NCERT Class 7 Social Science Chapter 5 साम्राज्यों का उदय

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NCERT Class 7 Social Science Chapter 5 साम्राज्यों का उदय

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Chapter: 5

प्रश्न और क्रियाकलाप

1. साम्राज्य की विशेषताएँ क्या हैं और यह राज्य से किस प्रकार भिन्न है? इसकी व्याख्या कीजिए।

उत्तर: साम्राज्य की विशेषताएँ हैं-

(i) अधीन राज्यों एवं राजाओं पर नियंत्रण, साम्राज्य विस्तार या बाह्य आक्रमणों से रक्षा हेतु सेना रखना।

(ii) संचार तंत्र (राजमार्ग, नदी, नौवहन) एवं अन्य लोकहितकारी संरचनाओं का निर्माण जिससे प्रशासन, व्यापार एवं जनकल्याण सुचारु रूप से चल सके।

(iii) शासन संचालन हेतु प्रशासनिक तंत्र का निर्माण एवं संचालन, क्षेत्रों के प्रबंधन, कर संग्रह, विधि व्यवस्था बनाए रखने इत्यादि के लिए अधिकारियों की नियुक्ति।

(iv) कला, साहित्य, धर्म, दर्शन, तथा ज्ञान केंद्रों को प्रोत्साहन।

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(v) विधि निर्माण, मुद्रा निर्गत, माप-तोल की मानक प्रणाली की स्थापना तथा व्यापार का नियमन।

(vi) संसाधनों (खनिज, वन, कृषि उत्पाद, जनशक्ति) का नियंत्रण व उनका विनियमन।

साम्राज्य और राज्य दोनों शासन की प्रणालियाँ हैं, लेकिन इन दोनों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर होते हैं।

साम्राज्य एक विशाल और विस्तृत राजनीतिक इकाई होती है, जिसमें कई छोटे-छोटे राज्य और क्षेत्र सम्मिलित होते हैं। इन छोटे क्षेत्रों पर आमतौर पर शक्तिशाली शासक या सम्राट का शासन होता है। साम्राज्य के भीतर विभिन्न राज्यों के अपने शासक होते हैं, लेकिन वे सभी सम्राट के अधीन होते हैं। इसका मतलब यह है कि साम्राज्य एक प्रकार का संघ होता है, जहां अलग-अलग राज्य सम्राट के प्रति निष्ठा रखते हैं।

इसके विपरीत, राज्य एक सीमित भूभाग पर शासन करता है और इसके भीतर कोई अन्य बड़ा प्रशासनिक संघ नहीं होता। राज्य में केंद्रित शासन होता है, जहां एक ही शासक (राजा या मुख्यमंत्री) पूरे राज्य का प्रशासन करता है। राज्य में आम तौर पर राजनीतिक सत्ता एक ही केंद्र में होती है, जबकि साम्राज्य में यह सत्ता विभिन्न प्रांतों या क्षेत्रों में विभाजित होती है।

साम्राज्य में, सैन्य और विस्तार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि साम्राज्य को विस्तार के लिए युद्ध और अन्य राजनीतिक उपायों का सहारा लेना पड़ता है। इसके मुकाबले, राज्य सामान्यतः स्थिरता बनाए रखने और शासन के लिए स्थानीय प्रशासन पर ध्यान केंद्रित करता है।

साम्राज्य का उद्देश्य आमतौर पर क्षेत्रीय विस्तार, संसाधनों का शोषण, और राजकीय शक्ति का प्रसार करना होता है, जबकि राज्य में शासन का उद्देश्य अपने सीमित क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना होता है।

2. राज्यों से साम्राज्यों में परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण कारक क्या हैं?

उत्तर: राज्यों से साम्राज्यों में परिवर्तन के लिए निम्नलिखित कारक महत्वपूर्ण हैं-

(i) उपजाऊ भूमि और अधिशेष (सरप्लस) अन्न उत्पादन।

(ii) लोहे के औज़ार और शस्त्रों का प्रयोग, जिससे कृषि और युद्ध दोनों सशक्त हुए।

(iii) गंगा व सोन जैसी नदियों से व्यापार और परिवहन का लाभ।

(iv) हाथियों, घोड़ों और वनों के संसाधनों की उपलब्धता।

(v) कराधान व्यवस्था और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण।

(vi) छोटे-छोटे राज्यों का विलय कर एक मजबूत शासक का उदय।

3. एलेक्जेंडर को विश्व इतिहास में एक महान शासक माना जाता है, आपके विचार से ऐसा क्यों है?

उत्तर: एलेक्जेंडर को विश्व इतिहास में महान शासक माना जाता है क्योंकि-

(i) उसने विशाल क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और अपनी सेना को दूरस्थ अभियानों पर ले गया।

(ii) ग्रीक और भारतीय दर्शन के बीच वैचारिक संवाद (जैसे जिम्नोसोफिस्टों से प्रश्न-उत्तर) करवाया।

(iii) उसकी नीतियों ने पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक संबंधों को गहरा बनाया।

(iv) वह युद्धकौशल, साहस और दार्शनिक दृष्टिकोण से भी प्रसिद्ध रहा।

4. प्रारंभिक भारतीय इतिहास में मौर्य वंश को महत्वपूर्ण माना जाता है। कारण बताएँ।

उत्तर: मौर्य वंश को प्रारंभिक भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि- 

(i) यह भारत का प्रथम महान साम्राज्य था, जिसकी नींव चंद्रगुप्त मौर्य ने रखी।

(ii) कौटिल्य (चाणक्य) के प्रशासनिक और राजनीतिक विचारों ने इसे स्थायित्व दिया।

(iii) साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र एक प्रमुख नगर और व्यापारिक केंद्र बनी।

(iv) सुव्यवस्थित कर प्रणाली, व्यापार मार्गों और सिक्कों का प्रचलन।

(v) अशोक जैसे शासक ने धर्म, शांति और कल्याणकारी नीतियों से इसे अद्वितीय बनाया।

5. कौटिल्य के कुछ प्रमुख विचार क्या थे? इनमें से कौन-से विचार आप आज भी आस-पास देख सकते हैं?

उत्तर: कौटिल्य के प्रमुख विचार-

कौटिल्य (चाणक्य) ने अपनी प्रसिद्ध रचना अर्थशास्त्र में राज्य और शासन से जुड़ी अनेक बातें बताई थीं। उनके कुछ प्रमुख विचार इस प्रकार हैं-

(i) सप्तांग सिद्धांत: राज्य सात अंगों (स्वामी, मंत्री, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड/सेना और मित्र) से मिलकर बनता है। यदि सभी अंग संगठित रहें तो राज्य समृद्ध और सुरक्षित रहता है।

(ii) कुशल प्रशासन: उन्होंने कहा कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक सशक्त और ईमानदार प्रशासन आवश्यक है।

(iii) भ्रष्टाचार पर नियंत्रण: कौटिल्य ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कठोर दंड-विधान और कड़े कानूनों का उल्लेख किया।

(iv) जनकल्याण को सर्वोपरि: उनका मूल दर्शन था: “राजा की प्रसन्नता प्रजा की प्रसन्नता में है।” यानी शासक को अपनी इच्छा नहीं बल्कि जनता के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।

(v) आर्थिक व्यवस्था: कर वसूली, व्यापारिक मार्गों का नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने पर उन्होंने विशेष बल दिया।

(vi) रक्षा और सुरक्षा: उन्होंने कहा कि राज्य को हमेशा अपने शत्रुओं और खतरों से सावधान रहना चाहिए तथा मजबूत सेना और दुर्ग बनाए रखने चाहिए।

आज के समय में दिखने वाले कौटिल्य के विचार हैं-

(i) जनकल्याणकारी योजनाएँ: आज सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कें, रोजगार आदि योजनाएँ चलाती हैं, जो कौटिल्य के “प्रजा-कल्याण” के सिद्धांत को दर्शाती हैं।

(ii) भ्रष्टाचार विरोधी कानून: आज भी लोकपाल, सतर्कता आयोग और कठोर कानूनों के माध्यम से भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो कौटिल्य की सोच से सामंजस्य रखते हैं।

(iii) कुशल प्रशासन: जैसे पुलिस, न्यायालय, चुनाव आयोग आदि संस्थाएँ कानून-व्यवस्था बनाए रखने का काम करती हैं।

(iv) रक्षा और सुरक्षा: सेना, पुलिस और खुफिया एजेंसियाँ आज भी राज्य की रक्षा करती हैं।

(v) आर्थिक नीतियाँ: कर व्यवस्था, बजट, व्यापार और बाजार नियंत्रण कौटिल्य की आर्थिक सोच का आधुनिक रूप है।

6. अशोक और उसके साम्राज्य के बारे में असाधारण बातें क्या थीं? उनमें से कौन-सी बातें आज भी भारत को प्रभावित करती रही हैं और क्यों? अपने विचार लगभग 250 शब्दों में लिखिए

देवताओं के प्रिय राजा पियदसी कहते हैं- मेरे धम्माधिकारी सार्वजनिक लाभ के लिए अनेक विषयों में व्यस्त हैं। वे सभी संप्रदाओं के सदस्यों, तपस्वियों और गृहस्थों दोनों के बीच व्यस्त हैं। मैंने कुछ को बौद्ध संघ, ब्राह्मणों और आजीवकों….. जैनियों.. और विभिन्न संप्रदायों के लिए नियुक्त किया है। अधिकारियों की अनेक श्रेणियाँ हैं और उनके कई प्रकार के कर्तव्य है। मेरे धम्माधिकारी इन और अन्य संप्रदायों के विषयों में व्यस्त हैं।

उत्तर: अशोक और उनके साम्राज्य की असाधारण बातें निम्नलिखित थीं-

अशोक (268–232 ई.पू.) मौर्य साम्राज्य के महानतम शासकों में गिने जाते हैं। प्रारंभिक काल में वे महत्वाकांक्षी और विजयी राजा थे, किंतु कलिंग युद्ध (ओडिशा) के बाद उन्होंने हिंसा का त्याग किया और बुद्ध के अहिंसा व करुणा के मार्ग को अपनाया। यही उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था।

उन्होंने ‘धम्म’ (धर्म) की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें करुणा, सहिष्णुता, सभी धर्मों का सम्मान, प्राणियों के प्रति दया और जनकल्याण प्रमुख थे। अपने विचारों को उन्होंने स्तंभों और शिलालेखों के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाया।

अशोक ने चिकित्सालय, कुएँ, विश्रामगृह और सड़कों के किनारे वृक्ष लगवाए। उन्होंने मनुष्यों और पशुओं दोनों के लिए चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाईं और पशु-क्रूरता पर रोक लगाई। उनके धम्माधिकारी जनता के कल्याण के लिए नियुक्त किए गए थे।

आज का प्रभाव-

आज के भारत पर अशोक की धरोहर गहरी छाप छोड़ती है। धर्मनिरपेक्षता और सभी संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता की भावना हमारे संविधान में परिलक्षित है। पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और सामाजिक कल्याणकारी योजनाएँ भी उनकी नीतियों से जुड़ी परंपरा को दर्शाती हैं।

इस प्रकार, अशोक केवल एक साम्राज्य-निर्माता नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों और सार्वभौमिक नैतिकता के प्रतीक बने।

7. अशोक के उपरोक्त शिलालेख को पढ़ने के उपरांत, क्या आपको लगता है कि वे अन्य धार्मिक विश्वासों और विचारधाराओं के प्रति सहिष्णु थे? अपने विचार कक्षा में साझा कीजिए।

उत्तर: हाँ, अशोक के शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि वे अन्य धार्मिक विश्वासों और विचारधाराओं के प्रति अत्यंत सहिष्णु थे। उन्होंने अपने धम्माधिकारियों को केवल बौद्ध संघ के लिए ही नहीं, बल्कि ब्राह्मणों, जैनियों (आजीवकों) और अन्य सभी संप्रदायों की सेवा और कल्याण हेतु नियुक्त किया।

अशोक ने यह भी कहा कि प्रत्येक संप्रदाय को दूसरों की शिक्षाओं का अध्ययन करना चाहिए और एक-दूसरे की अच्छाइयों को स्वीकार करना चाहिए। यह उनकी सहिष्णुता, समान दृष्टि और समावेशी नीति को दर्शाता है। वे मानते थे कि समाज में सभी धर्म और विचारधाराएँ शांति और नैतिकता के साथ मिलकर चल सकती हैं।

उनकी यह नीति न केवल उनके समय में धार्मिक सौहार्द बढ़ाने वाली थी, बल्कि आज के भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान का भी आधार मानी जा सकती है।

8. ब्राह्मी लिपि एक लेखन प्रणाली थी जिसका प्राचीन भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। इस लिपि के बारे में अधिक जानने का प्रयास कीजिए। जहाँ भी आवश्यक हो, अपने शिक्षक से सहायता लीजिए। एक लघु कार्य परियोजना बनाएँ और इस दौरान आपने ब्राह्मी लिपि के बारे में जो कुछ भी सीखा, उसे संलग्न कीजिए।

उत्तर: लघु कार्य परियोजना: ब्राह्मी लिपि-

ब्राह्मी लिपि क्या है?

ब्राह्मी लिपि प्राचीन भारत की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण लेखन प्रणालियों में से एक है। इसका व्यापक प्रयोग मौर्य काल (तीसरी शताब्दी सा.सं.पू.) में हुआ। यह लिपि मुख्यतः प्राकृत भाषा को लिखने के लिए प्रयुक्त होती थी। विद्वान इसे भारत की लगभग सभी आधुनिक लिपियों की जननी मानते हैं।

मुख्य विशेषताएँ है-

(i) यह बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी।

(ii) इसमें स्वरों और व्यंजनों के लिए अलग-अलग चिह्न थे।

(iii) यह सरल, व्यवस्थित और आसानी से सीखी जाने योग्य थी।

(iv) समय के साथ इसमें स्थानीय भेद दिखाई देने लगे।

उपयोग:

(i) अशोक के शिलालेख और स्तंभ-लेख इसी लिपि में लिखे गए, जिनमें धर्म और जनकल्याण के संदेश अंकित थे।

(ii) इसे व्यापारिक दस्तावेज़, प्रशासनिक आदेश और धार्मिक ग्रंथों को लिखने में भी उपयोग किया गया।

आधुनिक प्रभाव: 

(i) ब्राह्मी लिपि से आगे चलकर देवनागरी, बंगला, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, उड़िया और अनेक भारतीय लिपियों का विकास हुआ।

(ii)  यह भारतीय संस्कृति, इतिहास और लेखन परंपरा की सबसे बड़ी धरोहरों में से एक है।

9. मान लीजिए कि आपको तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. में कौशांबी से कावेरीपट्टनम की यात्रा करनी है। आप यह यात्रा कैसे करेंगे? इस यात्रा के दौरान आप कहाँ-कहाँ ठहरेंगे और आपको इसमें कितना समय लगेगा?

उत्तर: यात्रा योजना: कौशांबी से कावेरीपट्टनम (तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व)

यात्रा का मार्ग

यात्रा दक्षिणापथ व्यापारिक मार्ग से होगी।

यह मार्ग कौशांबी (उत्तर प्रदेश) → विदिशा (मध्य प्रदेश) → उज्जयिनी (मध्य प्रदेश) → प्रतिष्ठान/पैठण (महाराष्ट्र) → तगारा (तेलंगाना/आंध्र क्षेत्र) → कावेरीपट्टनम (तमिलनाडु) तक जाता था।

परिवहन के साधन:

बैलगाड़ी: लंबी दूरी और सामान ढोने के लिए प्रमुख साधन।

घोड़े या पैदल: छोटे मार्गों और कठिन रास्तों के लिए।

नदी-मार्ग: नर्मदा, गोदावरी जैसी नदियों पर नावों का सहारा।

ठहराव के प्रमुख स्था:

विदिशा: मध्य भारत का बड़ा व्यापारिक केंद्र।

उज्जयिनी: मौर्य काल का महत्वपूर्ण नगर, जहाँ विश्रामगृह उपलब्ध थे।

प्रतिष्ठान (पैठण): दक्षिण की ओर व्यापार और ठहराव का प्रमुख स्थल।

तगारा: दक्षिण भारत का सक्रिय व्यापारिक नगर।

कावेरीपट्टनम: अंतिम गंतव्य, जो कावेरी नदी के तट पर एक प्रसिद्ध बंदरगाह था।

यात्रा की अवधि:

(i) कुल दूरी लगभग 1500–2000 किमी।

(ii) बैलगाड़ी से प्रतिदिन 20–30 किमी यात्रा संभव।

(iii) विश्राम और मौसम की बाधाओं सहित, यात्रा में 2 से 3 महीने लग सकते थे।

सावधानियाँ और व्यवस्था:

(i) व्यापारिक मार्गों पर लुटेरों से सुरक्षा हेतु सैनिकों या व्यापारी-समूहों के साथ यात्रा।

(ii) पर्याप्त भोजन, पानी और औषधि साथ रखना।

(iii) विश्रामगृहों और धर्मशालाओं का उपयोग।

(iv) स्थानीय व्यापारियों और अधिकारियों से सहयोग लेना।

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