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NCERT Class 7 Social Science Chapter 6 पुनर्गठन का काल
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पुनर्गठन का काल
Chapter: 6
| प्रश्न और क्रियाकलाप |
1. मौर्योत्तर काल को पुनर्गठन का काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर: मौर्य साम्राज्य के पतन (लगभग 185 ईसा-पूर्व) के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक नए राज्यों का उदय हुआ। इस काल को ‘पुनर्गठन का युग’ कहा जाता है क्योंकि मौर्य साम्राज्य के बिखरे हुए क्षेत्रों का पुनर्गठन कर विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों ने अपने-अपने राज्य स्थापित किए। इन शक्तियों के बीच सत्ता की आकांक्षा के कारण निरंतर प्रतिस्पर्धा बनी रही। सीमांत क्षेत्रों पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए कभी युद्ध तो कभी वैवाहिक गठबंधनों का सहारा लिया गया। इस राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ कला, शिल्प और साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय विकास हुआ तथा विभिन्न संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान ने भारतीय समाज को और अधिक समृद्ध बनाया। इस प्रकार मौर्योत्तर काल राजनीतिक पुनर्गठन और सांस्कृतिक उन्नति दोनों का साक्षी रहा।
2. संगम साहित्य पर 150 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर: संगम साहित्य दक्षिण भारत का सबसे प्राचीन साहित्य है। यह लगभग दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं. तक की कवि-सभाओं (संगमों) में रचित काव्यों का संग्रह है। संगम शब्द संस्कृत के ‘संघ’ से निकला है, जिसका अर्थ है सभा या समिति।
संगम काव्य तत्कालीन समाज और संस्कृति का दर्पण है। इसमें प्रेम, वीरता, उदारता और सामाजिक मूल्यों को सरल एवं भावपूर्ण शैली में अभिव्यक्त किया गया है। इन रचनाओं से हमें उस युग की राजनीतिक गतिविधियों, आर्थिक व्यवस्था, व्यापारिक नगरों और सांस्कृतिक जीवन की जानकारी मिलती है।
संगम साहित्य के माध्यम से चेर, चोल और पांड्य वंशों का इतिहास और उनके योगदान का पता चलता है। यह साहित्य भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जिसने दक्षिण भारत की भाषाई और साहित्यिक परंपराओं को सुदृढ़ आधार दिया।
3. इस अध्याय में उल्लिखित किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया?
उत्तर: मौर्योत्तर काल में सातवाहन शासकों ने अपनी उपाधि में प्रायः माताओं के नाम को सम्मिलित किया। इसका प्रमुख उदाहरण है गौतमीपुत्र शातकर्णी, जिनका नाम उनकी माता गौतमी बलश्री के नाम पर रखा गया था। गौतमी बलश्री एक प्रभावशाली रानी थीं, जिन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान दी और नासिक में अभिलेख उत्कीर्ण करवाए। माताओं का नाम उपाधि में जोड़ने की परंपरा से यह स्पष्ट होता है कि सातवाहन समाज में माताओं को विशेष सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त थी। साथ ही, इससे यह संदेश भी जाता था कि शासक का अधिकार केवल वंशगत नहीं बल्कि माता के संरक्षण और उनके धार्मिक-सांस्कृतिक योगदान से भी जुड़ा हुआ है। इस प्रकार सातवाहन शासकों ने माताओं के नाम को अपनी पहचान का हिस्सा बनाकर समाज में स्त्रियों की गरिमा को और ऊँचा किया।
4. इस अध्याय में वर्णित किसी एक राज्य जो आपको रोचक लगता है, के विषय में 250 शब्दों का एक लेख लिखिए। आपने उस राज्य का चयन क्यों किया? अपना लेख कक्षा में प्रस्तुत कीजिए और यह जानने का प्रयास कीजिए कि आपके सहपाठियों ने कौन-से राज्यों का सर्वाधिक चयन किया है।
उत्तर: मौर्योत्तर काल में अनेक राज्यों का उदय हुआ, जिनमें मुझे सातवाहन राज्य विशेष रूप से रोचक लगता है। सातवाहन वंश ने दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं. तक दक्कन के विस्तृत क्षेत्र पर शासन किया।
सातवाहन साम्राज्य वर्तमान आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र में फैला हुआ था। इसकी राजधानियाँ अमरावती और प्रतिष्ठान (पैठण) थीं। यह साम्राज्य व्यापार और वाणिज्य के लिए प्रसिद्ध था। सातवाहन शासकों ने सिक्कों का व्यापक प्रचलन किया, जो गुजरात से लेकर आंध्र तक मिले हैं।
इस वंश की विशेष परंपरा यह थी कि शासकों के नाम प्रायः उनकी माताओं के नाम पर रखे जाते थे, जैसे गौतमीपुत्र शातकर्णी। इस परंपरा से महिलाओं की सामाजिक प्रतिष्ठा झलकती है। सातवाहनों ने बौद्ध, जैन और वैदिक विद्वानों को कर-मुक्त भूमि दान दी, जिससे धर्म और शिक्षा का प्रसार हुआ।
इस राज्य का अध्ययन रोचक इसलिए है क्योंकि यहाँ से हमें उस युग के समाज, संस्कृति और धर्मों के सह-अस्तित्व की झलक मिलती है। सातवाहनों की कला और सिक्कों से उस काल के जीवन का बहुमूल्य साक्ष्य प्राप्त होता है।
5. कल्पना कीजिए कि आपको एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ है। आप कौन-सा राजचिह्न चुनेंगे और क्यों? आप एक शासक के रूप में कौन-सी उपाधि धारण करेंगे? अपने राज्य के विषय में एक लेख लिखिए जिसमें राज्य के मूल्य, नियमावली एवं विशिष्टताएँ सम्मिलित हों।
उत्तर: मेरा स्वतंत्र राज्य: प्रगति
यदि मुझे एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर मिले, तो मैं अपने राज्य का नाम “प्रगति” रखूँगा। मेरे राज्य का राजचिह्न अशोक चक्र और उड़ता हुआ कबूतर होगा। अशोक चक्र न्याय और सतत् प्रगति का प्रतीक है, जबकि कबूतर शांति और स्वतंत्रता का द्योतक है। यह राजचिह्न यह संदेश देगा कि राज्य का विकास शांति और न्याय पर आधारित होगा।
एक शासक के रूप में मैं “लोकहितेश्वर” की उपाधि धारण करूँगा, क्योंकि मेरा लक्ष्य केवल सत्ता नहीं बल्कि प्रजा का कल्याण और उनकी सेवा करना होगा।
मेरे राज्य के मूल्य:
धर्मनिरपेक्षता और समानता – सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान मिलेगा।
शिक्षा और ज्ञान – हर बच्चे के लिए निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।
स्वास्थ्य और स्वच्छता – प्रत्येक व्यक्ति के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ।
पर्यावरण संरक्षण – वनों, नदियों और जीव-जंतुओं की रक्षा राज्य की प्राथमिकता होगी।
नियमावली:
सभी नागरिकों को भोजन, वस्त्र, आवास और रोजगार की गारंटी।
भ्रष्टाचार और शोषण के विरुद्ध कड़े कानून।
कला, साहित्य और स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन।
किसी भी विवाद का समाधान युद्ध के बजाय संवाद और सहयोग से।
विशिष्टताएँ:
राजधानी में एक विशाल ज्ञान-मंदिर (पुस्तकालय और अनुसंधान केंद्र) होगा, जो सबके लिए खुला रहेगा।
राज्य में हर वर्ष लोक-संस्कृति महोत्सव आयोजित होगा, जहाँ विभिन्न प्रांतों की कला और परंपराएँ प्रदर्शित होंगी।
किसानों और कारीगरों को विशेष संरक्षण और तकनीकी सहायता दी जाएगी।
स्वच्छ ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर “प्रगति” राज्य को एक आदर्श पर्यावरणीय राज्य बनाया जाएगा।
6. आपने मौर्योत्तर काल के वास्तु कलात्मक विकास के विषय में पढ़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप के एक रेखांकित मानचित्र पर इस अध्याय में उल्लिखित कुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को चिह्नित कीजिए।
उत्तर: मौर्योत्तर काल में कई स्थापत्य शैलियों का विकास हुआ। एक रेखांकित मानचित्र पर निम्नलिखित स्थान चिह्नित किए जा सकते हैं—
(i) भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश) – शुंगकालीन कला का उदाहरण।
(ii) अमरावती (आंध्र प्रदेश) – सातवाहन काल की बौद्ध कला।
(iii) उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ (ओडिशा) – चेदि राजा खारवेल द्वारा निर्मित।
(iv) मथुरा (उत्तर प्रदेश) – मथुरा कला शैली का केंद्र।
(v) गांधार (पाकिस्तान/अफगानिस्तान क्षेत्र) – गांधार कला शैली।

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