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NCERT Class 9 Science Chapter 11 जनन — जीवन की निरंतरता
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जनन — जीवन की निरंतरता
Chapter: 11
| TEXTUAL SOLUTIONS |
चिंतन कीजिए (Page No. 208)
1. एक कृषक फसल उत्पादन के लिए अलैंगिक या लैंगिक जनन विधियों का चयन किस आधार पर करता है?
उत्तर: अलैंगिक जनन में केवल एक ही जनक होता है, इसलिए इससे उत्पन्न पौधे आनुवंशिक रूप से समान (क्लोन) होते हैं। कृषक इस विधि (जैसे- कर्तन, कलम बाँधना, ऊतक संवर्धन) का उपयोग व्यापक स्तर पर वांछित और रोग-मुक्त फसलें तीव्रता से उगाने के लिए करते हैं। दूसरी ओर, लैंगिक जनन में दोनों जनकों की विशेषताओं का संयोजन होता है जिससे विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। ये विभिन्नताएँ पौधों को परिवर्तित परिवेश के अनुकूल बनाने और नई जातियों/किस्मों के विकास के लिए आवश्यक हैं।
2. आपके विचार से अधिकांश जटिल संरचना वाले जंतु और पुष्पीपादप लैंगिक जनन क्यों करते हैं जबकि यीस्ट और हाइड्रा जैसे अनेक सरल जीव मुख्यतः अलैंगिक जनन करते हैं?
उत्तर: लैंगिक जनन के परिणामस्वरूप संततियों में आनुवंशिक विभिन्नताएँ आती हैं, जो जटिल जीवों को बदलते परिवेश के अनुकूल बने रहने (उत्तरजीविता) और विकास में सहायता करती हैं। यीस्ट और हाइड्रा जैसे सरल जीव अनुकूल परिस्थितियों में तीव्रता से अपनी संख्या बढ़ाने के लिए अलैंगिक जनन (जैसे मुकुलन) करते हैं, जो एक त्वरित विधि है।
सोचिए और बताइए (Page No. 217, 218, 222, 223 and 224)
1. गुड़हल (Hibiscus or China-rose) के एक पौधे में परागकण के वर्तिकाग्र पर पहुँचने के पश्चात पराग नलिका वर्तिका से होते हुए आगे बढ़ती है। इसके पश्चात कौन-सी प्रक्रिया होने वाली है?
उत्तर: इसके पश्चात ‘निषेचन’ (Fertilisation) की प्रक्रिया होगी। नर युग्मक इस पराग नलिका से होकर अंडाशय में स्थित बीजांड तक पहुँचता है, जहाँ वह अंडकोशिका (मादा युग्मक) के साथ युग्मित होकर युग्मनज (Zygote) बनाता है।
2. नीचे दिए गए मदार (Calotropis) के बीजों और डेंडेलियन के बीजों के चित्र (चित्र 11.16) देखिए। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि ये बीज किस प्रकार के बीज-प्रकीर्णन के लिए अनुकूलित हैं?

उत्तर: इन बीजों में हल्के बालों जैसी संरचनाएँ दिखाई देती हैं, जो इन्हें वायु (हवा) द्वारा उड़ने में मदद करती हैं। अतः ये वायु द्वारा बीज-प्रकीर्णन के लिए अनुकूलित हैं।
3. एक कृषक मक्का की दो किस्मों को एक-दूसरे के पास बोता है परंतु देखता है कि बीज तभी बनते हैं जब एक किस्म का परागकण दूसरी किस्म के वर्तिकाग्र तक पहुँचता है। यह किस प्रकार का परागण है?
उत्तर: यह ‘पर-परागण’ (Cross-pollination) है, जिसमें एक पौधे के पुष्प के परागकोश से परागकण दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित होते हैं।
4. बाह्य निषेचन करने वाले जंतु सामान्यतः आंतरिक निषेचन करने वाले जंतुओं की तुलना में अधिक अंडे क्यों देते हैं?
उत्तर: बाह्य निषेचन में अंडे शरीर के बाहर (जैसे जल में) दिए जाते हैं, जहाँ कई अंडे जल-धाराओं द्वारा नष्ट हो जाते हैं अथवा अन्य जंतुओं द्वारा खा लिए जाते हैं। इसलिए, उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए वे बहुत बड़ी संख्या में अंडे देते हैं।
5. जंतुओं में किस निषेचन विधि में युग्मक अधिक सुरक्षित रहते हैं?
उत्तर: ‘आंतरिक निषेचन’ (Internal fertilisation) विधि में युग्मक अधिक सुरक्षित रहते हैं क्योंकि इसमें निषेचित अंडे या भ्रूण मादा के शरीर के अंदर विकसित होते हैं।
6. रवि अचानक देखता है कि उसकी लंबाई तीव्रता से बढ़ रही है, उसके कंधे चौड़े हो रहे हैं और आवाज में परिवर्तन हो रहा है। सोचिए कि वह जीवन की किस अवस्था में प्रवेश कर रहा है?
उत्तर: रवि ‘यौवनारंभ’ (Puberty/किशोरावस्था) की अवस्था में प्रवेश कर रहा है, जहाँ हार्मोन के प्रभाव से जनन अंग परिपक्व होते हैं और शारीरिक परिवर्तन दिखाई देते हैं।
7. रीना का मासिक धर्म प्रत्येक 28वें दिन पर होता है। उसका पिछला मासिक धर्म 5 मार्च को हुआ था। उसका अगला मासिक धर्म किस दिन होने की सबसे अधिक संभावना है?
उत्तर: मासिक धर्म चक्र सामान्यतः 28 दिनों में दोहराया जाता है। यदि पिछला मासिक धर्म 5 मार्च को हुआ था, तो 5 मार्च में 28 दिन जोड़ने पर अगला मासिक धर्म 2 अप्रैल को होने की संभावना है।
8. एक मानव युग्मनज अभी बना है। इसमें कितने गुणसूत्र हैं?
उत्तर: एक मानव युग्मनज में 46 गुणसूत्र होते हैं। 23 गुणसूत्र शुक्राणु (पिता) से और 23 गुणसूत्र अंडाणु (माता) से आकर युग्मनज में गुणसूत्रों की कुल संख्या को जनकों के बराबर कर देते हैं।
9. यौन क्रिया के समय यौन संचारित संक्रमण के प्रसार को कम करने के लिए कौन-से सुरक्षात्मक साधनों का उपयोग किया जा सकता है?
उत्तर: यौन संचारित संक्रमण (S.T.I.) के संचरण को रोकने के लिए ‘कंडोम’ (अवरोध युक्ति) का उपयोग किया जा सकता है।
10. यदि कोई दंपत्ति (युगल) मुँह से ली जाने वाली गर्भनिरोधक गोलियों का उपयोग करता है किंतु कंडोम का नहीं तो कौन-से जोखिम बने रहते हैं और क्यों?
उत्तर: मुँह से ली जाने वाली गर्भनिरोधक गोलियाँ केवल अवांछित गर्भावस्था को रोकती हैं। कंडोम का उपयोग न करने से सुजाक, सिफलिस, जननिक मस्से और एच.आई.वी. (एड्स) जैसे यौन संचारित संक्रमणों (S.T.I.) का जोखिम बना रहता है क्योंकि शारीरिक संपर्क स्थापित होता है।
11. अनेक जंतुओं में बच्चे जन्म के तुरंत बाद चल सकते हैं अथवा भोजन खोज सकते हैं इसके विपरीत मानव शिशु लंबे समय तक पूर्णतः दूसरो पर निर्भर रहते हैं। एक जाति के रूप में मनुष्यों में इसके क्या लाभ और हानियाँ हो सकती हैं?
उत्तर: हानियाँ: मानव शिशु जन्म के पश्चात लंबे समय तक पोषण और विशेष देखभाल पर निर्भर रहते हैं, वे अपना शारीरिक तापमान भी स्वयं नियंत्रित नहीं कर पाते। इससे माता-पिता को अत्यधिक समय और ऊर्जा का निवेश करना पड़ता है।
लाभ: इस लंबी देखभाल और स्तनपान की अवधि से शिशु का पूर्ण शारीरिक और मस्तिष्क विकास होता है, उसे अनेक रोगों से बचाव मिलता है, और यह मानव जाति के लिए स्वस्थ तथा उन्नत उत्तरजीविता सुनिश्चित करता है।
अभ्यास प्रश्न
1. एक पुष्प के परागकोश को परिपक्व होने से पूर्व ही हटा दिया जाता है। इसके पश्चात उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के परागकण उसके वर्तिकाग्र पर छिड़के जाते हैं और बीज बनते हैं। यहाँ कौन-सी प्रक्रिया सुनिश्चित होती है?
(i) स्व-परागण।
(ii) पर-परागण।
(iii) निषेचन।
(iv) ऊतक संवर्धन।
उत्तर: (ii) पर-परागण।
2. पौधों में लैंगिक जनन के निम्नलिखित चरणों को सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए—
(i) वर्तिकाग्र पर पराग का अंकुरण।
(ii) निषेचन।
(iii) परागण।
(iv) युग्मनज का निर्माण।
उत्तर: सही क्रम इस प्रकार है:
(iii) परागण -> (i) वर्तिकाग्र पर पराग का अंकुरण -> (ii) निषेचन -> (iv) युग्मनज का निर्माण।
3. नीचे दिए गए अभिकथन एवं कारण को पढ़िए और सही विकल्प का चयन कीजिए।
अभिकथन — निषेचन के पश्चात निर्मित युग्मनज तत्काल गर्भाशय भित्ति से जुड़ जाता है।
कारण — गर्भाशय की भित्ति सदैव युग्मनज को ग्रहण करने के लिए तैयार रहती है।
(i) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं और कारण, अभिकथन की सही व्याख्या है।
(ii) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं किंतु कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं है।
(iii) अभिकथन सत्य है, किंतु कारण असत्य है।
(iv) अभिकथन असत्य है, किंतु कारण सत्य है।
उत्तर: (iv) अभिकथन असत्य है, किंतु कारण सत्य है।
4. अलैंगिक जनन से उत्पन्न संततियाँ आनुवंशिक रूप से जनक के समान क्यों होती हैं?
उत्तर: अलैंगिक जनन में केवल एक ही जनक भाग लेता है और इसमें समसूत्री विभाजन (कोशिका विभाजन का एक प्रकार) होता है। इस कारण से उत्पन्न संतति (क्लोन) में आनुवंशिक पदार्थ पूरी तरह से उसी एक जनक के समान होता है।
5. गर्भावस्था के दौरान मासिक धर्म क्यों रुक जाता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: निषेचन होने पर युग्मनज गर्भाशय में अंतरोपित हो जाता है। विकासशील भ्रूण को पोषण देने और ग्रहण करने के लिए गर्भाशय का मोटा और रक्त वाहिकाओं से समृद्ध आंतरिक आस्तर बना रहता है। चूंकि यह आस्तर गर्भावस्था के दौरान आवश्यक होता है, इसलिए इसका निस्तारण नहीं होता है, जिसके परिणामस्वरूप मासिक धर्म रुक जाता है।
6. दिन के समय खिलने वाले पुष्पों की तुलना में रात में खिलने वाले पुष्प सफेद या हल्के रंग के क्यों होते हैं?
उत्तर: दिन में खिलने वाले पुष्प कीटों (जैसे मधुमक्खियों और तितलियों) को आकर्षित करने के लिए प्रायः चटकीले रंग के होते हैं। परंतु रात के अंधेरे में रंग दिखाई नहीं देते, इसलिए रात में खिलने वाले पुष्पों को चटक रंगों की आवश्यकता नहीं होती; वे प्रायः सफेद या हल्के रंग के होते हैं और संभवतः परागणकारियों को आकर्षित करने के लिए अपनी सुगंध पर निर्भर करते हैं।
7. लैंगिक रूप से उत्पन्न पौधों की तुलना में कायिक रूप से प्रवर्धित पौधे रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों होते हैं?
उत्तर: कायिक प्रवर्धन (अलैंगिक जनन) से उत्पन्न पौधे केवल एक ही जनक से विकसित होते हैं और आनुवंशिक रूप से पूर्णतः समान (क्लोन) होते हैं। इनमें लैंगिक जनन से उत्पन्न होने वाली आनुवंशिक विभिन्नताएँ नहीं होतीं, जो जीवों को परिवर्तित परिवेश के अनुकूल होने और रोगों से बचने में सहायता करती हैं।
8. यदि किसी प्रकार के पौधे में सभी पुष्प केवल स्व-परागण करने में सक्षम हों तो आगे आने वाली अनेक पीढ़ियों में आनुवंशिक विविधता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यदि किसी पौधे में सभी पुष्प केवल स्व-परागण (Self-pollination) करने में सक्षम हों, तो आगे आने वाली अनेक पीढ़ियों में आनुवंशिक विविधता (Genetic diversity) में भारी कमी आएगी।
इसके मुख्य कारण और प्रभाव निम्नलिखित हैं:
(i) नए आनुवंशिक संयोजनों का अभाव: स्व-परागण की प्रक्रिया में परागकणों का स्थानांतरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर अथवा उसी पौधे के किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता है। चूँकि निषेचन में भाग लेने वाले नर और मादा दोनों युग्मक एक ही जनक (पौधे) से आते हैं, इसलिए इसमें दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक लक्षणों का मिश्रण नहीं हो पाता है। इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न संतानों में आनुवंशिक विविधता धीरे-धीरे कम होती जाती है।
(ii) अनुकूलन क्षमता (Adaptability) में कमी: पादपों में दो अलग-अलग जनकों के बीच होने वाले लैंगिक जनन (जैसे पर-परागण) से संतानों में आनुवंशिक विभिन्नताएँ आती हैं। यह विभिन्नता जीवों को परिवर्तित होते हुए परिवेश (बदलते पर्यावरण) के प्रति श्रेष्ठ अनुकूलन में सहायता करती है। यदि पौधे केवल स्व-परागण करेंगे, तो उनमें नए लक्षण विकसित नहीं होंगे, जिससे वे नई बीमारियों, कीटों या जलवायु परिवर्तनों का सामना करने में कमजोर पड़ जाएंगे।
(iii) जाति की उत्तरजीविता (Survival) पर खतरा: पाठ्यांश के अनुसार, किसी भी पादप या जंतु जाति की उत्तरजीविता बनाए रखने के लिए आनुवंशिक विभिन्नता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लगातार कई पीढ़ियों तक केवल स्व-परागण होने से पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता और जीवन-शक्ति घट सकती है, जिससे लंबी अवधि में उस पादप जाति के नष्ट होने का जोखिम बढ़ जाता है।
9. एक कृषक बड़ी संख्या में आनुवंशिक रूप से एक जैसे पौधे शीघ्रता से उगाना चाहता है। इसके लिए उपयुक्त जनन विधियों का सुझाव दीजिए और समझाइए कि वे प्रभावी क्यों हैं?
उत्तर: एक कृषक यदि बड़ी संख्या में आनुवंशिक रूप से एक जैसे पौधे शीघ्रता से उगाना चाहता है, तो उसे अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction) के अंतर्गत आने वाली कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) की विधियों का उपयोग करना चाहिए।
उपयुक्त जनन विधियों के सुझाव: कृषक अपनी आवश्यकता और पौधे की प्रजाति के अनुसार निम्नलिखित में से कोई भी विधि अपना सकता है:
(i) कर्तन (Cutting): पौधे के तने या प्ररोह का एक निश्चित लंबाई का टुकड़ा काटकर उसे नमी युक्त मिट्टी में रोपना, जिससे नया पौधा बन सके।
(ii) कलम बाँधना (Grafting): एक वांछित उच्च गुणवत्ता वाले पौधे की कलम (शाखा) को दूसरे स्वस्थ जड़ वाले पौधे के तने में जोड़ना।
(iii) परतन (Layering): पौधे की किसी लचीली शाखा को बिना काटे मिट्टी में दबा देना, ताकि कुछ दिनों बाद उसमें से नई जड़ें निकल आएं और वह नया पौधा बन जाए।
(iv) ऊतक संवर्धन (Tissue culture): पौधे के प्ररोह शीर्ष (कोशिकाओं) का उपयोग करके प्रयोगशाला या नियंत्रित परिवेश में एक साथ हजारों पादपक (plantlets) विकसित करना।
ये विधियाँ प्रभावी क्यों हैं (इनके प्रमुख लाभ):
(i) पूर्ण आनुवंशिक समानता (क्लोन): कायिक प्रवर्धन (अलैंगिक जनन) में केवल एक ही जनक भाग लेता है। इस कारण से उत्पन्न होने वाले सभी नए पौधे आनुवंशिक रूप से बिल्कुल अपने जनक के समान होते हैं। इससे कृषक अपनी फसल के बेहतरीन और वांछित गुणों को बिना किसी बदलाव के कई पीढ़ियों तक बनाए रख सकता है।
(ii) अत्यंत शीघ्र उत्पादन: बीजों द्वारा पौधे उगाने और उनके बड़े होने में काफी समय लगता है। इसके विपरीत, इन विधियों में बिना बीज के ही पौधे के कायिक भागों (जैसे तने या पत्तियों) से नए पौधे बहुत शीघ्रता से अंकुरित और विकसित हो जाते हैं।
(iii) व्यापक स्तर पर उत्पादन: ऊतक संवर्धन तकनीक का उपयोग करके कृषक बहुत ही कम समय में व्यापक स्तर (बड़े पैमाने) पर एक साथ लाखों पौधे तैयार कर सकता है।
(iv) रोग-मुक्त और उच्च उपज: ऊतक संवर्धन जैसी आधुनिक तकनीक से उत्पन्न किए गए पौधे प्रायः स्वस्थ और विषाणु (virus) संक्रमण से पूर्णतः मुक्त होते हैं। इससे कृषक को फसल की उच्च उपज सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है।
10. सुरेश परागकणों के अंकुरण का अध्ययन करने के लिए विभिन्न शर्करा सांद्रता (0%, 2.5%, 5%, 7.5%, 10%) में परागकण लेकर स्लाइड तैयार करता है।
(i) इस व्यवस्थापन के उपयोग से किन विभिन्न परिकल्पनाओं की जाँच की जा सकती है?
उत्तर: इस प्रयोग से यह परिकल्पना जाँची जा सकती है कि शर्करा की भिन्न-भिन्न सांद्रता परागकणों के अंकुरण की दर और पराग नलिका की वृद्धि को किस प्रकार प्रभावित करती है।
(ii) इस व्यवस्थापन में कौन-से मानदंडों को समान रखा जाना चाहिए?
उत्तर: इस प्रयोग में तापमान, परागकणों की प्रजाति व मात्रा, प्रकाश, और अवलोकन का समय जैसे मानदंडों को समान रखा जाना चाहिए ताकि परिणाम केवल शर्करा की सांद्रता पर ही निर्भर हों।
11. नीचे दिए गए चित्र को देखिए और दिए गए संकेतों के आधार पर पता लगाइए कि इन पुष्पों में किस प्रकार का परागण हुआ होगा—

उत्तर: (i) टमाटर – पुंकेसर वर्तिकाग्र को ढक लेते हैं।
परागण का प्रकार: स्वपरागण (Autogamy), क्योंकि परागकण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर आसानी से पहुँच जाते हैं।
(ii) गेहूँ – पुष्प परागण के पश्चात् खुलते हैं।
परागण का प्रकार: स्वपरागण (Cleistogamy), क्योंकि परागण फूल के खुलने से पहले ही हो जाता है।
(iii) पपीता – नर और मादा पुष्प प्रायः अलग-अलग पौधों के पेड़ों पर होते हैं।
परागण का प्रकार: परपरागण (Cross-pollination/Xenogamy), क्योंकि नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर होने से परागण दूसरे पौधे के माध्यम से होता है।
12. उत्तरी भारत के निचले हिमालयी क्षेत्र में सेब एक महत्त्वपूर्ण नकदी फसल है जो कृषकों की आजीविका में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक परागणकारियों की जनसंख्या में अत्यधिक गिरावट के कारण सेब की उपज निरंतर घट रही है। एक शोधकर्ता कृषक समूह ने दो अलग-अलग स्थानों स्थान, ‘क’ और स्थान ‘ख’ पर परीक्षणार्थ सेब के दो उद्यान लगाए। स्थान ‘क’ के उद्यानों में इन्होंने सेब के पुष्पों का परागण प्राकृतिक परागणकारियों द्वारा होने दिया। स्थान ‘ख’ के उद्यानों में इन्होंने मधुमक्खी पालन की मिश्रित कृषि तकनीक अपनाई। सेब के उत्पादन के साथ-साथ कृषक ने शहद का भी उत्पादन किया। सेबों की उपज को चित्र 11.24 में दर्शाया गया है। इसे फल लगने (फलधारी शाखाओं की कुल संख्या के सापेक्ष फलों की संख्या) तथा फल गिरने (विकसित हो रहे फलों का समयपूर्व गिर जाना) के आधार पर सेब के उद्यानों के दो प्रकार के प्रायोगिक स्थलों के संदर्भ में दर्शाया गया है।

(i) शोधकर्ता-कृषक समूह ने इस शोध कार्य के लिए किन परिकल्पनाओं पर विचार किया होगा?
उत्तर: शोधकर्ता-कृषक समूह ने यह परिकल्पना की होगी कि चूँकि प्राकृतिक परागणकारियों की संख्या घट रही है, इसलिए यदि सेब के बागानों में कृत्रिम रूप से मधुमक्खियों के बक्से (मधुमक्खी पालन/Apiculture) रखे जाएँ, तो परागण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और तीव्र होगी। इससे सेब के पुष्पों में परागण की कमी दूर होगी, जिसके परिणामस्वरूप ‘फल लगने’ की दर में वृद्धि होगी और फसल का उत्पादन बढ़ेगा।
(ii) प्रयोग में कौन-कौन से विभिन्न मानदंड हैं?
उत्तर: इस प्रयोग में दो प्रमुख मानदंड (चर) हैं:
(i) स्वतंत्र चर (Independent Variable): परागण की विधि या माध्यम। (स्थान ‘क’ में केवल प्राकृतिक परागणकारी थे, जबकि स्थान ‘ख’ में प्राकृतिक परागणकारियों के साथ-साथ मधुमक्खियों की कालोनी का अतिरिक्त उपयोग किया गया था)।
(ii) आश्रित चर (Dependent Variable): सेब की उपज पर पड़ने वाला प्रभाव, जिसे ‘फल लगने’ (Fruit setting) और ‘समय से पहले फल गिरने’ (Premature fruit dropping) की दर के रूप में मापा गया है।
(iii) सेब की अधिक उपज के संदर्भ में परीक्षणार्थ लगाए गए दो उद्यानों ‘क’ और ‘ख’ के आँकड़ों की तुलना और विश्लेषण कीजिए।
उत्तर: आँकड़ों के अनुसार, दोनों स्थानों की उपज में भारी अंतर देखने को मिलता है:
(i) स्थान ‘क’ (केवल प्राकृतिक परागण): यहाँ प्राकृतिक परागणकारियों की कमी के कारण परागण ठीक से नहीं हो पाया। इसके परिणामस्वरूप यहाँ ‘फल लगने’ की दर काफी कम रही, और इसके विपरीत ‘फल गिरने’ की दर बहुत अधिक थी, जिससे कुल उपज घट गई।
(ii) स्थान ‘ख’ (मधुमक्खी कालोनी के साथ): यहाँ मधुमक्खियों ने प्रभावी परागणकारी के रूप में काम किया। आँकड़े दर्शाते हैं कि इस स्थान पर ‘फल लगने’ की दर स्थान ‘क’ की तुलना में बहुत अधिक है। साथ ही, अच्छी तरह से निषेचन होने के कारण स्वस्थ फल विकसित हुए जिससे ‘फल गिरने’ (समय से पहले नष्ट होने) की दर में भारी कमी आई।
(iv) अपने विश्लेषण के आधार पर इन आँकड़ों से आपने क्या निष्कर्ष निकाला?
उत्तर: इस प्रयोग से यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि सेब (तथा अन्य फलदार वृक्षों) की उच्च उपज के लिए परागण एक अत्यंत आवश्यक प्रक्रिया है। प्राकृतिक परागणकारियों की कमी की भरपाई के लिए मधुमक्खी पालन (मिश्रित कृषि तकनीक) अपनाना एक बेहद सफल और लाभदायक कदम है। मधुमक्खियाँ सेब के पुष्पों में परागण को सफलतापूर्वक सुनिश्चित करती हैं, जिससे न केवल फल अधिक मात्रा में लगते हैं बल्कि उनके गिरने की दर भी कम होती है। इसके अतिरिक्त, कृषकों को शहद के रूप में एक अतिरिक्त आर्थिक लाभ भी प्राप्त होता है।
13. एक विद्यार्थी का दावा है कि ‘मानवों में अंडोत्सर्ग सदैव मासिक धर्म के 14वें दिन होता है।’ कथन की विवेचनात्मक रूप से जाँच कीजिए और बताइए कि दावा सही है या नहीं। अपने उत्तर के लिए कम-से-कम दो कारण दीजिए।
उत्तर: यह दावा पूर्णतः सही नहीं है (आंशिक रूप से गलत है)।
यद्यपि एक आदर्श या प्रारूपिक चक्र में ऐसा माना जाता है, लेकिन “सदैव” (हमेशा) ऐसा ही हो, यह कथन वैज्ञानिक रूप से सत्य नहीं है।
इस दावे के गलत होने के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
(i) मासिक धर्म चक्र की अवधि में भिन्नता महिलाओं में मासिक धर्म (रजोधर्म) चक्र की कुल अवधि हमेशा 28 दिन की नहीं होती है। पाठ्यांश के अनुसार, अंडोत्सर्ग, गर्भाशय की तैयारी और रजोधर्म का यह चरण “सामान्यतः प्रत्येक 21 – 35 दिनों में दोहराया जाता है”। चूँकि अलग-अलग महिलाओं में (या एक ही महिला में अलग-अलग समय पर) यह चक्र 21 से 35 दिनों के बीच का हो सकता है, इसलिए चक्र की कुल अवधि में बदलाव के कारण अंडोत्सर्ग (Ovulation) का दिन भी बदल जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि 21 दिन या 35 दिन के चक्र में अंडोत्सर्ग 14वें दिन ही हो।
(ii) 14वां दिन केवल एक ‘प्रारूपिक’ (Typical) 28-दिन के चक्र का उदाहरण है पाठ्यांश में दिए गए चित्र (चित्र 11.21) में 14वें दिन अंडोत्सर्ग (अंडाशय द्वारा परिपक्व अंडाणु निर्मुक्त करना) को दर्शाया गया है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से “28 दिन की अवधि वाले एक प्रारूपिक (typical) रजोधर्म के प्रमुख चरण” को दर्शाता है। यह केवल अध्ययन को सरल बनाने के लिए एक आदर्श स्थिति का उदाहरण है। वास्तविक जीवन में, तनाव, स्वास्थ्य, और हार्मोनल बदलावों के कारण यह प्रक्रिया आगे या पीछे खिसक सकती है।

