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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 18 बाल-विकास की अवस्थाएँ
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बाल-विकास की अवस्थाएँ
Chapter: 18
| विस्तृत उत्तरीय प्रश्न |
1. शैशवावस्था से क्या आशय है? शैशवावस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: शैशवावस्था का अर्थ: ‘शैशवावस्था’ बालक के जीवन की वह अवस्था है जो जन्म से लेकर लगभग 6 वर्ष की आयु तक रहती है। इस अवस्था में बालक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं भावनात्मक दृष्टि से तीव्र गति से विकास करता है। यह अवस्था जीवन की नींव कहलाती है, क्योंकि इसी में व्यक्ति के भविष्य के व्यक्तित्व का निर्माण प्रारम्भ होता है।
शैशवावस्था की मुख्य विशेषताएँ:
(i) तीव्र शारीरिक विकास: इस अवस्था में बालक का शारीरिक विकास बहुत तेजी से होता है। उसका भार, लंबाई तथा मस्तिष्क का आकार शीघ्र बढ़ता है।
(ii) इन्द्रिय एवं संवेदी विकास: बालक की इन्द्रियाँ (देखना, सुनना, छूना आदि) तीव्र गति से विकसित होती हैं। वह अपने आसपास की वस्तुओं को जानने और पहचानने लगता है।
(iii) भाषा विकास: शैशवावस्था में बालक बोलना सीखता है। प्रारम्भ में वह शब्दों की नकल करता है और फिर धीरे-धीरे वाक्य बोलने लगता है।
(iv) अनुकरण की प्रवृत्ति: बालक इस अवस्था में अपने माता-पिता, भाई-बहन या शिक्षकों की क्रियाओं की नकल करता है। यह उसकी सीखने की मुख्य विधि होती है।
(v) खेल की प्रवृत्ति: खेल शैशवावस्था की प्रमुख गतिविधि है। बालक खेल के माध्यम से सामाजिक व्यवहार, भाषा और सहयोग की भावना सीखता है।
(vi) भावनात्मक अस्थिरता: इस अवस्था में बालक की भावनाएँ तीव्र और शीघ्र परिवर्तनीय होती हैं। वह कभी रोने लगता है तो कभी हँसने।
(vii) सामाजिकता का प्रारम्भ: बालक इस अवस्था में दूसरों के सम्पर्क में आकर ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद समझने लगता है। परिवार ही उसका पहला सामाजिक परिवेश बनता है।
(viii) नैतिकता की नींव: अच्छे-बुरे, सही-गलत का ज्ञान इसी अवस्था में परिवार के अनुभवों और अनुशासन के माध्यम से विकसित होता है।
निष्कर्ष: शैशवावस्था जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था है, क्योंकि इसी में व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की नींव रखी जाती है। उचित शिक्षा, प्रेमपूर्ण व्यवहार और अनुकूल वातावरण इस अवस्था में बालक के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक हैं।
2. शैशवावस्था में दी जाने वाली शिक्षा का सामान्य परिचय दीजिए।
या
शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए? समझाइए।
उत्तर: शैशवावस्था में शिक्षा का सामान्य परिचय / शिक्षा का स्वरूप:
शैशवावस्था (जन्म से लगभग 6 वर्ष तक) बालक के जीवन की सबसे कोमल और आधारभूत अवस्था होती है। इस अवस्था में बालक सीखने की अत्यधिक क्षमता रखता है, परन्तु उसका मन अत्यन्त चंचल और अनुकरणशील होता है। इसलिए इस अवस्था में दी जाने वाली शिक्षा स्वाभाविक, खेल-आधारित, प्रेमपूर्ण तथा अनुभवात्मक होनी चाहिए।
शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप निम्नलिखित होना चाहिए –
(i) स्वाभाविक एवं अनुभवात्मक शिक्षा: बालक को वही बातें सिखाई जाएँ जो वह अपने अनुभव और क्रियाओं से समझ सके। शिक्षा जीवन से जुड़ी हो, पुस्तकीय न हो।
(ii) खेल-आधारित शिक्षा: इस अवस्था में बालक खेल के माध्यम से सबसे अधिक सीखता है। इसलिए शिक्षा को खेल-कूद, कहानियों, चित्रों और गतिविधियों के रूप में देना चाहिए।
(iii) प्रेमपूर्ण वातावरण: बालक के चारों ओर ऐसा वातावरण होना चाहिए जिसमें वह भयमुक्त होकर सीख सके। शिक्षक और अभिभावक का व्यवहार स्नेहपूर्ण और सहयोगात्मक होना चाहिए।
(iv) इन्द्रियों के माध्यम से शिक्षा: बालक अपनी इन्द्रियों के माध्यम से सीखता है, इसलिए उसे देखने, सुनने, छूने, सूँघने और बोलने के अवसर दिए जाएँ।
(v) भाषा विकास पर बल: इस अवस्था में भाषा का तीव्र विकास होता है, अतः बालक को सरल, स्पष्ट और सही भाषा सुनने तथा बोलने के अवसर मिलने चाहिए।
(vi) सामाजिक एवं नैतिक मूल्य शिक्षा: बालक को परिवार, सहयोग, अनुशासन, सत्य, प्रेम, और सहायता जैसे मूल्यों की शिक्षा व्यवहार और उदाहरणों से देनी चाहिए।
(vii) व्यक्तिगत भिन्नता का ध्यान: प्रत्येक बालक की गति, रुचि और क्षमता अलग होती है। अतः शिक्षा बालक की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार दी जानी चाहिए।
(viii) स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की शिक्षा: बालक को शरीर की स्वच्छता, स्वास्थ्य, उचित भोजन और नींद के महत्त्व के बारे में प्रारम्भिक ज्ञान दिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष: शैशवावस्था की शिक्षा का उद्देश्य बालक के सर्वांगीण विकास — शारीरिक, मानसिक, भाषाई, सामाजिक और नैतिक — को सुनिश्चित करना है। इस अवस्था में शिक्षा का स्वरूप कठोर अनुशासन या परीक्षा नहीं, बल्कि खेल, प्रेम और अनुभव पर आधारित होना चाहिए ताकि बालक आनंदपूर्वक सीख सके।
3. बाल्यावस्था से क्या आशय है? बाल्यावस्था की मुख्य विशेषताओं का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बाल्यावस्था से आप क्या समझते हैं? इस अवस्था में भाषा के विकास का निरूपण कीजिए।
उत्तर: बाल्यावस्था का अर्थ: ‘बाल्यावस्था’ उस अवधि को कहा जाता है जो लगभग 6 वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक रहती है। यह अवस्था शैशवावस्था के बाद आती है और किशोरावस्था से पहले की अवधि होती है। इस समय बालक विद्यालय में प्रवेश करता है, सामाजिक जीवन में सक्रिय होता है तथा ज्ञान, भाषा और नैतिकता के क्षेत्र में तीव्र विकास करता है। इस अवस्था को “विद्यालयीन अवस्था” भी कहा जाता है।
बाल्यावस्था की मुख्य विशेषताएँ:
(i) शारीरिक विकास: इस अवस्था में शारीरिक वृद्धि नियमित और संतुलित होती है। शरीर की मांसपेशियाँ सशक्त होने लगती हैं और बालक खेल-कूद तथा शारीरिक क्रियाओं में सक्रिय रहता है।
(ii) मानसिक विकास: बालक की बुद्धि, स्मृति, तर्क एवं कल्पना शक्ति विकसित होती है। वह वस्तुओं का कारण जानने का प्रयास करता है और प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति प्रबल होती है।
(iii) भाषा विकास: इस अवस्था में बालक की भाषा तेजी से विकसित होती है। वह सही उच्चारण, व्याकरण, वाक्य-रचना एवं शब्दों का प्रयोग सीखता है। विद्यालय और साथियों के संपर्क से उसका शब्द-भंडार बढ़ता है तथा अभिव्यक्ति क्षमता में सुधार होता है।
(iv) सामाजिक विकास: बालक घर से बाहर आकर साथियों, शिक्षकों और समाज के अन्य लोगों के संपर्क में आता है। वह सहयोग, अनुशासन, समूह-कार्य और मित्रता का अर्थ समझने लगता है।
(v) नैतिक विकास: बालक सही और गलत का भेद सीखने लगता है। उसे सत्य, न्याय, ईमानदारी, नियमों का पालन आदि का ज्ञान मिलने लगता है।
(vi) भावनात्मक स्थिरता: शैशवावस्था की तुलना में बाल्यावस्था में बालक की भावनाएँ अधिक स्थिर और नियंत्रित होती हैं।
(vii) खेल की रुचि: खेल बाल्यावस्था की प्रमुख आवश्यकता है। खेल के माध्यम से बालक में सहयोग, नेतृत्व और प्रतियोगिता की भावना विकसित होती है।
(viii) ज्ञान की जिज्ञासा: बालक इस अवस्था में अत्यन्त जिज्ञासु होता है। वह हर वस्तु और घटना के कारण को जानना चाहता है – “यह क्यों?”, “कैसे?” जैसी प्रश्नावली उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।
निष्कर्ष: बाल्यावस्था व्यक्ति के जीवन की नींव मजबूत करने वाली अवस्था है। इस काल में बालक का शारीरिक, मानसिक, भाषाई, सामाजिक और नैतिक विकास संतुलित रूप से होता है। अतः इस अवस्था में उचित मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वह एक सुदृढ़ एवं संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण कर सके।
4. बाल्यावस्था में दी जाने वाली शिक्षा के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप: बाल्यावस्था (6 से 12 वर्ष) में दी जाने वाली शिक्षा बालक के सर्वांगीण विकास पर केन्द्रित होनी चाहिए।
इस अवस्था में शिक्षा का स्वरूप निम्नलिखित होना चाहिए —
(i) अनुभवात्मक शिक्षा: बालक को देखकर, सुनकर और करके सीखने के अवसर दिए जाएँ।
(ii) रुचिकर एवं खेल – आधारित शिक्षा: शिक्षा खेल, कहानी और क्रियाओं के माध्यम से दी जाए।
(iii) बौद्धिक विकास पर बल: सोचने, समझने और तर्क करने की क्षमता का विकास किया जाए।
(iv) भाषा विकास: पठन, लेखन और बोलने के अभ्यास पर ध्यान दिया जाए।
(v) नैतिक व सामाजिक शिक्षा: अनुशासन, सहयोग, सत्य और ईमानदारी जैसे गुणों का विकास किया जाए।
(vi) शारीरिक शिक्षा: खेल-कूद, योग और स्वच्छता पर बल दिया जाए।
निष्कर्ष: बाल्यावस्था की शिक्षा जीवनोपयोगी, आनंदमय और विकासोन्मुख होनी चाहिए ताकि बालक एक संतुलित और सक्षम नागरिक बन सके।

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