NCERT Class 11 Home Science Chapter 9 पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता Solutions Hindi Medium to each chapter is provided in the list so that you can easily browse through different chapters NCERT Class 11 Home Science Chapter 9 पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता Notes in Hindi and select need one. NCERT Class 11 Home Science Chapter 9 पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता Question Answers Download PDF. NCERT Class 11 Solutions for Home Science.
NCERT Class 11 Home Science Chapter 9 पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता
Also, you can read the NCERT book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Central Board of Secondary Education (CBSE) Book guidelines. NCERT Class 11 Home Science Chapter 9 पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता Solutions in Hindi are part of All Subject Solutions. Here we have given NCERT Class 11 Home Science Textbook Solutions Hindi Medium for All Chapters, You can practice these here.
पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता
Chapter: 9
मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान भाग – II
इकाई – (III) बाल्यावस्था
अंत में कुछ प्रश्न
1. हमें विद्यालय जाने वाले बच्चे के आहार में संतृप्त वसा, अतिरिक्त चीनी तथा नमक की मात्रा को सीमित क्यों करना चाहिए?
उत्तर: विद्यालय जाने वाले बच्चों के आहार में संतृप्त वसा, अतिरिक्त चीनी और नमक की मात्रा को सीमित करना आवश्यक है क्योंकि इन तत्वों की अधिकता स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। संतृप्त वसा और अतिरिक्त चीनी से भरपूर भोजन मोटापे के खतरे को बढ़ाता है, जिससे बच्चे विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का शिकार हो सकते हैं। अधिक चीनी युक्त खाद्य-पदार्थ दांतों की बीमारियों का कारण बनते हैं, जबकि अधिक सोडियम (नमक) का सेवन रक्तचाप को बढ़ा सकता है, जिससे हृदय, गुर्दे और लकवे जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। आजकल छोटे बच्चे भी मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे हैं, जिसका मुख्य कारण असंतुलित आहार और अधिक वसा, चीनी तथा नमक का सेवन है। इसलिए, बच्चों के संतुलित विकास के लिए उनके आहार में इन पदार्थों की मात्रा सीमित रखनी चाहिए और स्वस्थ भोजन की आदतें अपनानी चाहिए।
2. भोजन की योजना बनाने में बच्चों को शामिल करना स्वस्थ खान-पान में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर: भोजन की योजना बनाने में बच्चों को शामिल करना स्वस्थ खान-पान में सहायक होता है क्योंकि इससे उनकी पौष्टिक खाना खाने में रुचि बढ़ती है। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उन्हें उनके भोजन की योजना में शामिल किया जाना चाहिए। माता-पिता बच्चों के पसंद और संतुलित आहार की योजना बनाने के लिए उनसे विचार-विमर्श कर सकते हैं। उन्हें सामग्री खरीदने के लिए अपने साथ ले जाना और यह सिखाना कि कच्ची भोजन सामग्री खरीदते समय क्या ध्यान में रखना चाहिए, बच्चों के लिए लाभदायक होता है। इसके अतिरिक्त, बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार भोजन पकाने और परोसने के समुचित कार्य सिखाने से उनका उत्साह बढ़ता है और भोजन के प्रति स्वस्थ और सकारात्मक धारणाएँ विकसित होती हैं।
3. बचपन में मोटापे में वृद्धि हो रही है। कारण बताइए?
उत्तर: बचपन में मोटापे में वृद्धि का मुख्य कारण असंतुलित आहार और असक्रिय जीवनशैली है। आजकल बच्चों के आहार में अत्यधिक वसा युक्त भोजन, अधिक नमक, कम रेशा और चीनी मिले पेय पदार्थों की मात्रा बढ़ गई है, जिससे उनका वजन असंतुलित रूप से बढ़ रहा है। इसके अलावा, शारीरिक गतिविधियों की कमी और अधिक समय तक बैठकर रहने की आदत इस समस्या को और गंभीर बना देती है। यह समस्या विशेष रूप से उच्च सामाजिक-आर्थिक वर्गों के बच्चों में अधिक देखी जा रही है।
बचपन में मोटापे का बढ़ना कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है, जिनमें टाइप 2 मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियाँ शामिल हैं, जो पहले बच्चों में बहुत कम पाई जाती थीं, लेकिन अब आम हो गई हैं। वहीं, दूसरी ओर, समाज के निम्न वर्गों के बच्चे अल्पपोषण से ग्रसित होते हैं, जिससे उनकी शारीरिक और मानसिक विकास दर धीमी हो जाती है।
4. “मध्याह्न भोजन योजना” से किस प्रकार बच्चों के स्वास्थ्य एवं विद्यालय के कार्य निष्पादन में वृद्धि हुई है?
उत्तर: हमारी सरकार द्वारा कार्यान्वित मध्याह्न भोजन योजना (MDMS) के अंतर्गत विद्यालय में पहली से आठवीं कक्षा वाले बच्चों को निःशुल्क भोजन प्रदान किया जाता है। इस योजना के अच्छे परिणाम दिखाई पड़े हैं। अध्यापक बताते हैं कि कक्षा में उनका कार्य निष्पादन एवं ध्यान लगा पाने में काफी सुधार हुआ है। न केवल विद्यालय में नामांकन बड़ा है अपितु विद्यालय छोड़ने की दर में भी कमी आई है। मध्याह्न भोजन की योजना के कारण विद्यालय बालिकाओं की संख्या बहने से शिक्षा में लिंग भेद कम हुआ है।
अपने देश में हम अल्पपोषण तथा अतिपाषण की दोहरी समस्या का सामना करते हैं। इसलिए यदि हम पौष्टिक भोजन के लाभों का प्रचार करते रहे तो भविष्य में इसका प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त निःशुल्क स्वास्थ्य जाँच एवं उपचार प्रदान करने वाले “विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम से बच्चे के स्वस्थ रहने में सुधार आएगा।
बच्चों के समग्र विकास के लिए संबंधित देखभाल एवं वाली की है।
प्रस्तावित क्रियाकलाप |
(क) आप अपने पैतृक गाँव अथवा किसी अन्य गाँव में जा रहे हैं जहाँ आप पाते हैं कि बच्चे कुपोषित हैं और इसके कारण होने वाले रोगों के शिकार हैं। यदि आपको बच्चों के माता-पिता से बात करने के लिए कहा जाए तो आप किसके बारे में बात करेंगे?
(i) बच्चों की रोगों से सुरक्षा करने के लिए पर्याप्त पोषण की भूमिका?
(ii) छोटे बच्चों के लिए संतुलित भोजन की योजना?
(iii) संचारी रोग तथा प्रतिरक्षण का महत्त्व?
(iv) विद्यालय पूर्व वर्षों के दौरान प्रतिरक्षण कार्यक्रम?
उत्तर: यदि मुझे कुपोषित बच्चों के माता-पिता से बात करने का अवसर मिले, तो मैं उन्हें पर्याप्त पोषण, संतुलित भोजन, संचारी रोगों और प्रतिरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करूंगा। सबसे पहले, मैं उन्हें समझाऊंगा कि संतुलित आहार बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में सहायक होता है। भोजन में अनाज, दालें, हरी सब्जियाँ, फल, दूध और प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करना जरूरी है। मैं उन्हें यह भी बताऊंगा कि पौष्टिक भोजन महँगा नहीं होता—मूंगफली, गुड़, अंकुरित अनाज और सस्ते मौसमी फल भी पोषण का अच्छा स्रोत हैं।
इसके अलावा, मैं संचारी रोगों और स्वच्छता के महत्व पर चर्चा करूंगा। कुपोषित बच्चों में रोगों से लड़ने की क्षमता कम होती है, जिससे वे जल्दी बीमार पड़ते हैं। इसलिए, माता-पिता को बच्चों की सफाई, स्वच्छ पानी और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का विशेष ध्यान रखना चाहिए। टीकाकरण भी बहुत जरूरी है, क्योंकि यह बच्चों को घातक बीमारियों से बचाता है। मैं उन्हें विद्यालय पूर्व प्रतिरक्षण कार्यक्रम की जानकारी दूंगा और यह समझाऊंगा कि सही समय पर टीकाकरण कराने से उनके बच्चे स्वस्थ रह सकते हैं।
अंत में, मैं माता-पिता को सरकारी योजनाओं जैसे मध्याह्न भोजन योजना (MDMS) और आँगनवाड़ी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करूंगा। इन योजनाओं से बच्चों को निःशुल्क पौष्टिक भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलती हैं, जिससे उनका समग्र विकास संभव हो सकता है। जागरूक माता-पिता ही अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की नींव रख सकते हैं।
(ख) आपके पड़ोसी का दो वर्षीय बच्चा बार-बार डायरिया से पीड़ित होता है। उसको इसके बारे में बताएँ-
(i) शिशुओं की पोषण संबंधी आवश्यकता।
(ii) शिशु के स्वास्थ्य एवं विकास के लिए अनन्य स्तनपान का महत्त्व।
(iii) अल्प लागत वाले पुरक भोजन तथा स्थानीय रूप से उपलब्ध भोजन पदार्थों से उनका निर्माण।
उत्तर: यदि मेरे पड़ोसी का दो वर्षीय बच्चा बार-बार डायरिया से पीड़ित होता है, तो मैं उन्हें शिशु के पोषण, स्तनपान के लाभ और पूरक आहार के बारे में जानकारी दूँगा।
सबसे पहले, मैं उन्हें बताऊँगा कि शिशुओं की पोषण संबंधी आवश्यकताएँ अलग होती हैं और इस उम्र में संतुलित आहार बहुत जरूरी होता है। बच्चे को ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और खनिजों से भरपूर भोजन देना चाहिए, जिससे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़े और वह बार-बार बीमार न पड़े।
इसके बाद, मैं अनन्य स्तनपान के महत्त्व पर जोर दूँगा। जन्म से छह महीने तक केवल माँ का दूध ही शिशु के लिए सर्वोत्तम होता है, क्योंकि यह आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होता है और रोगों से बचाने में मदद करता है। स्तनपान से शिशु का इम्यून सिस्टम मजबूत होता है, जिससे डायरिया जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। यदि बच्चा छह महीने से बड़ा है, तो स्तनपान के साथ-साथ उसे पौष्टिक पूरक आहार देना जरूरी है।
अंत में, मैं अल्प लागत वाले पूरक भोजन और स्थानीय रूप से उपलब्ध खाद्य पदार्थों के बारे में बताऊँगा। घर में बने सस्ते और पौष्टिक भोजन, जैसे दाल-चावल, खिचड़ी, दूध-रोटी, सब्जियों का सूप, केले, मूंगफली, गुड़ और अंकुरित अनाज को बच्चे के आहार में शामिल करना चाहिए। ये खाद्य पदार्थ न केवल सस्ते होते हैं, बल्कि बच्चों के विकास में भी सहायक होते हैं।
साथ ही, मैं उन्हें यह सलाह दूँगा कि वे बच्चे की स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि डायरिया अक्सर गंदे पानी और अस्वच्छ भोजन से फैलता है। यदि बच्चा अधिक बार बीमार पड़ता है, तो डॉक्टर से परामर्श लेना भी आवश्यक होगा।
(ग) विद्यालय जाने वाले बच्चों में पौष्टिक भोजन करने की आदतें विकसित करने के लिए उपायों को सूची बनाइए एवं उनकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर: हम जानते हैं कि अन्य आदतों की तरह बच्चों को जीवन के आरम्भ में ही खान-पान संबंधी अच्छी आदतें विकसित करनी चाहिए। उनको यह सिखाने के लिए कि “पौष्टिक खान-पान स्वस्थ जीवन शैली का एक अंग है” हर व्यक्ति को निम्नलिखित सुझावों का पालन करना चाहिए –
(i) भोजन करने का समय वह समय है जब परिवार एक साथ इकट्ठा होता है। परिवार का एक साथ बैठकर सुखद एवं आनंदमय वातावरण में भोजन करना बच्चों के लिए बहुत सहायक होता है। बच्चे परिवार के अन्य सदस्यों के खान-पान संबंधी व्यवहार का अनुकरण करते हैं।
(ii) विविधता एक महत्वपूर्ण पहलू है तथा बच्चे की आवश्यकता के अनुरूप उसे थोड़ी मात्रा में विभिन्न तरह के भोजन को देना महत्वपूर्ण है। बच्चों को खाने के लिए प्लेट में रखी हर वस्तु को समाप्त करने की आदत सिखाई जानी चाहिए। साथ-ही-साथ उन्हें समाप्त करने के लिए पर्याप्त समय भी दें।
(iii) भोजन तथा अल्पाहार देने के समय में नियमितता बरती जाए ताकि बच्चे को विधिवत् भूख लगे।
(iv) बच्चे के पसंदीदा भोजन के साथ-साथ व्यंजन-सूची (मेन्यू) में नयी-नयी चीजें रखें। भोजन में रुचि जागृत करने के लिए सख्त, मुलायम एवं रंगीन भोज्य पदार्थों के मध्य संतुलन को बनाए रखना चाहिए।
(v) व्यंजन-सूची (मेन्यू) में ऐसे व्यंजन रखे जाएँ जिन्हें आसानी से खाया जा सके जैसे कि हाथ से खाए जाने वाले भोजन के रूप में छोटे-छोटे सैंडविच, चपाती रोल्स, छोटे आकार के समोसे, इडली, पूरा फल अथवा उबला हुआ अंडा।
(vi) एक स्थान पर ही बच्चे को भोजन परोसिए न कि बच्चा जब इधर-उधर घूम रहा हो तब उसे भोजन दिया जाए। आप बच्चे के शारीरिक सुविधा के अनुसार उसके बैठने के लिए उपयुक्त स्थान चुन सकते हैं।
(vii) इन सबसे अच्छा बच्चे को भोजन से पहले आराम करने दें। थका हुआ बच्चा भोजन में रुचि नहीं ले सकता।
(viii) यह सुझाव भी है कि आप बच्चे को कोई विशेष खाद्य पदार्थ खाने के लिए किसी प्रकार का लालच या दंड कभी भी न दें।
(घ) पोषण संबधी मुद्दों सहित विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सहायता करने के लिए उन पहलुओं की व्याख्या कीजिए जिन्हें आप ध्यान में रखागे-
(i) प्रेक्षण (निगरानी)।
उत्तर: प्रेक्षण – भोजन के समय बच्चे के व्यवहार एवं प्रगति पर बारीकी से निगाह रखिए। भोजन, भोजन के प्रति रुचियों और अरुचियों, एलर्जी तथा किसी विशिष्ट स्थिति से निपटने में उसकी योग्यता पर ध्यान दीजिए। उन्हें उस कौशल को विकसित करने में मदद कीजिए जिसकी उन्हें पर्याप्त पोषण प्राप्त करने एवं भोजन करने के समय का सुखद अनुभव करने की आवश्यकता है।
(ii) शारीरिक गतिविधियाँ।
उत्तर: स्वस्थ खान-पान एवं शारीरिक गतिविधि साथ-साथ चलती है तथा 45-60 मिनट की सीमित गतिविधि में अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं। सीमित समय के लिए टेलीविजन देखने दें और खेल को बढ़ावा दें। बच्चों को विद्यालय एवं समुदाय की पाठ्येतर गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए माता-पिता को सक्रिय जीवन शैली एवं स्वस्थ खान-पान के तरीकों का एक आदर्श बनना होगा।
(iii) खाने के कौशल का विकास।
उत्तर: अशक्त बच्चों को भोजन करने के लिए अधिक समय की आवश्यकता की संभावना रहती है। वे प्रायः स्वयं को खिलाने के लिए संघर्ष करते हैं तथा भोजन इधर-उधर बिखेरकर बड़ी अव्यवस्था देते हैं। सीखने की प्रक्रिया के दौरान गलती करने के लिए उन्हें भी दण्डित न करें। (उन्हें प्रेरित करने और अवरोध से बचने के लिए मात्र सकारात्मक प्रतिबल पर जोर दें।)
सुनिश्चित कीजिए कि बच्चा आरामदायक स्थिति से बैठा है और यदि वह स्वयं खा सकता/सकती है तो उसे आप स्वयं खाने दें। इस तरह के कौशल को विकसित करने में उनकी सहायता करें।
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है उसे जटिल संरचनाओं वाले खाद्य को स्वयं ही अच्छी तरह खाने दें। यदि आवश्यकता पड़े तो अनुकूलित उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
बच्चे की खाद्य वरीयता, भोजन स्थल का चुनाव तथा वह खाना चाह रहा है या नहीं आदि बातों का सम्मान कीजिए। खान-पान का समय नियमित करने का प्रयास कीजिए।
विशेष आहार कुछ बच्चों को उनकी योग्यता के आधार पर उनके आहारों एवं दैनिक आहार के समय में परिवर्तन की आवश्यकता पड़ सकती है। स्पास्टिक बच्चों को विभिन्न संरचनाओं वाला खाद्य पदार्थ अप्रिय लग सकता है।
(iv) विविधता।
उत्तर: हम जानते हैं कि कोई भी एक भोजन निर्धारित मात्रा में सभी पोषक तत्व प्रदान नहीं कर सकता जिनकी बच्चे को प्रतिदिन आवश्यकता पड़ती है। अतः विविध प्रकार के भोजन या खाद्य पदार्थ खाना सबसे अधिक तर्कसंगत पोषण संदेश है। विविधता होने से नए खाद्य पदार्थों को स्वीकार किए जाने की संभावना भी बढ़ जाती है।
(v) विशेष आहार।
उत्तर: कुछ बच्चों को उनकी योग्यता के आधार पर उनके आहारों एवं दैनिक आहार के समय में परिवर्तन की आवश्यकता पड़ सकती है। स्पास्टिक बच्चों को विभिन्न खाद्य
संरचनाओं वाला खाद्य पदार्थ अप्रिय लग सकता है। पतले तरल पदार्थ को गाढ़ा किया जा सकता है तथा सूखे अथवा ढेलेदार भोजन को टुकड़ों में काटा अथवा मुलायम बनाया जा सकता है ताकि इसे बच्चा आसानी से निगल सके। यदि आवश्यकता पड़े तो फ़ीडिंग ट्यूब का इस्तेमाल किया जा सकता है।
कुछ अशक्त बच्चों में मोटे होने की प्रवृत्ति होती है जिससे भोजन करना कठिन हो जाता है। स्वलीनता रोग (ऑटिज्म) वाले बच्चों में स्वाद अथवा गंध की इंद्रियाँ परिवर्तित हुई होती हैं जिसके कारण भोजन ग्रहण करने के उनके गुण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। उनकी पसंद को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त वसा, सीमित तरल पदार्थ, विशेष फार्मूला अथवा अन्य आहार संबंधी परिवर्तन किए जा सकते हैं।
वे सभी खाद्य पदार्थ जिसके प्रति विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चे को एलर्जी है, उन्हें उसके आहार से तुरंत हटा दिया जाए क्योंकि इससे नुकसान हो सकता है।
(ङ) परिवार, संचार माध्यम एवं दोस्त बच्चों को भोजन की मात्रा को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर: परिवार, संचार माध्यम और दोस्त बच्चों के भोजन की मात्रा को कई तरह से प्रभावित करते हैं:
(i) परिवार का प्रभाव:
बच्चे आमतौर पर परिवार के सदस्यों की भोजन संबंधी आदतों को अपनाते हैं। यदि माता-पिता संतुलित और पौष्टिक आहार लेते हैं, तो बच्चे भी उसी प्रकार का भोजन करने के लिए प्रेरित होते हैं।
भोजन का समय और उसके प्रकार भी परिवार के नियमों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, कुछ परिवार तीन समय भोजन करते हैं, जबकि कुछ में स्नैक्स का भी विशेष महत्व होता है।
माता-पिता बच्चों को स्वस्थ खाद्य पदार्थों के प्रति जागरूक कर सकते हैं और उन्हें संतुलित आहार की आदत डाल सकते हैं।
(ii) संचार माध्यमों (मीडिया) का प्रभाव:
विज्ञापन और टेलीविजन पर दिखाई जाने वाली खाद्य सामग्री बच्चों की पसंद और खाने की मात्रा को प्रभावित कर सकती है। जंक फूड और शर्करायुक्त पेय पदार्थों का आकर्षक विज्ञापन बच्चों को अस्वस्थ भोजन की ओर प्रेरित कर सकता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और फूड ब्लॉग्स से भी बच्चों की खाने की आदतें प्रभावित होती हैं, जिससे वे नए व्यंजनों को आजमाने के इच्छुक होते हैं।
(iii) दोस्तों का प्रभाव:
बच्चे अपने दोस्तों की भोजन संबंधी आदतों से प्रभावित होते हैं। यदि उनके मित्र स्वस्थ आहार लेते हैं, तो वे भी उसी तरह खाने की कोशिश कर सकते हैं।
स्कूल और खेल के मैदान में साथी बच्चों के साथ मिलकर भोजन करने की प्रवृत्ति भी उनके खाने की मात्रा को निर्धारित करती है।
यदि किसी समूह में जंक फूड अधिक पसंद किया जाता है, तो बच्चा भी उस प्रवृत्ति को अपनाने की संभावना रखता है।
अतः, बच्चों के भोजन की मात्रा और प्रकार परिवार, मीडिया और दोस्तों के प्रभावों से तय होते हैं। इसलिए, माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के खानपान पर ध्यान दें और उन्हें स्वस्थ विकल्पों के प्रति प्रेरित करें।

Hi! my Name is Parimal Roy. I have completed my Bachelor’s degree in Philosophy (B.A.) from Silapathar General College. Currently, I am working as an HR Manager at Dev Library. It is a website that provides study materials for students from Class 3 to 12, including SCERT and NCERT notes. It also offers resources for BA, B.Com, B.Sc, and Computer Science, along with postgraduate notes. Besides study materials, the website has novels, eBooks, health and finance articles, biographies, quotes, and more.