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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 17 विकास की प्रक्रिया
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विकास की प्रक्रिया
Chapter: 17
| विस्तृत उत्तरीय प्रश्न |
1. ‘विकास’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विकास में होने वाले परिवर्तनों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर: विकास का अर्थ, परिभाषा एवं परिवर्तन:
विकास का अर्थ: विकास एक ऐसी सतत और क्रमिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक पक्षों में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। यह केवल आकार या रूप में वृद्धि नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की संपूर्णता में परिवर्तन है।
परिभाषाएँ:
(i) क्रो और क्रो (Crow & Crow): “विकास वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने अनुभवों तथा पर्यावरण के साथ समायोजन करता है।”
(ii) हर्लॉक (Hurlock): “विकास व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक उसकी संपूर्ण क्षमताओं की क्रमिक अभिवृद्धि की प्रक्रिया है।”
विकास में होने वाले परिवर्तन:
(i) शारीरिक परिवर्तन – शरीर, लंबाई, वजन, इन्द्रियों का विकास।
(ii) मानसिक परिवर्तन – बुद्धि, तर्कशक्ति, स्मृति का विकास।
(iii) भावनात्मक परिवर्तन – भावनाओं का नियंत्रण एवं परिपक्वता।
(iv) सामाजिक परिवर्तन – दूसरों से संबंध स्थापित करने की क्षमता।
(v) नैतिक परिवर्तन – सही-गलत का ज्ञान एवं नैतिक मूल्यों की भावना।
2. विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
विकास के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए तथा उनका शैक्षिक महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: विकास के मुख्य सिद्धान्त एवं शैक्षिक महत्त्व:
मुख्य सिद्धान्त:
(i) विकास क्रमिक होता है – यह अचानक नहीं, धीरे-धीरे होता है।
(ii) विकास का क्रम निश्चित होता है – सिर से पाँव तक तथा केन्द्र से बाहर की ओर होता है।
(iii) विकास सतत प्रक्रिया है – यह जीवनभर चलता रहता है।
(iv) विकास सार्वभौमिक है, पर गति में भिन्नता होती है।
(v) विकास विभिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्धित होता है।
(vi) विकास उत्तराधिकार (वंशानुगति) और वातावरण दोनों पर निर्भर करता है।
शैक्षिक महत्त्व:
(i) शिक्षक को विद्यार्थियों की आयु एवं क्षमता के अनुसार शिक्षण करने में सहायता मिलती है।
(ii) विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु उचित गतिविधियाँ योजनाबद्ध की जा सकती हैं।
(iii) बालक के विकास के चरणों के अनुसार पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ तय की जा सकती हैं।
3. विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। या विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: विकास को प्रभावित करने वाले कारक:
मुख्य कारक:
(i) वंशानुगति (Heredity): माता-पिता से प्राप्त गुण – जैसे बुद्धि, शरीर की बनावट आदि।
(ii) पर्यावरण (Environment): परिवार, विद्यालय, समाज, संस्कृति आदि का प्रभाव।
(iii) पोषण (Nutrition): उचित आहार से शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है।
(iv) अभ्यास एवं शिक्षा (Training & Education): अनुभव और शिक्षण से बौद्धिक व सामाजिक विकास होता है।
संक्षेप में: विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जो वंशानुगति, वातावरण, पोषण और शिक्षा जैसे कारकों से प्रभावित होकर व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को रूप प्रदान करती है।
| लघु उत्तरीय प्रश्न |
1. विकास के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: विकास के मुख्य कारण (Main Causes of Development):
(i) विकास की प्रक्रिया के मुख्य कारण निम्नलिखित हैंपरिपक्वीकरण – परिपक्वीकरण का अर्थ होता है-स्वाभाविक विकास। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को वंशानुगत रूप से प्राप्त शील गुणों को, जो उसके अन्दर विद्यमान हैं, का विकास ही परिपक्वता है। प्रायः यह देखा गया है कि परिपक्वता के आधार पर बालक में एकाएक शील गुण प्रकट होते हैं। हरलॉक ने परिपक्वता की परिभाषा देते हुए लिखा है-”परिपक्वता से तात्पर्य वंशानुक्रम के प्रभाव के कारण व्यक्ति में शील गुणों के प्रभावी विकास से है, जिनकी व्यक्ति में जन्म के समय क्षमता होती है।” संक्षेप में, बालक के शील गुणों का स्पष्टीकरण ही परिपक्वता है। यह मानव के विकास की अनवरत प्रक्रिया है। आयु के विकास के साथ-साथ जैसे-जैसे बालक परिपक्व होता जाता है, वैसे ही उसमें कुछ विशेषताएँ स्पष्ट होती जाती हैं तथा परिपक्वता के साथ-साथ शरीर में विभिन्न क्रियाओं के लिए क्षमता भी उत्पन्न होती जाती है।
(ii) सीखना – सीखने को अधिगम (Learning) भी कहा जाता है। जन्म लेने के पश्चात् बालक अपने को एक विशेष प्रकार के भौतिक तथा सामाजिक वातावरण से घिरा पाता है। बालक की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति इस भौतिक और सामाजिक वातावरण के अन्दर ही होती है, परन्तु इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को अपने वातावरण में कुछ-न-कुछ संघर्ष अथवा अनुकूलन करना पड़ता है। इस प्रकार के अनुकूलन के लिए वह गत अनुभवों की सहायता से अपने व्यवहार में परिवर्तन लाता है और इस प्रकार सीख जाता है। गेट्स (Gates) के अनुसार, “अनुभवों और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन करना ही सीखना है।’ अनुभव जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है और इससे लाभ ” उठाकर व्यक्ति अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है। अतः सीखना परिवर्तन है। सीखना एक विकास भी है, जिसका कभी अन्त नहीं होता। जीवन-पथ के प्रत्येक कदम पर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है।
2. विकास तथा वृद्धि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: वृद्धि और विकास में अन्तर (Difference between Growth and Development):
| क्रमांक | वृद्धि (Growth) | विकास (Development) |
| 1. | वृद्धि का अर्थ शरीर के आकार, ऊँचाई, वजन आदि में वृद्धि से है। | विकास का अर्थ व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व में परिवर्तन से है। |
| 2. | यह केवल शारीरिक परिवर्तन है। | यह शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और नैतिक सभी पहलुओं से जुड़ा होता है। |
| 3. | वृद्धि मात्रात्मक (Quantitative) होती है। | विकास गुणात्मक (Qualitative) होता है। |
| 4. | वृद्धि एक निश्चित आयु तक होती है। | विकास जीवनभर चलता रहता है। |
| 5. | वृद्धि को मापा जा सकता है, जैसे—लंबाई, वजन आदि। | विकास को केवल अवलोकन और व्यवहार से आंका जा सकता है। |
| 6. | वृद्धि विकास का एक अंग है। | विकास वृद्धि से व्यापक है। |
संक्षेप में: वृद्धि शरीर के आकार में परिवर्तन है, जबकि विकास व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व में गुणात्मक परिवर्तन है।
अतः कहा जा सकता है- “विकास एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें वृद्धि उसका एक भाग मात्र है।”
3. विकास के मुख्य रूपों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर: विकास के मुख्य रूप (Main Kinds of Development):
व्यक्ति का विकास अपने आप में समग्रता का विकास है। उसके भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले विकास को विकास के विभिन्न रूप कहा जाता है।
विकास के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं:
(i) शारीरिक विकास – शरीर सम्बन्धी विकास को शारीरिक विकास कहा जाता है। विकास के इस रूप के अन्तर्गत मुख्य रूप से शरीर के अंगों में आने वाली परिपक्वता का अध्ययन किया जाता है। शरीर के अंगों में परिपक्वता आने के साथ-ही-साथ उनकी क्रियाशीलता में भी वृद्धि होती है।
(ii) मानसिक विकास – व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं में होने वाले विकास को मानसिक विकास के रूप में जाना जाता है।
(iii) संवेगात्मक विकास – व्यक्ति के संवेगों में स्थिरता एवं परिपक्वता के गुण के विकास को संवेगात्मक विकास के रूप में जाना जाता है।
(iv) सामाजिक विकास – व्यक्ति के समाजीकरण के परिणामस्वरूप कुछ सामाजिक सद्गुणों का आविर्भाव होता है। सामाजिक गुणों के इस विकास को ही सामाजिक विकास के रूप में जाना जाता है।
(v) नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास – नैतिक गुणों के प्रति सचेत होना तथा चरित्र को दृढ़ता प्राप्त होना ही नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास कहलाता है।
(vi) भाषागत विकास – भाषा के सीखने, बोलने आदि को भाषागत विकास कहा जाता है।

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