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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 6 गृह या परिवार: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में
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गृह या परिवार: शिक्षा के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में
Chapter: 6
| वस्तुत उतरीय प्रश्न |
1. परिवार से आप क्या समझते हैं? एक संस्था के रूप में परिवार के शैक्षिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
“गृह बालक की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
बालक/बालिका की शिक्षा में गृह का क्या महत्त्व है?
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में घर के महत्व पर प्रकाश डालिए।
या
शिक्षा के अभिकरण के रूप में परिवार की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर: परिवार का अर्थ: परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है, जिसमें माता-पिता, भाई-बहन एवं अन्य सदस्य एक साथ रहते हैं। यह रक्त-संबंध, प्रेम, स्नेह और सहयोग पर आधारित संस्था है। परिवार बालक के जीवन की प्रथम सामाजिक संस्था है, जहाँ वह दूसरों से रहना, बोलना, आचरण करना और मूल्य समझना सीखता है।
एक संस्था के रूप में परिवार का शैक्षिक महत्व / शिक्षा के अभिकरण के रूप में परिवार की भूमिका:
(i) प्रथम शिक्षालय: परिवार को बालक की प्रथम पाठशाला कहा जाता है क्योंकि शिक्षा का आरम्भ घर से ही होता है। बालक बोलना, चलना, पहनना, शिष्टाचार आदि सबसे पहले घर में ही सीखता है।
(ii) चरित्र-निर्माण: परिवार बालक के चरित्र-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। माता-पिता के आचरण, व्यवहार एवं आदर्श बालक के लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं।
(iii) सामाजिक शिक्षा: परिवार में रहकर बालक दूसरों के साथ व्यवहार करना, सहयोग करना, अनुशासन रखना तथा समाज के नियमों का पालन करना सीखता है।
(iv) नैतिक एवं धार्मिक मूल्य: परिवार बालक को अच्छे-बुरे का ज्ञान कराता है और उसे सत्य, अहिंसा, परोपकार, ईमानदारी जैसे नैतिक मूल्यों का संस्कार देता है।
(v) भावनात्मक विकास: परिवार में स्नेह, प्रेम और सुरक्षा का वातावरण बालक के भावनात्मक संतुलन को बनाए रखता है तथा आत्मविश्वास बढ़ाता है।
(vi) व्यक्तित्व विकास: परिवार बालक के सर्वांगीण व्यक्तित्व—शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और नैतिक—का विकास करता है।
(vii) सांस्कृतिक परंपराओं का संवाहक: परिवार बालक को अपने समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों, त्योहारों और सांस्कृतिक धरोहरों से परिचित कराता है।
निष्कर्ष: निःसंदेह, परिवार बालक की शिक्षा का प्रथम और अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। विद्यालय में औपचारिक शिक्षा बाद में आती है, परंतु जीवन के मूल संस्कार—जैसे प्रेम, अनुशासन, सहयोग, और नैतिकता—परिवार से ही प्राप्त होते हैं। इसलिए यह कथन सत्य है कि—
“गृह बालक की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है।”
2. परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
या
घर अथवा परिवार के शैक्षिक कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर: परिचय: परिवार बालक के जीवन का प्रथम एवं सर्वाधिक प्रभावशाली शिक्षण केन्द्र है। विद्यालय में प्रवेश से बहुत पहले बालक अपने घर में ही अनेक बातें सीख लेता है। अतः परिवार को शिक्षा का प्राथमिक एवं सबसे महत्त्वपूर्ण अभिकरण माना गया है। परिवार के माध्यम से बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता है।
परिवार के मुख्य शैक्षणिक कार्य:
(i) प्राथमिक शिक्षा का कार्य: परिवार बालक का प्रथम शिक्षालय है। वह बोलना, चलना, पहनना, खाना, उठना-बैठना, व्यवहार करना, आदि बातें सबसे पहले परिवार से सीखता है। इस प्रकार प्रारम्भिक शिक्षा का कार्य परिवार ही करता है।
(ii) नैतिक शिक्षा का कार्य: परिवार बालक को सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया, ईमानदारी, अनुशासन एवं सदाचार जैसे नैतिक गुणों की शिक्षा देता है। माता-पिता अपने आचरण द्वारा बालक के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
(iii) सामाजिक शिक्षा का कार्य: परिवार में रहकर बालक दूसरों के साथ व्यवहार करना, सहयोग करना, सेवा करना, बड़ों का आदर और छोटों से प्रेम करना सीखता है। इससे उसके सामाजिक गुणों का विकास होता है।
(iv) भावनात्मक शिक्षा का कार्य: परिवार में प्रेम, स्नेह और अपनापन बालक की भावनाओं को विकसित करता है। वह सहानुभूति, करुणा और आत्मविश्वास जैसे भावों को सीखता है।
(v) सांस्कृतिक शिक्षा का कार्य: परिवार बालक को अपने समाज की परंपराओं, संस्कृतियों, त्योहारों, रीति-रिवाजों, भाषा और धार्मिक मान्यताओं से परिचित कराता है। इससे बालक में सांस्कृतिक चेतना विकसित होती है।
(vi) चरित्र निर्माण का कार्य: परिवार बालक के नैतिक व व्यवहारिक गुणों को आकार देता है। माता-पिता का जीवन-व्यवहार और उनके मूल्य बालक के चरित्र की नींव बनते हैं।
(vii) आर्थिक शिक्षा का कार्य: परिवार बालक को बचत, परिश्रम, ईमानदारी, और आर्थिक जिम्मेदारी के महत्त्व को समझाता है। इससे बालक में आत्मनिर्भरता की भावना विकसित होती है।
(viii) धार्मिक शिक्षा का कार्य: परिवार में पूजा, प्रार्थना, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, और धार्मिक अनुष्ठान बालक को श्रद्धा, भक्ति और नैतिक जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
(ix) व्यक्तित्व विकास का कार्य: परिवार बालक के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास के अवसर प्रदान करता है। घर का वातावरण जितना स्वस्थ और प्रेरणादायक होगा, बालक का व्यक्तित्व उतना ही संतुलित होगा।
निष्कर्ष: परिवार बालक की शिक्षा का सबसे आधारभूत और स्थायी अभिकरण है। यह न केवल बालक को प्रारम्भिक ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि उसके जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता है।
इसलिए कहा गया है —
“परिवार वह संस्था है जो बालक के जीवन में शिक्षा की नींव रखती है।”
3. गृह-शिक्षा के मुख्य सिद्धान्तों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: परिचय: गृह-शिक्षा वह शिक्षा है जो बालक को परिवार के वातावरण में स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है। यह शिक्षा औपचारिक नहीं होती, बल्कि व्यवहार, अनुकरण और अनुभवों के माध्यम से दी जाती है। गृह-शिक्षा का उद्देश्य बालक के चरित्र, व्यवहार, सामाजिकता और नैतिकता का विकास करना होता है। इसके प्रभावी संचालन के लिए कुछ सिद्धान्तों का पालन आवश्यक है।
गृह-शिक्षा के मुख्य सिद्धान्त:
(i) अनुकरण का सिद्धान्त: बालक अपने माता-पिता और परिवारजनों का अनुकरण करता है। अतः माता-पिता को अपने आचरण, वाणी और व्यवहार में आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।
(ii) प्रेम और स्नेह का सिद्धान्त: गृह-शिक्षा में कठोरता के स्थान पर प्रेम और स्नेह का वातावरण होना चाहिए। स्नेहपूर्ण व्यवहार से बालक में आत्मविश्वास और आत्मनियंत्रण विकसित होता है।
(iii) अनुशासन का सिद्धान्त: घर में शालीनता, समयपालन, स्वच्छता और संयम जैसे अनुशासनात्मक गुणों को व्यावहारिक रूप से अपनाया जाना चाहिए ताकि बालक उनका पालन करना सीख सके।
(iv) व्यक्तिगत भिन्नताओं का सिद्धान्त: प्रत्येक बालक की रुचि, क्षमता और स्वभाव अलग होता है। गृह-शिक्षा में इन भिन्नताओं का ध्यान रखकर उचित मार्गदर्शन देना चाहिए।
(v) सहयोग का सिद्धान्त: परिवार के सभी सदस्य बालक की शिक्षा और विकास में सहयोग करें। सामूहिक कार्यों में बालक की भागीदारी से उसमें सहयोग की भावना विकसित होती है।
(vi) स्वानुशासन का सिद्धान्त: गृह-शिक्षा का उद्देश्य बाहरी अनुशासन नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन का विकास करना है। बालक को स्वयं जिम्मेदारी से कार्य करना सिखाया जाना चाहिए।
(vii) अनुभवात्मक शिक्षा का सिद्धान्त: घर में शिक्षा केवल उपदेश से नहीं, बल्कि व्यवहार और अनुभवों से दी जानी चाहिए। जैसे – पौधों की देखभाल, सफाई, दूसरों की सहायता करना आदि।
(viii) सांस्कृतिक एवं नैतिक सिद्धान्त: गृह-शिक्षा में सांस्कृतिक परंपराओं, त्योहारों, और धार्मिक मूल्यों का समावेश होना चाहिए ताकि बालक अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा रखे।
निष्कर्ष: गृह-शिक्षा के सिद्धान्त बालक को जीवनोपयोगी, अनुशासित, नैतिक और समाजोपयोगी बनाने में सहायक होते हैं। इसलिए परिवार को एक आदर्श शिक्षण वातावरण प्रदान करना चाहिए।
4. गृह-शिक्षा के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: परिचय: गृह-शिक्षा में शिक्षा किसी विशेष पाठ्यक्रम या पुस्तक के माध्यम से नहीं दी जाती, बल्कि जीवन के विभिन्न अनुभवों और व्यवहारिक क्रियाओं के माध्यम से दी जाती है। इसके लिए माता-पिता विभिन्न विधियाँ अपनाते हैं।
गृह-शिक्षा की मुख्य विधियाँ:
(i) अनुकरण विधि: बालक माता-पिता, भाई-बहनों एवं बड़ों के कार्यों का अनुकरण करके सीखता है। इसलिए परिवार के सदस्यों का आचरण शिक्षाप्रद होना चाहिए।
(ii) अनुभव विधि: बालक घर के कार्यों जैसे – सफाई, बागवानी, खरीदारी, मेहमानों का स्वागत आदि से अनुभव प्राप्त करता है। इससे उसमें व्यवहारिक ज्ञान और जिम्मेदारी का विकास होता है।
(iii) संवाद विधि: परिवार के सदस्यों के साथ नियमित संवाद के माध्यम से बालक अपनी बात कहना, विचार प्रकट करना और दूसरों की बात सुनना सीखता है।
(iv) प्रोत्साहन विधि: अच्छे कार्यों के लिए बालक को प्रशंसा, पुरस्कार या स्नेह देकर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि वह अच्छे व्यवहार को दोहराए।
(v) अनुशासन विधि: गृह-शिक्षा में हल्के अनुशासन का पालन आवश्यक है। इससे बालक में समयपालन, संयम और जिम्मेदारी की भावना आती है।
(vi) कथानक या कहानी विधि: माता-पिता बालक को नैतिक और धार्मिक कथाओं के माध्यम से जीवन के मूल्य सिखा सकते हैं। यह विधि बालकों के लिए रोचक और प्रभावशाली होती है।
(vii) अनुभूति या उदाहरण विधि: बालक को किसी कार्य के उदाहरण द्वारा सिखाना प्रभावी होता है। जैसे – माता-पिता स्वयं मिल-जुलकर कार्य करें तो बालक सहयोग का महत्त्व समझेगा।
निष्कर्ष: गृह-शिक्षा की विधियाँ बालक को व्यवहारिक, नैतिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाती हैं। घर में यदि इन विधियों का सही प्रयोग किया जाए, तो बालक का सर्वांगीण विकास संभव है।

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