UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 22 संवेगात्मक विकास

UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 22 संवेगात्मक विकास Solutions Hindi Medium As Per New Syllabus to each chapter is provided in the list so that you can easily browse throughout different chapters UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 22 संवेगात्मक विकास Notes and select need one. UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 22 संवेगात्मक विकास Question Answers Download PDF. UP Board Study Material of Class 11 Pedagogy.

UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 22 संवेगात्मक विकास

Also, you can read the UPMSP book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Uttar Pradesh Madhyamik Shiksha Parishad (UPMSP) Book guidelines. These solutions are part of UP Board All Subject Solutions. Here we have given UP Board Solutions For Class 11 Pedagogy in Hindi, UP Board of Secondary Education Course Pedagogy Notes in Hindi for All Chapter, You can practice these here.

Chapter: 22

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. संवेग का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। संवेगों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: संवेग का अर्थ: संवेग (Emotion) शब्द ‘एमोवेरे’ (Emovere) नामक लैटिन शब्द से बना है, जिसका अर्थ है — हिलाना या आंदोलित करना। जब किसी व्यक्ति की भावनाएँ किसी परिस्थिति, घटना या वस्तु से प्रभावित होकर उसके मन में तीव्र उत्तेजना उत्पन्न करती हैं, तो उसे संवेग कहा जाता है। अर्थात् संवेग एक ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति का मन, शरीर और व्यवहार किसी बाह्य या आन्तरिक उद्दीपन के प्रभाव से तीव्र रूप से प्रभावित हो जाता है।

संवेग की परिभाषाएँ:

(i) क्रोच और लिंडसे (Crow & Lindzey) के अनुसार -“संवेग वह अवस्था है जिसमें तीव्र उत्तेजना के कारण व्यक्ति के व्यवहार में अचानक परिवर्तन होता है।”

(ii) वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार –“संवेग शरीर की उत्तेजना या आंदोलन की वह अवस्था है जो किसी उद्दीपन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है।”

(iii) गैरेट (Garrett) के अनुसार –“संवेग वह जटिल मानसिक अवस्था है जो किसी उत्तेजना के परिणामस्वरूप उत्पन्न होकर व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक कार्यों को प्रभावित करती है।”

संवेग की मुख्य विशेषताएँ:

(i) अल्पकालिक अवस्था – संवेग स्थायी नहीं होते, ये कुछ समय के लिए ही उत्पन्न होते हैं।

(ii) तीव्र मानसिक प्रतिक्रिया – संवेग व्यक्ति की मानसिक स्थिति को तीव्र रूप से प्रभावित करते हैं।

(iii) शारीरिक परिवर्तन – संवेगों के समय शरीर में हृदय की गति, श्वास, रक्तचाप, पसीना आदि में परिवर्तन होते हैं।

(iv) व्यवहार में परिवर्तन – संवेग व्यक्ति के बोलने, चलने, सोचने और निर्णय लेने के व्यवहार को बदल देते हैं।

(v) सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप – संवेग जैसे– प्रेम, आनंद, करुणा (सकारात्मक) तथा क्रोध, भय, घृणा (नकारात्मक) दोनों प्रकार के हो सकते हैं।

(vi) सामान्य मानवीय अनुभव – प्रत्येक व्यक्ति में संवेग होते हैं; ये सार्वभौमिक मानवीय अनुभव हैं।

(vii) संवेग नियंत्रण योग्य हैं – व्यक्ति अभ्यास, शिक्षा और आत्मसंयम के द्वारा अपने संवेगों को नियंत्रित कर सकता है।

निष्कर्ष: संवेग मानव जीवन का आवश्यक अंग हैं। ये व्यक्ति को क्रियाशील बनाते हैं, उसके व्यवहार को दिशा देते हैं तथा उसके व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

2. संवेगात्मक विकास से क्या आशय है? संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को उल्लेख कीजिए।

या

उन कारकों का उल्लेख कीजिए,जो संवेगात्मक विकास पर प्रभाव डालते हैं।

उत्तर: संवेगात्मक विकास का अर्थ: संवेगात्मक विकास (Emotional Development) से आशय व्यक्ति के संवेगों के क्रमिक, संतुलित एवं परिपक्व रूप में विकसित होने की प्रक्रिया से है।

बालक जन्म के समय अस्थिर और तीव्र संवेगों से युक्त होता है, परंतु जैसे-जैसे उसका अनुभव, समझ, और सामाजिक संबंध बढ़ते हैं, वैसे-वैसे वह अपने संवेगों को नियंत्रित करना, उचित रूप से व्यक्त करना और दूसरों की भावनाओं को समझना सीखता है। यही प्रक्रिया संवेगात्मक विकास कहलाती है।

संवेगात्मक विकास की परिभाषाएँ:

(i) हाविगहर्स्ट (Havighurst) के अनुसार -“संवेगात्मक विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने संवेगों को पहचानना, व्यक्त करना और नियंत्रित करना सीखता है।”

(ii) क्रो और क्रो (Crow & Crow) के अनुसार –“संवेगात्मक विकास का तात्पर्य व्यक्ति में संवेगों की तीव्रता, दिशा और संतुलन के निर्माण से है।”

संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक:

(i) वंशानुगति (Heredity): संवेगों की तीव्रता, सहनशीलता और प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति कुछ हद तक वंशानुगत होती है। बच्चे अपने माता-पिता के स्वभाव से प्रभावित होते हैं।

(ii) परिवार (Family): परिवार संवेगात्मक विकास का पहला एवं प्रमुख वातावरण है। माता-पिता का प्रेम, अनुशासन, सहयोग, और वातावरण बच्चे के संवेगों को स्थिर एवं संतुलित बनाते हैं।

(iii) सामाजिक वातावरण (Social Environment): मित्र, विद्यालय, समुदाय आदि से प्राप्त सामाजिक अनुभव संवेगात्मक परिपक्वता को बढ़ाते हैं। सकारात्मक सामाजिक संपर्क संवेगों को नियंत्रित करना सिखाता है।

(iv) शिक्षा (Education): विद्यालय में शिक्षक, अनुशासन, सहशिक्षण गतिविधियाँ तथा खेलकूद संवेगात्मक विकास में सहयोग करते हैं।

(v) आर्थिक स्थिति (Economic Condition): परिवार की आर्थिक स्थिति भी संवेगात्मक स्थिरता को प्रभावित करती है। गरीबी या असुरक्षा की भावना से बालक में भय, चिंता आदि संवेग अधिक उत्पन्न होते हैं।

(vi) स्वास्थ्य (Health): शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य संवेगों पर गहरा प्रभाव डालता है। स्वस्थ व्यक्ति सामान्यतः अधिक संतुलित एवं प्रसन्नचित्त होता है।

(vii) अनुभव एवं प्रशिक्षण (Experience and Training): जीवन के विविध अनुभव व्यक्ति को संवेगों पर नियंत्रण और उचित अभिव्यक्ति का अभ्यास कराते हैं।

(viii) धर्म एवं संस्कृति (Religion and Culture): सांस्कृतिक परंपराएँ और धार्मिक मान्यताएँ व्यक्ति को भावनात्मक संयम, सहानुभूति एवं करुणा का अभ्यास कराती हैं।

निष्कर्ष: संवेगात्मक विकास एक सतत प्रक्रिया है जो व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास का आधार है। उचित वातावरण, शिक्षा, और परिवारिक सहयोग से संवेगात्मक संतुलन तथा परिपक्वता प्राप्त की जा सकती है।

NEW VIDEO CLASS

Subject Ka Complete Video Solution Dekhein

Step-by-step easy concept explanation aur full questions Answer ke liye watch karein ya app download karein:

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Scroll to Top