NCERT Class 11 Home Science Chapter 7 विविध संदर्भों में सरोकार और आवश्यकताएँ

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Chapter: 7

मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान भाग – I

इकाई – (II) परिवार, समुदाय और समाज के प्रति समझ

अभ्यास

1. निम्नलिखित वेबसाइटें देखें और कक्षा में उनके बारे में चर्चा करें-

(i) विश्व के बच्चों की स्थिति पर यूनिसेफ़ की रिपोर्ट।

(ii) मानव विकास सूचंकाक।

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(iii) विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्व स्वास्थ्य रिपोर्ट।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

2. कम से कम 5-6 प्रमुख सूचकों की पहचान करें जिन्हें आप स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण समझते हैं और देखें कि विश्व में विभिन्न देशों में भारत किस दर्जे पर है।

उत्तर: स्वास्थ्य मापने के छह प्रमुख सूचक हैं:

(i) शिशु मृत्यु दर (IMR): भारत में यह 27 प्रति 1,000 जीवित जन्म है, जो विकसित देशों (जैसे जापान – 2) से काफी अधिक है।

(ii) मातृ मृत्यु दर (MMR): भारत में 97 प्रति 100,000 जीवित जन्म, जबकि फिनलैंड में मात्र 3 है।

(iii) जीवन प्रत्याशा: भारत में औसत 70.1 वर्ष है, जबकि जापान में 84.5 वर्ष।

(iv) कुपोषण दर: भारत में 35% बच्चे अविकसित और 19% कम वज़न हैं, जो चीन (8%) से अधिक है।

(v) डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात: भारत में 1:1,511 डॉक्टर हैं, जबकि जर्मनी में 4.3 प्रति 1,000 लोग हैं।

(vi) स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च: भारत में 2.1% GDP, जबकि अमेरिका में 16.8% है।

हालांकि भारत ने सुधार किए हैं, लेकिन अभी भी स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। सरकारी योजनाएँ जैसे “आयुष्मान भारत” और “राष्ट्रीय पोषण मिशन” स्थिति सुधारने में मदद कर रही हैं।

अथवा

ग्रामीण छात्रों के लिए विकल्प अपने गाँव में छोटे बच्चों की दो माताओं से साक्षात्कार करें। हर माता से पूछें कि पिछले पूँक वर्ष में उसके बच्चे को कितनी बार अतिसार हुआ है। माताओं द्वारा बताए गए कारणों पर अपनी टिप्पणी लिखें।

उत्तर: साक्षात्कार: ग्रामीण क्षेत्र में छोटे बच्चों की माताओं से बातचीत।

माता 1: सुनीता देवी (30 वर्ष)।

बच्चे की उम्र: 3 साल।

अतिसार के मामले: पिछले एक वर्ष में 3 बार।

कारण (माता के अनुसार): गंदा पानी पीना और खुले में खेलते समय मिट्टी खाना।

टिप्पणी: यह दिखाता है कि स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता की कमी बच्चों में अतिसार का मुख्य कारण हो सकता है। जागरूकता और पानी उबालकर पीने की आदत से इसे रोका जा सकता है।

माता 2: रेखा देवी (28 वर्ष)।

बच्चे की उम्र: 4.5 साल।

अतिसार के मामले: पिछले एक वर्ष में 2 बार।

कारण (माता के अनुसार): बाहर के खाद्य पदार्थ (चाट, गोलगप्पे) खाना और बारिश के मौसम में संक्रमण।

टिप्पणी: अस्वच्छ खाद्य पदार्थ और दूषित वातावरण भी अतिसार के बड़े कारण हैं। स्वच्छ भोजन और हाथ धोने की आदत बच्चों को सुरक्षित रख सकती है।

निष्कर्ष:

साक्षात्कार से पता चलता है कि गंदा पानी, अस्वच्छ भोजन, और साफ-सफाई की कमी अतिसार के मुख्य कारण हैं। यदि माताओं को स्वच्छता, पोषण, और पानी को उबालकर पीने की जानकारी दी जाए, तो बच्चों में अतिसार की घटनाओं को कम किया जा सकता है।

3. स्वास्थ्य के बहुत से आयाम हैं। स्वास्थ्य समस्याओं की रोकथाम, अच्छे स्वास्थ्य के संवर्द्धन और चिकित्सीय सेवाओं सहित इस तरह के विभिन्न व्यवसायों में संलग्न लोगों की सूची बनाएँ जो स्वास्थ्य तथा पोषण के लिए सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।

उत्तर: स्वास्थ्य की परिभाषा विभिन्न शारीरिक, सामाजिक तथा मानसिक आयामों को समाहित करती है।

सामाजिक स्वास्थ्य – इसका आशय व्यक्तियों और समाज के स्वास्थ्य से है। जब हम किसी समाज से जुड़ते हैं तो इसका आशय उस समाज से होता है जिसमें सभी नागरिकों को अच्छे स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य वस्तुओं तथा सेवाओं को उपलब्ध करने के समान अवसर और पहुँच प्राप्त हो। जब हम व्यक्तियों का उल्लेख करते हैं, तब हमारा आशय हर व्यक्ति की कुशलता से होता है – वह व्यक्ति दूसरे लोगों और सामाजिक संस्थाओं के साथ कितनी अच्छी तरह व्यवहार करता है। इसमें हमारे सामाजिक कौशल और समाज के सदस्य के रूप में काम करने की क्षमता शामिल है। जब हमें समस्याओं और तनाव का सामना करना पड़ता है, तब सामाजिक सहयोग उन समस्याओं से निपटने और उन्हें हल करने में हमारी मदद करता है। सामाजिक सहयोग देने वाले उपाय बच्चों तथा वयस्कों में सकारात्मक समायोजन (तालमेल) करने में योगदान देते हैं और व्यक्तिगत विकास को प्रोत्साहित करते हैं। आजकल सामाजिक स्वास्थ्य पर बल देने का महत्त्व बढ़ रहा है क्योंकि वैज्ञानिक अध्ययन दर्शाते हैं कि जो लोग सामाजिक रूप से अच्छी तरह तालमेल बनाए रखते हैं वे लंबे समय तक जीते हैं और बीमारी से भी जल्दी राहत पा लेते हैं।

स्वास्थ्य से जुड़े कुछ सामाजिक निर्धारक हैं –

रोजगार की स्थिति।

कार्यस्थलों में सुरक्षा।

स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच।

सांस्कृतिक/धार्मिक आस्थाएँ, वर्जित कर्म और मूल्य-प्रणाली।

सामाजिक आर्थिक और पर्यावरण संबंधी परिस्थितियाँ।

मानसिक स्वास्थ्य – इसका आशय भावात्मक तथा मनोवैज्ञानिक स्वस्थता से है। जिस व्यक्ति ने स्वस्थता की अनुभूति को अनुभव किया है, वह अपनी संज्ञानात्मक तथा भावात्मक क्षमताओं का उपयोग कर सकता है, समाज में सुचारू रूप से कार्य कर सकता है और दैनिक सामान्य ज़रूरतों को पूरा कर सकता है। नीचे बॉक्स में मानसिक स्वास्थ्य के सूचकों को दर्शाया गया है।

जिस व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होता है-

वह स्वयं को समर्थ और सक्षम महसूस करता है।

वह दैनिक जीवन में सामने आने वाले सामान्य स्तर के तनावों से निबट सकता है।

उसके संबंध संतोषप्रद होते हैं।

वह स्वतंत्र जीवन बिता सकता है।

यदि किसी मानसिक या भावात्मक तनाव की परिस्थितियों का सामना करना पड़े तो वह उनका मुकाबला कर सकता है और उनसे सहज रूप से उबर सकता है।

वह किन्हीं बातों से डरता नहीं है।

जीवन में आने वाली छोटी-मोटी कठिनाइयों/समस्याओं से सामना करते हुए अनावश्यक रूप से लंबी अवधि तक परास्त या अवसाद महसूस नहीं करता है।

शारीरिक स्वास्थ्य – स्वास्थ्य के इस पहलू में शारीरिक तंदुरुस्ती और शरीर की क्रियाएँ एवं क्षमताएँ शामिल हैं। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति सामान्य गतिविधियाँ कर सकता है, असाधारण रूप से थकान महसूस नहीं करता तथा उसमें संक्रमण और रोग के प्रति पर्याप्त प्रतिरोधक शक्ति होती है।

समीक्षात्मक प्रश्न

1. “पोषण से उत्पादकता, आय और जीवन की में अपनी राय लिखिए। गुणवत्ता प्रभावित होती है”। इस कथन के बारे में अपनी राय लिखिए।

उत्तर: स्वास्थ्य के अनेक आयाम हैं और हर आयाम कई कारकों द्वारा प्रभावित होता है। इसलिए स्वास्थ्य के आकलन के लिए कई सूचकों का प्रयोग किया जाता है। इनके अंतर्गत मृत्यु-दर, रुग्णता (बीमारी/रोग), अशक्तता दर, पोषण स्तर, स्वास्थ्य देखभाल वितरण, उपयोग, परिवेश, स्वास्थ्य नीति, जीवन की गुणवत्ता आदि के सूचक शामिल हैं।

मानव शरीर के लिए अपेक्षित मात्राओं के आधार पर पोषक तत्वों को मोटे तौर पर वृहत् पोषक (अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में अपेक्षित) और सूक्ष्म पोषक (कम मात्रा में अपेक्षित) में वर्गीकृत किया गया है। वृहत् पोषक तत्वों में सामान्यतः वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा रेशे (फाइबर) आते हैं। सूक्ष्मपोषक तत्वों में खनिज जैसे लौह तत्व, जिंक, सिलेनियम और विभिन्न विटामिन वसा-विलेय तथा जल-विलेय शामिल हैं और ये सभी महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। उनमें से कुछ शरीर में होने वाली विभिन्न उपापचयी प्रतिक्रियाओं में सह-कारक तथा सह-एन्जाइम के रूप में काम करते हैं। पोषक तत्व जीन-अभिव्यक्ति तथा प्रतिलेखन को भी प्रभावित कर सकते हैं। विभिन्न अंग तथा तंत्र, पोषक तत्वों के पाचन, अवशोषण, उपापचय, भंडारण एवं उत्सर्जन में तथा इनके चयापचय के अंतिम उत्पादों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वस्तुतः, शरीर के सभी भागों की प्रत्येक कोशिका को पोषक तत्व की जरूरत होती है। सामान्य स्वस्थ अवस्था में पोषक तत्वों की आवश्यकता आयु, लिंग तथा शरीर क्रियात्मक अवस्था के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है, जैसे विकास की अवस्था यानी शैशव, बाल्यावस्था, किशोरावस्था और महिलाओं की गर्भावस्था तथा स्तन्यकाल में। शारीरिक सक्रियता का स्तर भी ऊर्जा, और ऊर्जा के उपापचय में सम्मिलित पोषक तत्वों की जरूरतों को निर्धारित करता है, उदाहरणतः थायामीन तथा राइन्नोफ्लेविन जैसे विटामिन।

पोषण विज्ञान जीवन, वृद्धि, विकास तथा तंदुरुस्ती के लिए भोजन एवं पोषक तत्वों तक पहुँच, उसकी उपलब्धता और उपयोग से संबंधित है। पोषणविद् (इस क्षेत्र के काम करने वाले पेशेवर) असंख्य पहलुओं पर ध्यान देते हैं जिसमें वे जैविक और उपापचयी पहलू से लेकर रोग की अवस्था में क्या होता है और शरीर का पोषण कैसे होता है (क्लीनिकल पोषण) तक आते हैं। पोषण एक विषय के रूप में लोगों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं और पोषक तत्वों (जनस्वास्थ्य पोषण), उनकी पोषण संबंधी समस्याओं का अध्ययन करता है, जिसमें पोषक तत्वों की कमी से पैदा होने वाली स्वास्थ्य समस्याएँ, जैसे- हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, उच्च रक्त दाब आदि और इन रोगों का निवारण भी शामिल है। हम सब जानते हैं कि जब कोई बीमार होता है, तब उसकी खाने की इच्छा नहीं होती। कोई व्यक्ति क्या और कितना खाता है, यह केवल रुचि या स्वाद पर ही नहीं बल्कि भोजन की उपलब्धता (भोजन सुरक्षा) पर भी निर्भर करता है और यह उपलब्धता क्रय क्षमता (आर्थिक कारक), परिवेश (जल तथा सिंचाई) और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरों की नीतियों से प्रभावित होती है। संस्कृति, धर्म, सामाजिक स्थिति, आस्था और वर्जित कर्म भी हमारे भोजन के विकल्पों, भोजन अंतर्ग्रहण, तथा पोषण की स्थिति को प्रभावित करते हैं।

2. पोषण मानसिक तथा दृष्टि संबंधी अशक्तता और जीवन की गुणवत्ता से कैसे जुड़ा हुआ है?

उत्तर: पोषण और स्वास्थ्य के बीच घनिष्ठ पारस्परिक संबंध है। ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ के विश्वव्यापी अभियान में, पोषण को बढ़ावा देना एक प्रमुख घटक है। पोषण का संबंध शरीर के अंगों तथा ऊतकों की संरचना एवं कार्य के रखरखाव के साथ है। यह शरीर की वृद्धि और विकास से भी संबंधित है। अच्छा पोषण व्यक्ति को इस योग्य बनाता है कि वह अच्छे स्वास्थ्य का आनंद ले सके, संक्रमण का प्रतिरोध कर सके, उसमें ऊर्जा का पर्याप्त स्तर हो और उसे दैनिक कामकाज करते हुए थकान महसूस न हो। बच्चों तथा किशोरों के लिए पोषण उनकी वृद्धि, मानसिक विकास और अपनी सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वयस्कों के लिए, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से सफल एवं स्वस्थ जीवन जीने के लिए समुचित पोषण अनिवार्य है। किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति उसकी पोषक तत्वों की आवश्यकताओं और आहार ग्रहण को निर्धारित करती हैं। बीमारी के दौरान पोषक तत्वों की आवश्यकता बढ़ जाती है और पोषकों का ब्रेकडाउन अधिक होता है। इसलिए, बीमारी तथा रोग पोषक तत्वों की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इसलिए पोषण मानव जीवन, स्वास्थ्य तथा विकास का ‘मूलभूत स्तंभ’ है।

3. कक्षा को समूहों में बाँटें। हर समूह किसी खाद्य पदार्थ विक्रेताओं के प्रतिष्ठानों में जाएँ जैसे कैंटीन कैफ़ेटेरिया, रेस्तरां, सड़क पर खाद्य पदार्थ विक्रेता। (क) आहार संबंधी स्वास्थ्य विज्ञान और (ख) निजी स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित खराब स्वास्थ्य विज्ञान की रीतियों को पहचानें।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

4. कक्षा में चर्चा करें कि स्वास्थ्य विज्ञान का समुचित प्रयोग कैसे किया जा सकता है और आहार को कैसे अधिक सुरक्षित कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर: स्वास्थ्य विज्ञान का समुचित प्रयोग और आहार को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर कक्षा में चर्चा की जा सकती है:

स्वास्थ्य विज्ञान का समुचित प्रयोग:

(i) नियमित स्वच्छता: हाथ धोना, साफ पानी पीना, और स्वच्छता के अन्य नियमों का पालन करना।

(ii) संक्रमण की रोकथाम: टीकाकरण, उचित उपचार, और जागरूकता के माध्यम से बीमारियों से बचाव।

(iii) शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य: योग, व्यायाम, और संतुलित आहार अपनाने की आवश्यकता।

(iv) चिकित्सा विज्ञान का उपयोग: प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी, आपातकालीन सेवाओं तक पहुंच, और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का लाभ।

(v) तकनीक और स्वास्थ्य: टेलीमेडिसिन, हेल्थ ऐप्स, और स्मार्ट हेल्थ डिवाइसेज़ का उपयोग।

आहार को अधिक सुरक्षित बनाने के उपाय:

(i) खाद्य स्वच्छता: खाना बनाने और खाने से पहले हाथ धोना, भोजन को ढककर रखना।

(ii) सही भंडारण: ताजे और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को सही तापमान पर रखना।

(iii) संतुलित आहार: पोषणयुक्त भोजन लेना, फास्ट फूड और अधिक वसा वाले भोजन से बचना।

(iv) संरक्षित खाद्य पदार्थ: मिलावटी और विषाक्त पदार्थों से बचने के लिए खाद्य पदार्थों की जाँच करना।

(v) सुरक्षित जल का उपयोग: उबला या फ़िल्टर किया हुआ पानी पीना।

कक्षा में इन विषयों पर समूह चर्चा, प्रेजेंटेशन और प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किए जा सकते हैं ताकि विद्यार्थी जागरूक बन सकें और इन उपायों को अपने जीवन में अपना सकें।

अथवा

बच्चों को तीन समूहों में बाँटें। एक समूह ‘आहार’ पहलू का अध्ययन करेगा, दूसरा ‘लोगों’ का अध्ययन करेगा, और तीसरा ‘यूनिट, सुविधाओं तथा उपकरणों’ का आकलन करेगा। बीमारी के खतरे को बढ़ाने वाले विभिन्न पहलुओं/भागों/गतिविधियों की सूची बनाने के बाद समूहों की एक प्रस्तुति करने के लिए कहा जा सकता है, और इसके बाद फिर सुधारात्मक उपायों पर चर्चा करें।

उत्तर: बच्चों को तीन समूहों में बाँटकर निम्नलिखित विषयों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है:

समूह 1: आहार।

खतरे: अस्वच्छ भोजन तैयार करना।

खाद्य सामग्री का गलत भंडारण।

पोषक तत्वों की कमी।

सुधार:

भोजन तैयार करने में स्वच्छता का पालन।

सही भंडारण तकनीकों का उपयोग।

संतुलित आहार सुनिश्चित करना।

समूह 2: लोग

खतरे:

स्वच्छता की अनदेखी।

बीमारी के लक्षणों को नज़रअंदाज़ करना।

स्वास्थ्य शिक्षा की कमी।

सुधार:

स्वच्छता पर जागरूकता कार्यक्रम।

बीमार होने पर घर पर आराम करने की सलाह।

स्वास्थ्य शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना।

समूह 3: यूनिट, सुविधाएँ और उपकरण।

खतरे:

गंदे शौचालय।

साफ पानी की कमी।

स्वास्थ्य उपकरणों की अनुपलब्धता।

सुधार:

नियमित सफाई सुनिश्चित करना।

सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना।

आवश्यक स्वास्थ्य उपकरण प्रदान करना।

इन विषयों पर समूह चर्चा और प्रस्तुति के माध्यम से छात्रों में स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।

अध्यापकों के लिए टिप्पणी:

अध्यापक विद्यालय के बच्चों, माता-पिता और समुदाय के सदस्यों के लिए स्वास्थ्य, पोषण तथा स्वास्थ्य विज्ञान पर एक प्रदर्शनी आयोजित करने में छात्रों का मार्गदर्शन करें।

उत्तर: अध्यापक विद्यालय के बच्चों, माता-पिता और समुदाय के सदस्यों के लिए स्वास्थ्य, पोषण तथा स्वास्थ्य विज्ञान पर एक प्रदर्शनी आयोजित करने में छात्रों का मार्गदर्शन करें। 

प्रदर्शनी आयोजित करने के लिए सुझाव:

1. विषय चयन: स्वास्थ्य, पोषण और स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित उपयुक्त विषयों का चयन करें, जैसे संतुलित आहार, स्वच्छता, और सामान्य बीमारियों की रोकथाम।

2. छात्र सहभागिता: छात्रों को विभिन्न विषयों पर समूहों में बाँटें और उन्हें शोध, मॉडल निर्माण, पोस्टर प्रस्तुति आदि के माध्यम से अपनी समझ प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित करें।

3. माता-पिता और समुदाय की भागीदारी: माता-पिता और समुदाय के सदस्यों को प्रदर्शनी में आमंत्रित करें, ताकि वे छात्रों के प्रयासों को देख सकें और स्वास्थ्य एवं पोषण के महत्व को समझ सकें।

4. विशेषज्ञ आमंत्रण: स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञों को आमंत्रित करें, जो उपस्थित लोगों के साथ बातचीत कर सकें और उनके प्रश्नों का उत्तर दे सकें।

5. प्रदर्शनी के बाद चर्चा: प्रदर्शनी के बाद एक चर्चा सत्र आयोजित करें, जिसमें प्रतिभागी अपने अनुभव साझा करें और सीखे गए महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार-विमर्श करें।

इस प्रकार की प्रदर्शनी छात्रों, माता-पिता और समुदाय के सदस्यों में स्वास्थ्य, पोषण और स्वास्थ्य विज्ञान के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायक होगी।

विद्यार्थियों के लिए टिप्पणी:

(क) अपने विद्यालय और (ख) अपने घर के आस-पास पर्यावरण संबंधी स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित कम से कम तीन कारक देखें और उन्हें बहुत अच्छा, अच्छा, साधारण, खराब तथा बहुत खराब के रूप में श्रेणीबद्ध करें।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रयोग – 10

आगे दी गई खाद्य पदार्थों के संघटकों की सारणियों का प्रयोग करके भोजन के 150 ग्रा. खाद्य भाग की ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्शियम तथा लौह तत्व की मात्रा की तुलना करें–

(क) अनाज

अनाज का नामऊर्जा की मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. बाजरा
2. चावल (अपरिष्कृत, पालिश किया हुआ)
3. मक्का (सूखा)
4. गेहूँ (साबुत)

उत्तर:

अनाज का नामऊर्जा की मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. बाजरा541.517.46312
2. चावल (अपरिष्कृत, पालिश किया हुआ)517.510.2151.05
3. मक्का (सूखा)51316.65153.45
4. गेहूँ (साबुत)51917.761.57.95

(ख) वालें

वाल/फली का नामऊर्जा ऊर्जा की की मात्रा मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. चने की दाल
2. उड़द साबुत
3. मसूर
4. सोयाबीन

उत्तर:

दान/फली का नामऊर्जा ऊर्जा की की मात्रा मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. चने की दाल54025.65847.95
2. उड़द साबुत520.5362315.7
3. मसूर514.537.65103.511.37
4. सोयाबीन64864.836015.6

(ग) सब्जियाँ

सब्जी का नामऊर्जा की मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. पालक
2. बैंगन
3. फूल गोभी
4. गाजर

उत्तर:

सब्जी का नामऊर्जा की मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. पालक34.54.35292.56.75
2. बैंगन35.251.6522.50.6
3. फूल गोभी40.54.0567.52.25
4. गाजर631.35451.35

(घ) फल

फल का नामऊर्जा की मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. आम (पका हुआ)
2. संतरा
3. अमरूद (देसी)
4. पपीता (पका हुआ)

उत्तर:

फल का नामऊर्जा की मात्रा (किलोकैलोरी प्रति 150 ग्रा.)प्रोटीन की मात्रा (ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)कैल्शियम की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)लौह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा. प्रति 150 ग्रा.)
1. आम (पका हुआ)900.9150.3
2. संतरा691.05150.15
3. अमरूद (देसी)1323240.75
4. पपीता (पका हुआ)600.9210.15

(ख) अपने परिवार के आहार में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन ए, लौह तत्व तथा कैल्सियम की प्रचुरता वाले स्रोतों की पहचान करें। क्या आप इनमें सुधार के लिए सुझाव दे सकते हैं? अपना उत्तर दर्ज करने के लिए निम्नलिखित फॉर्मेट का प्रयोग करें।

कार्बोहाइडेटों के स्रोतप्रोटीनों के स्रोतवसाओं के खोतवसाओं के खोतविटामिन ए के स्रोतलौह तत्व के स्रोतकैल्शियम के स्रोत
आहार पद्धतियाँ जिनमें सुधार की जरूरत हैसुझाव

उत्तर: 

कार्बोहाइडेटों के स्रोतप्रोटीनों के स्रोतवसाओं के खोतविटामिन ए के स्रोतलौह तत्व के स्रोतकैल्शियम के स्रोत
चावल, गेहूं, दालें (मूंग, मसूर, अरहर), घी, मक्खन,गाजर, पालक, आम, पपीता, पालक, चुकंदर, अनार,दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, 
आलू, मक्का, रोटीसोयाबीन, दूध, पनीर, अंडे, मछलीसरसों का तेल, नारियल तेल, मूंगफलीटमाटर, हरी पत्तेदार सब्जियाँगुड़, मसूर दाल, काले चनेबादाम, तिल
आहार पद्धतियाँ जिनमें सुधार की जरूरत हैसुझाव
तली-भुनी और जंक फूड की बजाय पोषक तत्वों से भरपूर भोजन लें।हरी सब्जियों और फलों की मात्रा बढ़ाएँ।
चीनी और मैदे से बने खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें।संतुलित आहार के लिए दालों और अनाजों का सही संतुलन बनाए रखें।
भोजन को सही समय पर और संतुलित मात्रा में लें। पानी का पर्याप्त सेवन करें।अत्यधिक वसायुक्त भोजन का सेवन कम करें।
(ख) संसाधन उपलब्धता और प्रबंधन

समीक्षात्मक प्रश्न

1. समय-संसाधनों और स्थान-संसाधनों का वर्णन करें।

उत्तर: समय-संसाधन और स्थान-संसाधन हमारे दैनिक जीवन के दो महत्वपूर्ण घटक हैं, जो हमारी उत्पादकता और दक्षता को प्रभावित करते हैं। समय-संसाधन का अर्थ है कि हम अपने कार्यों को एक निश्चित समय सीमा में कैसे पूरा करते हैं। यह सही योजना, प्राथमिकता निर्धारण और कार्यों के सुव्यवस्थित निष्पादन पर निर्भर करता है। यदि समय का सही उपयोग नहीं किया जाए, तो यह अनियंत्रित रूप से व्यर्थ हो सकता है।

स्थान-संसाधन उन भौतिक संसाधनों से जुड़े होते हैं, जिनका उपयोग कार्य करने के लिए किया जाता है। इनमें कार्यस्थल, उपकरण, आवश्यक सुविधाएं और परिवेश शामिल होते हैं। इन संसाधनों का उचित प्रबंधन कार्यक्षमता को बढ़ाता है और अनावश्यक समय व श्रम की बर्बादी को रोकता है।

इन दोनों संसाधनों का समुचित उपयोग करके हम न केवल अपने कार्यों को कुशलता से पूरा कर सकते हैं बल्कि उत्पादकता और संतोषजनक जीवनशैली भी सुनिश्चित कर सकते हैं।

2. समय-प्रबंधन क्यों ज़रूरी है?

उत्तर: समय सीमित संसाधन है जो एक बार व्यतीत होने पर पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 24 घंटे मिलते हैं, और यह महत्वपूर्ण है कि हम इस समय का उपयोग कैसे करते हैं। समय प्रबंधन का अभाव कार्यों की अधूरी स्थिति और चिंता का कारण बन सकता है, जिससे उत्पादकता में कमी आती है। सही समय प्रबंधन से हम अपनी जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभा सकते हैं, जिससे कार्य और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बना रहता है। यह कौशल कृषि से लेकर व्यापार, खेल, सार्वजनिक सेवा और निजी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की कुंजी है। समय प्रबंधन का सिद्धांत व्यस्त होने की बजाय परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना है, जिससे हम अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य कर सकें। इसलिए, प्रभावी समय प्रबंधन न केवल हमारी उत्पादकता बढ़ाता है, बल्कि हमें तनावमुक्त जीवन जीने में भी सहायता करता है।

3. समय और कार्यविधि-योजना के विभिन्न चरणों पर चर्चा करें।

उत्तर: समय और कार्यविधि-योजना के विभिन्न चरण –

(क) उन कामों पर ऊर्जा तथा समय नष्ट न करें जिन पर बहुत ध्यान देने की जरूरत न हो।

(ख) एक समय में एक काम देखें। जब तक वह पूरा न हो जाए, उसे बीच में न छोड़ें।

(ग) बड़े कामों को सुविधाजनक गतिविधियों की एक श्रृंखला में छोटा-छोटा कर विभाजित कर लें। दिन भर के स्कूल के कार्य (बड़े काम) को विषयों के अनुसार छोटे छोटे कामों में बाँटा जा सकता है।

(घ) अपना कार्य यथाशीघ्र शुरू कर दें। काम को टालने या उससे बचाव के उपाय करने में समय नष्ट न करें। विद्यार्थी को घर पहुँचकर, थोड़ी देर विश्राम कर, भोजन करना चाहिए और फिर स्कूल का काम शुरू कर देना चाहिए, उसे दिन के समाप्त होने तक टालना नहीं चाहिए।

(ङ) नियमित दिनचर्या से कार्य करें। हर काम निष्पादित करने के लिए समय तय करें, और फिर तदनुकूल उसे निभाएँ। जैसे स्कूल का काम पूरा करना, घर का कामकाज करना और फिर अन्य कार्य करना। छात्रों को प्रतिदिन का नियम बना लेना चाहिए कि बिना विलंब किए समय से काम पूरा करना है।

(च) अपने कामों की प्राथमिकता तय करें। कोई भी नया काम हाथ में लेते समय सुनिश्चित कर लें कि वह पहले से चल रहे कार्यों पर प्रभाव तो नहीं डालेगा। एक ही समय में बहुत अधिक गतिविधियाँ शुरू न करें। समय कम हो और कार्य अधिक हो तो ऐच्छिक कामों को बाद में करें, अनिवार्य गतिविधियाँ पहले पूरी करें। जैसे, यदि किसी छात्र की कक्षा की परीक्षा होनी हो, तो उसे पहले परीक्षा के लिए पढ़ना चाहिए, फिर स्कूल का काम करना चाहिए और बाद में अन्य गतिविधियों में लगना चाहिए।

4. समय-प्रबंधन के साधन कौन-से हैं?

उत्तर: समय-प्रबंधन के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता है, जिससे व्यक्ति अपने समय का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकता है। इनमें से प्रमुख साधन हैं—कार्य योजना बनाना, प्राथमिकताओं को निर्धारित करना, समय सारिणी तैयार करना और कार्यों की सूची बनाना। कार्य योजना बनाने से व्यक्ति अपने लक्ष्यों को स्पष्ट कर सकता है और उन्हें व्यवस्थित रूप से पूरा कर सकता है। प्राथमिकताओं का निर्धारण करने से सबसे महत्वपूर्ण कार्य पहले पूरे किए जा सकते हैं, जिससे समय की बर्बादी कम होती है।

इसके अलावा, समय सारिणी तैयार करना एक प्रभावी तरीका है, जिससे व्यक्ति अपने कार्यों को समय के अनुसार व्यवस्थित कर सकता है। कार्यों की सूची बनाने से यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी महत्वपूर्ण कार्य छूट न जाए। इसके साथ ही, तकनीकी साधन जैसे कि कैलेंडर, अलार्म, नोटिफिकेशन और डिजिटल ऐप्स भी समय प्रबंधन में मददगार होते हैं। इन सभी साधनों का सही उपयोग करने से व्यक्ति अपनी उत्पादकता बढ़ा सकता है और जीवन में संतुलन बनाए रख सकता है।

5. स्थान-प्रबंधन की परिभाषा दें। घर के भीतर स्थान-नियोजन के सिद्धांतों पर चर्चा करें।

उत्तर: बैठना, सोना, पढ़ना, पकाना, नहाना, धोना, मनोरंजन आदि घर में की जाने वाली प्रमुख गतिविधियाँ हैं। इनमें से प्रत्येक गतिविधि और उनसे संबंधित क्रियाओं को चलाने के लिए घर में प्रायः विशिष्ट क्षेत्र निर्धारित किए जाते हैं। जहाँ भी स्थान उपलब्ध हो, इन गतिविधियों को चलाने के लिए विशिष्ट कमरों का निर्माण किया जाता है। अधिकांश शहरी मध्यवर्गीय घरों में एक बैठक, एक या उससे अधिक शयनकक्ष, रसोईघर, भंडारघर, स्नानागार, शौचालय और बरामदा आँगन (ऐच्छिक) होते हैं।

इसके अलावा, कुछ घरों में अतिरिक्त कमरे भी हो सकते हैं जैसे- भोजन कक्ष, अध्ययन कक्ष, मनोरंजन कक्ष, श्रृंगार कक्ष, अतिथि कक्ष, बाल कक्ष, गैराज (स्कूटर या कार के लिए), सीढ़ियाँ, गलियारे, पूजा घर, बगीचा, बालकनी आदि। आइए, समझें कि स्थानों की योजना कैसे बनाई जाए।

(ग) भारत की वस्त्र परंपराएँ

समीक्षात्मक प्रश्न

1. भारतीय वस्त्र कला की प्राचीनता के बारे में जानकारी किन ऐतिहासिक स्रोतों से मिल सकती है?

उत्तर: भारत में परिष्कृत वस्त्रों का उत्पादन उतना ही प्राचीन है, जितनी भारतीय सभ्यता। ऋग्वेद तथा उपनिषदों में विश्व की सृष्टि का वर्णन करते हुए कपड़े का प्रयोग एक प्रतीक के रूप में किया गया है। इन ग्रंथों में विश्व को ‘देवताओं द्वारा बुना गया कपड़ा’ कहा गया है। पृथ्वी पर प्रकाश और अंधकार वाले दिन और रात की तुलना जुलाहे के करघे में शटल की गति से की गई है।

बुनाई सबसे पुरानी कला है और महीन कपड़े के उत्पाद बहुत पुराने समय से बनाए जाते रहे हैं। कपड़े के टुकड़े और टैरा-कोटा तकले तथा कांस्य की सूइयाँ भी, जो मोहनजोदाड़ो में खुदाई के स्थल पर मिली हैं, इस बात का प्रमाण हैं कि भारत में सूत की कताई, बुनाई, रंगाई और कशीदाकारी की परंपराएँ कम से कम 5000 वर्ष पुरानी हैं। रंग का पता लगाने और वस्त्र सामग्री पर, विशेषतः सूती सामग्री पर उसके प्रयोग की तकनीक में निपुणता हासिल करने वाला, प्राचीन सभ्यताओं में पहला भारत ही था। रंगाई और छपाई वाले सूती कपड़ों का निर्यात अन्य राष्ट्रों को किया जाता था, वे अपने पक्के रंगों के लिए प्रसिद्ध थे। प्राचीन साहित्य (ग्रीक और लैटिन) में उनका उल्लेख मिलता है, जैसे ‘भारतीय कपड़ों पर रंग उतना ही चिर स्थायी है, जितनी कि बुद्धिमानी।’

ज्ञात इतिहास की पूरी अवधि के दौरान सूत, रेशम तथा ऊन से बनाए गए भारतीय कपड़ों की उत्कृष्टता की प्रशंसा के उल्लेख मिलते हैं। वे अपने कपड़े की विशिष्टताओं के लिए और बुनाई, पक्की रंगाई, छपाई तथा कशीदाकारी द्वारा उन पर बनाए गए डिज़ाइनों के लिए भी प्रसिद्ध थे। शीघ्र ही भारतीय कपड़े व्यापार जगत् में लोकप्रिय हो गए, उन्होंने राजनीतिक संपर्कों में मदद की और अन्य देशों में ऐसे उद्योगों की स्थापना को प्रेरित किया। लगभग 15वीं शताब्दी से ही भारत वस्त्रों का सबसे बड़ा निर्यातक था। यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा विभिन्न ईस्ट इंडिया कंपनियों की स्थापना भारत में वस्त्र व्यापार के साथ संबंधित थी।

2. सूत उत्पादन के वे दो पहलू कौन-से हैं जिन्होंने भारतीय कपड़ों को विश्वविख्यात बना दिया?

उत्तर: भारतीय कपड़ों को विश्वविख्यात बनाने में सूत उत्पादन के दो प्रमुख पहलू थे। पहला, भारत में उच्च गुणवत्ता वाले सूत की उपलब्धता थी, जिससे बारीक और मजबूत धागे बनाए जाते थे। यह धागे विभिन्न प्रकार के कपड़ों के उत्पादन में सहायक होते थे, जिनमें मलमल, रेशम, और अन्य उत्तम वस्त्र शामिल थे। दूसरा, भारतीय बुनकरों की उन्नत तकनीक और कौशल, जिन्होंने कपड़ों को सुंदर और टिकाऊ बनाया। भारतीय वस्त्रों की बुनाई, रंगाई और कढ़ाई की विशिष्टता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रसिद्ध कर दिया।

3. रेशम ब्रोकेड बुनाई से संबंधित कुछ क्षेत्रों के नाम बताइए। प्रत्येक के विशेष लक्षण क्या हैं?

उत्तर: भारत में रेशम ब्रोकेड बुनाई के लिए कई क्षेत्र प्रसिद्ध हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट विशेषताएँ हैं:

(i) पश्चिम बंगाल: पश्चिम बंगाल अपनी रेशम की बुनाई के लिए पारंपरिक रूप से प्रसिद्ध है। पश्चिम बंगाल के बुनकर जामदानी बुनकर जैसे करघे का प्रयोग कर रेशमी ब्रोकेड वाली साड़ी बुनते हैं, जिसे बालुचर बूटेदार कहते हैं। यह शैली मुर्शिदाबाद जिले में बालुचर नामक स्थान से शुरू हुई थी। अब वाराणसी में भी इसे सफलतापूर्वक बनाया जा रहा है। यहाँ, प्लेन बुने हुए कपड़े को रेशम के बिना बटे धागे से ब्रोकेड किया जाता है। इन साड़ियों की सबसे बड़ी विशेषता उनका पल्लू है। उसमें अनोखे डिज़ाइन होते हैं, जो वीर कथाओं, शाही दरबार, घरेलू दृश्य या यात्रा के दृश्य में सवारों तथा पालकियों के साथ दिखाए जाते हैं। किनारी तथा पल्लू में आम के मोटिफ़ का बहुत प्रयोग किया जाता है।

(ii) गुजरात: गुजरात ने किनख्वाब की अपनी शैली विकसित की है। भड़ौच और खंबात में बहुत बारीक वस्त्र बनाए गए थे, जो भारतीय शासकों के दरबारों में लोकप्रिय थे। अहमदाबाद की अशावली साड़ियाँ अपनी सुंदर ब्रोकेड किनारियों और पल्लुओं के लिए प्रसिद्ध हैं। उनमें भव्य सोने या चाँदी की धात्विक पृष्ठभूमि होती है जिस पर रंगीन धागे से पैटर्न बुने जाते हैं और कपड़े पर मीनाकारी जैसी छवि आ जाती है। पैटर्न में मानवों, पशुओं तथा पक्षियों के मोटिफ प्रायः बना दिए जाते हैं क्योंकि वे गुजराती लोक परंपरा के अभिन्न अंग हैं। 

(iii) तमिलनाडु: तमिलनाडु में कांचीपुर प्राचीन काल से दक्षिण भारत में ब्रोकेड बुनाई का एक प्रसिद्ध केंद्र है। पारंपरिक साड़ियों में ब्रोकेड वाले भव्य पल्लू के साथ पक्षियों और पशुओं के मोटिफ़ होते हैं। दक्षिण भारतीय कपड़ों में गहरे रंग, जैसे- लाल, बैंगनी, नारंगी, पीला, हरा, और नीला प्रमुख होते हैं।

(iv) महाराष्ट्र: महाराष्ट्र में औरंगाबाद के निकट गोदावरी नदी के किनारे स्थित पैठन दक्कन प्रदेश का एक प्राचीनतम नगर है। यह किनारियों तथा मोटिफ़ों के लिए सोने की जड़ाऊ बुनाई वाली रेशम की विशेष साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। पैठन में प्रयुक्त टेपेस्ट्री बुनाई सजावटी बुनाई की प्राचीनतम तकनीक है। यह घनी बुनाई वाले अपने सुनहरी कपड़े के लिए जानी जाती है। झिलमिलाती सुनहरी पृष्ठभूमि में लाल, हरे, गुलाबी तथा बैंगनी रंग में बनाए गए विभिन्न पैटर्न (बूटे, जीवन-वृक्ष, विशिष्ट कलियाँ और फूलों की किनारियाँ) मणियों की तरह चमकते हैं।

4. भारतीयों को ‘संसार का सर्वोत्तम रंगरेज़’ क्यों कहा जाता था?

उत्तर: भारतीयों को ‘संसार का सर्वोत्तम रंगरेज़’ कहा जाता था क्योंकि वे सूती कपड़ों को चटकीले और स्थायी रंगों से रंगने में अद्वितीय कौशल रखते थे। 17वीं शताब्दी तक, केवल भारतीय शिल्पकार ही सूत को रंगने की जटिल प्रक्रिया में पारंगत थे, जिससे पक्के और स्थायी रंग बनते थे। उनकी इस निपुणता ने भारतीय छींट (छपाई और चित्रकारी वाले सूती कपड़े) को यूरोपीय फैशन और बाजार में क्रांति ला दी थी। इस प्रकार, भारतीय शिल्पकारों की उत्कृष्ट रंगाई तकनीकों और उनकी कला की विशिष्टता ने उन्हें विश्वभर में ‘सर्वोत्तम रंगरेज’ की उपाधि दिलाई।

5. निम्नलिखित शब्दों के साथ आप किसको जोड़ते हैं- फुलकारी, कसूती, कशीदा, कान्था और चिकनकारी।

उत्तर: फुलकारी – पंजाब की कशीदाकारी कला।

कसूती – कर्नाटक की पारंपरिक कढ़ाई।

कान्था – बंगाल की परतदार सूती कढ़ाई।

कशीदा – कश्मीर की कशीदाकारी, जिसमें सुजनी और जलकदोजी शामिल हैं।

चिकनकारी – लखनऊ, उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध कढ़ाई।

परिशिष्ट – पाठ्यक्रम

कक्षा 11

प्रयोग

1. निम्नलिखित के संदर्भ में अपना शारीरिक अध्ययन-

(a) आयु, ऊँचाई, भार, नितम्ब साइज़, छाती/वक्ष की गोलाई, कमर की गोलाई।

(b) प्रथम रजस्स्राव की आयु (लड़कियों में)।

(c) दाढ़ी का बढ़ना, आवाज में परिवर्तन (लड़कों में)।

(d) बालों और आँखों का रंग।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

2. निम्नलिखित के संदर्भ में स्वयं को समझना-

(a) विकासीय मानदंड।

(b) हमउम्र साथी, पुरूष और स्त्री दोंनों तरह के।

(c) स्वास्थ्य की स्थिति।

(d) पोशाक की साइज़िंग।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

3. (a) अपने दिन के आहार का रिकॉर्ड बनाएँ।

उत्तर: आहार रिकॉर्ड टेबल:

समय भोजन का विवरणमात्रा
सुबह का नाश्ताउदाहरणः पराठा, अंडा, दूध)…………….
मिड-मॉर्निंग स्नैकउदाहरणः फल, ड्राई फ्रूट्स)…………….
दोपहर का भोजन(उदाहरणः दाल, चावल, सब्जी, रोटी)…………….
शाम का नाश्ताउदाहरणः चाय, बिस्किट, मूंगफली)…………….
रात का खाना(उदाहरणः हल्का खाना, सूप, खिचड़ी)…………….

(b) उपयुक्तता के लिए मात्रात्मक मूल्यांकन।

उत्तर: मूल्यांकन मापदंड (10 अंकों का स्केल):

मापदंडअंक (0-2)आपका स्कोर
पोषक तत्व संतुलन (कार्ब्स, प्रोटीन, फैट, विटामिन, मिनरल)0 = बहुत खराब, 2 = संतुलित……………..
कैलोरी की उपयुक्तता (आपकी आवश्यकता के अनुसार)0 = बहुत कम/ज्यादा, 2 = सही मात्रा……………..
फाइबर की मात्रा (फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज)0 = बहुत कम, 2 = पर्याप्त…………….
प्रोसेस्ड फूड /जंक फूड (कम होना चाहिए)0 = बहुत ज्यादा, 2 = नहीं के बरात…………….
हाइड्रेशन (पानी का सेवन)0 = 4 गिलास से कम, 2 = 8+ गिलास…………….

अंक गणना और निष्कर्ष

8-10 अंक = बहुत अच्छा आहार।

5-7 अंक = संतुलित लेकिन सुधार की जरूरत।

0-4 अंक = असंतुलित, बेहतर विकल्प चुनें।

4. (a) दिन में उपयोग में लिए जाने वाले कपड़ों और पोशाकों का रिकॉर्ड बनाएँ।

उत्तर: दिनभर पहने जाने वाले कपड़ों और पोशाकों का रिकॉर्ड:

समय कपड़ों का विवरणमौसम के अनुसार उपयुक्तताआरामदायक (✔IX)
सुबह (जागने के बाद)(उदाहरणः नाइटसूट, पायजामा)✔IX✔IX
सुबह का समय (वर्कआउट /योग)(उदाहरणः ट्रैकसूट, टी-शर्ट)✔IX✔IX
दोपहर (ऑफिस /कॉलेज/घर पर)(उदाहरणः फॉर्मल कपड़े, कुर्ता)✔IX✔IX
शाम (बाहर जाने पर)(उदाहरणः कैजुअल ड्रेस, जींस’)✔IX✔IX
रात (सोते समय)(उदाहरणः कॉटन नाइटसूट, हल्के कपड़े)✔IX✔IX

(b) उनका उपयोगिता की दृष्टि से वर्गीकरण करें।

उत्तर: कपड़ों का उपयोगिता के आधार पर वर्गीकरण:

श्रेणीउदाहरणउपयोगिता
आरामदायक कपड़ेनाइटसूट, पायजामा, कॉटन कुर्तानींद और घर में आराम के लिए
औपचारिक कपड़ेऑफिस सूट, फॉर्मल शर्ट-पैंट, साड़ीकार्यस्थल, मीटिंग, औपचारिक कार्यक्रमों के लिए
कैजुअल कपड़ेजींस-टीशर्ट, कुर्ती-लेगिंगरोजमर्रा के उपयोग और बाहर जाने के लिए
खेल एवं व्यायाम के कपड़ेट्रैकसूट, जिम वियर, योगा ड्रेसवर्कआउट और फिजिकल एक्टिविटी के लिए
मौसम आधारित कपड़ेस्वेटर, जैकेट (सर्दी), कॉटन ड्रेस (गर्मी)मौसम के अनुसार शरीर की सुरक्षा के लिए
पारंपरिक एवं विशेष अवसर के कपड़ेशेरवानी, लहंगा, सिल्क साड़ीत्योहार, शादी, धार्मिक कार्यक्रमों के लिए

5. (a) समय के उपयोग और कार्य संबंधी एक दिन की गतिविधियों का रिकॉर्ड बनाएँ।

उत्तर: एक दिन की गतिविधियों का समय और कार्यानुसार रिकॉर्ड:

समयगतिविधिउपयोगिता (उद्देश्य/महत्व)
सुबह (6:00 -7:00 AM)जागना, नित्य क्रियाएँ, स्नानदिन की शुरुआत, स्वच्छता बनाए रखना
सुबह (7:00 -8:00 AM)योग/व्यायाम/वॉकशारीरिक और मानसिक तंदुरुस्ती
सुबह (8:00 -9:00 AM)नाश्ता और समाचार पढ़नापोषण और जानकारी प्राप्त करना
सुबह (9:00 -12:00 PM)अध्ययन/ऑफिस /कामकाजज्ञान वृद्धि और उत्पादकता
दोपहर (12:00 – 1:00 PM)भोजन और आरामऊर्जा पुनः प्राप्त करना
दोपहर (1:00 – 4:00 PM)कार्य/पढ़ाई/महत्वपूर्ण कार्यलक्ष्य प्राप्ति और विकास
शाम (4:00 -5:00 PM)नाश्ता, हल्का विश्रामशरीर को तरोताजा करना
शाम (5:00 -7:00 PM)मनोरंजन/शौक /मित्रों से मिलनामानसिक आराम और सामाजिकता
रात (7:00 -9:00 PM)परिवार संग समय, टीवी, पढ़ाईव्यक्तिगत जीवन संतुलित करना
रात (9:00 -10:00 PM)हल्का खाना, फ्री टाइमस्वास्थ्य बनाए रखना
रात (10:00 -11:00 PM)मोबाइल/किताब पढ़ना, सोने की तैयारीज्ञान वृद्धि, अच्छी नींद लेना
रात (11:00 PM – 6:00 AM)सोनाऊर्जा पुनः प्राप्ति

(b) अपने लिए एक समय योजना तैयार करें।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

6. (a) एक दिन के लिए विभिन्न संदर्भों में अपने संवेगों को रिकॉर्ड करें।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

(b) इन संवेगों के कारणों और इनसे निपटने के तरीकों पर विमर्श करें।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

7. मुद्रण और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से प्राप्त पाँच संदेशों की सूची बनाएँ और चर्चा करें, जिन्होंने आपको प्रभावित किया है।

उत्तर: मुद्रण (प्रिंट) और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से हमें कई तरह के संदेश मिलते हैं, जो हमारे विचारों, भावनाओं और दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकते हैं।

यहाँ पाँच ऐसे संदेशों की सूची दी गई है जिन्होंने मुझे प्रभावित किया है:

(i) समाचार पत्र में प्रकाशित सामाजिक जागरूकता अभियान:

संदेश: “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान।

प्रभाव: इस संदेश ने मुझे लैंगिक समानता और शिक्षा के महत्व को समझने में मदद की। इससे मैंने महसूस किया कि लड़कियों की शिक्षा और सशक्तिकरण समाज के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

(ii) टेलीविज़न पर दिखाया गया पर्यावरण संरक्षण विज्ञापन:

संदेश: “पेड़ लगाओ, धरती बचाओ”।

प्रभाव: यह संदेश पर्यावरण की रक्षा करने की प्रेरणा देता है। मैंने इससे सीखा कि हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए, जल बचाना चाहिए और प्लास्टिक का कम से कम उपयोग करना चाहिए।

(iii) सोशल मीडिया पर वायरल हुआ प्रेरणादायक वीडियो:

संदेश: “सफलता मेहनत और लगन से मिलती है”।

प्रभाव: इस वीडियो में एक गरीब छात्र की कहानी थी, जिसने अपनी मेहनत से सफलता पाई। यह कहानी बहुत प्रेरणादायक थी और इसने मुझे यह सिखाया कि कठिनाइयाँ हमें रोक नहीं सकतीं, अगर हम सच्चे मन से प्रयास करें।

(iv) रेडियो पर सुना एक स्वास्थ्य जागरूकता संदेश:

संदेश: “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है”।

प्रभाव: इस संदेश ने मुझे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया। मैंने नियमित व्यायाम करने और संतुलित आहार लेने की आदत डालने का संकल्प लिया।

(v) इंटरनेट पर पढ़ा गया एक साइंस ब्लॉग:

संदेश: “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जीवन में क्रांति”।

प्रभाव: इस लेख ने मुझे नई तकनीकों के प्रति रुचि दिलाई। मुझे समझ आया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) कैसे हमारे जीवन को आसान बना सकती है और भविष्य में इसका क्या प्रभाव हो सकता है।

निष्कर्ष:

इन पाँच संदेशों ने मेरे विचारों और जीवनशैली को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया। मीडिया के माध्यम से हमें ज्ञान और प्रेरणा मिलती है, जो हमें बेहतर इंसान बनने और समाज में योगदान देने की सीख देती है।

8. निम्नलिखित पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों से जानकारी इकट्ठा करें और उन पर विवेचनात्मक चर्चा करें-

(a) वर्जित, व्रत और उत्सव संबंधी खाद्य पदार्थों सहित भोजन पद्धतियाँ।

उत्तर: भारत की विविधता उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और क्षेत्रीय परंपराओं में स्पष्ट रूप से झलकती है, जो भोजन पद्धतियों, वर्जित खाद्य पदार्थों, व्रत (उपवास) और उत्सवों के दौरान विशेष खाद्य तैयारियों में परिलक्षित होती है। आइए, भारत के विभिन्न क्षेत्रों की इन विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करें:

(i) वर्जित खाद्य पदार्थ (Taboos):

भारत में खाद्य वर्जनाएँ मुख्यतः धार्मिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय मान्यताओं पर आधारित होती हैं:

उत्तर भारत: कुछ समुदायों में प्याज और लहसुन का उपयोग भी वर्जित होता है, विशेषकर धार्मिक अवसरों पर। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में विशेष महीनों में मांसाहार वर्जित होता है।

दक्षिण भारत: कुछ ब्राह्मण समुदाय मांसाहार से परहेज करते हैं और केवल शाकाहारी भोजन का पालन करते हैं। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में विशेष महीनों में मांसाहार वर्जित होता है।

पूर्वोत्तर भारत: यहाँ के जनजातीय समुदायों में कुछ विशेष जानवरों का मांस वर्जित होता है, जो उनकी सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ा होता है।

(ii) व्रत संबंधी भोजन पद्धतियाँ:

व्रत या उपवास के दौरान भोजन पद्धतियाँ क्षेत्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भिन्न होती हैं:

उत्तर भारत: नवरात्रि के दौरान लोग अनाज, प्याज, लहसुन और सामान्य नमक का सेवन नहीं करते। इसके स्थान पर कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, सेंधा नमक और आलू का प्रयोग किया जाता है।

पश्चिम भारत: महाराष्ट्र में एकादशी व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी, राजगिरा रोटी और फलाहार का प्रचलन है।

दक्षिण भारत: एकादशी और अन्य व्रतों में चावल और दाल का सेवन नहीं किया जाता; इसके बजाय फल, दूध का उपयोग होता है।

(iii) उत्सव संबंधी विशेष खाद्य पदार्थ:

भारत के विभिन्न उत्सवों में विशेष खाद्य पदार्थों का निर्माण और सेवन किया जाता है, जो उस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं:

पोंगल (तमिलनाडु): यह फसल उत्सव है, जिसमें ‘पोंगल’ नामक मीठे चावल का विशेष महत्व है। 

मकर संक्रांति: उत्तर भारत में तिल और गुड़ से बने लड्डू, जबकि महाराष्ट्र में तिलगुल का वितरण होता है। 

लोहड़ी (पंजाब): गुड़, तिल, मूंगफली और मक्का से बने व्यंजन इस उत्सव का मुख्य आकर्षण हैं।

बिहू (असम): चावल से बने ‘पीठा’ और ‘लारू’ इस उत्सव के विशेष व्यंजन हैं।

ओणम (केरल): ‘सद्य’ नामक विशेष भोज, जिसमें चावल, सांभर, अवियल, और पायसम सहित विभिन्न प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं।

निष्कर्ष:

भारत की भोजन पद्धतियाँ उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और क्षेत्रीय विविधताओं का प्रतिबिंब हैं। वर्जित खाद्य पदार्थ, व्रत के दौरान विशेष आहार और उत्सवों में विशेष व्यंजन न केवल पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे समाज की मान्यताओं, परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को भी प्रदर्शित करते हैं। इन विविधताओं का सम्मान और संरक्षण हमारे समृद्ध सांस्कृतिक ताने-बाने को बनाए रखने में सहायक है।

(b) अनुष्ठानों, कर्मकाण्डों और व्यवसायों से संबंधित पहनावे।

उत्तर: भारत की सांस्कृतिक विविधता उसके अनुष्ठानों, कर्मकाण्डों और व्यवसायों से संबंधित पहनावे में स्पष्ट रूप से झलकती है। ये पहनावे न केवल धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं को प्रतिबिंबित करते हैं, बल्कि क्षेत्रीय परंपराओं और पेशेवर आवश्यकताओं को भी दर्शाते हैं।

आइए, इन तीनों पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करें:

(i) अनुष्ठानों और कर्मकाण्डों से संबंधित पहनावे:

भारत में अनुष्ठानों और धार्मिक कर्मकाण्डों के दौरान विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करने की परंपरा है, जो शुद्धता, श्रद्धा और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक होते हैं।

धार्मिक अनुष्ठान: हिंदू धर्म में पूजा, हवन या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के समय पुरुष प्रायः धोती और कुर्ता पहनते हैं, जबकि महिलाएँ साड़ी धारण करती हैं। इन वस्त्रों का रंग सफेद या हल्के रंग का होता है, जो पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

संस्कार: जन्म से मृत्यु तक के सोलह संस्कारों में विशेष वस्त्रों का प्रावधान है। उदाहरण के लिए, यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ) के दौरान ब्राह्मण लड़के सफेद वस्त्र पहनते हैं और कंधे पर यज्ञोपवीत धारण करते हैं।

विवाह समारोह: विवाह के अवसर पर दूल्हा पारंपरिक शेरवानी या धोती-कुर्ता पहनता है, जबकि दुल्हन लाल या हरे रंग की साड़ी या लहंगा चोली धारण करती है, जो शुभता और समृद्धि का प्रतीक है।

(ii) व्यवसायों से संबंधित पहनावे:

विभिन्न व्यवसायों में कार्य की प्रकृति और आवश्यकताओं के अनुसार विशेष प्रकार के वस्त्र धारण किए जाते हैं।

कृषक (किसान): ग्रामीण क्षेत्रों में किसान प्रायः धोती या लुंगी और कुर्ता पहनते हैं, जो आरामदायक होते हैं और खेतों में काम करने के लिए उपयुक्त होते हैं।

मछुआरे: तटीय क्षेत्रों में मछुआरे हल्के और जल्दी सूखने वाले कपड़े पहनते हैं, जैसे लुंगी और बनियान, जो समुद्र में काम करने के लिए सुविधाजनक होते हैं।

शिल्पकार: हस्तशिल्प से जुड़े कारीगर प्रायः ऐसे वस्त्र पहनते हैं जो उनके काम के दौरान आरामदायक हों और आसानी से गंदे न हों। उदाहरण के लिए, बुनकर सूती कपड़े पहनते हैं जो उन्हें धागों के साथ काम करने में सुविधा प्रदान करते हैं।

व्यापारी और व्यवसायी: शहरी क्षेत्रों में व्यापारी और व्यवसायी प्रायः औपचारिक वस्त्र, जैसे पैंट-शर्ट या सूट पहनते हैं, जो पेशेवर माहौल के अनुरूप होते हैं।

निष्कर्ष:

भारत की सांस्कृतिक और व्यावसायिक विविधता उसके पहनावे में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। अनुष्ठानों और कर्मकाण्डों के दौरान धारण किए जाने वाले वस्त्र धार्मिक आस्था और परंपराओं को दर्शाते हैं, जबकि विभिन्न व्यवसायों से संबंधित पहनावे कार्य की प्रकृति और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार विकसित हुए हैं। यह विविधता भारतीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और अनुकूलन क्षमता का प्रतीक है।

(c) प्रारंभिक वर्षों में बच्चे की देखभाल की पद्धतियाँ।

उत्तर: प्रारंभिक वर्षों में बच्चों की देखभाल उनके समग्र विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इस अवधि में उचित देखभाल और शिक्षा से बच्चों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास की नींव रखी जाती है।

निम्नलिखित प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है:

(i) स्वास्थ्य और पोषण:

संतुलित आहार: बच्चों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करने के लिए संतुलित आहार आवश्यक है, जिससे उनकी शारीरिक वृद्धि और मस्तिष्क विकास सुनिश्चित होता है।

टीकाकरण: बच्चों को विभिन्न बीमारियों से बचाने के लिए समय पर टीकाकरण आवश्यक है।

(ii) प्रारंभिक शिक्षा:

प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा (ECCE): यह बच्चों के सीखने की नींव रखती है, जिससे उनकी संज्ञानात्मक और सामाजिक क्षमताओं का विकास होता है।

आंगनवाड़ी और बालवाड़ी: सरकार द्वारा संचालित ये केंद्र बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा और पोषण प्रदान करते हैं, जिससे उनका समग्र विकास होता है। 

(iii) सामाजिक और भावनात्मक विकास:

सकारात्मक वातावरण: बच्चों के लिए प्रेमपूर्ण और सुरक्षित वातावरण उनकी भावनात्मक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

सामाजिक संपर्क: अन्य बच्चों और वयस्कों के साथ बातचीत से बच्चों में सामाजिक कौशल विकसित होते हैं।

(iv) सुरक्षा और स्वच्छता:

सुरक्षित वातावरण: बच्चों को दुर्घटनाओं से बचाने के लिए घर और विद्यालय में सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।

स्वच्छता: स्वच्छता की आदतें, जैसे हाथ धोना, बच्चों को सिखाना आवश्यक है, जिससे वे बीमारियों से बच सकें।

(v) खेल और शारीरिक गतिविधियाँ:

खेलकूद: शारीरिक गतिविधियाँ बच्चों की मांसपेशियों के विकास और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं।

रचनात्मक खेल: ये बच्चों की कल्पनाशक्ति और समस्या समाधान कौशल को बढ़ावा देते हैं।

इन सभी पहलुओं पर ध्यान देकर हम बच्चों के प्रारंभिक वर्षों में उनकी देखभाल को सुनिश्चित कर सकते हैं, जिससे उनका समग्र और स्वस्थ विकास संभव हो सके।

(d) उत्सव संबंधी और विशेष अवसरों पर संप्रेषण के पारंपरिक रूप।

उत्तर: भारत की सांस्कृतिक विविधता उसके उत्सवों और विशेष अवसरों पर अपनाए जाने वाले पारंपरिक संप्रेषण रूपों में स्पष्ट रूप से झलकती है। ये संप्रेषण रूप न केवल लोगों के बीच भावनाओं और संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं को भी सजीव रखते हैं।

निम्नलिखित प्रमुख पारंपरिक संप्रेषण रूपों पर प्रकाश डाला गया है:

(i) मौखिक परंपराएँ:

लोकगीत और भजन: उत्सवों के दौरान विशेष लोकगीत और भजनों का गायन किया जाता है, जो धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को व्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए, होली पर फाग गीत और जन्माष्टमी पर कृष्ण भजन गाए जाते हैं।

कहानियाँ और लोककथाएँ: विशेष अवसरों पर बुजुर्ग लोग बच्चों और युवाओं को पौराणिक कथाएँ और लोककथाएँ सुनाते हैं, जिससे सांस्कृतिक मूल्यों का संप्रेषण होता है।

(ii) दृश्य और प्रदर्शन कलाएँ:

नृत्य नाटिकाएँ: उत्सवों पर कथकली, भरतनाट्यम, कथक जैसे शास्त्रीय नृत्य और रामलीला, रासलीला जैसी नाटिकाएँ प्रस्तुत की जाती हैं, जो धार्मिक कथाओं और मान्यताओं को जीवंत करती हैं।

रंगोली और अल्पना: त्योहारों के अवसर पर घरों के आंगन में रंगोली (दक्षिण भारत) और अल्पना (पश्चिम बंगाल) बनाई जाती है, जो सौंदर्य और शुभता का प्रतीक हैं।

(iii) हस्तशिल्प और कला:

पारंपरिक सजावट: उत्सवों के दौरान घरों और सार्वजनिक स्थलों को बंदनवार, तोरण, फूलों की मालाओं और दीपों से सजाया जाता है, जो स्वागत और आनंद का प्रतीक हैं।

हस्तनिर्मित उपहार: विशेष अवसरों पर हस्तनिर्मित वस्त्र, आभूषण और सजावट सामग्री उपहार में दी जाती हैं, जो सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करती हैं।

(iv) सामुदायिक आयोजन:

मेलों और जुलूसों का आयोजन: उत्सवों के दौरान मेलों और जुलूसों का आयोजन किया जाता है, जहाँ लोग एकत्रित होकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं और सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।

पारंपरिक खेल और प्रतियोगिताएँ: विशेष अवसरों पर कबड्डी, कुश्ती, पतंगबाजी जैसे पारंपरिक खेलों का आयोजन किया जाता है, जो सामुदायिक भावना को बढ़ावा देते हैं।

(v) धार्मिक अनुष्ठान और प्रथाएँ:

पूजा और आरती: उत्सवों पर सामूहिक पूजा और आरती का आयोजन होता है, जहाँ भक्ति गीतों और मंत्रों के माध्यम से आध्यात्मिक संप्रेषण होता है।

प्रसाद वितरण: धार्मिक आयोजनों में प्रसाद का वितरण किया जाता है, जो समुदाय में समानता और भाईचारे का संदेश देता है।

इन पारंपरिक संप्रेषण रूपों के माध्यम से भारत में उत्सवों और विशेष अवसरों पर न केवल सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण होता है, बल्कि समाज में एकता, प्रेम और सामूहिकता की भावना भी प्रबल होती है।

9. निम्नलिखित के साथ सहमति और असहमति के 4-5 क्षेत्रों की सूची बनाएँ और उस पर चर्चा करें-

(a) माँ।

(b) पिता।

(c) बहन-भाई।

(d) मित्र।

(e) शिक्षक।

आप सामंजस्य और पारस्परिक स्वीकृति की स्थिति में पहुँचने के लिए असहमतियों को किस प्रकार सुलझाएँगे?

उत्तर: जीवन में हमारे सबसे करीबी संबंधों में सहमति और असहमति स्वाभाविक होती है। ये मतभेद हमारे दृष्टिकोण, अनुभवों और व्यक्तिगत मूल्यों के कारण उत्पन्न होते हैं। नीचे प्रत्येक संबंध में संभावित सहमति और असहमति के कुछ क्षेत्र दिए गए हैं, साथ ही असहमतियों को हल करने के तरीके भी बताए गए हैं।

(a) माँ।

सहमति के क्षेत्र:

(i) माता-पिता का सम्मान और आदर करना।

(ii) स्वास्थ्य और खानपान का ध्यान रखना।

(iii) पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं का पालन करना।

(iv) जीवन में अनुशासन और संस्कारों का महत्व।

असहमति के क्षेत्र:

(i) करियर के चुनाव (माँ पारंपरिक करियर चाह सकती हैं, जबकि बच्चे आधुनिक विकल्प चुन सकते हैं)।

(ii) कपड़े पहनने की शैली और फैशन।

(iii) दोस्तों के चुनाव को लेकर विचार अलग हो सकते हैं।

(iv) जीवनशैली से जुड़ी चीज़ें, जैसे सोने-उठने का समय, खानपान की आदतें आदि।

(b) पिता।

सहमति के क्षेत्र:

(i) जीवन में शिक्षा और अनुशासन का महत्व।

(ii) आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की योजनाएँ बनाना।

(iii) माता-पिता और परिवार की देखभाल करना।

(iv) नैतिक मूल्यों और ईमानदारी को अपनाना।

असहमति के क्षेत्र:

(i) करियर से जुड़े निर्णय (पिता अधिक व्यावहारिक सोच सकते हैं, जबकि बच्चे अपने जुनून को प्राथमिकता देना चाह सकते हैं)।

(ii) स्वतंत्रता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता पर मतभेद।

(iii) आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया का उपयोग।

(iv) दोस्तों और घूमने-फिरने को लेकर राय अलग हो सकती है।

(c) बहन-भाई।

सहमति के क्षेत्र:

(i) पारिवारिक एकता बनाए रखना।

(ii) माता-पिता की देखभाल करना।

(iii) एक-दूसरे की जरूरत के समय मदद करना।

(iv) साझा यादें और अनुभवों का आनंद लेना।

असहमति के क्षेत्र:

(i) घर के कामों में जिम्मेदारियों का विभाजन।

(ii) माता-पिता के प्रति कर्तव्यों को निभाने की प्राथमिकताएँ।

(iii) व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का सम्मान।

(iv) छोटे मुद्दे, जैसे टीवी पर कौन-सा चैनल देखना या किसी वस्तु का साझा उपयोग।

(d) मित्र।

सहमति के क्षेत्र:

(i) एक-दूसरे की मदद करना और समर्थन देना।

(ii) विश्वास और ईमानदारी का महत्व।

(iii) एक-दूसरे के साथ समय बिताना और अनुभव साझा करना।

(iv) आम रुचियाँ और पसंद-नापसंद।

असहमति के क्षेत्र:

(i) विचारधाराओं और जीवनशैली में अंतर।

(ii) किसी विशेष निर्णय पर अलग-अलग राय होना।

(iii) दोस्तों के साथ समय बिताने को लेकर प्राथमिकताएँ।

(iv) कभी-कभी ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा का आना।

(e) शिक्षक।

सहमति के क्षेत्र:

(i) शिक्षा और ज्ञान का महत्व।

(ii) अनुशासन और मेहनत का मूल्य।

(iii) परीक्षा और आकलन का महत्व।

(iv) नैतिकता और सदाचार का पालन करना।

असहमति के क्षेत्र:

(i) शिक्षा की पद्धति और पढ़ाने के तरीके पर अलग-अलग विचार।

(ii) अनुशासन के नियमों की कठोरता या लचीलापन।

(iii) परीक्षा के अंकों के महत्व को लेकर मतभेद।

(iv) कुछ व्यक्तिगत निर्णयों में शिक्षकों की राय से असहमति।

असहमतियों को सुलझाने के तरीके:

(i) खुला संवाद करें: बिना गुस्से के अपनी भावनाएँ और तर्क स्पष्ट रूप से रखें।

(ii) दूसरों के दृष्टिकोण को समझें: सामने वाले की बात को ध्यान से सुनें और उसके नजरिए को समझने की कोशिश करें।

(iii) समझौता करने की प्रवृत्ति रखें: जहाँ संभव हो, दोनों पक्षों के विचारों का संतुलन बनाएँ।

(iv) सम्मान बनाए रखें: असहमति के बावजूद एक-दूसरे की भावनाओं और विचारों का सम्मान करें।

(v) धैर्य रखें: कुछ मुद्दे समय के साथ सुलझ सकते हैं, इसलिए जल्दबाजी में निर्णय न लें।

निष्कर्ष:

सहमति और असहमति जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन सही संचार, सहानुभूति और समझदारी से हम अपने रिश्तों को मजबूत बना सकते हैं। पारस्परिक स्वीकृति और सहयोग से हम सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रख सकते हैं।

10. पड़ोस के क्षेत्र की किसी पारंपरिक कला/शिल्प का प्रलेखन।

उत्तर: गुवाहाटी, असम की सांस्कृतिक राजधानी, अपनी समृद्ध हस्तशिल्प परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की पारंपरिक कलाएँ असम की सांस्कृतिक धरोहर को प्रतिबिंबित करती हैं।

निम्नलिखित प्रमुख शिल्पों पर प्रकाश डाला गया है:

(i) असमिया जापी (Jaapi):

जापी असम की पारंपरिक बांस की टोपी है, जो धान के खेतों में काम करने वाले किसानों द्वारा धूप से बचाव के लिए पहनी जाती है। यह टोपी बांस और पाम की पत्तियों से बनाई जाती है और अक्सर रंगीन कपड़ों और कढ़ाई से सजाई जाती है। जापी असम की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है और इसे राज्य के विभिन्न उत्सवों और समारोहों में भी उपयोग किया जाता है। हाल ही में, असमिया जापी को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है, जो इसकी विशिष्टता और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देता है। 

(ii) बिहू ढोल (Bihu Dhol):

बिहू ढोल असम के सबसे प्रमुख वाद्ययंत्रों में से एक है, जिसका उपयोग विशेष रूप से बिहू नृत्य और संगीत में किया जाता है। यह ढोल लकड़ी के बेलनाकार ढांचे पर चमड़े की परत चढ़ाकर बनाया जाता है। बिहू ढोल की ध्वनि और ताल असमिया संस्कृति में उल्लास और उत्सव का प्रतीक है। इसकी विशिष्टता के कारण इसे भी GI टैग प्राप्त हुआ है। 

(iii) सार्थेबारी धातु शिल्प (Sarthebari Metal Craft):

सार्थेबारी, गुवाहाटी के निकट स्थित एक कस्बा, अपने पीतल और कांस्य शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के कारीगर पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करके सुंदर बर्तन, मूर्तियाँ और सजावटी वस्तुएँ बनाते हैं। सार्थेबारी धातु शिल्प की उत्कृष्टता और विशिष्टता को मान्यता देते हुए इसे भी GI टैग प्रदान किया गया है। 

(iv) बेंत और बांस शिल्प (Cane and Bamboo Craft):

असम में बेंत और बांस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, और गुवाहाटी के कारीगर इनका उपयोग करके विभिन्न हस्तशिल्प वस्तुएँ बनाते हैं। इनमें टोकरियाँ, फर्नीचर, चटाई, और सजावटी सामान शामिल हैं। इन शिल्पों की विशेषता उनकी टिकाऊपन और सुंदरता में निहित है। 

(v) असमिया वस्त्र शिल्प (Assamese Textile Craft):

गुवाहाटी की हथकरघा परंपरा में मुगा, एरी और पाट रेशम से बने वस्त्र विशेष स्थान रखते हैं। यहाँ की महिलाएँ पारंपरिक मेखला चादर और अन्य वस्त्रों की बुनाई में निपुण हैं, जो असमिया संस्कृति की सुंदरता को प्रदर्शित करते हैं। 

इन पारंपरिक शिल्पों के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का आनंद ले सकें।

11. बच्चों के किसी कार्यक्रम/संस्थान (सरकारी/गैर-सरकारी) पर जाना; कार्यक्रम में गतिविधियों को देखना तथा रिपोर्ट लिखना।

उत्तर: गुवाहाटी में बच्चों के विकास और शिक्षा के लिए कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान सक्रिय हैं। इनमें से एक प्रमुख संस्थान है आंचलिक विज्ञान केंद्र, गुवाहाटी (Regional Science Centre, Guwahati), जो बच्चों और युवाओं में विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न कार्यक्रम और गतिविधियाँ आयोजित करता है।

अथवा

पड़ोस के किन्हीं दो भिन्न-भिन्न आयु के बच्चों का अवलोकन और उनकी गतिविधियों तथा व्यवहार की रिपोर्ट बनाना।

उत्तर: अवलोकन रिपोर्ट: दो अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों की गतिविधियाँ और व्यवहार।

परिचय

मैंने अपने पड़ोस के दो बच्चों का अवलोकन किया, जिनकी उम्र और गतिविधियाँ एक-दूसरे से भिन्न हैं। पहला बच्चा आरव (5 वर्ष) है, जो नर्सरी में पढ़ता है, और दूसरा बच्चा स्नेहा (12 वर्ष) है, जो कक्षा 7 की छात्रा है। दोनों की दैनिक गतिविधियों, खेल और सामाजिक व्यवहार का अवलोकन किया गया।

(i) आरव (5 वर्ष) – एक जिज्ञासु और चंचल बालक।

गतिविधियाँ:

आरव अधिकतर समय खेल-कूद में व्यस्त रहता है। वह खिलौनों से खेलता है, दौड़ता है और कभी-कभी दीवारों पर चित्र भी बनाता है।

उसे कहानी सुनना बहुत पसंद है, खासकर वे कहानियाँ जिनमें जानवरों और परी-कथाओं का जिक्र हो।

जब बाहर खेलने जाता है, तो वह झूले और फिसलपट्टी पर अधिक समय बिताता है।

खाने-पीने में थोड़ा चूज़ी (पसंदीदा चीजें ही खाने की आदत) है।

व्यवहार:

बहुत ही चंचल और उत्साही स्वभाव का है। छोटी-छोटी चीजों में बहुत रुचि लेता है और बार-बार सवाल पूछता है।

दोस्तों के साथ खेलते समय कभी-कभी झगड़ भी लेता है, लेकिन जल्दी ही मान जाता है।

बड़ों की बातों को ध्यान से सुनता है, लेकिन कई बार जिद्दी हो जाता है।

उसकी भाषा में मासूमियत झलकती है, और वह बोलते समय हाव-भाव का भी खूब इस्तेमाल करता है।

(ii) स्नेहा (12 वर्ष) – एक समझदार और आत्मनिर्भर किशोरी है।

गतिविधियाँ:

स्नेहा पढ़ाई में अच्छी है और स्कूल से आने के बाद कुछ समय होमवर्क में लगाती है।

उसे किताबें पढ़ने और संगीत सुनने का बहुत शौक है।

शाम को वह अपने दोस्तों के साथ बैडमिंटन खेलती है।

मोबाइल और सोशल मीडिया में उसकी रुचि बढ़ रही है, लेकिन माता-पिता ने इसके उपयोग को सीमित कर रखा है।

व्यवहार:

वह अधिक आत्मनिर्भर हो रही है और चीजों को तर्कसंगत तरीके से समझने की कोशिश करती है।

छोटे बच्चों के साथ खेलने या उनकी मदद करने में रुचि लेती है, खासकर अपने छोटे भाई के साथ समय बिताती है।

माता-पिता और शिक्षकों की बातों को गंभीरता से सुनती है और समझदारी से जवाब देती है।

कभी-कभी मूड स्विंग (मनोभावों का अचानक और तेज़ी से बदलना) होता है, खासकर जब उसे कोई चीज़ पसंद नहीं आती या पढ़ाई का दबाव बढ़ जाता है।

निष्कर्ष और तुलना:

आरव अभी जिज्ञासु और ऊर्जावान उम्र में है, जहाँ वह नई चीजें सीखने और हर चीज को छूने-समझने की कोशिश करता है।

स्नेहा, किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकी है, इसलिए वह अधिक आत्मनिर्भर और गंभीर हो रही है।

जहाँ आरव खेल-कूद में अधिक रुचि रखता है, वहीं स्नेहा का ध्यान पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों पर ज्यादा है।

दोनों की सीखने और सामाजिक होने की शैली अलग-अलग है – आरव अधिक बोलने वाला और चंचल है, जबकि स्नेहा अधिक शांत और सोच-समझकर बोलने वाली है।

यह अवलोकन दिखाता है कि उम्र के अनुसार बच्चों के व्यवहार, गतिविधियाँ और सोचने के तरीके में कितना बदलाव आता है।

12. जीवन की गुणवत्ता (क्युओएल) और मानव विकास (एच. डी. आई.) का निर्माण करना।

उत्तर: जीवन की गुणवत्ता (QoL) और मानव विकास सूचकांक (HDI) का निर्माण।

(a) जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life-QoL)।

व्यक्ति और समाज के जीवन स्तर को प्रभावित करने वाले आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय कारकों का समग्र माप।

मुख्य घटक:

आर्थिक स्थिति – रोजगार, आय स्तर, गरीबी दर।

स्वास्थ्य – चिकित्सा सुविधाएँ, जीवन प्रत्याशा, पोषण।

शिक्षा – साक्षरता दर, शिक्षा तक पहुँच।

पर्यावरण – स्वच्छ जल, स्वच्छता, प्रदूषण स्तर।

सामाजिक कारक – लैंगिक समानता, सामाजिक सुरक्षा, जीवन संतोष।

(b) मानव विकास सूचकांक (Human Development Index-HDI)।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा विकसित सूचकांक, जो किसी देश में स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक विकास को मापता है।

HDI के घटक:

(i) स्वास्थ्य – जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy)।

(ii) शिक्षा – औसत और अपेक्षित स्कूली शिक्षा वर्ष।

(iii) आय – प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI per Capita)।

HDI वर्गीकरण:

0.800 – 1.000 → उच्च मानव विकास।

0.700 – 0.799 → उच्च मध्यम विकास।

0.550 – 0.699 → निम्न मध्यम विकास।

0.000 – 0.549 → निम्न मानव विकास।

(c) QoL और HDI के निर्माण में HEFS पाठ्यक्रम की भूमिका।

व्यक्ति, परिवार और समाज के बीच संतुलन बनाने में सहायक।

स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ता है।

लैंगिक समानता, सामाजिक समावेशन और संवेदनशीलता को बढ़ावा देता है।

जीवन कौशल और व्यावसायिक दक्षता विकसित कर उत्पादक नागरिक बनने में मदद करता है।

निष्कर्ष:

QoL और HDI व्यक्ति और समाज के समग्र विकास को दर्शाते हैं। HEFS पाठ्यक्रम इन पहलुओं को समझने और सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे विद्यार्थी समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें

13. रेशों के गुणों का उसके उपयोग से संबंध।

(a) ऊष्मीय गुण और ज्वलनशीलता।

उत्तर: रेशों के गुणों का उनके उपयोग से संबंध।

रेशों के ऊष्मीय गुण (Thermal Properties) और ज्वलनशीलता (Flammability) उनके उपयोग को प्रभावित करते हैं। विभिन्न प्रकार के रेशे अलग-अलग तापमान सहन कर सकते हैं और ज्वलनशीलता के अनुसार अलग-अलग उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं।

(i) प्राकृतिक रेशे (Natural Fibers):

कपास (Cotton):

ऊष्मीय गुण: गर्मी को अवशोषित करता है और त्वचा को ठंडा रखता है।

ज्वलनशीलता: जल्दी जलता है और राख छोड़ता है।

उपयोग: गर्मी में पहनने वाले कपड़े, बेडशीट, पर्दे।

ऊन (Wool):

ऊष्मीय गुण: उत्कृष्ट ऊष्मा-संरक्षक, ठंड में गर्म रखता है।

ज्वलनशीलता: जल्दी नहीं जलता, केवल सुलगता है।

उपयोग: सर्दियों के कपड़े, कंबल, गर्म वस्त्र।

रेशम (Silk):

ऊष्मीय गुण: हल्का ऊष्मा-संरक्षक, शरीर के तापमान के अनुसार समायोजित होता है।

ज्वलनशीलता: जल्दी जलता है, लेकिन खुद ही बुझ सकता है।

उपयोग: पारंपरिक परिधान, परिष्कृत वस्त्र, सजावटी कपड़े।

(ii) कृत्रिम रेशे (Synthetic Fibers):

नायलॉन (Nylon):

ऊष्मीय गुण: उच्च तापमान सहन नहीं कर सकता, पिघल जाता है।

ज्वलनशीलता: जलने पर पिघलकर त्वचा से चिपक सकता है।

उपयोग: खेल और वर्षा के कपड़े, बैग, रस्सियाँ।

पॉलिएस्टर (Polyester):

ऊष्मीय गुण: ऊष्मा-प्रतिरोधी, जल्दी सिकुड़ता नहीं।

ज्वलनशीलता: धीरे जलता है, लेकिन पिघल सकता है।

उपयोग: औद्योगिक वस्त्र, परिधान, होम फर्निशिंग।

ऐक्रिलिक (Acrylic):

ऊष्मीय गुण: ऊन के समान, लेकिन हल्का।

ज्वलनशीलता: जल्दी जलता है और पिघलता है।

उपयोग: स्वेटर, शॉल, कालीन।

निष्कर्ष:

रेशों का उपयोग उनके ऊष्मीय गुणों और ज्वलनशीलता के अनुसार किया जाता है। प्राकृतिक रेशे आमतौर पर सांस लेने योग्य और आरामदायक होते हैं, जबकि कृत्रिम रेशे टिकाऊ लेकिन आग के प्रति संवेदनशील होते हैं। सुरक्षा मानकों के अनुसार विभिन्न उद्योगों में इनका उपयोग किया जाता है, जैसे कि अग्निरोधी वस्त्र, दैनिक परिधान, और औद्योगिक सामग्री।

(b) नमी का अवशोषित करने की क्षमता और आराम।

उत्तर: नमी अवशोषण क्षमता और आराम का संबंध।

रेशों की नमी अवशोषित करने की क्षमता (Moisture Absorption) उनके आराम (Comfort) को प्रभावित करती है। जो रेशे अधिक नमी अवशोषित करते हैं, वे त्वचा पर अधिक आरामदायक होते हैं, जबकि कम नमी अवशोषित करने वाले रेशे पसीना नहीं सोखते और असुविधा उत्पन्न कर सकते हैं।

(i) प्राकृतिक रेशे (Natural Fibers):

कपास (Cotton):

नमी अवशोषण: उच्च (8-12%)।

आराम: त्वचा पर ठंडा और आरामदायक, गर्मियों के लिए उपयुक्त।

उपयोग: गर्मी के कपड़े, टॉवल, बेडशीट।

ऊन (Wool):

नमी अवशोषण: बहुत अधिक (30-35%)।

आराम: गर्म और नरम, ठंडे मौसम में शरीर को सूखा रखता है।

उपयोग: सर्दियों के कपड़े, स्वेटर, कंबल।

रेशम (Silk):

नमी अवशोषण: मध्यम (10-11%)।

आराम: हल्का और मुलायम, सभी मौसमों में आरामदायक।

उपयोग: परिष्कृत परिधान, इनरवियर।

(ii) कृत्रिम रेशे (Synthetic Fibers):

नायलॉन (Nylon):

नमी अवशोषण: बहुत कम (4-5%)।

आराम: चिपचिपा महसूस होता है, गर्मियों में असुविधाजनक।

उपयोग: खेल और वर्षा के कपड़े, बैग।

पॉलिएस्टर (Polyester):

नमी अवशोषण: बहुत कम (0.4-0.8%)।

आराम: पसीना सोखता नहीं, गर्म और आर्द्र मौसम में असुविधाजनक।

उपयोग: औद्योगिक वस्त्र, स्पोर्ट्सवियर।

ऐक्रिलिक (Acrylic):

नमी अवशोषण: बहुत कम (1-2%)।

आराम: हल्का लेकिन कम सांस लेने योग्य, सर्दियों के लिए उपयुक्त।

उपयोग: स्वेटर, शॉल, कंबल।

निष्कर्ष:

अधिक नमी अवशोषित करने वाले रेशे (जैसे कपास और ऊन) अधिक आरामदायक होते हैं, जबकि कम नमी सोखने वाले कृत्रिम रेशे गर्मी में असुविधाजनक हो सकते हैं। आरामदायक वस्त्रों के चयन में नमी अवशोषण एक महत्वपूर्ण कारक होता है, खासकर गर्मी और सर्दी के मौसम में।

14. निम्नलिखित के संदर्भ में 35 से 60 वर्ष की आयु रेंज के एक व्यस्क महिला और एक व्यस्क पुरूष का अध्ययन करें-

(a) स्वास्थ्य तथा बीमारी।

(b) शारीरिक गतिविधि और समय प्रबंधन।

(c) आहार संबंधी व्यवहार।

(d) चुनौतियों का सामना करना।

(e) मीडिया की उपलब्धता और पसंद।

उत्तर: 35 से 60 वर्ष की आयु रेंज के एक वयस्क महिला और एक वयस्क पुरुष का अध्ययन

(a) स्वास्थ्य तथा बीमारी।

महिला:

हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस), थायरॉयड, मेनोपॉज से संबंधित समस्याएँ।

उच्च रक्तचाप और मधुमेह का खतरा।

स्वास्थ्य पर अधिक जागरूक, नियमित जांच करवाने की प्रवृत्ति।

पुरुष:

हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, और कोलेस्ट्रॉल की समस्या आम।

तनाव और कार्यभार के कारण मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव।

चिकित्सकीय परामर्श में देरी करने की प्रवृत्ति।

(b) शारीरिक गतिविधि और समय प्रबंधन।

महिला:

योग, वॉकिंग और हल्की कसरत को प्राथमिकता।

घरेलू कार्यों और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास।

स्वयं के लिए समय निकालने में कठिनाई।

पुरुष:

जिम, रनिंग या व्यायाम में रुचि लेकिन कार्य व्यस्तता के कारण निरंतरता की कमी।

कार्य प्राथमिकता में होने के कारण शारीरिक गतिविधि को अक्सर नजर अंदाज करना।

(c) आहार संबंधी व्यवहार।

महिला:

संतुलित आहार, कैल्शियम और प्रोटीन युक्त भोजन पर अधिक ध्यान।

घर का बना खाना पसंद, तैलीय और मीठे भोजन से बचने की प्रवृत्ति।

वजन और स्वास्थ्य पर अधिक जागरूकता।

पुरुष:

बाहर का खाना अधिक पसंद, व्यस्तता के कारण अनियमित भोजन।

मीठा, तला-भुना और मसालेदार भोजन की अधिकता।

स्वास्थ्य बिगड़ने पर ही आहार में बदलाव।

(d) चुनौतियों का सामना करना।

महिला:

पारिवारिक जिम्मेदारियों, कार्य और सामाजिक दबावों को संतुलित करना चुनौतीपूर्ण।

मानसिक तनाव से निपटने के लिए भावनात्मक समर्थन की तलाश।

आत्मनिर्भर बनने की कोशिश, नई चीजें सीखने की रुचि।

पुरुष:

करियर, वित्तीय दबाव और परिवार की अपेक्षाओं से तनाव।

चुनौतियों को अकेले सुलझाने की प्रवृत्ति, कम भावनात्मक अभिव्यक्ति।

आत्मनिर्भरता और समाधान-केन्द्रित दृष्टिकोण।

(e) मीडिया की उपलब्धता और पसंद।

महिला:

समाचार, हेल्थ और फैशन ब्लॉग, सामाजिक मीडिया (WhatsApp, Facebook, YouTube) में रुचि।

मनोरंजन के लिए टीवी सीरियल, स्वास्थ्य और फिटनेस संबंधी सामग्री देखना।

पुरुष:

समाचार, खेल, टेक्नोलॉजी और व्यापार से जुड़ी जानकारी में रुचि।

सोशल मीडिया (Twitter, YouTube, LinkedIn) का उपयोग।

डिजिटल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अधिक समय बिताना।

निष्कर्ष:

महिला और पुरुष दोनों इस आयु में स्वास्थ्य, आहार और जीवनशैली को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। महिलाएँ स्वास्थ्य और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने में अधिक सतर्क होती हैं, जबकि पुरुष करियर और आर्थिक पहलुओं पर अधिक ध्यान देते हैं। चुनौतियों से निपटने के तरीके और मीडिया उपयोग भी अलग-अलग होते हैं।

15. पोषक तत्वों के समृद्ध स्त्रोतों की पहचान के लिए खाद्य पदार्थों के पोषण मान की गणना कीजिए।

उत्तर: खाद्य पदार्थों के पोषण मान की गणना के लिए हमें विभिन्न पोषक तत्वों (जैसे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज) की मात्रा की गणना करनी होती है।

पोषक तत्व और उनका महत्व:

पोषक तत्व शरीर के विकास, ऊर्जा और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होते हैं। इनमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज प्रमुख हैं। कार्बोहाइड्रेट (जैसे चावल, गेहूँ, फल) ऊर्जा प्रदान करते हैं, जबकि प्रोटीन (दूध, दालें, अंडे) मांसपेशियों और ऊतकों की मरम्मत में मदद करता है। वसा (नट्स, घी, जैतून का तेल) शरीर के तापमान और हार्मोन संतुलन में सहायक होता है।

विटामिन (A, B, C, D आदि) शरीर की कार्यप्रणाली को सुचारू रखते हैं, जैसे विटामिन C रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और विटामिन D हड्डियों को मजबूत करता है। खनिज (कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम) हड्डियों, रक्त और मांसपेशियों को स्वस्थ बनाए रखते हैं। संतुलित आहार इन सभी पोषक तत्वों की सही मात्रा सुनिश्चित करता है, जिससे शरीर मजबूत और रोगमुक्त बना रहता है।

16. किसी किशोर के लिए उपयुक्त विभिन्न स्वास्थ्यवर्धक स्नैक्स तैयार करना।

उत्तर: किशोरों के लिए स्वास्थ्यवर्धक स्नैक्स पोषण से भरपूर, हल्के और ऊर्जा देने वाले होने चाहिए। 

यहाँ कुछ आसान और पौष्टिक स्नैक्स दिए गए हैं, जो घर पर बनाए जा सकते हैं:

(i) फलों और दही की स्मूदी:

सामग्री: दही, केला, स्ट्रॉबेरी, शहद, चिया सीड्स।

विधि: सभी सामग्रियों को ब्लेंड करें और ठंडा परोसें।

2. मूंग दाल चीला:

सामग्री: भीगी मूंग दाल, हरी मिर्च, धनिया, अदरक।

विधि: पीसकर घोल बनाएं, तवे पर सेंकें और दही या चटनी के साथ खाएँ।

3. मखाना चिवड़ा:

सामग्री: भुने मखाने, मूंगफली, बादाम, करी पत्ता, हल्का नमक।

विधि: हल्का भूनकर स्नैक के रूप में खाएँ।

4. स्प्राउट्स चाट:

सामग्री: अंकुरित मूंग, टमाटर, खीरा, नींबू, काला नमक।

विधि: सबको मिलाकर स्वादानुसार मसाले डालें।

5. ओट्स और गुड़ लड्डू:

सामग्री: ओट्स, गुड़, घी, बादाम, तिल।

विधि: भुने हुए ओट्स में पिघला गुड़ मिलाकर लड्डू बना लें।

ये स्नैक्स पोषण से भरपूर हैं और किशोरों के ऊर्जा स्तर को बनाए रखते हैं, जिससे वे स्वस्थ और एक्टिव रहते हैं।

17. निम्नलिखित पर लगे लेबलों का अध्ययन करना –

(a) खाद्य पदार्थ।

(b) औषध और प्रसाधन सामग्री।

(c) वस्त्र और परिधान।

(d) उपभोक्ता के लिए टिकाऊ।

उत्तर: उत्पादों पर लगे लेबलों का अध्ययन।

लेबल उपभोक्ता को उत्पाद की गुणवत्ता, सुरक्षा और उपयोग की जानकारी देते हैं।

(a) खाद्य पदार्थ:

सामग्री सूची, पोषण तथ्य, उत्पादन और समाप्ति तिथि।

एफएसएसएआई प्रमाणन, शाकाहारी/मांसाहारी संकेत।

(b) औषध और प्रसाधन सामग्री:

सक्रिय घटक, उपयोग विधि, दुष्प्रभाव और सावधानियाँ।

निर्माण और समाप्ति तिथि, लाइसेंस नंबर।

(c) वस्त्र और परिधान:

कपड़े की सामग्री, धोने के निर्देश, आकार और ब्रांड।

गुणवत्ता प्रमाणन और मूल्य।

(d) टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद:

मॉडल नंबर, ऊर्जा खपत (BEE स्टार रेटिंग), वारंटी।

सुरक्षा निर्देश और निर्माता जानकारी।

निष्कर्ष:

सही लेबल पढ़कर उपभोक्ता बेहतर और सुरक्षित खरीदारी कर सकते हैं।

18. विभिन्न स्थानों/परिस्थितियों में समूह गतिशीलताओं को देखना और रिकॉर्ड करना। उदाहरण के रूप में कुछ स्थान/परिस्थितियाँ हैं-

(a) घर।

(b) खान-पान के स्थान।

(c) खेल का मैदान।

(d) विद्यालय।

(e) मनोरंजन के क्षेत्र।

उत्तर: समूह गतिशीलताओं का अवलोकन और रिकॉर्डिंग।

समूह गतिशीलता (Group Dynamics) का अर्थ है, किसी समूह के भीतर व्यक्तियों के बीच बातचीत, भूमिकाएँ और व्यवहार। 

विभिन्न स्थानों पर समूह कैसे कार्य करते हैं, इसका अवलोकन किया गया:

(a) घर:

परिवार के सदस्यों में भावनात्मक जुड़ाव और सहयोग।

माता-पिता मार्गदर्शन देते हैं, जबकि बच्चे सीखते हैं।

घरेलू कार्यों में भूमिका विभाजन।

(b) खान-पान के स्थान (रेस्टोरेंट/कैफे):

दोस्तों और परिवार के बीच चर्चा और साझा अनुभव।

ग्राहक और वेटर के बीच औपचारिक बातचीत।

सामूहिक रूप से भोजन का आनंद लेना।

(c) खेल का मैदान:

टीम वर्क और प्रतिस्पर्धा का प्रदर्शन।

नेतृत्व की भूमिका (कप्तान), रणनीति और सहयोग।

खेल भावना और नियमों का पालन।

(d) विद्यालय:

शिक्षक-छात्रों के बीच संवाद और अनुशासन।

समूह गतिविधियाँ और सहपाठियों के बीच सहयोग।

नेतृत्व, प्रतियोगिता और दोस्ती।

(e) मनोरंजन के क्षेत्र (सिनेमा, पार्क, मॉल):

दोस्तों और परिवार के साथ आनंददायक समय बिताना।

सामूहिक गतिविधियाँ (जैसे मूवी देखना, खेल खेलना)।

भीड़ प्रबंधन और सामाजिक शिष्टाचार।

निष्कर्ष:

हर स्थान पर समूह गतिशीलता अलग होती है। खेल मैदान और विद्यालय में अनुशासन और टीम वर्क महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि घर और मनोरंजन स्थलों पर भावनात्मक जुड़ाव अधिक होता है। सही समूह सहभागिता व्यक्ति के विकास में मदद करती है।

19. अपनी संप्रेषण शैलियों और कौशलों का विश्लेषण करें।

उत्तर: संप्रेषण शैलियों और कौशलों का विश्लेषण:

संप्रेषण (Communication) एक महत्वपूर्ण कौशल है जो व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता को प्रभावित करता है। यह मुख्य रूप से मौखिक, गैर-मौखिक और लिखित शैलियों में विभाजित किया जाता है।

(i) मौखिक संप्रेषण (Verbal Communication):

बातचीत, बहस, प्रस्तुति और सार्वजनिक भाषण में उपयोग।

स्पष्ट, आत्मविश्वासी और प्रभावशाली बोलने की क्षमता आवश्यक।

सुधार की जरूरत: शब्द चयन और धैर्यपूर्वक सुनने की आदत विकसित करना।

(ii) गैर-मौखिक संप्रेषण (Non-Verbal Communication):

हाव-भाव, शारीरिक भाषा और आँखों के संपर्क से संवाद।

आत्मविश्वास और सकारात्मक बॉडी लैंग्वेज महत्वपूर्ण।

सुधार की जरूरत: बेहतर अभिव्यक्ति और स्थिति के अनुसार अनुकूलन।

(iii) लिखित संप्रेषण (Written Communication):

ईमेल, रिपोर्ट, निबंध और सोशल मीडिया में प्रभावी लेखन।

संक्षिप्त, स्पष्ट और व्याकरणिक रूप से सही लेखन आवश्यक।

सुधार की जरूरत: लेखन शैली को और परिष्कृत करना और अधिक अभ्यास करना।

(iv) श्रवण कौशल (Listening Skills):

अच्छे संवाद के लिए सक्रिय और धैर्यपूर्वक सुनना जरूरी।

गलतफहमियों से बचने और बेहतर उत्तर देने में मदद करता है।

सुधार की जरूरत: ध्यानपूर्वक सुनने और प्रश्न पूछने की आदत विकसित करना।

निष्कर्ष:

संप्रेषण कौशल को प्रभावी बनाने के लिए स्पष्टता, आत्मविश्वास और सक्रिय सुनने की आदत जरूरी है। निरंतर अभ्यास और फीडबैक से इसे और बेहतर किया जा सकता है।

20. किसी दी हुई परिस्थिति/उद्देश्य के लिए स्वयं के लिए एक बजट की योजना बनाएं।

उत्तर: व्यक्तिगत बजट योजना:

परिस्थिति: एक छात्र के रूप में ₹10,000 के मासिक बजट की योजना बनाना, जिसमें आवास, भोजन, परिवहन और अन्य खर्च शामिल हों।

बजट विभाजन:

(i) आवास (रेंट/होस्टल फीस) – ₹4,000

किराया या हॉस्टल शुल्क।

बिजली और पानी बिल।

(ii) भोजन – ₹2,500

घर का भोजन/कैंटीन खर्च।

स्नैक्स और बाहर खाने का बजट।

(iii) परिवहन – ₹1,000

बस/मेट्रो पास या पेट्रोल खर्च।

अन्य यात्रा खर्च:

(iv) शिक्षा और स्टडी मटेरियल – ₹1,000

किताबें, नोट्स, प्रोजेक्ट खर्च।।

इंटरनेट और ट्यूशन फीस (यदि आवश्यक हो)

(v) व्यक्तिगत और मनोरंजन – ₹800

मूवी, आउटिंग, दोस्तों के साथ खर्च।

जिम/हॉबी क्लासेस:

(vi) आपातकालीन और बचत – ₹700

मेडिकल खर्च और अन्य आपातकालीन जरूरतें

हर महीने थोड़ी बचत करना

निष्कर्ष:

इस बजट से संतुलित खर्च बनाए रखते हुए बचत भी संभव है। बेहतर प्रबंधन के लिए अनावश्यक खर्चों को कम करना जरूरी होगा।

21. उपभोक्ता के रूप में अपने या परिवार के सामने आई पाँच समस्याओं की सूची बनाएँ। इनके समाधान हेतु सुझाव दें।

उत्तर: उपभोक्ता समस्याएँ और समाधान:

(i) निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद:

ब्रांडेड और प्रमाणित उत्पाद खरीदें।

रेटिंग और रिव्यू चेक करें।

खराब उत्पाद मिलने पर रिटर्न/रिप्लेसमेंट करें।

(ii) अधिक कीमत वसूली:

बिल लें और एमआरपी से अधिक चार्ज होने पर शिकायत करें।

सरकारी उपभोक्ता हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराएं।

ऑनलाइन-ऑफलाइन कीमतों की तुलना करें।

(iii) एक्सपायरी सामान की बिक्री:

खरीदारी से पहले एक्सपायरी डेट जांचें।

दुकानदार को तुरंत सूचित करें।

खाद्य सुरक्षा विभाग में शिकायत करें।

(iv) ऑनलाइन खरीदारी में धोखाधड़ी:

भरोसेमंद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ही खरीदें।

कैश ऑन डिलीवरी (COD) का विकल्प चुनें।

ग्राहक सेवा या उपभोक्ता फोरम में शिकायत करें।

(v) खराब ग्राहक सेवा और गारंटी/वॉरंटी न मिलना:

खरीदारी की रसीद और गारंटी कार्ड सुरक्षित रखें।

कंपनी की वेबसाइट या उपभोक्ता फोरम में शिकायत करें।

सोशल मीडिया पर समस्या उजागर करें।

निष्कर्ष:

सतर्क और जागरूक उपभोक्ता बनकर इन समस्याओं से बचा जा सकता है।

कक्षा 12

प्रयोग

पोषण, खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी

1. खाद्य पदार्थों में मिलावट की जाँच हेतु गुणात्मक परीक्षण।

उत्तर: मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान की विशेषताएँ।

व्यक्ति, परिवार और समाज के विकास पर केंद्रित।

स्वास्थ्य, पोषण, संसाधन प्रबंधन और संचार से संबंधित अध्ययन।

विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का समावेश।

समस्याओं के समाधान और जीवन कौशल विकसित करने पर जोर।

पोषण, खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी।

स्वस्थ आहार और पोषण की समझ विकसित करना।

खाद्य प्रसंस्करण और भंडारण तकनीकों का अध्ययन।

खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता बनाए रखना।

खाद्य पदार्थों में मिलावट की जाँच हेतु गुणात्मक परीक्षण।

1. दूध में मिलावट – पानी की जाँच के लिए दूध की एक बूंद चिकनी सतह पर डालें, यदि तुरंत बह जाए तो पानी मिला हो सकता है।

2. हल्दी में मिलावट – पानी में घोलने पर यदि लाल रंग दिखे तो सिंथेटिक रंग की मिलावट हो सकती है।

3. चाय पत्तियों में मिलावट – गीले हाथों से रगड़ने पर यदि रंग छोड़ दे तो कृत्रिम रंग मिला हो सकता है।

4. आटे में मिलावट – आयोडीन डालने पर नीला रंग आने से मिलावट की पुष्टि होती है।

5. मिठाइयों में चांदी की परत – असली चांदी की परत आग पर जलने पर नहीं सिकुड़ती, जबकि नकली परत जलकर सिकुड़ जाती है।

निष्कर्ष:

गुणात्मक परीक्षण से हम खाद्य पदार्थों की शुद्धता सुनिश्चित कर सकते हैं और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित भोजन का चयन कर सकते हैं।

2. पोषण कार्यक्रमों के लिए पूरक खाद्य पदार्थों का विकास और उन्हें तैयार करना

उत्तर: पोषण कार्यक्रमों के लिए पूरक खाद्य पदार्थों का विकास और तैयारी।

(i) पूरक खाद्य पदार्थों का महत्त्व:

कुपोषण रोकने और पोषण स्तर सुधारने के लिए आवश्यक।

बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी।

आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करके ऊर्जा और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

(ii) पूरक खाद्य पदार्थों का विकास:

संतुलित पोषण – प्रोटीन, विटामिन, खनिज और ऊर्जा से भरपूर।

स्थानीय और सस्ते उपलब्ध खाद्य पदार्थों का उपयोग – दालें, अनाज, सूखे मेवे, दूध उत्पाद आदि।

सुगम और आसान तैयारी – जल्दी बनने वाले और पचने में आसान खाद्य पदार्थ।

(iii) पूरक खाद्य पदार्थों की तैयारी:

(a) बच्चों के लिए:

दलिया (गेहूं/बाजरा/रागी+दूध+गुड़)।

मूंगफली और गुड़ के लड्डू।

सत्तू का पेय (चने का सत्तू+गुड़+दूध/पानी)।

(b) गर्भवती और धात्री महिलाओं के लिए:

खजूर और मेवा से भरपूर लड्डू।

प्रोटीन युक्त मूंग दाल और सोया की खिचड़ी

दूध और केले का शेक।

(c) कमजोर और रोगग्रस्त व्यक्तियों के लिए:

सूजी और दलिया की खीर।

मल्टीग्रेन रोटी और हरी सब्जी।

घर का बना प्रोटीन शेक (दूध+केला+बादाम+शहद)।

निष्कर्ष:

पूरक खाद्य पदार्थों से पोषण स्तर में सुधार किया जा सकता है। सही पोषक तत्वों का चयन कर विभिन्न आयु वर्ग के लिए स्वास्थ्यवर्धक विकल्प तैयार किए जा सकते हैं।

3. विभिन्न केंद्रित समूहों के लिए संचार के विभिन्न तरीकों का उपयोगग करते हुए पोषण, स्वास्थ्य और जीवन कौशलों के लिए संदेशों का नियोजन।

उत्तर: विभिन्न केंद्रित समूहों के लिए संचार के तरीकों द्वारा पोषण, स्वास्थ्य और जीवन कौशल संदेशों का नियोजन।

(i) केंद्रित समूह और उनकी आवश्यकताएँ:

बच्चे: संतुलित आहार, स्वच्छता, शारीरिक गतिविधि।

किशोर: पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास।

महिलाएँ: मातृत्व पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, परिवार प्रबंधन।

बुजुर्ग: संतुलित आहार, व्यायाम, मानसिक स्वास्थ्य।

ग्रामीण समुदाय: स्वच्छता, पोषण, टिकाऊ जीवनशैली।

(ii) संचार के विभिन्न तरीके:

(i) दृश्य संचार – पोस्टर, चित्र, वीडियो (टीवी, सोशल मीडिया)।

(ii) श्रव्य संचार – रेडियो, पॉडकास्ट, गीत, नाटक।

(iii) व्यक्तिगत संचार – कार्यशालाएँ, स्वास्थ्य शिविर, समूह चर्चाएँ।

(iv) डिजिटल संचार – व्हाट्सएप ग्रुप, वेबिनार, मोबाइल ऐप।

(v) जनसंचार माध्यम – अखबार, पत्रिकाएँ, टेलीविजन कार्यक्रम।

(iii) संदेशों का नियोजन और प्रसार:

सरल भाषा और स्थानीय संदर्भ का उपयोग।

आकर्षक और संवादात्मक तरीके अपनाना (वीडियो, कहानियाँ, गेम)।

सही माध्यम और समय का चयन (स्कूलों, आंगनवाड़ियों, सामुदायिक केंद्रों पर प्रचार)।

सर्वेक्षण और प्रतिक्रिया के आधार पर सुधार।

निष्कर्ष:

विभिन्न संचार माध्यमों के माध्यम से प्रभावी संदेश प्रसारित कर पोषण, स्वास्थ्य और जीवन कौशल को बढ़ावा दिया जा सकता है। सही रणनीति अपनाकर समाज में जागरूकता और सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

4. परंपरागत और समकालीन विधियों द्वारा खाद्य पदार्थों का संरक्षण।

उत्तर: परंपरागत और समकालीन विधियों द्वारा खाद्य पदार्थों का संरक्षण:

खाद्य संरक्षण का उद्देश्य भोजन की गुणवत्ता, पौष्टिकता और भंडारण क्षमता को बनाए रखना है। यह प्रक्रिया परंपरागत और समकालीन (आधुनिक) दोनों विधियों के माध्यम से की जाती है।

(a) परंपरागत संरक्षण विधियाँ:

(i) सुखाना (Dehydration) – सूरज की रोशनी में फल, सब्जियाँ और मसाले सुखाना (जैसे- आम पापड़, सूखे मेवे)।

(ii) नमक और शर्करा का उपयोग – अचार, जैम, मुरब्बा, और नमकीन मछली का संरक्षण।

(iii) धूम्रपान (Smoking) – मांस और मछली को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए (जैसे- स्मोक्ड फिश)।

(iv) किण्वन (Fermentation) – दूध से दही, सोयाबीन से टोफू, इडली-डोसा बैटर का संरक्षण।

(v) तेल और सिरका में डालना – अचार और कुछ सब्जियों का भंडारण।

(b) समकालीन (आधुनिक) संरक्षण विधियाँ:

(i) रेफ्रिजरेशन और डीप फ्रीजिंग – दूध, मांस, सब्जियाँ और फल को कम तापमान पर संरक्षित करना।

(ii) पाश्चराइजेशन – दूध और जूस को गर्म कर हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट करना।

(iii) कैन्डिंग (Canning) – टिन या ग्लास जार में भोजन को सील कर लंबे समय तक सुरक्षित रखना।

(iv) वैक्यूम पैकिंग – ऑक्सीजन निकालकर खाद्य को खराब होने से बचाना (जैसे- चिप्स के पैकेट)।

(v) रेडिएशन तकनीक – विकिरण के माध्यम से जीवाणु और कीटाणु नष्ट कर संरक्षण (जैसे- मसालों और सूखे मेवों में उपयोग)।

निष्कर्ष:

परंपरागत और समकालीन दोनों विधियाँ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक हैं। आधुनिक तकनीकों के साथ परंपरागत तरीकों का संयोजन भोजन को लंबे समय तक संरक्षित करने का प्रभावी तरीका है।

5. तैयार उत्पाद को पैक करना और उनकी शेल्फ लाइफ का अध्ययन।

उत्तर: तैयार उत्पाद का पैकेजिंग और शेल्फ लाइफ अध्ययन:

(i) पैकेजिंग के प्रकार:

उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने और उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए उपयुक्त पैकेजिंग आवश्यक है।

(a) पारंपरिक पैकेजिंग।

कागज पैकेजिंग – रोटी, बिस्किट, मसाले आदि के लिए।

कांच के जार – जैम, अचार, शहद के लिए।

पत्तों और कपड़े में पैकिंग – पुराने समय में खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयोग किया जाता था।

(b) आधुनिक पैकेजिंग।

प्लास्टिक पैकिंग – दूध, तेल, स्नैक्स आदि।

वैक्यूम पैकिंग – ड्राई फ्रूट्स, नमकीन, मांस उत्पाद।

मेटल कैनिंग – जूस, सूप, सॉस।

टेट्रा पैकिंग – दूध, जूस, लस्सी।

(ii) शेल्फ लाइफ का अध्ययन:

शेल्फ लाइफ से तात्पर्य किसी उत्पाद के उपयोग योग्य बने रहने की अवधि से है।

(a) शेल्फ लाइफ को प्रभावित करने वाले कारक।

नमी – अधिक नमी खाद्य पदार्थों को जल्दी खराब कर सकती है।

तापमान – गर्मी में खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होते हैं, जबकि ठंड में अधिक टिकाऊ रहते हैं।

पैकेजिंग की गुणवत्ता – एयरटाइट और वैक्यूम पैकिंग शेल्फ लाइफ बढ़ाती है।

संरक्षण विधियाँ – पाश्चराइजेशन, फ्रीजिंग, कैन्डिंग आदि से शेल्फ लाइफ बढ़ाई जाती है।

संरक्षक (Preservatives) का उपयोग – कुछ उत्पादों में प्राकृतिक या कृत्रिम संरक्षक मिलाए जाते हैं, जैसे- नमक, सिरका, बेंजोएट आदि।

(b) शेल्फ लाइफ बढ़ाने के उपाय।

उचित तापमान पर भंडारण करें।

सही पैकेजिंग सामग्री का चयन करें।

एक्सपायरी डेट की निगरानी करें।

खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन करें।

निष्कर्ष:

उचित पैकेजिंग और संरक्षण तकनीकों के प्रयोग से उत्पाद की शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को ताजे और सुरक्षित खाद्य पदार्थ मिलते हैं।

मानव विकास और परिवार अध्ययन

6. समुदाय में बच्चों, किशोरों और व्यस्कों के लिए सामाजिक रूप से प्रासंगिक प्रदेशों को संप्रेषित करने के लिए देशी और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री को उपयोग में लेकर शिक्षण-सहायक सामग्री का निर्माण करना और उसे उपयोग में लेना।

उत्तर: सामाजिक रूप से प्रासंगिक संदेशों के लिए शिक्षण-सहायक सामग्री का निर्माण और उपयोग।

(i) उद्देश्य:

समुदाय में बच्चों, किशोरों और व्यस्कों को जागरूक करने के लिए देशी और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग कर प्रभावी शिक्षण-सहायक सामग्री बनाई जाती है। इससे शिक्षा अधिक प्रभावशाली और सुलभ बनती है।

(ii) स्थानीय सामग्री का उपयोग:

पेड़ की छाल, पत्तियाँ, मिट्टी, लकड़ी – चित्रांकन और मॉडल बनाने के लिए।

पुराने कपड़े और कागज – पोस्टर, चार्ट और कठपुतली बनाने के लिए।

स्थानीय भाषा में लोकगीत, कहानियाँ और नाटक – शिक्षाप्रद संदेशों के लिए।

बांस और रस्सी – खेल और शारीरिक गतिविधियों में उपयोग।

(iii) शिक्षण-सहायक सामग्री के प्रकार:

(a) बच्चों के लिए।

चित्रकथाएँ और फ्लैशकार्ड।

इंटरैक्टिव खेल और कठपुतली शो।

पजल्स और मॉडल।

(b) किशोरों के लिए।

पोस्टर, बैनर और नुक्कड़ नाटक।

डिजिटल सामग्री (वीडियो, ऑडियो)।

समूह चर्चाएँ और वर्कशॉप।

(c) व्यस्कों के लिए।

प्रदर्शनी और फील्ड विजिट।

डॉक्यूमेंट्री और प्रेजेंटेशन।

स्थानीय कारीगरों से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम।

(iv) प्रभावी उपयोग के उपाय।

शिक्षण सामग्री को आकर्षक और संवादात्मक बनाना।

विषय को समुदाय की समस्याओं और जरूरतों से जोड़ना।

सरल भाषा और स्थानीय संदर्भों का उपयोग।

भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए समूह गतिविधियों का आयोजन।

निष्कर्ष:

स्थानीय संसाधनों से बनी शिक्षण-सहायक सामग्री समुदाय के सभी वर्गों के लिए शिक्षा को सुलभ, रोचक और प्रभावशाली बनाती है, जिससे सामाजिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

7. देखरेख में करियर मार्गदर्शन, पोषण परामर्श और व्यक्तिगत परामर्श के लिए हमउम्र लोगों के मध्य दिखावटी सत्र आयोजित करना।

उत्तर: हमउम्र लोगों के बीच दिखावटी सत्र (Mock Sessions) का आयोजन।

(i) उद्देश्य:

इन सत्रों का मुख्य उद्देश्य करियर मार्गदर्शन, पोषण परामर्श और व्यक्तिगत परामर्श के बारे में जागरूकता बढ़ाना और सही निर्णय लेने में सहायता करना है।

(ii) प्रमुख सत्रों का आयोजन:

(a) करियर मार्गदर्शन सत्र।

विभिन्न करियर विकल्पों पर चर्चा।

विशेषज्ञों से मार्गदर्शन या रोल-प्ले आधारित सत्र।

कौशल विकास और उच्च शिक्षा के अवसरों की जानकारी।

(b) पोषण परामर्श सत्र।

संतुलित आहार और स्वस्थ खानपान की जानकारी।

किशोरों और व्यस्कों के लिए पोषण संबंधी जरूरतों पर चर्चा।

स्थानीय रूप से उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों का महत्व।

(c) व्यक्तिगत परामर्श सत्र।

मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और तनाव प्रबंधन।

पारिवारिक, सामाजिक और शैक्षणिक समस्याओं पर चर्चा।

आत्म-सुधार और लक्ष्य निर्धारण के सुझाव।

(iii) सत्र को प्रभावी बनाने के उपाय:

हमउम्र दोस्तों के बीच खुली बातचीत और समूह चर्चा।

रोल-प्ले और प्रश्नोत्तर सत्र।

केस स्टडी और समस्या समाधान गतिविधियाँ।

निष्कर्ष:

दिखावटी सत्र हमउम्र लोगों को करियर, पोषण और व्यक्तिगत चुनौतियों के प्रति जागरूक करने का एक प्रभावी तरीका है। इससे वे आत्मनिर्भर बनते हैं और अपने भविष्य के लिए बेहतर निर्णय ले सकते हैं।

वस्त्र एवं परिधान

8. अनुप्रयुक्त वस्त्र डिजाइन तकनीकों- बँधाई और रँगाई/बाटिक/ब्लॉक प्रिंटिंग का उपयोग वस्तुओं का निर्माण करना।

उत्तर: अनुप्रयुक्त वस्त्र डिज़ाइन तकनीकों का उपयोग कर वस्तुओं का निर्माण।

(i) उद्देश्य:

वस्त्रों को सुंदर और आकर्षक बनाने के लिए पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है। बँधाई और रँगाई, बाटिक तथा ब्लॉक प्रिंटिंग जैसी तकनीकों से कपड़ों और अन्य वस्त्र उत्पादों को डिज़ाइन किया जा सकता है।

(ii) प्रमुख डिज़ाइन तकनीकें और उनके उपयोग:

(a) बँधाई और रँगाई (टाई एंड डाई)।

विधि: कपड़े को मोड़कर, मरोड़कर या धागे से बाँधकर रंग में डुबोया जाता है।

उपयोग: दुपट्टे, स्कार्फ, कुर्ते, टी-शर्ट, साड़ी, तकिए के कवर आदि।

(b) बाटिक (Batik):

विधि: कपड़े पर गरम मोम से डिज़ाइन बनाकर रंग लगाया जाता है, फिर मोम हटाकर अंतिम डिज़ाइन प्राप्त किया जाता है।

उपयोग: वॉल हैंगिंग, कुर्ते, साड़ी, रूमाल, बैग आदि।

(c) ब्लॉक प्रिंटिंग।

विधि: लकड़ी के ब्लॉकों पर डिज़ाइन उकेरकर उन्हें रंग में डुबोकर कपड़े पर छापा जाता है।

उपयोग: बेडशीट, पर्दे, दुपट्टे, टेबल कवर, जैकेट, कुर्ते आदि।

(iii) वस्त्र निर्माण के लिए प्रक्रिया:

(a) डिज़ाइन का चयन और कपड़े की तैयारी।

(b) रंग, मोम या ब्लॉक का उपयोग कर पैटर्न बनाना।

(c) रंगाई या छपाई करने के बाद सुखाना और फाइनल फिनिशिंग।

निष्कर्ष:

बँधाई और रँगाई, बाटिक और ब्लॉक प्रिंटिंग जैसी तकनीकों से कपड़ों को अनोखा और सुंदर बनाया जा सकता है। ये पारंपरिक विधियाँ आज भी फैशन और होम डेकोर में लोकप्रिय हैं।

9. वस्त्र उत्पादों की देखभाल और अनुरक्षण।

(a) मरम्मती सिलाई।

(b) सफ़ाई।

(c) भंडारण।

उत्तर: वस्त्र उत्पादों की देखभाल और अनुरक्षण:

वस्त्रों की सही देखभाल और रखरखाव उनकी गुणवत्ता और आयु को बनाए रखने में मदद करता है। उचित मरम्मत, सफाई और भंडारण से कपड़े लंबे समय तक टिकाऊ और आकर्षक बने रहते हैं।

(a) मरम्मती सिलाई:

कपड़ों में छोटे-मोटे कट या सिलाई उधड़ने की समस्या आम होती है। इन्हें सुधारने के लिए हाथ से सिलाई या सिलाई मशीन का उपयोग किया जाता है। बटन, ज़िप और हुक की मरम्मत करने से कपड़े दोबारा इस्तेमाल के लिए उपयुक्त बनते हैं। सही रंग के धागे और मजबूत सिलाई तकनीकों का उपयोग करना आवश्यक है ताकि कपड़ा पहले की तरह अच्छा लगे।

(b) सफ़ाई:

विभिन्न प्रकार के कपड़ों के लिए अलग-अलग सफाई विधियाँ अपनाई जाती हैं। नाजुक कपड़ों के लिए ड्राई क्लीनिंग, जबकि सामान्य सूती और सिंथेटिक कपड़ों के लिए मशीन वॉश या हैंड वॉश उपयुक्त होता है। दाग-धब्बों को हटाने के लिए सही डिटर्जेंट और घरेलू उपायों (जैसे सिरका और नींबू) का उपयोग किया जा सकता है। सही तापमान पर इस्त्री करने से कपड़े की गुणवत्ता बनी रहती है।

(c) भंडारण:

वस्त्रों को उचित तरीके से स्टोर करना उनकी उम्र बढ़ाने में मदद करता है। ऊनी और सिल्क के कपड़ों को नमी और कीड़ों से बचाने के लिए नेफ्थलीन बॉल्स या लौंग का उपयोग किया जाता है। नियमित रूप से अलमारी की सफाई और उचित फोल्डिंग से कपड़े लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं। मौसमी कपड़ों को सही जगह और ढंग से रखने से वे अगली बार इस्तेमाल के लिए तैयार रहते हैं।

निष्कर्ष:

वस्त्रों की मरम्मत, सफाई और भंडारण के सही तरीकों को अपनाने से वे लंबे समय तक उपयोग में लाए जा सकते हैं। इससे न केवल पैसे की बचत होती है, बल्कि कपड़ों की गुणवत्ता भी बनी रहती है, जिससे वे अधिक आकर्षक और टिकाऊ दिखते हैं।

विस्तार और संचार

10. निम्नलिखित का संकेंद्रण, प्रस्तुतीकरण, प्रौद्योगिकी तथा लागत के संदर्भ में विश्लेषण और चर्चा करें-

(a) प्रिंट (मुद्रण)।

(b) रेडियो।

(c) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया।

उत्तर: मीडिया के विभिन्न माध्यमों का विश्लेषण:

सूचना और संचार के लिए प्रिंट मीडिया, रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इन माध्यमों को संकेंद्रण, प्रस्तुतीकरण, प्रौद्योगिकी और लागत के संदर्भ में निम्नलिखित रूप से विश्लेषण किया जा सकता है।

(a) प्रिंट मीडिया (मुद्रण):

संकेंद्रण: समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तकें, ब्रोशर, पोस्टर और विज्ञापन शामिल होते हैं।

प्रस्तुतीकरण: लिखित शब्द और छवियों के माध्यम से स्थायी जानकारी प्रदान करता है।

प्रौद्योगिकी: ऑफसेट प्रिंटिंग, डिजिटल प्रिंटिंग, फ्लेक्स प्रिंटिंग और टाइपसेटिंग का उपयोग किया जाता है।

लागत: बड़े पैमाने पर उत्पादन सस्ता होता है, लेकिन सीमित संस्करणों की मुद्रण लागत अधिक हो सकती है।

(b) रेडियो:

संकेंद्रण: यह श्रव्य माध्यम है, जिसमें समाचार, संगीत, वार्तालाप, इंटरव्यू और शैक्षिक कार्यक्रम शामिल होते हैं।

प्रस्तुतीकरण: ध्वनि और संवाद के माध्यम से प्रभावी संचार करता है, जिसमें कोई दृश्य सामग्री नहीं होती।

प्रौद्योगिकी: AM/FM रेडियो, डिजिटल रेडियो, पॉडकास्टिंग और इंटरनेट रेडियो शामिल हैं।

लागत: प्रारंभिक सेटअप लागत कम होती है, और रेडियो कार्यक्रमों का उत्पादन अपेक्षाकृत सस्ता होता है।

(c) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया:

संकेंद्रण: इसमें टेलीविजन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, यूट्यूब, ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल समाचार पोर्टल शामिल हैं।

प्रस्तुतीकरण: वीडियो, ऑडियो, ग्राफिक्स और एनीमेशन के साथ आकर्षक और तेज़ संचार प्रदान करता है।

प्रौद्योगिकी: डिजिटल ब्रॉडकास्टिंग, HD/4K स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन स्टोरेज और क्लाउड नेटवर्किंग का उपयोग किया जाता है।

लागत: प्रारंभिक सेटअप और उत्पादन महंगा हो सकता है, लेकिन सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म अधिक किफायती विकल्प प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष:

प्रिंट मीडिया विश्वसनीय और स्थायी है, रेडियो व्यापक पहुँच और कम लागत वाला माध्यम है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सबसे प्रभावी और आधुनिक संचार तकनीक प्रदान करता है। प्रत्येक माध्यम की अपनी विशेषताएँ होती हैं और वे विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार उपयोग किए जाते हैं।

11. निम्नलिखित थीमों में से किसी एक पर समूहों के साथ बातचीत करें-

(a) सामाजिक संदेश – जेंडर समता, एड्स, भ्रूण हत्या, बालश्रम पर्यावरण और इसी प्रकार की अन्य थीम।

उत्तर: समाज में जागरूकता बढ़ाने के लिए इन विषयों पर चर्चा करना आवश्यक है। जेंडर समता के तहत, लड़का-लड़की के समान अधिकार, शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर जोर दिया जा सकता है। एड्स को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए इसके कारण, बचाव और भ्रामक धारणाओं पर चर्चा करनी चाहिए। भ्रूण हत्या के दुष्परिणामों और इसके खिलाफ कड़े कानूनों की जानकारी साझा करना महत्वपूर्ण है। बालश्रम पर चर्चा करते हुए इसके कारणों और उन्मूलन के प्रयासों पर जोर देना चाहिए। पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रदूषण नियंत्रण, वृक्षारोपण और प्लास्टिक के उपयोग को कम करने जैसे विषयों को उठाया जा सकता है।

(b) वैज्ञानिक तथ्य/खोज।

उत्तर: वैज्ञानिक तथ्यों और खोजों पर चर्चा करते समय, डार्विन का विकासवाद सिद्धांत, न्यूटन के गति के नियम, आइंस्टीन का सापेक्षता सिद्धांत, और डीनए की खोज जैसी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियों पर बात की जा सकती है। इसके अलावा, कोविड-19 वैक्सीन का विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्पेस एक्सप्लोरेशन (जैसे मंगल मिशन), और हरित ऊर्जा के नए स्रोतों जैसे विषयों पर चर्चा करना भी ज्ञानवर्धक होगा।

(c) कोई महत्वपूर्ण घटना/इवेंट।

उत्तर: महत्वपूर्ण घटनाओं में ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं पर चर्चा की जा सकती है। उदाहरण के लिए, भारत की स्वतंत्रता संग्राम और संविधान निर्माण एक प्रेरणादायक विषय हो सकता है। हाल के वर्षों में, चंद्रयान-3 का सफल प्रक्षेपण, जी-20 सम्मेलन, या ओलंपिक में भारत की उपलब्धियाँ जैसी घटनाएँ भी चर्चा के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं। इन घटनाओं के प्रभाव, चुनौतियों और भविष्य में उनके संभावित प्रभावों पर समूहों के साथ बातचीत की जा सकती है।

परियोजनाएँ

1. निम्नलिखित परियोजनाओं में से किसी एक का दायित्व लेना और मूल्यांकन किया जा सकता है। किसी एक का दायित्व लेना और मूल्यांकन करना-

(a) अपने स्थानीय क्षेत्र में व्याप्त पारंपरिक व्यवसायों, उनकी शुरूआत, वर्तमान स्थिति और सामने आई चुनौतियों का विश्लेषण।

उत्तर: स्थानीय स्तर पर पारंपरिक व्यवसायों की पहचान कर उनका अध्ययन किया जा सकता है। जैसे बुनाई, हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन बनाना, जरी-जरदोजी कढ़ाई, लकड़ी पर नक्काशी आदि। इन व्यवसायों की शुरुआत पारंपरिक कौशल और संसाधनों के माध्यम से हुई थी, लेकिन आधुनिक तकनीक और मशीनों के आने से इन पर असर पड़ा है। वर्तमान में कई पारंपरिक व्यवसाय बाजार प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की कमी, कम आय और नई पीढ़ी की रुचि में कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इन व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी योजनाओं, डिजिटल मार्केटिंग, प्रशिक्षण और नए डिजाइन इनोवेशन जैसी रणनीतियों को अपनाना आवश्यक है।

(b) जेंडर भूमिकाओं, उद्यमशीलता के अवसरों तथा भावी जीविकाओं और परिवार की भागीदारी का विश्लेषण।

उत्तर: समाज में पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं को पारंपरिक रूप से अलग-अलग बांटा गया है, लेकिन आधुनिक समय में जेंडर समता की दिशा में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। अब महिलाएँ बैंकिंग, शिक्षा, विज्ञान, व्यापार और स्टार्टअप्स में बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं। उद्यमशीलता के अवसर भी बढ़ रहे हैं, जहाँ महिलाएँ हस्तनिर्मित वस्त्र, जैविक उत्पाद, फ्रीलांसिंग, डिजिटल मार्केटिंग और स्टार्टअप्स में कदम रख रही हैं।

परिवार की भागीदारी भी इस बदलाव का अहम हिस्सा है। परिवार का समर्थन महिलाओं और युवाओं को आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की ओर ले जा सकता है। इसके लिए समान अवसर, वित्तीय सहायता, जागरूकता और कौशल विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जिससे समाज में समानता और समावेशिता को बढ़ावा मिल सके।

2. निम्नलिखित के संदर्भ में, अपने क्षेत्र में कार्यान्वित किसी सार्वजनिक/जन अभियान का प्रलेखन-

(a) अभियान का उद्देश्य।

(b) केंदित समूह।

(c) कार्यान्वयन के ढंग।

(d) सम्मिलिखित हिस्सेदार।

(e) उपयोग में लिए गए संचार माध्यम तथा विधियाँ।

अभियान की प्रासंगिकता पर टिप्पणी करें।

उत्तर: सार्वजनिक अभियान: “स्वच्छ भारत अभियान” (Clean India Mission):

भारत सरकार द्वारा चलाया गया स्वच्छ भारत अभियान (Clean India Mission) देशभर में सफाई और स्वच्छता को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक अभियान है। इसका उद्देश्य भारत को स्वच्छ और खुले में शौच से मुक्त (ODF) बनाना था।

(a) अभियान का उद्देश्य।

स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना।

खुले में शौच की प्रथा समाप्त करना।

ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन में सुधार।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शौचालयों का निर्माण।

नागरिकों को स्वच्छता अपनाने के लिए प्रेरित करना।

(b) केंदित समूह।

ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के नागरिक।

स्कूल एवं कॉलेज के छात्र।

सरकारी और गैर-सरकारी संगठन।

नगर निगम एवं ग्राम पंचायतें।

(c) कार्यान्वयन के ढंग।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से लागू किया गया।

पंचायतों, नगर निकायों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी।

स्वयंसेवकों और स्वच्छाग्रहियों को नियुक्त कर जागरूकता अभियान चलाए गए।

शौचालय निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की गई।

(d) सम्मिलित हिस्सेदार।

भारत सरकार एवं राज्य सरकारें।

स्थानीय निकाय (नगर निगम, ग्राम पंचायतें)।

गैर-सरकारी संगठन (NGOs)।

कॉर्पोरेट सेक्टर (CSR पहल के माध्यम से)।

मीडिया एवं फिल्म इंडस्ट्री।

नागरिक समाज एवं स्कूल-कॉलेज।

(e) उपयोग में लिए गए संचार माध्यम तथा विधियाँ।

टेलीविजन और रेडियो विज्ञापन।

सोशल मीडिया (Facebook, Twitter, YouTube)।

पोस्टर, बैनर एवं नुक्कड़ नाटक।

“स्वच्छता ही सेवा” अभियान के तहत जन भागीदारी।

स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम।

ब्रांड एंबेसडर (जैसे अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार) के माध्यम से प्रचार।

अभियान की प्रासंगिकता:

स्वच्छ भारत अभियान ने न केवल स्वच्छता की आदतों को बढ़ावा दिया, बल्कि समाज में स्वास्थ्य एवं पर्यावरण सुधार में भी योगदान दिया। इससे डायरिया, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों में कमी आई। ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच की समस्या काफी हद तक कम हुई, जिससे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा भी बढ़ी।

हालाँकि, कुछ चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, जैसे लोगों की मानसिकता में पूर्ण बदलाव और कचरा प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था। लेकिन समग्र रूप से, यह अभियान सफाई के प्रति जागरूकता बढ़ाने में एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ।

3. निम्नलिखित के संदर्भ में, पोषण/स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यान्वित किए जा रहे किसी एकीकृत समुदाय आधारित कार्यक्रम का अध्ययन-

(a) कार्यक्रम के उद्देश्य।

(b) केंद्रित समूह।

(c) कार्यान्वयन के ढंग।

(d) सम्मिलित हिस्सेदार।

उत्तर: राष्ट्रीय पोषण मिशन (Poshan Abhiyan):

यह भारत सरकार द्वारा 2018 में शुरू किया गया एक समुदाय आधारित कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और 6 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण को कम करना है।

(a) कार्यक्रम के उद्देश्य:

कुपोषण, बौनापन, दुबलापन और एनीमिया को कम करना।

गर्भवती महिलाओं और बच्चों के पोषण स्तर में सुधार करना।

पोषण जागरूकता बढ़ाना और स्वस्थ खान-पान को प्रोत्साहित करना।

(b) केंद्रित समूह:

0-6 वर्ष के बच्चे, गर्भवती महिलाएँ, किशोरियाँ।

आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता।

ग्रामीण और शहरी गरीब समुदाय।

(c) कार्यान्वयन के ढंग:

POSHAN Tracker और POSHAN App के जरिए डिजिटल निगरानी।

POSHAN Mah और घर-घर पोषण अभियान के माध्यम से जागरूकता बढ़ाना।

आंगनवाड़ी केंद्रों में पोषण कक्षाएँ और राशन वितरण।

(d) सम्मिलित हिस्सेदार:

भारत सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय।

आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता।

NGOs, WHO, UNICEF, स्कूल और मीडिया।

निष्कर्ष:

यह कार्यक्रम बच्चों और महिलाओं के पोषण स्तर में सुधार लाने का प्रभावी प्रयास है। हालाँकि, दूरस्थ क्षेत्रों में जागरूकता और बुनियादी सुविधाओं को और मजबूत करने की जरूरत है।

4. आसपास के क्षेत्रों में जाएं और दो किशोरों तथा दो व्यस्कों के साथ विशेष आवश्यकताओं वाले व्यक्तियों संबंधी उनके प्रत्यक्ष ज्ञान के बारे में साक्षात्कार करें।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

5. किसी एक विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बच्चे या व्यस्कों के आहार, पोशाकों, गतिविधियों, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के बारे में जानकारी देने के लिए विवरणिका तैयार करें।

उत्तर: विशेष आवश्यकताओं वाले व्यक्ति की देखभाल: एक संपूर्ण मार्गदर्शिका:

यह विवरणिका एक विशेष आवश्यकताओं वाले व्यक्ति की आहार, पोशाक, गतिविधियों, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करती है।

(a) आहार (Dietary Needs):

(i) पौष्टिक और संतुलित आहार: प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और फाइबर युक्त भोजन आवश्यक है।

(ii) विशेष आहार: कुछ व्यक्तियों को ग्लूटेन-फ्री, शुगर-फ्री या लिक्विड डाइट की जरूरत हो सकती है।

(iii) नियमित भोजन: भोजन समय पर और सही मात्रा में दिया जाए।

(iv) हाइड्रेशन: पर्याप्त पानी और तरल पदार्थ लें।

(b) पोशाक (Clothing Needs):

(i) आरामदायक कपड़े: सूती, हल्के और त्वचा के अनुकूल कपड़े।

(ii) विशेष डिज़ाइन: वेल्क्रो या इलास्टिक वाले कपड़े, जो पहनने में आसान हों।

(iii) मौसम के अनुसार: गर्मियों में हल्के और सर्दियों में ऊनी कपड़े जरूरी।

(iv) सुरक्षा: स्किन एलर्जी या सेंसरी सेंसिटिविटी वाले लोगों के लिए विशेष कपड़े।

(c) गतिविधियाँ (Activities):

(i) शारीरिक गतिविधियाँ: हल्के व्यायाम, योग, तैराकी, साइकलिंग आदि।

(ii) कौशल विकास: ड्राइंग, म्यूजिक थेरेपी, कहानी सुनाना, पज़ल्स हल करना।

(iii) सामाजिक गतिविधियाँ: ग्रुप गेम्स, कला और शिल्प, सामुदायिक मेलजोल।

(iv) सेंसरी गतिविधियाँ: टच एंड फील गेम्स, पानी में खेलना, रेत में खेलना।

(d) शारीरिक आवश्यकताएँ (Physical Needs):

(i) चलने-फिरने की सहायता: व्हीलचेयर, वॉकर, स्पेशल शूज़।

(ii) विशेष उपकरण: श्रवण यंत्र, ब्रेल किताबें, स्पीच डिवाइस।

(iii) सुरक्षा: नॉन-स्लिप मैट, गद्देदार फर्नीचर, हैंडरेल्स।

(iv) चिकित्सा देखभाल: नियमित हेल्थ चेकअप और थेरेपी (फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी)।

(e) मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ (Psychological Needs):

(i) स्नेह और सहयोग: परिवार और समाज से प्रेम और समर्थन।

(ii) सकारात्मकता: प्रेरक बातें और आत्मविश्वास बढ़ाने वाली गतिविधियाँ।

(iii) तनाव प्रबंधन: संगीत, मेडिटेशन, रचनात्मक कार्य।

(iv) समाज में समावेशन: भेदभाव रहित माहौल और समान अवसर।

निष्कर्ष:

विशेष आवश्यकताओं वाले व्यक्ति की देखभाल में संवेदनशीलता, धैर्य और उचित संसाधनों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। सही आहार, आरामदायक कपड़े, उपयुक्त गतिविधियाँ और भावनात्मक समर्थन से उनका जीवन बेहतर बनाया जा सकता है। हमारी छोटी-छोटी कोशिशें उनके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती हैं!

6. अपने विद्यालय/घर या पड़ोस में किसी आयोजन की योजना को देखें और उसका प्रलेख तैयार करें।

(a) प्रासंगिकता।

(b) संसाधन उपलब्धता और गति प्रदान करना।

(c) आयोजन का नियोजन तथा कार्यान्वयन।

(d) वित्तीय उलझनें।

(e) हिस्सेदारों से प्रतिपुष्टि।

उत्तर: आयोजन प्रलेख: “स्वच्छता अभियान – एक सामुदायिक पहल”।

आयोजन स्थान: हमारे विद्यालय एवं पड़ोस।

आयोजन तिथि: 10 अप्रैल 2025।

समय: सुबह 8:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक।

आयोजक: विद्यालय प्रबंधन एवं स्थानीय नगर पालिका।

(a) प्रासंगिकता:

स्वच्छता हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बेहद आवश्यक है। विद्यालय और पड़ोस में कचरा प्रबंधन की स्थिति को सुधारने के लिए स्वच्छता अभियान का आयोजन किया गया, जिसमें छात्रों, शिक्षकों और स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया। इस पहल का उद्देश्य लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना और सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ बनाना था।

(b) संसाधन उपलब्धता और गति प्रदान करना:

संसाधन: झाड़ू, कूड़ादान, दस्ताने, मास्क, बायोडिग्रेडेबल कचरा बैग।

सहयोग: विद्यालय प्रशासन, नगर निगम, एनजीओ और स्थानीय व्यवसायियों ने सफाई उपकरण उपलब्ध कराए।

प्रचार: सोशल मीडिया, पोस्टर और विद्यालय के नोटिस बोर्ड के माध्यम से।

(c) आयोजन का नियोजन तथा कार्यान्वयन:

(i) योजना बनाना:

छात्रों और शिक्षकों की एक समिति बनाई गई।

सफाई के लिए विद्यालय और पड़ोस के क्षेत्र चिन्हित किए गए।

टीमों का गठन कर कार्य विभाजित किया गया।

(ii) कार्यान्वयन:

सुबह 8:00 बजे अभियान की शुरुआत की गई।

सभी प्रतिभागियों को दस्ताने, मास्क और कचरा बैग दिए गए।

अलग-अलग टीमें विद्यालय परिसर, सड़कें और पार्कों की सफाई में लगीं।

सफाई के बाद प्लास्टिक और गीले कचरे को अलग-अलग डस्टबिन में डाला गया।

(d) वित्तीय उलझनें:

आयोजन के लिए नगर निगम और विद्यालय फंड से कुछ सहायता मिली।

स्थानीय दुकानदारों और एनजीओ से आर्थिक सहयोग मिला।

कई आवश्यक वस्तुएँ दान में प्राप्त हुईं, जिससे बजट का भार कम हुआ।

हालांकि, अधिक कचरा डिब्बे और जागरूकता कार्यक्रमों के लिए अतिरिक्त धनराशि की आवश्यकता महसूस हुई।

(e) हिस्सेदारों से प्रतिपुष्टि:

छात्र: अभियान में भाग लेकर वे स्वच्छता के महत्व को समझ पाए।

शिक्षक: उन्होंने इसे एक प्रभावी शैक्षिक पहल बताया।

स्थानीय लोग: वे अभियान से खुश थे और भविष्य में इसे जारी रखने की इच्छा व्यक्त की।

नगर निगम अधिकारी: उन्होंने और अधिक सफाई अभियानों को समर्थन देने की बात कही।

निष्कर्ष:

स्वच्छता अभियान सफल रहा और लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित हुई। भविष्य में इसे और बड़े स्तर पर आयोजित करने की योजना बनाई गई, ताकि पूरे समुदाय में स्वच्छता संस्कृति विकसित हो सके।

7. विभिन्न केंद्रित समूहों के लिए संचार के विभिन्न तरीकों का उपयोग करते हुए पोषण, स्वास्थ्य और जीवन कौशलों के लिए संदेशों का नियोजन।

उत्तर: पोषण, स्वास्थ्य और जीवन कौशलों के संदेशों का नियोजन।

समाज के विभिन्न केंद्रित समूहों के लिए प्रभावी संचार माध्यमों का चयन करना आवश्यक है ताकि पोषण, स्वास्थ्य और जीवन कौशल से संबंधित संदेश अधिक प्रभावी और व्यवहारिक रूप से लागू किए जा सकें।

1. केंद्रित समूह और संचार के तरीके:

केंद्रित समूहसंचार माध्यमसंदेशों के उदाहरण
बच्चे (6-12 वर्ष)स्टोरीबुक, कार्टून, स्कूल वर्कशॉप, खेल-आधारित लर्निंग“फल और सब्जियाँ खाने से ताकत मिलती है!”, “अपने हाथ धोना ज़रूरी है।”
किशोर (13-19 वर्ष)सोशल मीडिया (Instagram, YouTube), पोस्टर, इंटरेक्टिव सेशन“संतुलित आहार लो, हेल्दी रहो!”, “तनाव प्रबंधन के लिए ध्यान और व्यायाम करें।”
महिलाएँ (गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताएँ)आंगनवाड़ी सत्र, रेडियो कार्यक्रम, डॉक्टर की काउंसलिंग“गर्भावस्था में आयरन और कैल्शियम युक्त भोजन आवश्यक है।”
ग्रामीण समुदायनुक्कड़ नाटक, लोकगीत, सामुदायिक बैठकेंस्वच्छ पानी पीएँ, बीमारियों से बचें।”, “हर घर में शौचालय का निर्माण करें।”
कार्यस्थल पर व्यस्कईमेल न्यूजलेटर, हेल्थ सेमिनार, पोस्टर“काम के दौरान सही मुद्रा रखें।”, “रोज़ाना 30 मिनट व्यायाम करें।”
वृद्धजन (60+ वर्ष)टेलीविजन, अखबार, स्थानीय हेल्थ कैंप“हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए कैल्शियम लें।”, “रोज़ाना टहलें, स्वस्थ रहें।”

2. संचार विधियों का नियोजन:

(i) दृश्य माध्यम: पोस्टर, बैनर, वीडियो।

(ii) श्रव्य माध्यम: रेडियो, पॉडकास्ट, नुक्कड़ नाटक।

(iii) डिजिटल माध्यम: सोशल मीडिया, ईमेल, ऐप आधारित हेल्थ टिप्स।

(iv) प्रत्यक्ष संचार: सामुदायिक बैठकें, वर्कशॉप, स्कूल प्रोग्राम।

3. प्रभावी संदेश डिजाइन के लिए आवश्यक तत्व:

(i) सरल और स्पष्ट भाषा: सभी आयु समूहों के लिए आसानी से समझने योग्य।

(ii) संस्कृति और क्षेत्रीय संवेदनशीलता: लोकल भाषा और परंपराओं के अनुसार संदेश।

(iii) प्रेरणादायक और व्यवहारिक संदेश: “करो और सीखो” की मानसिकता विकसित करना।

निष्कर्ष:

हर समूह की जरूरतों के अनुसार संचार माध्यमों और संदेशों को तैयार करना आवश्यक है। दृश्य, श्रव्य और डिजिटल तकनीकों के संयोजन से पोषण, स्वास्थ्य और जीवन कौशल से जुड़े संदेश अधिक प्रभावी ढंग से समाज तक पहुँचाए जा सकते हैं।

8. संसाधित खाद्य पदार्थों, उनको पैक करने और लेबल संबंधी जानकारी का बाज़ारी सर्वेक्षण।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करें।

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