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UP Board Class 11 Pedagogy Chapter 12 मॉण्टेसरी पद्धति
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मॉण्टेसरी पद्धति
Chapter: 12
| विस्तृत उत्तरीय प्रश्न |
1. मॉण्टेसरी पद्धति के मूल सिद्धान्त क्या हैं? सविस्तार समझाइए।
या
मारिया मॉण्टेसरी के अनुसार शिक्षा के सिद्धान्त क्या हैं?
उत्तर: (संक्षेप में):
मॉण्टेसरी पद्धति के मूल सिद्धान्त:
(i) स्वतंत्रता का सिद्धान्त: बालक को अपनी इच्छा और गति से कार्य करने की स्वतंत्रता दी जाती है।
(ii) स्वाभाविक विकास: शिक्षा बालक के मानसिक और शारीरिक विकास के अनुरूप होती है।
(iii) संवेदनशील काल: बालक के जीवन में कुछ समय ऐसे होते हैं जब वह विशेष बातों को शीघ्र सीख सकता है; शिक्षा उसी अनुसार दी जाती है।
(iv) इन्द्रिय प्रशिक्षण: देखने, सुनने, छूने आदि इन्द्रियों के अभ्यास से ज्ञान बढ़ाया जाता है।
(v) व्यक्तिगत शिक्षा: प्रत्येक बालक की रुचि और क्षमता के अनुसार शिक्षा दी जाती है।
(vi) अनुकूल वातावरण: बालक के लिए ऐसा वातावरण बनाया जाता है जहाँ वह स्वयं अनुभव से सीख सके।
(vii) शिक्षक की भूमिका: शिक्षक मार्गदर्शक होता है, आदेश देने वाला नहीं।
(viii) स्वयं अनुशासन: बालक स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए आत्म-नियंत्रण सीखता है।
संक्षेप में: मॉण्टेसरी पद्धति स्वतंत्रता, स्वाभाविक विकास और इन्द्रिय प्रशिक्षण पर आधारित बालक-केंद्रित शिक्षा प्रणाली है।
2. मॉण्टेसरी शिक्षा-पद्धति के मुख्य गुणों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: (संक्षेप में):
मॉण्टेसरी शिक्षा-पद्धति के मुख्य गुण (Merits of Montessori Method):
(i) बालक-केंद्रित शिक्षा: यह पद्धति बालक की रुचि, आवश्यकता और क्षमता के अनुसार शिक्षा प्रदान करती है।
(ii) स्वतंत्रता का विकास: बालक को अपनी इच्छा से कार्य करने की स्वतंत्रता दी जाती है, जिससे आत्म-विश्वास बढ़ता है।
(iii) स्वयं अनुशासन का विकास: बालक स्वतंत्र वातावरण में कार्य करते हुए आत्म-नियंत्रण और अनुशासन सीखता है।
(iv) इन्द्रियों का विकास: विशेष सामग्रियों के प्रयोग से बालक की इन्द्रियाँ (देखना, सुनना, छूना आदि) प्रशिक्षित होती हैं।
(v) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास: यह शिक्षा बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और नैतिक विकास में सहायक है।
(vi) शिक्षक की प्रेरक भूमिका: शिक्षक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है, जिससे बालक में आत्म-शिक्षण की प्रवृत्ति बढ़ती है।
(vii) अनुकूल वातावरण: ऐसा वातावरण बनाया जाता है जहाँ बालक अपनी गति से सीख सके और अनुभव प्राप्त कर सके।
(viii) व्यक्तिगत भिन्नताओं का सम्मान: हर बालक को अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार कार्य करने का अवसर मिलता है।
संक्षेप में: मॉण्टेसरी पद्धति बालक की स्वतंत्रता, आत्म-अनुशासन, इन्द्रिय-विकास और सर्वांगीण विकास पर आधारित एक उत्कृष्ट शिक्षा प्रणाली है।
3. मॉण्टेसरी शिक्षा-पद्धति के मुख्य दोषों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: (संक्षेप में):
मॉण्टेसरी शिक्षा-पद्धति के मुख्य दोष (Demerits of Montessori Method):
(i) अधिक खर्चीली पद्धति: मॉण्टेसरी सामग्री महँगी होती है, जिससे यह पद्धति सभी विद्यालयों में लागू करना कठिन है।
(ii) प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता: इस प्रणाली को सफल बनाने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित शिक्षकों की जरूरत होती है।
(iii) सामाजिक जीवन की उपेक्षा: व्यक्तिगत शिक्षा पर अधिक बल देने से समूह जीवन और सामूहिक सहयोग का विकास कम होता है।
(iv) कल्पनाशक्ति का सीमित विकास: अत्यधिक अनुशासन और निश्चित क्रियाओं के कारण कभी-कभी बालक की कल्पनाशक्ति दब जाती है।
(v) सभी बच्चों पर समान प्रभाव नहीं: प्रत्येक बालक की रुचि और गति अलग होती है, इसलिए यह पद्धति सबके लिए समान रूप से उपयोगी नहीं होती।
(vi) अधिक स्वतंत्रता के दुष्परिणाम: यदि शिक्षक मार्गदर्शन न करे तो बालक स्वतंत्रता का अनुचित प्रयोग कर सकता है।
संक्षेप में: मॉण्टेसरी पद्धति उत्कृष्ट और बालक-केंद्रित होने के बावजूद महँगी, प्रशिक्षण-आवश्यक और सीमित सामूहिक उपयोगिता वाली पद्धति है।
| लघु उत्तरीय प्रश्न |
1. मैडम मारिया मॉण्टेसरी का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर: मैडम मारिया मॉण्टेसरी का सामान्य परिचय (General Introduction of Madam Maria Montessori):
डॉ० मॉण्टेसरी की गणना विश्व के महाम् शिक्षाशास्त्रियों में की जाती है। उन्होंने अपना जीवन एक डॉक्टर के रूप में आरम्भ किया और बाल शिक्षा के क्षेत्र में अपनी मौलिक देन देकर अपना नाम अमर कर लिया। डॉ० मॉण्टेसरी इटली की मूल निवासी थीं। 24 वर्ष की आयु में उन्होंने रोम विश्वविद्यालय से डॉक्टरी पास करके अपाहिज और मन्दबुद्धि के बालकों की चिकित्सा करनी आरम्भ की। उन्होंने अपाहिज और मन्दबुद्धि के बालकों की दयनीय दशा देखकर निर्णय किया कि ऐसे बालकों की शिक्षा की कोई नई व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने अपने अनुभवों से यह निष्कर्ष निकाला कि मन्दबुद्धि वाला बालक भी बुद्धिमान बन सकता है, यदि उसकी शिक्षा-पद्धति पूर्ण मनोवैज्ञानिक हो। इसीलिए उन्होंने प्रयोगात्मक मनोविज्ञान तथा सामाजिक मानवशास्त्र का गहन अध्ययन करके बालकों के लिए एक नवीन शिक्षा-पद्धति को जन्म दिया, जिसे ‘मॉण्टेसरी पद्धति’ के रूप में विश्वभर में ख्याति प्राप्त हुई।
सन् 1907 में मॉण्टेसरी ने अपना स्कूल ‘Children Home’ स्थापित किया। सन् 1939 में वे ‘इण्डियन ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट’ (Indian Training Institute) की डायरेक्टर बनकर भारत आयीं। उन्होंने भारत में अनेक स्थानों पर अपनी पद्धति के सम्बन्ध में भाषण दिए। थियोसोफिकल सोसायटी के माध्यम से उनकी पद्धति के सम्बन्ध में अनेक लेख, व्याख्यान आदि प्रकाशित हुए। इसके परिणामस्वरूप भारत में मॉण्टेसरी पद्धति का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ। भारत में असंख्य मॉण्टेसरी स्कूलों की स्थापना हो गई और ये स्कूल आज भी पूरी सफलता के साथ कार्यरत हैं।
2. मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के विद्यालयों का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: मॉण्टेसरी विद्यालय (Montessori Schools):
मॉण्टेसरी पद्धति में बच्चों को विद्यालय में घर के समान ही वातावरण मिलता है, इसीलिए मॉण्टेसरी ने विद्यालय को ‘बच्चों का घर’ (Children’s Home) कहा है। मॉण्टेसरी स्कूलों का वातावरण बालकों के अनुकूल तथा स्वतन्त्र होता है और उसमें उन्हें खेलने-कूदने तथा अपने व्यक्तित्व को विकसित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है।
बालघर में एक बड़ा कमरा तथा कई छोटे-छोटे कमरे होते हैं। बड़े कमरे में बालक उपकरणों की सहायता से सीखता है तथा छोटे-छोटे कमरे भोजन, व्यायाम, विश्राम, गोष्ठी आदि कार्यो के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। बालकों को घूमने तथा खेलने के लिए छोटे-छोटे पार्क तथा उद्यान होते हैं, जिनमें बालक स्वच्छन्दतापूर्वक खेलता है तथा उसके भूलने-भटकने का भी डर नहीं रहता है। बालक पूर्ण स्वतन्त्र होता है। कि वह चाहे बाग में जाकर सीखे या कमरे में बैठकर सीखें। विद्यालय में नीचे कमरे, नीची खिड़कियाँ, नीची अलमारियाँ एवं छोटी-छोटी मेज-कुर्सियों का प्रबन्ध होता है। खिड़कियों के खोलने, बन्द करने एवं अलमारियों के उपयोग में बालक स्वतन्त्र होता है। आवश्यकतानुसार बालक स्वयं ही अपनी कुर्सी को यत्र-तत्र ले जाता है। छोटे-छोटे प्याले, चम्मच एवं अन्य बर्तन होते हैं, जिन्हें वह अपना समझता है और वास्तविक आनन्द एवं तृप्ति पाता है।
3. मॉण्टेसरी शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत कर्मेन्द्रियों की शिक्षा-व्यवस्था का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: कर्मेन्द्रियों की शिक्षा (Education of Action-Sense):
मॉण्टेसरी ने अपनी शिक्षण-पद्धति में बालक की कर्मेन्द्रियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया है। मॉण्टेसरी स्कूलों का वातावरण ऐसा होता है और बालकों के सम्मुख ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी जाती हैं कि बालक चलने-फिरने के साधारण कार्य से लेकर अपने से सम्बन्धित सभी कार्यों को स्वयं कर लेता है। हाथ-मुँह धोना, कपड़े पहनना और उतारना, मेज तथा कुर्सी को ठीक स्थान पर रखना, कमरा सजाना, चीजों को सँभालकर रखना, भोजन बनाना और परोसना, बर्तन धोना आदि काम बालक स्वयं कर लेते हैं। ऐसे कार्यों को अपने आप करने से बालक प्रसन्नता का अनुभव प्राप्त करता है तथा अन्य कार्यों के लिए उत्साहित होता है। इस प्रकार के शिक्षण का उद्देश्य बालकों में अच्छी आदतों का निर्माण करना एवं उनका जीवन सफल बनाना है। इसके द्वारा बालक दैनिक जीवन के सभी आवश्यक कार्यों की शिक्षा प्राप्त कर लेता है। वह शिष्ट तथा सभ्य हो जाता है।

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