NCERT Class 7 Social Science Chapter 11 वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

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NCERT Class 7 Social Science Chapter 11 वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

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Chapter: 11

प्रश्न और क्रियाकलाप

1. वस्तु विनिमय प्रणाली कैसे कार्य करती थी और इस प्रणाली में किस प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग विनिमय हेतु किया जाता था?

उत्तर: वस्तु विनिमय प्रणाली में लोग अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएँ या सेवाएँ सीधे दूसरी वस्तुओं या सेवाओं के बदले में देते थे। उदाहरण के लिए, यदि किसी के पास अतिरिक्त गेहूँ है और उसे कपड़े चाहिए, तो वह किसी ऐसे व्यक्ति को खोजेगा जिसके पास कपड़े हों और जिसे गेहूँ चाहिए। इस प्रणाली में कौड़ी, कवच, नमक, तंबाकू, चायपत्ती, पशुधन (गाय, बैल, बकरी), कपड़े, बीज, फल-सब्जियाँ आदि वस्तुएँ विनिमय के लिए प्रयुक्त होती थीं।

2. वस्तु विनिमय प्रणाली की क्या सीमाएँ थीं?

उत्तर: वस्तु विनिमय प्रणाली की सीमाएँ:

(i) आवश्यकताओं का द्विसंयोग (Double Coincidence of Wants): दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तु होनी चाहिए।

(ii) सामान्य मूल्य मानक का अभाव: वस्तुओं के अनुपात या मूल्य तय करना कठिन था।

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(iii) विभाज्यता की समस्या: बड़ी वस्तुओं (जैसे बैल) को छोटे हिस्सों में बाँटना संभव नहीं था।

(iv) सुवाह्यता की समस्या: बड़ी वस्तुओं को हर जगह ले जाना कठिन होता था।

(v) टिकाऊपन की समस्या: अनाज, फल-सब्जियाँ जैसी वस्तुएँ लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखी जा सकती थीं।

3. प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?

उत्तर: प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेषताएँ है:

(i) सिक्के सोने, चाँदी, ताँबे और उनकी मिश्रधातुओं से बनाए जाते थे।

(ii) इन्हें कार्षापण या पण कहा जाता था।

(iii) सिक्कों पर विशेष चिह्न अंकित रहते थे, जिन्हें रुपा कहा जाता था।

(iv) सिक्कों के शीर्ष और पृष्ठ पर प्राकृतिक आकृतियाँ (पशु, वृक्ष, पहाड़) उकेरी जाती थीं।

(v) देवी-देवताओं की छवियाँ और शासकों की प्रतिमाएँ भी अंकित रहती थीं।

(vi) सिक्कों की प्रामाणिकता और प्रचलन पूर्णतया शासकों के नियंत्रण में था।

4. समय के साथ मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कैसे परिवर्तित हुई?

उत्तर: समय के साथ मुद्रा का विकास निम्नलिखित रूपों में हुआ:

(i) वस्तु विनिमय प्रणाली: प्रारंभ में लोग कौड़ी, कवच, नमक, पशुधन, बीज आदि वस्तुओं का उपयोग विनिमय के लिए करते थे।

(ii) सिक्का प्रणाली: बाद में धातुओं जैसे सोना, चाँदी और ताँबे से सिक्के ढाले गए, जिन्हें शासकों द्वारा जारी किया जाता था। इनसे व्यापार सरल और व्यापक हुआ।

(iii) कागजी मुद्रा: कालांतर में बड़े लेन-देन के लिए कागजी मुद्रा का प्रचलन हुआ, जिसने लेन-देन को और सुविधाजनक बनाया।

(iv) डिजिटल मुद्रा: वर्तमान समय में डिजिटल भुगतान (UPI, QR कोड, डेबिट/क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग) का प्रयोग होता है, जो सुरक्षित, तेज और सरल है।

5. प्राचीन काल में कौन-से कदम उठाए गए होंगे जिससे भारतीय सिक्के विभिन्न देशों में विनिमय का माध्यम बन सकें?

उत्तर: भारतीय सिक्कों को विभिन्न देशों में विनिमय का माध्यम बनाने के लिए कदम:

(i) सिक्कों की गुणवत्ता और धातु की शुद्धता पर ध्यान दिया गया।

(ii) सिक्कों पर अंकित प्रतीक और चिह्नों से उनकी प्रामाणिकता सिद्ध होती थी।

(iii) समुद्री व्यापार का विस्तार किया गया।

(iv) सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया गया।

(v) भारतीय सिक्के दक्षिण-पूर्व एशिया, रोम और अरब देशों तक पहुँच गए।

(vi) इससे भारतीय सिक्के विश्वसनीय और मान्यता प्राप्त बने।

6. अर्थशास्त्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़ें-

’60 पणों का एक वर्ष का वेतन प्रतिदिन एक अधक अनाज से प्रतिस्थापित हो सकता था, जो चार बार के भोजन के लिए पर्याप्त था…’ (एक अधक लगभग 3 किलोग्राम के बराबर होता है)। यह एक पण के मूल्य के विषय में क्या बताता है? पड़ोसी की सहायता न करने की दंड 100 पण था। इसकी तुलना वार्षिक वेतन से करें। इससे आप मानवीय मूल्यों के बारे में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जो इसके माध्यम से प्रोत्साहित किए जा रहे थे?

उत्तर: अर्थशास्त्र की पंक्ति पर आधारित निष्कर्ष-

(i) वार्षिक वेतन और पण का महत्व: उस समय एक व्यक्ति का वार्षिक वेतन 60 पण था और केवल एक पण से पूरे दिन का भोजन प्राप्त किया जा सकता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस काल में एक पण का मूल्य अत्यधिक था और इससे जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती थीं।

(ii) मानवीय सहयोग पर बल: यदि कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी की सहायता नहीं करता था, तो उसे 100 पण का दंड देना पड़ता था। यह वार्षिक वेतन से भी कहीं अधिक था, जिससे यह पता चलता है कि समाज ने दूसरों की मदद को सबसे बड़ा कर्तव्य माना था।

(iii) नैतिक मूल्यों का संरक्षण: कठोर दंड से यह संकेत मिलता है कि आर्थिक व्यवस्था केवल वस्तुओं और पैसों के लेन-देन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिक कर्तव्यों को भी जोड़ा गया था।

(iv) समाज की सामूहिक सोच: ऐसे प्रावधान यह दर्शाते हैं कि प्राचीन समाज व्यक्तिगत लाभ से अधिक सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता देता था। सहयोग और करुणा को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक नियमों का सहारा लिया गया।

7. एक नाटक लिखिए और उसका मंचन कीजिए जिसमें यह दिखाया जाए कि लोग एक-दूसरे को कौड़ी, कवच (और ऐसी अन्य वस्तुओं) को विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग करने के लिए कैसे तैयार कर सके होंगे?

उत्तर: नाटक – “वस्तु विनिमय से मुद्रा तक”

दृश्य 1: गाँव का चौपाल

(गाँव वाले इकट्ठा हुए हैं। एक किसान, मछुआरा, कुम्हार और व्यापारी आपस में बातचीत कर रहे हैं।)

किसान: मेरे पास गेहूँ की बोरियाँ हैं, लेकिन मुझे अपनी पत्नी के लिए कपड़े चाहिए।

मछुआरा: मेरे पास कपड़े नहीं हैं, लेकिन मेरे पास ताज़ी मछलियाँ हैं।

कुम्हार: मैं मिट्टी के बर्तन बनाता हूँ, पर मुझे अनाज चाहिए।

व्यापारी: मेरे पास दूर-दराज़ से लाया हुआ नमक है, लेकिन मुझे बर्तन और मछलियाँ चाहिए।

(सभी सोच में पड़ जाते हैं, क्योंकि हर किसी को अपनी ज़रूरत की चीज़ सीधे नहीं मिल रही है।)

दृश्य 2: समाधान की खोज

किसान: यदि हम कोई ऐसी वस्तु तय कर लें, जिसे हर कोई स्वीकार करे, तो आदान-प्रदान आसान हो जाएगा।

मछुआरा: हाँ! जैसे कौड़ी। यह सुंदर भी है और हर किसी को पसंद भी आती है।

कुम्हार: सही कहा! कौड़ी हर जगह मिलती है और इसे आसानी से ले जाया जा सकता है।

व्यापारी: कवच और धातु के टुकड़े भी उपयोगी होंगे। इन्हें सँभालना आसान है और सब इन्हें मान सकते हैं।

दृश्य 3: निष्कर्ष

(सभी गाँववाले मिलकर तय करते हैं कि वे कौड़ी, कवच और कुछ विशेष वस्तुओं को सामान्य विनिमय माध्यम के रूप में मानेंगे।)

गाँव के बुजुर्ग: आज से हम सभी लेन-देन के लिए कौड़ी और कवच को स्वीकार करेंगे। इससे किसी को भी वस्तु-विनिमय में परेशानी नहीं होगी और व्यापार सरल होगा।

(सभी लोग ताली बजाते हैं और खुशी जाहिर करते हैं।)

नाटक का संदेश:

यह नाटक दर्शाता है कि प्राचीन समय में लोग आपसी सहमति से कौड़ी, कवच जैसी वस्तुओं को एक सामान्य विनिमय माध्यम के रूप में स्वीकार करने लगे। इससे वस्तु विनिमय की समस्याएँ कम हुईं और व्यापार अधिक सरल और संगठित हो गया।

8. भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) ही कागजी मुद्रा को छापने व वितरण करने का एकमात्र वैधानिक स्रोत है। नोटों की अवैध छपाई और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने कई सुरक्षा कदम उठाए हैं। पता लगाइए कि ऐसे कुछ उपाय कौन-से हैं और अपनी कक्षा में उनकी चर्चा कीजिए।

उत्तर: भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) नोटों की अवैध छपाई और दुरुपयोग को रोकने के लिए निम्नलिखित सुरक्षा उपाय करता है:

सुरक्षा धागा: प्रत्येक नोट में एक चमकदार धागा होता है, जिस पर ‘RBI’ और ‘भारत’ लिखा होता है। यह प्रकाश में रंग बदलता है।

वॉटरमार्क: नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर और मूल्य का वॉटरमार्क होता है, जो रोशनी में दिखाई देता है।

माइक्रो-टेक्स्ट: नोटों पर छोटे अक्षरों में RBI या मूल्य लिखा होता है, जिसे आवर्धक लेंस से पढ़ा जा सकता है।

उभरा हुआ प्रिंट: कुछ हिस्से उभरे होते हैं, जिससे दृष्टिबाधित लोग भी मूल्य पहचान सकते हैं।

फ्लोरोसेंट स्याही: पराबैंगनी (UV) प्रकाश में नोटों के कुछ अंक और धागे चमकते हैं।

होलोग्राम: कुछ नोटों पर होलोग्राम होता है, जो अलग-अलग कोण से देखने पर रंग और डिज़ाइन बदलता है।

9. अपने परिवार के कुछ सदस्यों और स्थानीय दुकानदारों का साक्षात्कार लीजिए और उनसे पूछिए कि वे भुगतान करने या प्राप्त करने में नकद या यू.पी.आई. में किसको वरीयता देंगे और क्यों?

उत्तर: साक्षात्कार के लिए नमूना प्रश्न:

आप भुगतान करने या प्राप्त करने के लिए नकद या यू.पी.आई. में से किसे पसंद करते हैं?

आपकी पसंद का कारण क्या है?

क्या आपको यू.पी.आई. का उपयोग करने में कोई परेशानी होती है?

नकद और यू.पी.आई. में से कौन अधिक सुविधाजनक और सुरक्षित है?

नमूना उत्तर (साक्षात्कार के आधार पर):

मम्मी: मैं यू.पी.आई. को पसंद करती हूँ क्योंकि इससे तुरंत भुगतान हो जाता है और ज्यादा नकद रखने की जरूरत नहीं होती। हालांकि, छोटे दुकानदारों के पास कभी-कभी यह सुविधा नहीं होती, तो नकद देना पड़ता है।

पापा: मुझे यू.पी.आई. अच्छा लगता है क्योंकि इससे सभी लेन-देन का रिकॉर्ड मोबाइल में रहता है। यह सुरक्षित भी है, क्योंकि नकद चोरी हो सकता है लेकिन डिजिटल पैसा बैंक में सुरक्षित रहता है।

स्थानीय सब्जी विक्रेता: मैं नकद को ज्यादा पसंद करता हूँ क्योंकि ग्राहक अक्सर छोटी रकम नकद में ही देते हैं। यू.पी.आई. भी लेता हूँ, लेकिन कई बार नेटवर्क या बिजली की समस्या आ जाती है।

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