UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 23 सामाजिक विकास Solutions Hindi Medium As Per New Syllabus to each chapter is provided in the list so that you can easily browse throughout different chapters UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 23 सामाजिक विकास Notes and select need one. UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 23 सामाजिक विकास Question Answers Download PDF. UP Board Study Material of Class 11 Pedagogy.
UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 23 सामाजिक विकास
Also, you can read the UPMSP book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Uttar Pradesh Madhyamik Shiksha Parishad (UPMSP) Book guidelines. These solutions are part of UP Board All Subject Solutions. Here we have given UP Board Solutions For Class 11 Pedagogy in Hindi, UP Board of Secondary Education Course Pedagogy Notes in Hindi for All Chapter, You can practice these here.
सामाजिक विकास
Chapter: 23
| विस्तृत उत्तरीय प्रश्न |
1. सामाजिक विकास से आप क्या समझते हैं ? सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का भी उल्लेख कीजिए।
या
सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। बालक के सामाजिक विकास में पारिवारिक कारक और विद्यालयी कारक की भूमिका का वर्णन कीजिए।
या
सामाजिक विकास क्या है?
उत्तर: सामाजिक विकास का अर्थ: सामाजिक विकास (Social Development) से अभिप्राय व्यक्ति के समाज में रहने योग्य बनने की प्रक्रिया से है। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक समाज के नियमों, परंपराओं, मान्यताओं और मूल्यों को समझकर सामाजिक व्यवहार करना सीखता है।
अर्थात् सामाजिक विकास वह क्रमिक परिवर्तन है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति में सहयोग, सहानुभूति, अनुशासन, मित्रता, नेतृत्व, और दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है।
सामाजिक विकास की परिभाषाएँ:
(i) हाविगहर्स्ट (Havighurst) के अनुसार – “सामाजिक विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति समाज में अपने कर्तव्यों और अधिकारों को समझकर दूसरों के साथ समायोजन करना सीखता है।”
(ii) गैरेट (Garrett) के अनुसार – “सामाजिक विकास व्यक्ति के व्यवहार में सामाजिकता, सहयोग और अनुकूलन की प्रवृत्ति का विकास है।”
सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक:
(i) वंशानुगति (Heredity): व्यक्ति के स्वभाव, बुद्धि और अभिवृत्ति जैसी विशेषताएँ वंशानुगत होती हैं, जो सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
(ii) परिवार (Family): परिवार सामाजिक विकास का प्रथम विद्यालय है। माता-पिता के आचरण, अनुशासन, प्रेम और व्यवहार से बालक सामाजिक नियमों, सहयोग, और जिम्मेदारी का ज्ञान प्राप्त करता है।
(iii) विद्यालय (School): विद्यालय बालक को समाज में रहने, समूह में कार्य करने, सहयोग, अनुशासन, नेतृत्व, और सहिष्णुता जैसी सामाजिक गुणों का अभ्यास कराता है।
(iv) सामाजिक वातावरण (Social Environment): मित्र-मंडली, समुदाय, पड़ोस और समाज में रहने वाले लोग बालक के सामाजिक व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।
(v) धर्म और संस्कृति (Religion and Culture): सांस्कृतिक परंपराएँ, त्यौहार, रीति-रिवाज, और धार्मिक संस्कार सामाजिक बंधन और एकता की भावना को सशक्त बनाते हैं।
(vi) शिक्षा (Education): शिक्षा बालक को सामाजिक मूल्य, नैतिकता और सह-अस्तित्व की भावना सिखाती है।
(vii) आर्थिक स्थिति (Economic Status): परिवार की आर्थिक स्थिति सामाजिक अवसरों और अनुभवों को प्रभावित करती है, जिससे सामाजिक विकास पर प्रभाव पड़ता है।
(viii) मीडिया और संचार साधन (Mass Media): टेलीविज़न, इंटरनेट, समाचार पत्र आदि समाज के आदर्शों और व्यवहारों को बालक तक पहुँचाते हैं और उसके दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं।
बालक के सामाजिक विकास में पारिवारिक कारक की भूमिका:
(i) परिवार बालक का प्रथम समाजीकरण केंद्र है।
(ii) माता-पिता का प्रेम, अनुशासन और व्यवहार सामाजिक मूल्यों का आधार बनता है।
(iii) भाई-बहनों के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है।
(iv) परिवार के धार्मिक, सांस्कृतिक तथा नैतिक मूल्य बालक में सामाजिक चेतना उत्पन्न करते हैं।
बालक के सामाजिक विकास में विद्यालयी कारक की भूमिका:
(i) विद्यालय बालक को समूह में कार्य करना और दूसरों से सहयोग करना सिखाता है।
(ii) शिक्षक आदर्श सामाजिक व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
(iii) सहशिक्षण गतिविधियाँ (खेल, वाद-विवाद, नाटक) नेतृत्व, सहयोग और अनुशासन की भावना विकसित करती हैं।
(iv) विद्यालय बालक को समाज के नियमों, नैतिकता, और उत्तरदायित्व की शिक्षा देता है।
निष्कर्ष: सामाजिक विकास एक सतत प्रक्रिया है जो परिवार, विद्यालय और समाज के संयुक्त प्रयासों से होती है। इस विकास के द्वारा बालक एक जिम्मेदार, सहयोगी और समायोजनशील नागरिक बनता है, जो समाज के कल्याण में योगदान देता है।
| लघु उत्तरीय प्रश्न |
1. शैशवावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: शैशवावस्था में सामाजिक विकास (Social Development in Infancy):
नवजात शिशु में किसी प्रकार का सामाजिक विकास देखने को नहीं मिलता। क्रो एवं क्रो के अनुसार, “जन्म के समय शिशु न तो सामाजिक प्राणी होता है और न असामाजिक, परन्तु यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं बनी रहती। धीरे-धीरे शिशु अपनी माता या परिचारिका के सम्पर्क में आकर अनेक प्रतिक्रियाएँ प्रकट करता है। उसकी यह प्रतिक्रिया विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। उसका हर्ष एवं रुदन इसी के अनेक रूपों में से एक है। प्रथम मास तक शिशु साधारण आवाजें तथा मनुष्य की आवाज में कोई अन्तर नहीं कर पाता। परन्तु दूसरे मास में वह यह अन्तर जान जाता है। माता जब बच्चे को पुचकारती है तो वह मुस्कराने लगता है।
म्यूलर के अनुसार, दो मास के पश्चात् ही शिशु सामाजिक प्रतिक्रियाओं को प्रारम्भ करता है। उसके अनुसार दो मास के 60 प्रतिशत बालक माँ या परिचारिका के हट जाने पर रोने लगते हैं तथा माँ या पिता को देखकर मुस्कराने लगते हैं। चौथे मास तक शिशु उन बालकों तथा व्यक्तियों में रुचि दिखाने लगता है, जो उसके प्रति विशेष प्रेम प्रकट करते हैं। पाँचवें तथा छठे मास तक वह स्नेहपूर्ण व्यवहार तथा ताड़ना में अन्तर करने लगता है। जब उसे देखकर कोई मुस्कराता है तो वह मुस्कराने लग जाता है और यदि कोई डाँटता है तो वह रोने लग जाता है। सात या आठ मास का शिशु परिचित तथा अपरिचित में कुछ-कुछ भेद करने लग जाता है। नौ मास का शिशु प्रौढ़ों की विभिन्न क्रियाओं और शब्दों का अनुकरण करने का प्रयास करता है।
एक वर्ष का शिशु उन कार्यों को नहीं करता, जिनके लिए उसे मना किया जाता है। दो वर्ष की आयु के बालक अन्य व्यक्तियों के साथ किसी कार्य में सहयोग देने में विशेष आनन्द का अनुभव करते हैं। तीसरे वर्ष में बालक अपने साथियों के साथ खेलने में विशेष आनन्द लेता है। चार से छ: वर्ष का बालक अभिभावक के संरक्षण में रहकर कार्य करना चाहता है। अब वह नवीन मित्रों की तलाश में रहता है तथा सामूहिक खेल-कूद में उसे विशेष आनन्द आता है। इस अवस्था के शिशु में सामाजिकता का पर्याप्त विकास हो जाता है।
2. बाल्यावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: बाल्यावस्था में सामाजिक विकास (Social Development in Childhood):
बाल्यावस्था में सामाजिक विकास तीव्रता से होता है। प्राय: इस अवस्था के बालक ही विद्यालय में प्रवेश लेते हैं। विद्यालय में बालक अपने जैसे अनेक बालकों के सम्पर्क में आता है। यह सम्पर्क ही उसे सामाजिक प्राणी बनाता है। वह शीघ्रता से नवीन वातावरण के अनुकूल अपने को ढालने का प्रयास करता है। अनुकूलन के पश्चात् ही उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है तथा उसमें उत्तरदायित्व और स्वतन्त्रता की भावना का विकास होता है। इस अवस्था के बालकों का किसी-न-किसी टोली या समूह से सम्बन्ध होता है।
अपनी टोली के प्रति प्रत्येक बालक की अटूट श्रद्धा होती है। टोली की सदस्यता से ही बालक का सामाजिक विकास होता है। इस अवस्था में बालक के सामाजिक विकास पर सहपाठियों एवं मित्रों के अतिरिक्त कक्षा के अध्यापकों का भी गम्भीर प्रभाव पड़ता है। अध्यापकों द्वारा बालकों को अनेक सामाजिक सद्गुणों की जानकारी प्रदान की जाती है। विद्यालय आने-जाने के समय भी बालकों का सम्पर्क रिक्शा अथवा बस के साथियों आदि से होता है। इस सम्पर्क से भी उनके सामाजिक विकास में उल्लेखनीय योगदान प्राप्त होता है।
3. किशोरावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का उल्लेख कीजिए।
या
बालकों अथवा बालिकाओं में किशोरावस्था में होने वाले सामाजिक विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर: किशोरावस्था में सामाजिक विकास (Social Development in Adolescence):
किशोरावस्था में बालक अपने वातावरण के प्रति जागरूक हो जाता है और उसके सामाजिक विकास पर परिवार, साथियों तथा विद्यालय के वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। इस अवस्था में किशोर अपने को सम्मानित देखना चाहता है। वह चाहता है कि घर के अन्दर और घर के बाहर सब स्थानों पर उसे सम्मान मिले और इस सम्मान की प्राप्ति में वह प्रौढ़ों के समान व्यवहार करने लग जाता है। इस अवस्था में किशोर के सामाजिक व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। अब बाल्यकाल की चंचलता गम्भीरता में परिवर्तित हो जाती है। वह अपने आचरणों में दिखावट का प्रदर्शन करने लगता है। प्रत्येक किशोर अपनी आर्थिक स्थिति को अपने अन्य मित्रों से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का प्रयास करता है।
वह मित्रता के महत्त्व को भी समझने लगता है और अपनी रुचि के अनुकूल ही किसी किशोर को ही अपना घनिष्ठ मित्र बनाता है। किशोरावस्था में बालक बालिकाओं के प्रति तथा बालिकाएँ बालकों के प्रति आकर्षित होती हैं। इस आकर्षण के लिए वे अपने वस्त्र, वेशभूषा तथा प्रसाधनों के प्रति विशेष जागरूक रहते हैं। किशोर तथा किशोरियाँ किसी-न-किसी समुदाय के सदस्य बन जाते हैं। इन समुदायों का मूल उद्देश्य पिकनिक, भ्रमण, नाटक खेलना, नृत्य व संगीत द्वारा मनोरंजन करना होता है।
प्रत्येक किशोर अपने समूह या समुदाय के प्रति अटूट श्रद्धा रखता है तथा उसे परिवार और विद्यालय से भी अधिक महत्त्व देता है। इसके साथ-ही-साथ किशोर समुदाय का सदस्य बनकर उसके द्वारा स्वीकृत वेशभूषा, आचरण आदि को भी व्यवहार में लाता है। डॉ० सीताराम जायसवाल के अनुसार, “किशोर में अपने समुदाय की वेशभूषा, व्यवहार शैली और अनुकरण की प्रबल प्रवृत्ति होती है। समुदाय के प्रति सदस्यों की निष्ठा इतनी पक्की होती है कि वे पढ़ाई और परिवार के आवश्यक कार्य भी छोड़कर समुदाय के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। सदस्यों के व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन के मूल्यों पर समुदायों की गहरी छाप । रहती है।’ समुदाय का सदस्य बनकर ही किशोर नेतृत्व की शिक्षा प्राप्त करता है तथा उसमें उत्साह, सहयोग, सहानुभूति आदि सामाजिक गुणों का विकास होता है।

Hi, I’m Dev Kirtonia, Founder & CEO of Dev Library. A website that provides all SCERT, NCERT 3 to 12, and BA, B.com, B.Sc, and Computer Science with Post Graduate Notes & Suggestions, Novel, eBooks, Biography, Quotes, Study Materials, and more.
Subject Ka Complete Video Solution Dekhein
Step-by-step easy concept explanation aur full questions Answer ke liye watch karein ya app download karein:

