NCERT Class 11 Home Science Chapter 3 भोजन, पोषण, स्वास्थ्य और स्वस्थता

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NCERT Class 11 Home Science Chapter 3 भोजन, पोषण, स्वास्थ्य और स्वस्थता

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Chapter: 3

मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान भाग – I

इकाई – (I) स्वयं को समझना-किशोरावस्था

समीक्षात्मक प्रश्न

1. आर.डी.ए. और आवश्यकता के बीच अंतर बताएँ।

उत्तर: आर.डी.ए. और आवश्यकता के बीच अंतर –

आर.डी.ए.: अतिरिक्त सुरक्षा मात्रा उपवास के दिनों में अथवा दैनिक आहार में कुछ पोषक तत्त्वों की अल्पकालिक कमी को पूरा करती है। यदि संतुलित आहार व्यक्ति की संस्तुत आहारीय मात्रा (आर.डी.ए. – रिकमैडिड डायटरी एलाउंसेस) की पूर्ति करता है तो अतिरिक्त मात्रा भी इसमें पहले से शामिल होती है क्योंकि आर.डी.ए. अतिरिक्त मात्रा को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। निर्धारित आहार संबंधी मात्रा (आर.डी.ए.) आवश्यकता + अतिरिक्त सुरक्षा मात्रा।

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आवश्यकता: संतुलित आहार वह है जिसमें विभिन्न प्रकार के वे सभी खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं जिनमें दैनिक आवश्यकता के सभी अनिवार्य पोषक तत्त्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, खनिज, जल तथा रेशे समुचित मात्रा और सही अनुपात में विद्यमान होते हैं।

2. खाद्य वर्गों के प्रयोग से संतुलित भोजन की योजना बनाना किस प्रकार सरल हो जाता है, स्पष्ट रूप से समझाइए।

उत्तर: संतुलित आहार तैयार करने का एक आसान तरीका है, खाद्य पदार्थों को वर्गों में विभाजित करना और फिर यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक वर्ग को भोजन में शामिल किया जाए। प्रत्येक खाद्य वर्ग में समान विशेषताओं वाले विभिन्न खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। यह समान विशेषताएँ खाद्य पदार्थों का स्रोत, इनके द्वारा निष्पादित की जाने वाली शरीर क्रियात्मक क्रियाएँ अथवा इनमें उपस्थित पोषक तत्त्व हो सकते हैं।

खाद्य पदार्थों को उनमें विद्यमान मुख्य पोषक तत्त्वों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। यह वर्गीकरण अनेक कारकों के आधार पर एक देश से दूसरे देश में भिन्न होता है। भोजन योजना को सुलभ करने के लिए भारत में पाँच खाद्य वर्गों का उपयोग किया जाता है। इन खाद्य वर्गों का वर्गीकरण करते समय खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, लागत, भोजन पद्धति और कमी से होने वाले प्रचलित रोगों आदि कारकों को ध्यान में रखा जाता है। प्रत्येक वर्ग में सम्मलित सभी खाद्य पदार्थों में पोषक तत्त्वों की मात्रा बराबर नहीं होती। इसलिए प्रत्येक वर्ग के विभिन्न खाद्य पदार्थों को अदल-बदल कर आहार में शामिल किया जाना चाहिए।

विद्यमान पोषक तत्त्वों के आधार पर हुए वर्गीकरण से यह सुनिश्चित होता है कि शरीर को सभी पोषक तत्त्व प्राप्त हो रहे हैं और प्रत्येक वर्ग में खाद्य पदार्थों की विविधता भी है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (आई.सी.एम.आर.) द्वारा पाँच मूलभूत खाद्य वर्गों का सुझाव दिया गया है।

यह इस प्रकार हैं:

(i) अनाज, खाद्यान्न और उनके उत्पाद।

(ii) दालें और फलियाँ।

(iii) दूध और मांस के उत्पाद।

(iv) फल और सब्जियाँ।

(v) वसा और शर्करा।

3. ऐसे 10 खाद्य पदार्थ बताएँ जो संरक्षी खाद्य वर्ग से संबंधित हैं। अपने चयन के लिए कारण भी बताएँ।

उत्तर: संरक्षी खाद्य पदार्थ ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें आवश्यक मात्रा में विटामिन, खनिज तथा उच्च गुणवत्तायुक्त प्रोटीन विद्यमान होते हैं। इस तरह के खाद्य पदार्थ खान-पान की कमी के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

संरक्षी खाद्य वर्ग से संबंधित 10 खाद्य पदार्थ निम्नलिखित हैं:

(i) हरी पत्तेदार सब्जियाँ।

(ii) पीली सब्जियाँ।

(iii) खट्टे फल।

(iv) मांस।

(v) दूध।

(vi) अण्डे।

(vii) टमाटर।

(viii) गाजर।

(ix) पनीर।

(x) मछली (सैलमन)।

उपर्युक्त 10 संरक्षी खाद्य पदार्थों के चयन का मुख्य कारण यह है कि ये संतुलित आहार में निरंतर रूप से शामिल किए जा सकते हैं। इनमें सभी प्रमुख खाद्य वर्गों का समावेश होता है, जो शरीर को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। ये खाद्य पदार्थ अपने संरक्षी मूल्य के कारण स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं और शरीर को रोगों से बचाने में सहायक होते हैं। विशेष रूप से, वे खाद्य पदार्थ जो विटामिन, खनिज, आवश्यक पोषक तत्वों और रोग प्रतिरक्षक यौगिकों (जैसे एंटीऑक्सीडेंट) से भरपूर होते हैं, अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होते हैं। इन गुणों के कारण ये खाद्य पदार्थ स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

4. उन कारकों की चर्चा करें जो किशोरावस्था में खान-पान संबंधी आचरण को प्रभावित करते हैं।

उत्तर: किशोरावस्था में पहुँचने पर व्यक्ति की खान-पान संबंधी आदतों को कई चीजें प्रभावित करती हैं, जैसा कि दिए गए चित्र में दर्शाया गया है।

चित्र: किशोरों के खान-पान संबंधी आचरण को प्रभावित करने वाले कारक

किशोरों की बढ़ती हुई स्वतंत्रता, सामाजिक जीवन में बढ़ती भागीदारी और सामान्य तौर पर व्यस्त कार्यक्रम का उनके खान-पान पर निश्चित प्रभाव पड़ता है। अब वे अपने लिए खाना खरीदने और स्वयं बनाने के लिए सक्षम होने लगते हैं और अक्सर जल्दी-जल्दी खाते हैं और घर से बाहर खाते हैं।

किशोरों को समुचित रूप से स्वस्थ खान-पान संबंधी आदतें बनाने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए अभिभावकों (माता-पिता) को बच्चों को उनके विकासकाल के दौरान विभिन्न प्रकार के पोषणीय खाद्य पदार्थों में से चुनने का अवसर देना चाहिए। जब तक वे किशोरावस्था में पहुँचेंगे उन्हें रसोई घर का उपयोग करने के लिए कुछ स्वतंत्रता चाहिए होगी। यह लड़कों और लड़कियों दोनों पर सटीक बैठता है।

वैसे तो खान-पान संबंधी आदतों का मूल आधार परिवार है, लेकिन इन पर बाहर का भी कुछ प्रभाव पड़ता है। किशोरावस्था में हमजोलियों की संगति का प्रभाव समर्थन और तनाव दोनों के लिए कारगर हो सकता है। हमजोलियों की सहायता सामान्य से अधिक वजन वाले किशोरों के लिए सहायक हो सकती है, लेकिन वही दोस्त कभी उसे चिढ़ाने का कारण भी बन सकते हैं।

विज्ञापनों में दिए गए संदेशों के प्रति किशोर अत्यधिक संवेदनशील होता है। टीवी में खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों और कार्यक्रम में दर्शाई गई खान-पान की आदतों ने दशक से अधिक समय से लोगों को प्रभावित किया है। अधिकांश विज्ञापन अत्यधिक शर्करा और वसा वाले उत्पादों के लिए होते हैं। अतः किशोरों को इन खाद्य उत्पादों का उपयोग विवेक से करना चाहिए।

तैयार भोजन (रेडी टू ईट) की सरल उपलब्धता भी किशोरों की खान-पान संबंधी आदतों को प्रभावित करती है। होम डिलीवरी द्वारा वेंडिंग मशीनों से, सिनेमा हॉल में, मेलों में, खेल कार्यक्रमों में, फास्ट फूड बिक्री केंद्रों पर और सुविधाजनक किराने की दुकानों पर दिनभर खाना उपलब्ध रहता है। इसलिए किशोर कई बार खाते हैं, और ऐसे पदार्थ खाते हैं जो स्वास्थ्यकर नहीं होते। इन प्रवृत्तियों पर नजर रखनी चाहिए।

5. खान-पान संबंधी ऐसी दो विकृतियों का विस्तार से वर्णन करें जो किशोरावस्था में हो सकती हैं। इनकी रोकथाम के सर्वोत्तम उपाय क्या हैं?

उत्तर: किशोरावस्था में शारीरिक विकास तीव्रता से होता है और शरीर की छवि के निर्माण का भी विकास होता है। इस समय खान-पान संबंधी विकृतियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

खान-पान से संबंधित विकृतियाँ, जो किशोरावस्था में हो सकती हैं, वह निम्नलिखित हैं:

(i) ऐनोरेक्ज़िया नर्वोसा: वह विकृति है, जो शारीरिक छवि को बिगाड़ने से जुड़ी है, और सामान्यतया किशोरावस्था में ही दिखाई देती है। इस उम्र में व्यक्ति अपने पहचान के संकट से जूझ रहा होता है और शारीरिक छवि संबंधी समस्याओं के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होता है। खान-पान संबंधी अनियंत्रित आदतें किशोरों को सामान्य वयस्क के शरीर की छवि ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।

ऐनोरेक्जिया नर्वोसा को हम, सोनम के उदाहरण से समझते हैं। वह एक आदर्श (परफेक्ट) शरीर चाहती है। उसने अपने माता-पिता और अध्यापकों की सलाह को ध्यान नहीं दिया और खाना लगभग बंद कर दिया। उस पर दुबले शरीर की सनक सवार हो गईं यद्यपि उसका वजन सामान्य है, तथापि वह हर समय इस दबाव में है कि उसे फिल्मों में दिखाई पड़ने वाली कुछ हीरोइनों अथवा पत्रिकाओं में दिखाई देने वाली मॉडलों जितना पतला होना है। उसमें आत्मविश्वास की कमी है, और वह उदास रहती है। इससे वह अपने परिवार और मित्रों से दूर होती जा रही है। वह यह नहीं समझती कि वह कुपोषण का शिकार हो रही है, और इस बात पर जोर देती है कि वह मोटी है। वह स्पष्टतः ऐनोरेक्जिया नर्वोसा नामक खान-पान संबंधी विकार से ग्रस्त है। वह इस बात से अनभिज्ञ है कि अत्यधिक वजन कम होने से मृत्यु भी हो सकती है।

(ii) बुलीमिया: एक अन्य प्रकार की खान-पान संबंधी विकृति है। बुलीमिया अकसर किशोरावस्था के अंतिम भाग में अथवा वयस्कावस्था के आरंभ में वजन कम करने के असफल प्रयासों हेतु लिए गए विभिन्न प्रकार के आहारों से शुरू होता है। इससे ग्रस्त रोगी बार-बार खाने लगता है। अत्यधिक खाता है। उल्टी अथवा विरेचकों के उपयोग द्वारा पेट साफ करता है। यद्यपि यह महिलाओं में अधिक होता है, लेकिन पाँच से दस प्रतिशत खान-पान संबंधी विकृतियाँ पुरुषों में भी होती हैं।

ऐनोरेक्जिया और बुलीमिया के गंभीर परिणाम हो सकते हैं जैसे-ऐंठन होना, गुरदा खराब होना, हृदय गति असामान्य होना और दाँतों का क्षरण होना। किशोरवय की लड़कियों में ऐनोरेक्ज़िया से मासिक धर्म देर से आरंभ हो सकता है, कद स्थायी रूप से कम हो सकता है और इससे ओस्टियोपोरोसिस (हड्डियाँ कमजोर होना) भी हो सकता है।

किशोरों में होने वाली उपर्युक्त विकृतियों की रोकथामः

(i) अपनी विशिष्टता सराहने की कला सीखनाइन विकृतियों से बचने के लिए व्यक्ति के पास सर्वोत्तम उपाय है अपनी विशिष्टता को सराहने की कला सीखना। साथ ही स्वयं का आदर करना और स्वयं को महत्व देना निश्चित तौर पर जीवनरक्षक सिद्ध होगा।

(ii) आहार सम्बन्धी उपाय-इन विकृतियों की रोकथाम हेतु आहार सम्बन्धी उपायों में संतुलित आहार सुनिश्चित करना, आहार में रेशे अधिक मात्रा में लेना और क्षतिपूर्ति हेतु पोषक तत्वों एवं खाद्य संपूरकों का उपयोग शामिल हैं। स्वास्थ्य के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्वस्थ आहार सिद्धान्तों को कैसे अपनाया जाए, यह सीखने से स्वस्थ वर्तमान और भावी जीवन की नींव रखने में सहायता मिल सकती है।

प्रायोगिक कार्य – 3

खाद्य, पोषण, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य का रख-रखाव

1. अच्छे स्वास्थ्य के 10 लक्षण बताइए। निम्नलिखित फॉर्मेट का प्रयोग करते हुए अपना मूल्यांकन कीजिए।

अच्छे स्वास्थ्य के लक्षणआपकी श्रेणी (रेटिंग)
संतोषजनकसामान्यसामान्य से कम
1.
2.
3.
4.
5.
6.
7.
8.
9.
10.

उत्तर:

अच्छे स्वास्थ्य के लक्षणआपकी श्रेणी (रेटिंग)
संतोषजनकसामान्यसामान्य से कम
1. ऊर्जा का उच्च स्तर: एक स्वस्थ व्यक्ति दिनभर के कार्यों को बिना अत्यधिक थकान महसूस किए संपन्न कर सकता है।
2. स्वस्थ त्वचा: स्वस्थ त्वचा का रंग साफ, चमकदार और दाग-धब्बों से मुक्त होता है, जो शरीर के अच्छे पोषण को दर्शाता है।
3. सामान्य भूख: समय पर भूख लगना और भोजन करने के बाद संतुष्टि का अनुभव होना अच्छे स्वास्थ्य का संकेत है।
4. स्वच्छ नेत्र: आँखों का सफेद भाग साफ, चमकदार और थकावट रहित होता है, जिससे व्यक्ति की आंतरिक सेहत का पता चलता है।
5. सामान्य शारीरिक भार: शरीर का भार आयु और ऊँचाई के अनुसार संतुलित होना अच्छे स्वास्थ्य का लक्षण है।
6. स्वस्थ बाल और नाखून: मजबूत, घने बाल और गुलाबी, चमकदार नाखून शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति का संकेत देते हैं।
7. मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली: रोगों से बचाव और जल्दी स्वस्थ होने की क्षमता अच्छे स्वास्थ्य की पहचान है।
8. मानसिक संतुलन: तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखना और भावनात्मक स्थिरता बनाए रखना मानसिक स्वास्थ्य का संकेत है।
9. सामान्य रक्तचाप: संतुलित रक्तचाप का स्तर हृदय और संपूर्ण शरीर की बेहतर कार्यक्षमता को दर्शाता है।
10. अच्छी नींद: प्रतिदिन पर्याप्त और गहरी नींद आना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

2. अपने एक दिन के आहार को रिकॉर्ड करें। पाँच खाद्य वर्गों के समावेशन के संदर्भ में प्रत्येक भोजन का मूल्यांकन करें। क्या आपको लगता है कि आपका आहार संतुलित है? अपना उत्तर लिखने के लिए निम्नलिखित फॉर्मेट का प्रयोग करें-

भोजन/मेन्यू (आहार-सूची)पाँच खाद्य वर्गों का समावेशनभोजन संतुलित है/भोजन संतुलित नहीं है, इस पर टिप्पणी।

उत्तर:

भोजन/मेन्यू (आहार-सूची)पाँच खाद्य वर्गों का समावेशनभोजन संतुलित है। भोजन संतुलित नहीं, इस पर टिप्पणी
सुबह का नाश्ताएक गिलास दूध, ब्रेड-आमलेट या उबला अण्डा, अगर शाकाहारी हैं तो 1-2 रोटी तथा 1 कटोरी हरी सब्जी, दलिया व अंकुरित सलाद भी ले सकते हैं।भोजन पूर्णतः संतुलित है।
दोपहर के भोजन से पूर्व अल्पाहारएक या दो फल अथवा कुछ ड्राई फ्रूट्स भी खा सकते हैं।पूर्णतः संतुलित
दिन का भोजनएक-दो रोटियाँ, दाल-चावल और चिकन/मछली करी और अगर शाकाहारी हैं तो बीन्स की सब्जी, रोटी, दाल व चावल खा सकते हैं। सलाद जरूर लें।भोजन पूर्णतः संतुलित है
शाम का नाश्तासब्जियों का सूप/मिक्स फलों का सलाद या कुछ ड्राई फ्रूट्स ले सकते हैं।पूर्णतः संतुलित
रात्रि का भोजन1-2 रोटियाँ और मछली या चिकन करी भोजन पूर्णतः संतुलित है। खायें अथवा चिकन सूप पिएँ। शाकाहारी लोग 1 कटोरी दाल व 1 कटोरी रेशेदार सब्जियाँ व 1-2 रोटी लें, पनीर की सब्जी भी खा सकते हैं।पाचन हेतु अति आवश्यक है।
सोने से पूर्वएक गिलास गुनगुना दूध लें, चाहें तो स्वाद हेतु कोई फ्लेवर मिश्रित कर सकते हैं।भोजन संतुलित है।

3. निम्नलिखित जानकारी प्राप्त करने के लिए अपने परिवार के सदस्यों, जैसे दादी, माँ अथवा चाची/ताई/बुआ/मौसी का साक्षात्कार करें-

(क) खान-पान संबंधी वर्जनाएँ और इनको अपनाए जाने के कारण।

(ख) भारत के जिस क्षेत्र से आप संबंध रखते हैं, वहाँ उपवास और त्यौहारों के दौरान अपनाई जाने वाली खान-पान संबंधी प्रथाएँ।

(ग) उपवास के दौरान बनाए जाने वाले व्यंजन।

प्राप्त जानकारी को निम्नलिखित रूप से सारणीबद्ध करें-

क्षेत्रअवसर (उपवास का स्वरूप)व्यंजनविद्यमान पोषक तत्व

सारणीबद्ध जानकारी के आधार पर दो निष्कर्ष बताएँ।

उत्तर: परिवार के सदस्यों से साक्षात्कार के आधार पर निम्नलिखित जानकारी प्राप्त हुई:

क्षेत्रअवसर (उपवास का स्वरूप)व्यंजनविद्यमान पोषक तत्व
असमभोगाली बिहूतिल पिठा, नारिकोल लाडूप्रोटीन, कैल्शियम, आयरन
उत्तर भारतनवरात्रिसाबूदाना खिचड़ी, कुटू के आटे की पूरीकार्बोहाइड्रेट , फाइबर, ऊर्जा
महाराष्ट्रमहाशिवरात्रिश्रीखंड, साबूदाना वड़ाप्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन C
गुजरातजन्माष्टमीमखाना खीर, शक्कर पाराकैल्शियम, ऊर्जा, फाइबर

निष्कर्ष:

1. उपवास के दौरान बनाए जाने वाले व्यंजन प्रायः हल्के, सुपाच्य और ऊर्जा प्रदान करने वाले होते हैं, जिनमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर और विटामिन की अधिकता पाई जाती है।

2. खान-पान संबंधी वर्जनाएँ मुख्यतः स्वास्थ्य, धार्मिक मान्यताओं और ऋतुजन्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अपनाई जाती हैं, जिससे शरीर स्वस्थ बना रहे और संतुलित पोषण प्राप्त हो सके।

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