NCERT Class 7 Social Science Chapter 4 नवारंभ – नगर एवं राज्य

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NCERT Class 7 Social Science Chapter 4 नवारंभ – नगर एवं राज्य

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Also, you can read the NCERT book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Central Board of Secondary Education (CBSE) Book guidelines. NCERT Class 7 Social Science Chapter 4 नवारंभ – नगर एवं राज्य Textual Solutions are part of All Subject Solutions. Here we have given CBSE Class 7 Social Science Textbook Solutions Hindi Medium for All Chapters, You can practice these here.

Chapter: 4

प्रश्न और क्रियाकलाप

1. अध्याय के आरंभ में दिए गए उद्धरण पर विचार करें और समूह में चर्चा करें। अपने निरीक्षणों तथा निष्कर्षों की तुलना करें कि कौटिल्य ने एक राज्य के लिए क्या अनुशंसा की थी? क्या यह आज की परिस्थिति से भिन्न है?

उत्तर: कौटिल्य ने “अर्थशास्त्र” में राज्य के लिए कई महत्वपूर्ण अनुशंसाएँ दी थीं, जिनमें प्रशासन की शक्ति, राजकोष का प्रबंधन, और राज्य की सुरक्षा को सुनिश्चित करना शामिल था। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य का क्षेत्र सुरक्षित, संपन्न और संवेदनशील होना चाहिए, जिसमें कृषियोग्य क्षेत्र, खनिजों से भरपूर भूमि, वन्यप्राणी और जल स्रोत (नदियाँ, जलाशय) शामिल हों। राज्य की सड़कें और जलमार्ग सुव्यवस्थित होने चाहिए, ताकि व्यापार और संचार में कोई रुकावट न हो।

आज के समय में, कौटिल्य की ये अनुशंसाएँ फिर भी प्रासंगिक हैं, लेकिन आजकल शासन लोकतांत्रिक रूप से संचालित होता है और समानता और मानवाधिकार जैसे आधुनिक पहलू इसमें जुड़े हुए हैं। कौटिल्य की “राजस्व संग्रहण”, विधान व्यवस्था और सेना के प्रति दृष्टिकोण आज भी राज्य के संचालन के मूल तत्वों में शामिल हैं, परंतु राजनीतिक परिप्रेक्ष्य, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता आज के शासकों के लिए महत्वपूर्ण बन गए हैं। इस प्रकार, आज के शासन में समाज के सभी वर्गों के हित को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष और पारदर्शी निर्णय लिए जाते हैं।

2. पाठ के अनुसार प्रारंभिक वैदिक समाज में शासकों का चयन कैसे किया जाता था?

उत्तर: प्रारंभिक वैदिक समाज में शासकों का चयन मुख्य रूप से जनसभा या विभिन्न जनपदों की सभा के माध्यम से किया जाता था। इन सभाओं में समाज के प्रमुख सदस्य, जो वरिष्ठजन होते थे, राजा या शासक के चयन पर विचार करते थे। राजा का चुनाव वंशानुगत था, लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से शासक को अपने कार्यों में जनसामान्य की भलाई और न्याय का पालन करना पड़ता था। यदि कोई शासक अयोग्य होता था, तो उसे सभा द्वारा पदच्युत भी किया जा सकता था।

इस प्रकार, शासक का चयन किसी सामूहिक निर्णय के आधार पर किया जाता था, जिसमें समाज की भलाई और उसकी सुरक्षा प्रमुख कारक होते थे।

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3. कल्पना कीजिए कि आप प्राचीन भारत के इतिहास का अध्ययन करने वाले एक इतिहासकार हैं। महाजनपदों के विषय में अधिक जानकारी हेतु आप कौन-कौन से स्रोतों (पुरातात्विक, साहित्यिक इत्यादि) का उपयोग करेंगे? प्रत्येक स्रोत से आपको क्या जानकारी प्राप्त हो सकती है, वर्णन करें।

उत्तर: महाजनपदों के अध्ययन हेतु विभिन्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है:

पुरातात्विक उत्खनन:

साक्ष्य: महाजनपदों की राजधानी और नगरों के अवशेष, जैसे प्राचीन नगरों के भव्य प्राचीर, मंदिर, महल, किले, और अन्य वास्तुशिल्पीय संरचनाएँ।

जानकारी: इन अवशेषों से हम महाजनपदों के सामाजिक, सांस्कृतिक और भौतिक जीवन की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, जैसे शहरों के नियोजन, व्यापारिक मार्गों, और आर्थ‍िक संरचनाओं के बारे में।

साहित्यिक स्रोत (जैसे – बौद्ध, जैन और वेदिक साहित्य):

साक्ष्य: ग्रंथों में महाजनपदों के बारे में वर्णन, जैसे “अर्थशास्त्र”, “महाभारत”, “जैन साहित्य”, “बौद्ध साहित्य”।

जानकारी: इन साहित्यिक स्रोतों से महाजनपदों के राजनीतिक संगठन, शासकों की शक्ति और धार्मिक विचारधाराओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।

लेखन प्रणाली:

साक्ष्य: महाजनपदों में उपयोग किए गए लेखन प्रणालियों के साक्ष्य, जैसे खगोलशास्त्र, धर्म और प्रशासन के लिए इस्तेमाल होने वाले लेख।

जानकारी: लेखन से महाजनपदों में संस्कार, प्रशासन और सामाजिक संरचना का स्पष्ट चित्र प्राप्त हो सकता है।

इन स्रोतों का संयोजन महाजनपदों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थ‍िक जीवन को समझने में सहायक होगा।

4. प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में नगरीकरण हेतु लौह धातु-विज्ञान का विकास इतना महत्वपूर्ण क्यों था? उत्तर देने हेतु आप पाठ में दिए गए तथ्यों के साथ-साथ अपनी जानकारी या कल्पना का भी उपयोग कर सकते हैं।

उत्तर: प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में लौह धातु-विज्ञान का विकास नगरीकरण के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि:

कृषि में सुधार: लौह उपकरणों के विकास ने कृषि तकनीकों में सुधार किया। लौह से बने हल, बुआई के औजार, और अन्य कृषि उपकरणों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाया, जिससे अधिक जनसंख्या का पोषण संभव हुआ और नगरीय सभ्यता का विस्तार हुआ।

सैन्य शक्ति: लौह धातु से बने हथियार (जैसे तलवार, भाले, तीर आदि) युद्ध के लिए अधिक प्रभावी थे। इससे सैन्य बल को मज़बूती मिली, जो महाजनपदों के साम्राज्य विस्तार के लिए आवश्यक था।

वाणिज्य और व्यापार: लौह धातु के औजार और उपकरण निर्माण से व्यापारिक गतिविधियाँ भी बढ़ीं। लौह धातु को व्यापारिक मार्गों के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों में भेजा जाता था, जिससे वाणिज्यिक नेटवर्क मजबूत हुआ।

नगरों का विकास: लौह धातु से निर्माण सामग्री (जैसे बर्तन, औजार, किले आदि) सस्ते और मजबूत बन गए, जिससे नगरों का विस्तार और स्थिरता बढ़ी।

इस प्रकार, लौह धातु विज्ञान ने कृषि, सैन्य और व्यापार के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलाव लाए, जिससे नगरीकरण को तेज़ी से बढ़ावा मिला और यह समृद्ध हुआ।

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