UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 19 शारीरिक विकास

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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 19 शारीरिक विकास

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Chapter: 19

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. शारीरिक विकास का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शारीरिक विकास का अर्थ: शारीरिक विकास से अभिप्राय व्यक्ति के शरीर में होने वाली वृद्धि, परिवर्तन तथा परिपक्वता से है। इसमें शरीर की ऊँचाई, भार, मांसपेशियों, हड्डियों, अंगों और इन्द्रियों की वृद्धि एवं सुदृढ़ता शामिल होती है। यह विकास जन्म से लेकर युवावस्था तक निरंतर चलता रहता है। शारीरिक विकास ही मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास का आधार बनता है।

शारीरिक विकास की प्रमुख विशेषताएँ:

(i) वृद्धि की निरंतरता: जन्म से लेकर युवावस्था तक शरीर निरंतर बढ़ता और परिपक्व होता रहता है, यद्यपि इसकी गति अलग-अलग आयु में भिन्न होती है।

(ii) वृद्धि में व्यक्तिगत भिन्नता: प्रत्येक बालक का शारीरिक विकास समान नहीं होता। आनुवंशिकता, भोजन, स्वास्थ्य और वातावरण के अनुसार यह भिन्न हो सकता है।

(iii) अनुपात में परिवर्तन: विकास के साथ शरीर के विभिन्न अंगों का अनुपात बदलता है — जैसे सिर के आकार की तुलना में शरीर लंबा होता जाता है।

(iv) मांसपेशियों का विकास: शैशवावस्था से किशोरावस्था तक मांसपेशियाँ मजबूत और नियंत्रित होती हैं, जिससे बच्चे की गतिशीलता और कार्य करने की क्षमता बढ़ती है।

(v) लैंगिक विकास: किशोरावस्था में यौन अंगों का विकास होता है, जिससे लड़के और लड़कियों के शरीर में स्पष्ट भिन्नताएँ दिखाई देने लगती हैं।

(vi) स्वास्थ्य और पोषण का प्रभाव: उचित आहार, स्वच्छता, नींद और व्यायाम से शारीरिक विकास की गति तेज होती है, जबकि कुपोषण और बीमारियाँ इसे बाधित करती हैं।

(vii) संतुलित विकास का महत्त्व: शरीर के सभी अंगों और क्रियाओं का संतुलित विकास होना आवश्यक है ताकि व्यक्ति स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सके।

निष्कर्ष: शारीरिक विकास व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व की नींव है। यदि बाल्यावस्था और किशोरावस्था में सही आहार, व्यायाम, स्वच्छता और उचित वातावरण मिले, तो शारीरिक विकास स्वस्थ, संतुलित और पूर्ण रूप में होता है।

2. शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

या

बालकों के शारीरिक विकास पर किन-किन कारकों का प्रभाव पड़ता है? किन्हीं दो कारकों का उल्लेख कीजिए।

या

शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से कारक हैं? इन कारकों का ज्ञान एक बाल-मनोवैज्ञानिक के लिए किस प्रकार लाभदायक है।

या

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों की सविस्तार व्याख्या कीजिए।

उत्तर: शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक: शारीरिक विकास केवल जन्मजात गुणों का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह आनुवंशिक, जैविक, पोषणीय, सामाजिक और पर्यावरणीय कारकों के संयुक्त प्रभाव से होता है। इन कारकों का ज्ञान एक बाल-मनोवैज्ञानिक के लिए आवश्यक है, क्योंकि इससे वह बालक के विकास को समझकर उचित दिशा और मार्गदर्शन दे सकता है।

मुख्य कारक जो शारीरिक विकास को प्रभावित करते हैं —

(i) आनुवंशिकता (Heredity): बालक का शरीर, लंबाई, रंग, स्वास्थ्य तथा अंगों की बनावट माता-पिता से प्राप्त गुणों पर निर्भर करती है। यह शारीरिक विकास का सबसे प्रमुख आधार है।

(ii) पोषण (Nutrition): संतुलित आहार शरीर की वृद्धि, हड्डियों की मजबूती और ऊर्जा के लिए आवश्यक है। कुपोषण से विकास रुक जाता है और रोग बढ़ते हैं।

(iii) स्वास्थ्य (Health): नियमित स्वास्थ्य, स्वच्छता, नींद और व्यायाम से शरीर का विकास अच्छा होता है, जबकि बार-बार बीमार पड़ने से विकास की गति धीमी पड़ जाती है।

(iv) पर्यावरण (Environment): स्वच्छ, शांत, प्राकृतिक और प्रेमपूर्ण वातावरण बालक के शारीरिक विकास में सहायक होता है। प्रदूषण और भीड़भाड़ वाला वातावरण हानिकारक है।

(v) सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति: सम्पन्न परिवारों में बच्चों को अच्छा भोजन, चिकित्सा और खेलकूद के अवसर मिलते हैं, जिससे उनका विकास अच्छा होता है, जबकि गरीब परिवारों में यह सीमित रहता है।

(vi) व्यायाम एवं शारीरिक गतिविधियाँ: नियमित खेल-कूद, योग और शारीरिक श्रम से मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और शरीर स्वस्थ रहता है।

(vii) लिंग (Sex): लड़के और लड़कियों का शारीरिक विकास भिन्न गति से होता है; लड़कियों में यह प्रायः पहले प्रारम्भ होता है।

(viii) नींद और विश्राम: पर्याप्त नींद से शरीर की ऊर्जा पुनः प्राप्त होती है और कोशिकाओं की वृद्धि होती है।

बाल-मनोवैज्ञानिक के लिए महत्त्व:

शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का ज्ञान बाल-मनोवैज्ञानिक को यह समझने में सहायता करता है कि —

(i) बालक का विकास सामान्य है या नहीं।

(ii) किन परिस्थितियों में सुधार कर उसके विकास को संतुलित बनाया जा सकता है।

(iii) शिक्षा और वातावरण को बालक की आवश्यकताओं के अनुसार ढाला जा सकता है।

निष्कर्ष: शारीरिक विकास कई कारकों के सामूहिक प्रभाव से होता है। यदि बालक को उचित आहार, स्वास्थ्य, व्यायाम, स्वच्छ वातावरण और स्नेहपूर्ण देखभाल मिले, तो उसका शारीरिक विकास स्वस्थ और संतुलित रूप से होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. शैशवावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: (संक्षिप्त): 

शैशवावस्था में शारीरिक विकास: शैशवावस्था जन्म से 6 वर्ष तक की अवधि होती है, जिसमें बालक का शारीरिक विकास तीव्र होता है।

मुख्य विशेषताएँ:

(i) लंबाई और वजन: शरीर तेजी से बढ़ता है; जन्म के समय लगभग 3 किग्रा और 50–52 सेमी से पाँच वर्ष तक ऊँचाई ~100 सेमी और वजन लगभग 15 किग्रा तक बढ़ता है।

(ii) मस्तिष्क विकास: मस्तिष्क लगभग 90% तक विकसित होता है।

(iii) इन्द्रियों का विकास: देखने, सुनने, छूने आदि इन्द्रियाँ सक्रिय होती हैं।

(iv) मांसपेशियों का विकास: बैठना, रेंगना, चलना और दौड़ना सीखता है।

(v) दाँतों का विकास: लगभग 6 महीने से दूध के दाँत निकलते हैं।

(vi) नींद और स्वास्थ्य: पर्याप्त नींद, पौष्टिक भोजन और स्वच्छता आवश्यक हैं।

निष्कर्ष: सही पोषण, स्वास्थ्य और प्रेमपूर्ण देखभाल से शैशवावस्था में बालक का शारीरिक विकास स्वस्थ और संतुलित होता है।

2. बाल्यावस्था में होने वाले शारीरिक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: बाल्यावस्था में शारीरिक विकास: बाल्यावस्था लगभग 6 से 12 वर्ष की आयु तक की अवधि होती है। इस अवस्था में शारीरिक विकास शैशवावस्था की तुलना में धीमा लेकिन नियमित और संतुलित होता है। बच्चे की हड्डियाँ, मांसपेशियाँ और अंग मजबूत होते हैं, और उसे खेल-कूद व शारीरिक गतिविधियों में अधिक रुचि होती है।

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास के मुख्य बिंदु:

(i) ऊँचाई और वजन में वृद्धि: बालक की लंबाई और वजन धीरे-धीरे बढ़ता है। इस समय वृद्धि की दर शैशवावस्था की तुलना में धीमी होती है लेकिन स्थिर होती है।

(ii) मांसपेशियों और हड्डियों का विकास: मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और हाथ-पैर अधिक सक्रिय रूप से कार्य करने लगते हैं।

(iii) समानुपातिक विकास: शरीर के अंगों का आकार और अनुपात संतुलित रूप से विकसित होता है।

(iv) स्वास्थ्य और रोग-प्रतिरोधक क्षमता: बालक की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। पर्याप्त आहार और व्यायाम से शरीर स्वस्थ और सशक्त रहता है।

(v) खेल और शारीरिक गतिविधियाँ: खेल-कूद के प्रति रुचि अधिक होती है, जिससे शारीरिक क्षमता और सहनशीलता बढ़ती है।

निष्कर्ष: बाल्यावस्था में शारीरिक विकास संतुलित, नियमित और स्वस्थ होता है। उचित पोषण, स्वच्छता, व्यायाम और खेल-कूद के अवसर बालक को मजबूत और सक्रिय बनाते हैं।

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