NCERT Class 11 Home Science Chapter 2 स्वयं को समझना

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NCERT Class 11 Home Science Chapter 2 स्वयं को समझना

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Chapter: 2

मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान भाग – I

इकाई – (I) स्वयं को समझना-किशोरावस्था

क्रियाकलाप – 1

मैं से शुरू होने वाले इन वाक्यों को पूरा करिए –

1. मैं ________________ हूँ।
2. मैं ________________ हूँ।
3. मै ________________ हूँ।
4. मैं ________________ हूँ।
5. मैं ________________ हूँ।
6. मैं ________________ हूँ।
7. मैं ________________ हूँ।
8. मैं ________________हूँ।
9. मैं ________________ हूँ।
10. मैं ________________ हूँ।

उत्तर:

1. मैं एक मेहनती विद्यार्थी हूँ।
2. मैं अपने माता-पिता का आज्ञाकारी संतान हूँ।
3. मैं अपने मित्रों के साथ मिलनसार और हँसमुख व्यक्ति हूँ।
4. मैं चुनौतियों का सामना करने में साहसी हूँ।
5. मैं अपनी संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करने वाला व्यक्ति हूँ।
6. मैं दूसरों की मदद करने में विश्वास रखता हूँ।
7. मैं अपनी गलतियों से सीखने वाला व्यक्ति हूँ।
8. मैं अपने लक्ष्यों को पाने के लिए मेहनत करता हूँ।
9. मैं नए विचारों को अपनाने में उत्सुक हूँ।
10. मैं अपने भविष्य के प्रति आशावादी हूँ।

क्रियाकलाप – 2

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क्या आप वही व्यक्ति हैं जो 5 साल पहले थे? इस विषय पर कुछ देर सोचें तथा नीचे दिए गए स्थान में अपने विचार तथा उन विचारों के कारण लिखें।

उत्तर: पाँच वर्ष पहले की तुलना में मैं अब एक अधिक परिपक्व, आत्मविश्वासी और समझदार व्यक्ति बन गया हूँ। पहले मैं छोटी-छोटी बातों पर घबरा जाता था और निर्णय लेने में हिचकिचाता था, लेकिन अब मैं कठिन परिस्थितियों का सामना धैर्य और आत्मविश्वास के साथ करता हूँ। मेरी सोच में भी काफी बदलाव आया है; जहाँ पहले मैं केवल अपनी पढ़ाई और व्यक्तिगत हितों तक सीमित था, अब मैं अपने परिवार, समाज और कार्यस्थल में अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझने लगा हूँ। अनुभवों ने मुझे सिखाया है कि गलतियाँ भी सीखने का हिस्सा होती हैं, जिससे मैंने आत्मविश्लेषण करना और अपनी कमियों को सुधारना सीखा है। इसके अलावा, मेरे आत्मसम्मान में भी वृद्धि हुई है क्योंकि अब मैं अपनी क्षमताओं को पहचानते हुए अपने निर्णयों पर भरोसा करने लगा हूँ। इन परिवर्तनों ने मुझे मानसिक रूप से मजबूत बनाया है और जीवन के प्रति मेरी सोच को अधिक सकारात्मक बनाया है। मेरा मानना है कि यह विकास एक सतत प्रक्रिया है, जो अनुभवों, सीखने और आत्मविश्लेषण के साथ आगे भी चलता रहेगा।

समीक्षात्मक प्रश्न

1. “स्वयं” शब्द से आप क्या समझते हैं? समझाएँ। उदाहरण देकर इसके विभिन्न आयामों पर चर्चा करें।

उत्तर: हमारे माता-पिता, भाई-बहन, अन्य संबंधियों, मित्रों तथा हमारे बीच अनेक बातें सामान्य हैं परंतु फिर भी हम में से प्रत्येक अलग व्यक्ति है, जो अन्य सभी से भिन्न है। इस अनोखेपन की यह अनुभूति हमें अपने होने का एहसास कराती है- ‘मैं’ होने की अनुभूति, जो ‘आप’ ‘वे’ और ‘अन्य’ से अलग है।

किशोरावस्था – जीवन की वह अवधि जिससे आप इस समय गुज्जर रहे हैं- इस दौरान हम अपने बारे में सबसे अधिक सोचना शुरू कर देते हैं कि हम कौन हैं, “मुझे” ‘अन्य’ से भिन्न कौन-सी बातें बनाती हैं। इस अवस्था में किसी अन्य अवस्था की तुलना में हम ‘स्वयं’ को परिभाषित करने की अधिक कोशिश करते हैं।

स्वयं’ की अनुभूति का अर्थ है- यह अनुभव करना कि हम कौन हैं और कौन-सी बातें हमें अन्य लोगों से। भिन्न बनाती हैं? इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘स्वयं’ शब्द का अर्थ उनके अनुभवों, विचारों, सोच तथा अनुभूतियों का संपूर्ण रूप है जो स्वयं के विषय में है।

‘स्वयं’ के विभिन्न आयाम निम्नलिखित हैं:

1. व्यक्तिगत स्वयं-व्यक्तिगत स्वयं के वे पक्ष हैं जिसमें केवल आप जुड़े हैं।

2. सामाजिक स्वयं-सामाजिक स्वयं का अर्थ उन पक्षों से है जहाँ आप अन्य व्यक्तियों के साथ जुड़े हुए हैं। इनमें आपस में बाँटना, सहयोग, समर्थन और एकता शामिल है।

2. ‘स्वयं’ को समझना महत्वपूर्ण क्यों है?

उत्तर: किसी भी व्यक्ति के लिए ‘स्वयं’ को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे वह अपने व्यक्तित्व को बेहतर ढंग से पहचान सकता है और उसे निखार सकता है। विशेष रूप से किशोरावस्था के दौरान व्यक्ति अपने बारे में सबसे अधिक सोचने लगता है, जैसे – “मैं कौन हूँ?” और “मुझे ‘अन्य’ से भिन्न कौनसी बातें बनाती हैं?” इस अवस्था में व्यक्ति स्वयं को परिभाषित करने का अधिकतम प्रयास करता है। जैसे-जैसे हम अपने बारे में जानने लगते हैं, वैसे-वैसे हमारे भीतर एक नियंत्रण बोध विकसित होता है, जो जीवन की यात्रा को सुगम बनाने में सहायक होता है। आत्मविश्लेषण केवल स्वयं द्वारा ही किया जा सकता है, अतः हमें निरंतर स्वयं से प्रश्न करते रहना चाहिए कि “मैं कौन हूँ?” यह प्रश्न हमारे जीवन का ऐसा हिस्सा होना चाहिए जिसे हम निरंतर पूछते रहें, क्योंकि एक स्वस्थ व्यक्तित्व में सुधार की संभावना हमेशा बनी रहती है। दूसरों को सुनना और उनसे सीखना महत्वपूर्ण है, परंतु स्वयं को पहचानने में निर्णय, स्वीकृति और पसंद अपनी होनी चाहिए।

(ख) स्वयं का विकास एवं विशेषताएँ

समीक्षात्मक प्रश्न

1. उदाहरण देते हुए निम्नलिखित अवस्थाओं के दौरान ‘स्वयं’ की विशेषताएँ बताएँ?

(i) शैशवकाल के दौरान।

उत्तर: शैशवकाल के दौरान ‘स्वयं’ की विशेषताएँ जन्म के समय शिशु को अपने विशिष्ट अस्तित्व की जानकारी नहीं होती। इसका अर्थ है कि शिशु यह महसूस नहीं कर पाता कि वह बाहर के संसार से अलग और भिन्न है उसे अपने बारे में कोई जानकारी अथवा समझ और पहचान नहीं होती। इन सभी शब्दों से हमारा तात्पर्य ‘स्वयं’ के मानसिक निरूपण (मानसिक चित्र) से है। शिशु अपना हाथ अपने चेहरे के सामने लाता है लेकिन उसे यह पता नहीं होता कि वह उसका हाथ है, और वह उन अन्य सभी लोगों और वस्तुओं जिन्हें वह अपने चारों ओर देखता है, उससे से अलग है। ‘स्वयं’ की भावना शैशवकाल के दौरान क्रमिक रूप से उत्पन्न होती है और लगभग 18 महीने की आयु तक स्वयं की छवि की पहचान होने लगती है। 

दूसरे वर्ष की दूसरी छः माही में, शिशु व्यक्तिगत सर्वनामों-‘मैं’, ‘मुझे’ और ‘मेरा’ का उपयोग करने लगता है। वह किसी व्यक्ति अथवा वस्तु पर अधिकार जताने जैसे “मेरा खिलौना” अथवा “मेरी माँ” अपने बारे में अथवा जो कार्य वह कर रहा है उसे बताने अथवा अपने अनुभवों को बताने जैसे “मैं खाना खा रहा हूँ”, के लिए इनका उपयोग करते हैं। इस समय तक शिशु स्वयं को तस्वीर में भी पहचानना शुरू कर देता है।

(ii) प्रारंभिक बाल्यावस्था के दौरान।

उत्तर: 1. वे ‘स्वयं’ को अन्य लोगों से अलग बताने के लिए ‘स्वयं’ का अथवा अपनी वस्तुओं के बाह्य विवरण का उपयोग करते हैं वे विवरणात्मक शब्दों जैसे “लंबा” अथवा “बड़ा” का उपयोग कर सकते हैं अथवा जो कपड़े वे पहनते हैं और जो खिलौने अथवा वस्तुएँ उनके पास हैं उनको संदर्भित कर सकते हैं। उनका ‘स्वयं’ संबंधी विवरण संपूर्ण अर्थों में होता है – इसका अर्थ है कि वे ‘स्वयं’ की तुलना अन्य से नहीं करते। उदाहरण के लिए यह कहने के बजाय कि “मैं किरण से लंबा हूँ।” बच्चा कहेगा कि “मैं लंबा हूँ।”

2. वे जो कार्य कर सकते हैं उसके अनुसार ‘स्वयं’ का विवरण देते हैं। उदाहरण के लिए खेल संबंधी कार्यकलापों के बारे में वह कहेगा कि “मैं साइकिल चला सकता हूँ”, “मैं घर बना सकता हूँ”, “मैं गिनती कर सकता हूँ” आदि। अर्थात् उनकी ‘स्वयं’ की समझ के अंतर्गत ‘स्वयं’ का विवरण सक्रियता से शामिल होता है।

3. उनका स्वयं विवरण निश्चित होता है- अर्थात् वे ‘स्वयं’ को उन वस्तुओं के अनुसार परिभाषित करते हैं जो वे कर सकते हैं अथवा जो उन्हें दिखाई पड़ता है। जैसे; “मेरे पास टेलीविज़न है।”

4. वे अकसर स्वयं का आकलन वास्तविकता से अधिक करते हैं। जैसे; एक बच्चा कह सकता है- “मुझे कभी डर नहीं लगता” अथवा “मुझे सभी कविताएँ आती हैं”, लेकिन हो सकता है कि उसे पूरी तरह से याद न हो।

5. छोटे बच्चे यह पहचानने में भी असक्षम होते हैं कि उनमें भिन्न-भिन्न गुण हो सकते हैं- वे अलग-अलग समय में “अच्छे” व “बुरे’, ‘मतलबी’ व ‘आकर्षक’ हो सकते हैं।

(iii) मध्य बाल्यावस्था के दौरान।

उत्तर: इस अवधि में बच्चे का स्वयं-मूल्यांकन अधिक जटिल हो जाता है।

इस बढ़ती हुई जटिलता की विशेषता बताने वाले पाँच महत्वपूर्ण परिवर्तन हैं-

1. अब बच्चा अपनी आंतरिक विशेषताओं के संदर्भ में अपना विवरण देता है। अधिक संभव है कि बच्चा अपनी स्व-परिभाषा में अपनी मनोवैज्ञानिक विशेषताओं (जैसे प्राथमिकताएँ अथवा व्यक्तित्व संबंधी गुण) के बारे में अधिक बताए जैसे, नाम तथा शारीरिक विशेषताओं के बारे में न बताए। अतः बच्चा कह सकता है, “मैं मित्र बनाने में अच्छा हूँ”, “मैं मेहनत करके अपना कार्य समय पर समाप्त कर सकता हूँ”।

2. बच्चे के विवरण में सामाजिक विवरण और पहचान शामिल होती है वे जिस वर्ग से संबंध रखते हैं उसके संदर्भ में स्वयं को परिभाषित कर सकते हैं जैसे “मैं स्कूल के संगीत समूह में हूँ”।

3. बच्चे सामाजिक तुलना करने लगते हैं वे स्वयं को वास्तविक रूप की बजाय अन्य लोगों से तुलनात्मक रूप से भिन्न बताते हैं। अतः वे यह सोचना आरंभ कर देते हैं कि वे अन्य की तुलना में क्या कर सकते हैं जैसे “मैं किरण से तेज दौड़ सकती हूँ”।

4. वे वास्तविक स्वयं और आदर्श स्वयं में अंतर करने लगते हैं। अतः वे अपनी वास्तविक क्षमताओं, जो उनके पास हैं, और जो उनके पास होनी चाहिए अथवा जो वे समझते हैं कि अधिक महत्वपूर्ण हैं, में अंतर कर सकते हैं। 

5. पूर्व विद्यालयी बच्चे की तुलना में इस उम्र के बच्चे का स्वयं का विवरण अधिक वास्तविक हो जाता है। वस्तुओं और स्थितियों को अन्य लोगों के नजरिए से देखने की क्षमता के विकसित हो जाने के कारण ऐसा हो सकता है।

(iv) किशोरावस्था के दौरान।

उत्तर: 1. किशोरावस्था के दौरान स्वयं का विवरण संक्षिप्त एवं केवल विचार रूप में ही होता है। अब किशोर “लंबा” अथवा “बड़ा” जैसे बाह्य संदर्भों में स्वयं का विवरण देने पर अधिक बल नहीं देते। वे अपने व्यक्तित्व को संक्षिप्त रूप से बताने या अपने आंतरिक गुणों पर अधिक बल देते हैं। अतः वे स्वयं का विवरण शांत, संवेदनशील, शांत दिमाग, बहादुर, भावुक अथवा सच्चा होने के रूप में दे सकते हैं।

2. किशोरावस्था के दौरान स्वयं में कई विरोधाभास होते हैं। अतः किशोर स्वयं के बारे में इस प्रकार बता सकता है कि, “मैं शांत हूँ लेकिन सरलता से विचलित हो जाता हूँ” अथवा “मैं शांत हूँ और बातूनी भी”।

3. किशोर स्वयं की भावना में काफी उतार-चढ़ाव का अनुभव करता है। चूँकि किशोर भिन्न-भिन्न परिस्थितियों का अनुभव करते हैं और उन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, स्वयं के बारे में उनकी समझ स्थिति और समय के अनुसार बदलती रहती है।

4. किशोर के स्वयं में ‘आदर्श स्वयं’ और ‘वास्तविक स्वयं’ होता है। अब आदर्श स्वयं अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। हममें से प्रत्येक को यह ज्ञान है कि हम आदर्श रूप में कैसा होना चाहते हैं? इसे ‘आदर्श स्वयं’ कहा जा सकता है जो हम विकसित करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए एक लड़की जो वास्तव में बहुत छोटी है, लंबा होने की इच्छा रख सकती है।

5. किशोर, बच्चों की अपेक्षा स्वयं के बारे में अधिक सचेत होते हैं और अपने में ही मग्न रहते हैं। इससे उन्हें हमेशा ‘मंच पर रहने’ का आभास होता रहता है ऐसा आभास कि उन्हें हर वक्त नोटिस किया जा रहा है। यही कारण है कि अधिकांश किशोर अपने बाह्य रूप रंग के प्रति अत्यधिक परेशान रहते हैं।

2. “किशोरावस्था ऐसा समय है जब सभी किशोर पहचान के संकट का अनुभव करते हैं”। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कारण दें।

उत्तर: हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ कि “किशोरावस्था ऐसा समय है जब सभी किशोर पहचान के संकट का अनुभव करते हैं।” किशोरावस्था में ‘स्वयं’ की समझ जटिल हो जाती है, जिससे यह समय उनके लिए नाजुक होता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एरिक एच, एरिक्सन के अनुसार, प्रत्येक विकास चरण में व्यक्ति को कुछ सफलताएँ प्राप्त करनी होती हैं। उदाहरण के लिए, प्रारंभिक बाल्यावस्था (2-4 वर्ष) में बच्चे को आंतों और मूत्राशय पर नियंत्रण पाना सीखना पड़ता है, ताकि वह सामाजिक गतिविधियों में भाग ले सके। इसी तरह, किशोरावस्था में अपनी पहचान विकसित करना आवश्यक होता है। यदि इस दौरान किशोर अपनी पहचान को लेकर भ्रमित रहता है, तो इससे उसका आत्मविश्वास और सामाजिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि किशोरावस्था को पहचान के संकट का समय कहा जाता है।

किशोरावस्था पहचान के विकास हेतु महत्वपूर्ण अवस्था है क्योंकि इस समय स्वयं के विकास पर ध्यान अधिक केंद्रित रहता है। ऐसा माना गया है कि किशोरावस्था ‘स्वयं’ की पहचान बनाने के संदर्भ में कठिन समय होता है।

इसके तीन मुख्य कारण हैं-

1. किशोरावस्था से पहले कभी भी व्यक्ति ‘स्वयं’ को जानने में इतना तल्लीन नहीं रहा। अर्थात् अब वह स्वयं को समझने के लिए अत्यधिक चिंतित होता है।

2. किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में व्यक्ति ‘स्वयं’ और ‘पहचान’ की अपेक्षाकृत स्थाई भावना निर्मित कर लेता है और कह सकता है- “मैं यह हूँ।”

3. यही वह समय भी है जब व्यक्ति की पहचान पर तीव्र शारीरिक परिवर्तनों और बदल रही सामाजिक माँगों का प्रभाव पड़ता है।

(ग) पहचान पर प्रभाव – स्व-बोध का विकास हम कैसे करते हैं?

समीक्षात्मक प्रश्न

1. यौवनारंभ और यौवनावस्था की संकल्पनाओं पर चर्चा करें। यौवनारंभ के दौरान लड़कियों और लड़कों में होने वाले प्रमुख शारीरिक और जैविक परिवर्तनों का विवरण दें।

उत्तर: यौवनारंभ और यौवनावस्था की संकल्पना: किशोरावस्था के दौरान शरीर में कुछ सार्वभौमिक शारीरिक और जैविक परिवर्तन होते हैं जो एक विशेष क्रम में होते हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप यौन परिपक्वता आती है। यौन परिपक्वता की आयु को यौवनारम्भ (Puberty) कहा जाता है। अक्सर मासिक धर्म (पहला) को लड़कियों में यौन परिपक्वता का बिंदु माना जाता है। लड़कों के लिए यौवनारम्भ को चिह्नित करने वाली कोई विशिष्ट प्रक्रिया नहीं है। यद्यपि इसके लिए अक्सर जिस मानदंड का उपयोग किया जाता है वह है शुक्राणु (स्पर्मेटोजोआ) का उत्पादन। विभिन्न संस्कृतियों में यौवनारम्भ भिन्न-भिन्न औसत आयु में होता है। लड़कों व लड़कियों की लंबाई में एक वर्ष में होने वाली अधिकतम बढ़ोतरी को यौवनारम्भ का एक उपयोगी मानदंड माना गया है। लड़कियों में बढ़ोत्तरी मासिक धर्म से एकदम पहले अधिक तेजी से होती है और लड़कों में कुछ वयस्क विशेषताओं के विकास से पहले ऐसा होता है। वह अवधि जिसमें शारीरिक और जैविक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप यौवनारम्भ होता है उसे यौवनावस्था कहा जाता है।

अधिकांश लड़कियों में यह अवधि 11 वर्ष से 13 वर्ष के बीच होती है और लड़कों में 13 वर्ष से 15 वर्ष के बीच। यौवनावस्था के दौरान लड़कियों और लड़कों में होने वाले परिवर्तन जो विकास के सामान्य क्रम को दर्शाते हैं, की सूची निम्नवत् है-

लड़कियाँलड़के
स्तनों के आकार में आरंभिक वृद्धिअंडकोष (वृषण) का विकास होना
बगलों और जाघों में बालों का आनाबगलों और जाघों में बालों का आना
अधिकतम वृद्धि की आयुअधिकतम वृद्धि की आयु
मासिक धर्मवीर्य (सीमन) का पहली बार स्खलन
आवाज़ में स्पष्ट परिवर्तनआवाज़ में स्पष्ट परिवर्तन
दाढ़ी का आना

यौवनारम्भ के आरंभ होने पर शरीर में होने वाले शारीरिक परिवर्तन सार्वभौमिक हैं लेकिन प्रत्येक व्यक्ति पर इन परिवर्तनों का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव भिन्न-भिन्न संस्कृति के अनुसार भिन्न होता है। यही नहीं एक ही संस्कृति के लोगों में भी प्रत्येक व्यक्ति पर प्रभाव भिन्न रूप से पड़ता है। हम इन पहलुओं पर चर्चा अगले दो शीर्षकों, “सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भ” तथा “भावनात्मक परिवर्तन”, के अंतर्गत करेंगे।

2. एक किशोर के व्यक्तित्व को आकार देने में परिवार की क्या भूमिका है?

उत्तर: एक किशोर के व्यक्तित्व को आकार देने में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। किशोरों की पहचान निर्माण को उन पारिवारिक सम्बन्धों से प्रोत्साहन मिलता है, जहाँ स्वयं की राय बनाने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है और जहाँ परिवार के सदस्यों में सुरक्षित सम्बन्ध होते हैं। इसके कारण किशोर को अपने बढ़ते हुए सामाजिक दायरे को जानने के लिए एक सुरक्षित आधार मिलता है। यह भी पाया गया है कि सुदृढ़ और स्नेहमय पालन-पोषण से पहचान का स्वरूप विकास होता है। ‘स्नेहमय’ पालन-पोषण का अर्थ है कि अभिभावक उत्साही, स्नेही और बच्चे के प्रयासों एवं उपलब्धियों का समर्थन करने वाले हों। वे अक्सर बच्चे की प्रशंसा करते हैं, उसके कार्यकलापों के प्रति उत्साह दिखाते हैं, उसकी भावनाओं के प्रति संवेदनपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं और उसके व्यक्तित्व एवं उसकी राय को समझते हैं। तथापि ऐसे माता-पिता दृढ़ अनुशासन वाले होते हैं।

इस प्रकार के पालन-पोषण से बच्चों में स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता आती है।

3. संस्कृति एक किशोर की पहचान को कितना प्रभावित करती है? उदाहरण सहित व्याख्या करें।

उत्तर: एक किशोर की पहचान निर्माण की प्रक्रिया पर विभिन्न संस्कृतियों का प्रभाव भिन्न होता है। यह जानने के लिए हम अपनी संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति की तुलना करते हैं। यथा-

(i) अधिकांश पश्चिमी संस्कृतियों, जैसे-अमेरिका और ब्रिटेन में किशोरों से पूर्णतः आत्मनिर्भर होने की अपेक्षा की जाती है। कई मामलों में तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार से अलग जाकर अपना घर बसाएँ। जबकि भारतीय संदर्भ में, अधिकांश किशोर अपने माता-पिता पर काफी हद तक निर्भर होते हैं और परिवार हमेशा उन पर नियंत्रण बनाए रखते हैं।

(ii) पारंपरिक संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति में ‘पहचान विकास’ के भिन्न होने की संभावना का एक कारण और भी है। पारंपरिक भारतीय समुदायों में किशोरों में स्वयं को स्वतंत्र तथा आत्मनिर्भर रूप से दर्शाना और अपने बारे में बात करने का विचार एक सामान्य क्रियाकलाप नहीं है। यही नहीं इस प्रकार की प्रवृत्ति को अकसर न तो बढ़ावा ही दिया जाता है और न ही सहन किया जाता है। कई भारतीय स्वयं को मुख्यतः अपनी एक या दूसरी भूमिका जैसे- पुत्र/पुत्री, माता/पिता, बहन/भाई के रूप में परिभाषित करते हैं। अन्य शब्दों में, वे अक्सर स्वयं के बारे में अपने परिवार और समुदाय के संदर्भ में जैसे ‘मैं’ की बजाय ‘हम’ के रूप में बात करते हैं। 

उदाहरण के लिए एक किशोर लड़की से विवाह के बारे में उसकी राय पूछने पर वह यह कहने कि, “मैं चाहूँगी कि मेरे माता-पिता मेरी शादी तय करें” की बजाय यह कहेगी कि, “हमारे परिवार में माता-पिता शादी तय करते हैं।” 

अतः हम यह देख सकते हैं कि स्व-बोध के निर्माण में सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ कितना महत्वपूर्ण है। यद्यपि ये सांस्कृतिक प्रभाव भी प्रत्येक परिवार और प्रत्येक व्यक्ति के साथ भिन्न हो जाते हैं।

4. किशोरावस्था के दौरान होने वाले प्रमुख भावात्मक और संज्ञानात्मक परिवर्तन कौन से हैं?

उत्तर: किशोरावस्था के दौरान होने वाले प्रमुख भावात्मक और संज्ञानात्मक परिवर्तन:

प्रमुख भावात्मक:

(i) इनमें से कई परिवर्तन किशोर में हो रहे जैविक और शारीरिक परिवर्तनों के कारण होते हैं। यह सच है कि किशोर अपने शारीरिक रूप को लेकर अधिक चिंतामग्न रहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरे लोग उनके शरीर और व्यवहार के प्रत्येक पहलू को देख रहे हैं।

(ii) शारीरिक परिवर्तनों के प्रति सभी-किशोर अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। एक लड़का जिसके चेहरे पर उसकी उम्र के अन्य लड़कों की तुलना में पर्याप्त बाल नहीं हैं, उसे यह अजीब-सा लग सकता है। तथापि चेहरे पर बाल न होना किसी अन्य लड़के को परेशान न करे, ऐसा भी हो सकता है।

(iii) शारीरिक विकास के प्रति गर्व अथवा सहज भाव रखने से किशोरों के स्व-बोध पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 

(iv) दूसरी ओर, यदि किशोर इस बात से कि वह कैसा दिखाई देता है, आवश्यकता से अधिक असंतुष्ट है तो वह अपने व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं, जैसे कार्य, पढ़ाई आदि पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता है। इससे विद्यालय में उसके कार्य निष्पादन में गिरावट आ सकती है और यह उसकी स्वयं के प्रति धारणा अथवा स्वाभिमान को कम करती है। 

(v) अपने प्रति नकारात्मक धारणा रखने से व्यक्ति असुरक्षित महसूस करता है और उसमें शरीर के प्रति नकारात्मक भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। संभव है कि शारीरिक अशक्तता वाला किशोर स्वयं को अन्य से कम समझे जबकि एक सुगठित किशोरवय लड़का चिंतित और अपूर्ण महसूस करे क्योंकि उसे लगता है कि उसका पानीर ‘अन्ता’ नहीं है।

(vi) किशोरों की मनःस्थिति भी बदलती रहती है। उदाहरणतः कभी परिवार के सदस्यों और मित्रों के साथ रहने की इच्छा रखना और कभी बिल्कुल अकेले रहना। कभी उसे अचानक बेहद तेज क्रोध भी आ सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि किशोर विभिन्न स्तरों पर स्वयं में हो रहे विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों को जानने का और समझने का प्रयास कर रहा होता है।

संज्ञानात्मक परिवर्तन:

(i) जब तक बच्चा 11 वर्ष का होता है, उसका स्वयं-विवरण काफी वास्तविक हो जाता है और बच्चा ‘वास्तविक’ और ‘आदर्श’ स्वयं में अन्तर करने में सक्षम हो जाता है।

(ii) किशोरावस्था के दौरान एक जबर्दस्त परिवर्तन यह होता है कि किशोर अमूर्त रूप से सोचने लगता है अर्थात् वे वर्तमान से तथा जो वह देखते और अनुभव करते हैं उससे अधिक आगे भी सोच सकते हैं। यही नहीं जैसे-जैसे सोच लचीली होती जाती है, वे परिकल्पित स्थितियों के बारे में भी सोच सकते हैं। अन्य शब्दों में, वे विभिन्न संभावनाओं और उनके परिणामों के बारे में सोच सकते हैं और इसके लिए यह आवश्यक भी नहीं कि वे उस स्थिति से होकर गुजरें अथवा किसी परिणाम को झेलें।

(iii) किशोर कल्पनात्मक ढंग से अपने वर्तमान को अपने लिए चयनित कल्पित भविष्य के साथ जोड़ सकता है। उदाहरण के लिए किशोर उन संभावित जीविकाओं के बारे में सोच सकता है जो वह वयस्क के रूप में अपना सकता है तथा जो उसकी स्थिति और मिजाज के अनुकूल हो। तद्नुसार वह अपने अध्ययन की वर्तमान दिशा निर्धारित कर सकता है।

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