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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 7 विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में
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विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में
Chapter: 7
| वस्तुत उतरीय प्रश्न |
1. विद्यालय का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विद्यालय की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: विद्यालय का अर्थ (Meaning of School):
“विद्यालय” शब्द ‘वि’ और ‘आलय’ दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘वि’ का अर्थ है – विशेष या विशिष्ट तथा ‘आलय’ का अर्थ है – घर या स्थान। अतः विद्यालय का अर्थ है – विशेष रूप से ज्ञान प्राप्त करने का स्थान।
विद्यालय वह संस्था है जहाँ विद्यार्थियों को सुनियोजित एवं संगठित रूप से शिक्षा दी जाती है। यह बालक के सर्वांगीण विकास का केंद्र है, जहाँ उसके शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं बौद्धिक गुणों का विकास किया जाता है।
विद्यालय की परिभाषाएँ (Definitions of School):
(i) रूसो (Rousseau) के अनुसार –“विद्यालय वह स्थान है जहाँ बालक को समाज में जीवन यापन करने की तैयारी कराई जाती है।”
(ii) जॉन डेवी (John Dewey) के अनुसार –“विद्यालय एक लघु समाज है, जहाँ बालक सामाजिक जीवन के नियमों को सीखता है।”
(iii) एडम्स (Adams) के अनुसार –“विद्यालय एक ऐसी संस्था है जो समाज के भावी नागरिकों को शिक्षित करके उन्हें उपयोगी बनाती है।”
विद्यालय की आवश्यकता (Need of School):
विद्यालय की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि —
(i) ज्ञानार्जन का केंद्र: विद्यालय बच्चों को व्यवस्थित रूप से ज्ञान प्रदान करता है।
(ii) व्यक्तित्व विकास: विद्यालय में शारीरिक, मानसिक, नैतिक, भावनात्मक एवं सामाजिक विकास होता है।
(iii) अनुशासन का अभ्यास: विद्यालय बच्चों को नियम, अनुशासन और उत्तरदायित्व का अनुभव कराता है।
(iv) सामाजिकता का विकास: विद्यालय में बच्चों को सहयोग, सहिष्णुता, समानता और भाईचारे की भावना सिखाई जाती है।
(v) राष्ट्रीय एकता का विकास: विद्यालय नागरिकता एवं राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करता है।
(vi) जीवन की तैयारी: विद्यालय बच्चों को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से सामना करने के योग्य बनाता है।
विद्यालय की उपयोगिता (Utility of School):
(i) ज्ञान एवं कौशल का विकास: विद्यालय में बच्चों को विभिन्न विषयों, कलाओं एवं तकनीकी ज्ञान की शिक्षा दी जाती है।
(ii) चरित्र निर्माण: विद्यालय बच्चों में नैतिकता, ईमानदारी, सहयोग और कर्तव्यनिष्ठा के गुण विकसित करता है।
(iii) सांस्कृतिक विकास: विद्यालय संस्कृति, परम्पराओं और मूल्यबोध को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
(iv) लोकतांत्रिक प्रशिक्षण: विद्यालय में बच्चों को लोकतांत्रिक जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है।
(v) आर्थिक एवं व्यावसायिक योग्यता: विद्यालय जीवनोपार्जन के लिए आवश्यक कौशलों का विकास करता है।
निष्कर्ष (Conclusion):
विद्यालय समाज की आत्मा है। यह बालक के सर्वांगीण विकास तथा एक सुशिक्षित, अनुशासित एवं उपयोगी नागरिक के निर्माण का केंद्र है। विद्यालय के बिना न तो व्यक्ति का समुचित विकास संभव है और न ही समाज की उन्नति।
संक्षेप में: “विद्यालय वह पवित्र स्थान है जहाँ बालक का सर्वांगीण विकास होता है और वह एक अच्छे नागरिक के रूप में समाज में योगदान देने योग्य बनता है।”
2. शिक्षा के एक मुख्य औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
विद्यालय के कार्यों की व्याख्या कीजिए। विद्यालय के चार प्रमुख कार्यों की व्याख्या कीजिए।
वैयक्तिक विकास के विचार से विद्यालय के कार्यों को लिखिए।
उत्तर: विद्यालय शिक्षा का प्रमुख औपचारिक अभिकरण है, जो बालक के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है।
इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं —
(i) बौद्धिक विकास: ज्ञान, बुद्धि, तर्कशक्ति और सृजनात्मक सोच का विकास करता है।
(ii) शारीरिक विकास: खेल-कूद, व्यायाम और स्वास्थ्य शिक्षा से शरीर को स्वस्थ व सशक्त बनाता है।
(iii) सामाजिक एवं नैतिक विकास: सहयोग, अनुशासन, सेवा, ईमानदारी और नागरिकता की भावना उत्पन्न करता है।
(iv) भावनात्मक एवं सौन्दर्यात्मक विकास: संगीत, चित्रकला, नाटक आदि से संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का विकास होता है।
निष्कर्ष: विद्यालय बालक के व्यक्तित्व के सभी पक्षों—शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और नैतिक—का विकास कर उसे एक आदर्श नागरिक बनाता है।
3. घर तथा विद्यालय में सम्बन्ध स्थापित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: घर और विद्यालय बालक के शिक्षा-जीवन के दो प्रमुख अभिकरण हैं। दोनों का उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है। इसलिए इन दोनों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध आवश्यक है।
घर और विद्यालय के सम्बन्ध स्थापित करने के मुख्य उपाय:
(i) अभिभावक – शिक्षक संघ (Parent-Teacher Association): विद्यालय में अभिभावक-शिक्षक संघ बनाकर दोनों के बीच सहयोग और विचार-विनिमय को बढ़ाया जा सकता है।
(ii) अभिभावक – सभा का आयोजन: समय-समय पर अभिभावकों को विद्यालय बुलाकर विद्यार्थियों की प्रगति और समस्याओं पर चर्चा की जानी चाहिए।
(iii) विद्यालय की गतिविधियों में अभिभावकों की भागीदारी: खेलकूद, उत्सव, प्रदर्शनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि में अभिभावकों को आमंत्रित कर भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
(iv) घर पर अध्ययन में सहयोग: अभिभावक घर पर बच्चों के अध्ययन, गृहकार्य और व्यवहार पर ध्यान दें तथा शिक्षकों के निर्देशों का पालन करें।
(v) संचार माध्यमों द्वारा सम्पर्क: पत्र, टेलीफोन, ईमेल, मैसेज आदि के माध्यम से शिक्षक और अभिभावक नियमित सम्पर्क बनाए रखें।
(vi) गृह भ्रमण (Home Visit): शिक्षक समय-समय पर विद्यार्थियों के घर जाकर उनके परिवेश और पारिवारिक स्थिति को समझें।
(vii) परामर्श एवं सहयोग: शिक्षक और अभिभावक मिलकर बालक की समस्याओं का समाधान करें और उसकी रुचि एवं क्षमता के अनुसार मार्गदर्शन दें।
निष्कर्ष: घर और विद्यालय के बीच सशक्त सम्बन्ध से बालक का समुचित विकास संभव है।
संक्षेप में: “बालक के विकास की सफलता तभी संभव है जब घर और विद्यालय दोनों एक-दूसरे के सहयोगी बनें।”

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