैं।

(iv) मूल्यांकन का अभाव: सीखने के परिणाम को मापने की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं होती।

(v) सीमित प्रभाव: यह अधिकतर स्थानीय व पारिवारिक वातावरण तक सीमित रहती है।

संक्षेप में: अनौपचारिक अभिकरण व्यक्ति को स्वाभाविक, व्यवहारिक और नैतिक शिक्षा देते हैं, परंतु इनमें संगठन और मूल्यांकन की कमी रहती है।

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