NCERT Class 7 Social Science Chapter 8 भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं?

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NCERT Class 7 Social Science Chapter 8 भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं?

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Chapter: 8

प्रश्न और क्रियाकलाप

1. प्रसिद्ध पर्यावरणविद डेविड सुजुकी के निम्नलिखित वाक्य पढ़ें-

“हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं। अगर पर्वत एक देवता है, न कि खनिज का ढेर; अगर नदियाँ पृथ्वी की शिराएँ हैं, न कि केवल सिंचाई का स्रोत; अगर वन पावन निकुंज है, न कि केवल इमारती लकड़ियों का ढेर; अगर अन्य प्रजातियाँ हमारे संबंधी हैं, न कि केवल साधनमात्र या अगर पृथ्वी हमारी माता है, न कि केवल संसाधन; तब हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर के साथ व्यवहार करते हैं। अतः यह विश्व को एक अलग परिप्रेक्ष्य में देखने की चुनौती है।”

इस पर छोटे समूह में चर्चा कीजिए। आप उक्त वाक्यों से क्या समझते हैं? इससे हमारे चारों ओर विद्यमान वायु, जल, भूमि, वृक्ष तथा पर्वत के प्रति हमारे व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: डेविड सुजुकी के कथन से यह समझ आता है कि जब हम प्रकृति को केवल संसाधन न मानकर पवित्र और जीवित रूप में देखते हैं, तो हमारा व्यवहार उसके प्रति आदरपूर्ण होता है। यदि पर्वत को देवता, नदियों को पृथ्वी की शिराएँ और वनों को पावन निकुंज माना जाए तो हम उनका दोहन करने के बजाय उनकी रक्षा करेंगे। इसका प्रभाव यह होता है कि हम वायु, जल, भूमि, वृक्ष और पर्वत के प्रति जिम्मेदार और संरक्षक दृष्टिकोण अपनाते हैं। यह दृष्टिकोण पर्यावरण की सुरक्षा और सतत विकास के लिए आवश्यक है।

2. आपने क्षेत्र के पावन स्थलों की सूची बनाइए। पता लगाइए कि ये स्थल पावन क्यों माने जाते हैं? क्या इनसे जुड़ी कोई कहानियाँ हैं? इस विषय में 150 शब्दों में एक संक्षिप्त लेख लिखिए। (संकेत- आप अपने परिवार एवं समुदाय के वरिष्ठ लोगों से चर्चा कर सकते हैं। अपने शिक्षक से भी विचार-विमर्श कीजिए। इस प्रकार की सूचनाओं का संग्रह करने के लिए लेख एवं पुस्तक पढ़िए)।

उत्तर: मेरे क्षेत्र में अनेक पावन स्थल हैं, जैसे गंगा नदी, काशी विश्वनाथ मंदिर और बोधगया। गंगा नदी को माँ के रूप में पूजते हैं, क्योंकि यह जीवनदायिनी और पापों से मुक्ति देने वाली मानी जाती है। काशी विश्वनाथ मंदिर मोक्षदायी स्थल माना जाता है और यहाँ प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु आते हैं। बोधगया वह स्थान है जहाँ बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया, इसलिए यह बौद्ध अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र है।

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इन स्थलों से जुड़ी कई कथाएँ भी प्रचलित हैं। जैसे- गंगा के अवतरण की कथा, बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति का प्रसंग और काशी में शिवजी का वास। ये स्थल लोगों की आस्था, संस्कृति और परंपराओं को जोड़ते हैं और समाज में एकता और श्रद्धा का भाव जगाते हैं।

3. आपके विचार में प्राकृतिक तत्व, जैसे नदी, पर्वत और वन आदि लोगों के लिए पावन क्यों माने जाते हैं? वे हमारे जीवन में किस प्रकार योगदान देते हैं? 

उत्तर: प्राकृतिक तत्व जैसे नदी, पर्वत और वन लोगों के लिए पावन माने जाते हैं क्योंकि हमारे सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में इन्हें ईश्वर के रूप या उनके निवास स्थान से जोड़ा गया है। नदियाँ जीवनदायिनी होती हैं, जो हमें शुद्ध जल, सिंचाई और आजीविका प्रदान करती हैं। इन्हें माता के समान मानकर पूजा जाता है, जैसे गंगा और यमुना। पर्वत, जैसे हिमालय, देवताओं का निवास स्थान और आध्यात्मिक साधना के केंद्र माने जाते हैं। वे जलवायु को नियंत्रित कर हमारे जीवन को संतुलित बनाए रखते हैं। वन और वृक्ष न केवल ऑक्सीजन और औषधियाँ प्रदान करते हैं, बल्कि जैव-विविधता और प्राकृतिक संतुलन के भी आधार हैं।

इन प्राकृतिक तत्वों का हमारे जीवन में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है—

(i) नदियाँ हमें पीने का जल, खेती और व्यापार की सुविधा देती हैं।

(ii) पर्वत हमें जलवायु की स्थिरता, नदियों का स्रोत और धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व प्रदान करते हैं।

(iii) वन हमें वायु शुद्ध करने वाली ऑक्सीजन, औषधीय पौधे, लकड़ी तथा अनेक जीवों का आवास उपलब्ध कराते हैं।

इस प्रकार ये तत्व केवल भौतिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते, बल्कि हमें आध्यात्मिक शांति, सांस्कृतिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देते हैं।

4. लोग तीर्थ या अन्य पावन स्थलों की यात्रा क्यों करते हैं?

उत्तर: लोग तीर्थ या पावन स्थलों की यात्रा कई कारणों से करते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि तीर्थयात्रा करने से पापों का नाश होता है और आत्मा शुद्ध होती है। लोग विश्वास करते हैं कि ऐसे स्थलों पर जाने से ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है और मन को आत्मिक शांति मिलती है।सामाजिक दृष्टि से तीर्थयात्रा लोगों को एक-दूसरे से मिलने और जुड़ने का अवसर देती है। विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों से आए लोग एक ही स्थान पर मिलकर धार्मिक अनुभव साझा करते हैं। इससे एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भावना को बल मिलता है।

5. प्राचीन तीर्थयात्रा मार्गों ने उस समय किस प्रकार व्यापार को प्रोत्साहित किया? आपके अनुसार ये पावन स्थल उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक बने?

उत्तर: प्राचीन काल में तीर्थयात्रा मार्ग केवल धार्मिक यात्राओं तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन दिया। जब लोग तीर्थस्थलों की ओर यात्रा करते थे, तो उनके भोजन, वस्त्र, पूजा सामग्री और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यापारी भी इन मार्गों पर सक्रिय रहते थे। व्यापारी अपने सामान लेकर तीर्थस्थलों तक पहुँचते और तीर्थयात्रियों को आवश्यक वस्तुएँ बेचते हैं। इस प्रकार तीर्थयात्रा मार्ग व्यापारिक मार्गों के रूप में भी विकसित हुए।इसके अलावा, तीर्थस्थलों के आसपास बाज़ार और हाट-बाज़ारों का निर्माण हुआ, जहाँ स्थानीय लोग और व्यापारी मिलकर लेन-देन करते थे। तीर्थस्थलों की बढ़ती लोकप्रियता से वहाँ धर्मशालाएँ, सराय, परिवहन सुविधाएँ और अन्य सेवाएँ भी विकसित हुईं। इससे न केवल व्यापारियों को लाभ हुआ, बल्कि स्थानीय निवासियों को भी रोजगार और आर्थिक उन्नति के अवसर मिले।

6. पावन स्थल किस प्रकार वहाँ के लोगों की संस्कृति और परंपरा को प्रभावित करते हैं?

उत्तर: पावन स्थल वहाँ की संस्कृति और परंपराओं को गहराई से प्रभावित करते हैं। ये केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं होते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के भी प्रमुख स्थल बन जाते हैं। यहाँ होने वाले मेले, उत्सव और धार्मिक अनुष्ठान स्थानीय संगीत, नृत्य, लोककथाएँ और हस्तशिल्प को जीवित रखते हैं। उदाहरण के लिए, कुंभ मेला, पंढरपुर वारी या शक्तिपीठों से जुड़ी कथाएँ लोगों की आस्था को मजबूत करती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपराओं को आगे बढ़ाती हैं। इन स्थलों पर विभिन्न क्षेत्रों से आए लोग एकत्र होते हैं, जिससे भाषाओं, खान-पान और रीति-रिवाजों का आदान-प्रदान होता है। यह सांस्कृतिक एकता और समन्वय को प्रोत्साहित करता है। साथ ही, पावन स्थल स्थानीय समुदाय की पहचान का प्रतीक बनते हैं और उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखते हैं। इसके अतिरिक्त, यहाँ होने वाली गतिविधियाँ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता की भावना को भी बल देती हैं।

7. भारत के विविध प्रकार के पावन स्थलों में से अपनी रुचि के अनुसार किन्हीं दों का चयन कीजिए तथा उनका महत्व बताते हुए एक परियोजना बनाइए।

उत्तर: परियोजना: भारत के दो पावन स्थल हैं-

(i) बोधगया (बिहार): बोधगया बौद्ध धर्म का सबसे प्रमुख पावन स्थल है। माना जाता है कि यहीं महात्मा बुद्ध ने पीपल वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे कठोर तपस्या और ध्यान करके ज्ञान की प्राप्ति की थी। इस स्थल पर महाबोधि मंदिर और बोधि वृक्ष आज भी मौजूद हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। यह स्थान न केवल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए, बल्कि शांति और ध्यान की खोज करने वाले हर व्यक्ति के लिए प्रेरणादायी है। बोधगया का महत्व सांस्कृतिक दृष्टि से भी गहरा है, क्योंकि यह भारत को विश्वभर में “आध्यात्मिक धरोहर” के रूप में स्थापित करता है।

(ii) सबरीमाला (केरल): सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है और यह हिंदू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। यहाँ की यात्रा कठिन पहाड़ी मार्गों से होकर की जाती है, जो अनुशासन, आत्मसंयम और श्रद्धा का प्रतीक है। प्रतिवर्ष करोड़ों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं और यह स्थल भक्ति, त्याग तथा समर्पण की भावना को प्रकट करता है। सबरीमाला केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि यह विभिन्न समुदायों को जोड़कर सामाजिक एकता और भाईचारे का भी संदेश देता है। इसके अतिरिक्त, यहाँ की परंपराएँ पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन को भी बढ़ावा देती हैं।

महत्व:

इन दोनों पावन स्थलों का अध्ययन यह दर्शाता है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता कितनी समृद्ध है। बोधगया शांति और आत्मज्ञान का प्रतीक है, जबकि सबरीमाला अनुशासन और सामूहिक भक्ति का केंद्र है। ये दोनों स्थल तीर्थयात्रा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से समाज और राष्ट्र के विकास में भी योगदान देते हैं।

8. तीर्थयात्राएँ किस प्रकार दोहरा महत्व रखती हैं?

उत्तर: तीर्थयात्राएँ केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। धार्मिक रूप से यह विश्वास किया जाता है कि तीर्थयात्रा करने से पापों का नाश होता है, आत्मा शुद्ध होती है और व्यक्ति को आत्मिक शांति प्राप्त होती है। यह आस्था और भक्ति को दृढ़ करने का एक साधन है, जो व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक उत्थान लाती है।

दूसरी ओर, तीर्थयात्राओं का सामाजिक और आर्थिक महत्व भी गहरा होता है। जब बड़ी संख्या में लोग तीर्थस्थलों की ओर यात्रा करते हैं, तो इससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलता है। विभिन्न क्षेत्रों से आए लोग एक-दूसरे की परंपराओं, भाषा और रीति-रिवाजों से परिचित होते हैं। इसके साथ ही, स्थानीय व्यापारियों और कारीगरों को भी लाभ होता है, क्योंकि यात्रियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यापार और सेवाओं का विकास होता है। इस प्रकार तीर्थयात्रा स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में भी सहायक होती है।

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