NCERT Class 11 Home Science Chapter 8 उत्तरजीविता, वृद्धि तथा विकास

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NCERT Class 11 Home Science Chapter 8 उत्तरजीविता, वृद्धि तथा विकास

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Chapter: 8

मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान भाग – II

इकाई – (III) बाल्यावस्था

क्रियाकलाप – 3

ऊपर दिया गया चित्र आपके समक्ष एक सामान्य वृद्धि वक्र प्रस्तुत करता है। अब निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें-

1. किसी बच्चे को गंभीर अतिसार हो जाए तो इस वृद्धि वक्र की क्या स्थिति होगी?

उत्तर: गंभीर अतिसार (डायरिया) के कारण बच्चे का वज़न कम हो जाएगा, जिससे वृद्धि वक्र में गिरावट देखने को मिलेगी। यदि उपचार न मिले, तो यह गिरावट जारी रह सकती है, और वक्र सामान्य विकास से भिन्न हो जाएगा।

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2. एक कुपोषित बच्चे को दो माह के लिए अच्छा भोजन दिया जाए तो वृद्धि वक्र में क्या अंतर आएगा?

उत्तर: यदि कुपोषित बच्चे को संतुलित और पोषण युक्त आहार दिया जाए, तो उसकी वृद्धि दर में सुधार होगा। इसका प्रभाव यह होगा कि वृद्धि वक्र ऊपर की ओर मुड़ जाएगा, और बच्चे का वजन धीरे-धीरे सामान्य वृद्धि वक्र के करीब आ सकता है।

अंत में कुछ प्रश्न

1. वृद्धि तथा विकास के बीच अंतर बताइए। उदाहरण देते हुए विकास के विभिन्न क्षेत्रों की परिभाषा लिखिए।

उत्तर: वृद्धि तथा विकास के बीच अन्तर-वृद्धि तथा विकास के बीच प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं:

(i) वृद्धि का संबंध आकार या परिमाण से है; अर्थात ऐसे भौतिक परिवर्तन जिन्हें मापा जा सकता है। विकास का संबंध गुणवत्ता से है।

(ii) वज़न, लंबाई, तथा आंतरिक अंगों के आकार में बढ़ोतरी, वृद्धि है। पर वृद्धि केवल हमारे शरीर के आकार की ही नहीं होती। ऐसा होता तो एक नवजात शिशु बीस वर्ष की आयु के बाद केवल एक बड़ा शिशु ही होता। आकार में वृद्धि के साथ-साथ, अंगों के स्वरूप तथा संरचना में परिवर्तन होता है, उनके कार्य में बदलाव आता आता है।

(iii) वृद्धि का संबंध मुख्यतः शारीरिक परिवर्तनों से है, जबकि विकास एक साथ अनेक आयामों में होता है। शिशु की सोचने की क्षमताओं का विकास होता है, वह लोगों के साथ संबंध बनाता है, अपनी भावनाओं को समझना तथा नियंत्रित करना सीखता है, बोलने के क्रम में वाक्य संरचना का विन्यास बदलने लगता है। अर्थात्, बहुमुखी विकास होता है।

(iv) समय के साथ-साथ शारीरिक संरचनाओं, मनोवैज्ञानिक लक्षणों, व्यवहारों, सोचने के तरीकों, तथा जीवन की मांग के अनुसार स्वयं को ढालने की सुव्यवस्थित पद्धतियों के रूप में हम विकास को परिभाषित करते हैं।

(v) वृद्धि एक निश्चित अवधि के पश्चात् रुक जाती है, जबकि विकास एक सतत् प्रक्रिया है जो जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त चलता रहता है।

(vi) वृद्धि से संरचना परिवर्तन का बोध होता है, जबकि विकास से प्रकार्यों में परिवर्तन का बोध होता है।

विकास के विभिन्न क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

(i) शारीरिक विकास: शारीरिक विकास का संबंध गर्भधारण के समय से लेकर आगे तक शरीर की संरचना तथा अनुपात में भौतिक परिवर्तनों से है।

(ii) क्रियात्मक विकास: क्रियात्मक (मोटर) विकास का संबंध शारीरिक गतिविधियों पर नियंत्रण से है, जिसके कारण शरीर के विभिन्न भागों के बीच समन्वयन बेहतर होता जाता है। शारीरिक वृद्धि से शरीर बढ़ता है, तो क्रियात्मक (मोटर) विकास में शरीर का सहज, नियंत्रित तथा प्रभावी विकास होता है। गतिविधियों पर नियंत्रण का अर्थ शरीर की पेशियों की गतिविधि पर नियंत्रण है। क्रियात्मक विकास दो प्रकार के होते हैं- स्थूल क्रियात्मक विकास, और सूक्ष्म क्रियात्मक विकास। स्थूल क्रियात्मक विकास का संबंध शरीर की बड़ी मांसपेशियों की गतिविधियों पर नियंत्रण से है; जैसे कंधे, जांघों, ऊपरी भुजा, निम्न भुजा, उदर तथा पीठ की पेशियों की गतिविधियाँ, आदि। इस नियंत्रण के परिणामस्वरूप हम बैठ सकते हैं, झुक सकते हैं, चल सकते हैं तथा अपनी पूरी भुजा को हिला सकते हैं। सूक्ष्म क्रियात्मक विकास का संबंध शरीर की छोटी पेशियों पर नियंत्रण से है; जैसे – कलाई, अंगुलियाँ या अंगूठे की पेशियाँ। इस नियंत्रण के परिणामस्वरूप, हम लिख सकते हैं, पुस्तक के पन्ने पलट सकते हैं, सिलाई तथा बुनाई कर सकते हैं।

(iii) संवेदनात्मक विकास: संवेदनात्मक विकास का संबंध देखने, सुनने, सूँघने, स्पर्श करने तथा स्वाद महसूस करने की संवेदी क्षमताओं के विकास से है। हालांकि शिशु के जन्म के समय से ही उसकी संवेदनात्मक क्षमताएँ पर्याप्त रूप से विकसित होती हैं, आयु बढ़ने के साथ-साथ ये और अधिक परिष्कृत तथा विकसित होती जाती हैं। उदाहरणार्थ, कोई नवजात शिशु किसी चेहरे या वस्तु पर अपनी आँखें तभी केंद्रित करता है जब वे चेहरे आठ इंच तक की दूरी पर होते हैं। क्रमिक रूप से बच्चों की देखने की क्षमता विकसित होती जाती है, जिससे वे अपनी आँखें दूरस्थ या निकटस्थ वस्तुओं पर केंद्रित करने लगता है।

(iv) संज्ञानात्मक विकास: संज्ञानात्मक विकास का संबंध बच्चों के जन्म से लेकर सोचने-विचारने की क्षमताओं के प्रकट होने तक से है। जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसके सोचने-विचारने के तरीकों में गुणात्मक अंतर आता जाता है। सोचने-विचारने के हमारे तरीकों में ये अंतर हमारी मानसिक संरचनाओं तथा अनुभवों को समझने में आए बदलावों के कारण आता है। इसे संज्ञानात्मक विकास कहा जाता है। उदाहरण के लिए शिशु ऐसे व्यवहार करता है जैसे उसकी आँखों से ओझल वस्तु का कोई अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु वही शिशु डेढ़-दो वर्ष की आयु में सब समझने लगता है, चाहे वस्तु उसकी आंखों से ओझल हो या सामने।

(v) भाषा संबंधी विकास: भाषा संबंधी विकास का संबंध उन परिवर्तनों से है जो शिशु को, (जो जन्म के समय केवल रो ही सकता था) दूसरों की भाषा समझने तथा जटिल वाक्यों को बोलने में समर्थ बनाते हैं।

(vi) सामाजिक विकास: सामाजिक विकास का संबंध उन योग्यताओं के विकास से है जो किसी व्यक्ति को समाज की प्रत्याशाओं के अनुरूप व्यवहार करने, लोगों के साथ रखने में समर्थ बनाती हैं।

(vii) भावनात्मक विकास: भावनात्मक विकास का संबंध भावनाओं के उभरने तथा उन्हें व्यक्त करने के, समाज स्वीकृत तौर-तरीकों को सीखने से है।

(viii) व्यक्तिगत विकास: व्यक्तिगत विकास का संबंध स्वयं से है, इसमें उसके अपने विचार का विकास शामिल है कि वह कौन है; उसके पास कौन से व्यक्तिगत गुण तथा कौशल हैं तथा अपने भविष्य के लिए उसकी क्या आकांक्षाएँ हैं।

2. बच्चे के जन्म के समय से लेकर उसके किशोरावस्था को पूर्ण करने तक बच्चे की स्वस्थ वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए किन स्थितियों तथा संसाधनों की आवश्यकता होती है?

उत्तर: बच्चे की स्वस्थ वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए निम्नलिखित स्थितियों और संसाधनों की आवश्यकता होती है:

(i) शारीरिक स्वास्थ्य और पोषण।

माँ और शिशु के लिए उचित प्री-नेटल और पोस्ट-नेटल देखभाल।

संतुलित आहार जिसमें प्रोटीन, विटामिन, खनिज और कैलोरी हों।

स्वच्छ पानी और उचित स्वच्छता।

नियमित टीकाकरण और स्वास्थ्य जांच।

(ii) मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक विकास।

माता-पिता और देखभाल करने वालों का स्नेह और सुरक्षा।

सकारात्मक सामाजिक संपर्क और संचार कौशल का विकास।

आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन और सहयोग।

(iii) शैक्षिक और बौद्धिक विकास।

उपयुक्त आयु के अनुसार खेल और शैक्षिक गतिविधियाँ।

प्रारंभिक बचपन शिक्षा और स्कूल शिक्षा।

रचनात्मकता और समस्या-समाधान कौशल को बढ़ाने वाले अवसर।

(iv) सामाजिक और नैतिक विकास।

परिवार और समाज के साथ स्वस्थ संबंध।

नैतिक मूल्यों की शिक्षा और सामाजिक नियमों की समझ।

अनुशासन और आत्म-नियंत्रण का विकास।

(v) पर्यावरणीय और आर्थिक संसाधन।

सुरक्षित और पोषणकारी पारिवारिक और सामाजिक वातावरण।

आर्थिक स्थिरता ताकि बच्चे की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित रहने की जगह।

इन सभी कारकों का संतुलित विकास बच्चे को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से स्वस्थ बनाने में सहायक होता है।

3. क्या आप यह कह सकते हैं कि नवजात शिशु असहाय होता है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण बताइए।

उत्तर: नवजात शब्द का प्रयोग हाल ही में जन्मे बच्चे के जीवन के प्रथम माह के संदर्भ में होता है। हमारी प्रवृत्ति नवजात बच्चों को असहाय समझने की है। हालांकि यह सत्य है कि वे पूर्णतया वयस्कों पर निर्भर होते हैं, परंतु यह भी सत्य है कि उनमें अनेक ऐसी क्षमताएँ होती हैं जो उन्हें अपने आस-पास के परिवेश के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित करने में सहायता करती हैं। वे उससे कहीं अधिक सचेत होते हैं जितना कि हम कल्पना करते हैं।

(क) प्रतिवर्ती क्रियाएँ – नवजात शिशुओं में जन्म के समय ही कुछ प्रतिवर्ती क्रियाएँ होती हैं जो उन्हें उस समय तक जीवित रहने तथा उसे अनुकूलित करने में सहायता करती है जब तक कि उनकी क्रियात्मक (मोटर) क्षमताओं का विकास नहीं हो जाता। प्रतिवर्त साधारण, अनसीखी अनुक्रियाएँ हैं जो कुछ प्रकार के उद्दीपनों के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होती हैं। उनके लिए मस्तिष्क के उच्चतर कार्य की आवश्यकता नहीं होती- वे बिना सोच-विचार के घटित होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे स्वतः ही घटित हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई चीज़ आप की आँख को स्पर्श करती है तो आप आँख का संरक्षण करने के लिए स्वतः ही पलक को झपका लेते हैं- यह आंख झपकाने का प्रतिवर्त है। नवजात शिशु में अन्य प्रतिवर्त होते हैं जैसे, चूषण प्रतिवर्त जो दुग्धपान में सहायता करता है, निष्कासन रिफ्लेक्स जो मूत्र त्याग और मल त्याग में सहायता करता है।

(ख) संवेदनात्मक क्षमताएँ – जन्म के समय सबसे अधिक विकसित, संवेदांग दृष्टि होती है। नवजात शिशु प्रकाश तथा अंधेरे के बीच भेद कर सकता है तथा सक्रियतापूर्वक प्रकाश की खोज करता है। वे किसी गतिशील वस्तु का पीछा अपनी आँखों से कर सकते हैं। उसका सर्वोत्तम संकेन्द्रण तब होता है जब कोई वस्तु / व्यक्ति उनके चेहरे से लगभग 8 इंच की दूरी पर होती है। शिशु मानव चेहरे पर संकेन्द्रण करने के लिए पहले से तैयार रहता है।

4. जन्म से लेकर दस वर्ष की आयु तक के क्रियात्मक विकास के क्रम का वर्णन कीजिए।

उत्तर: जन्म से लेकर दस वर्ष की आयु तक का क्रियात्मक विकास क्रम:

क्र. सं.आयु उपलब्धि का स्वरूप
1.जन्म से 2 माह तकसिर को उठाना और उठाए रखना
2.नवजात नवजात शिशु अपने सिर को थोड़ा-सा इधर-उधर हिला सकते हैं।
3.1 माह वे अपना सिर उठा सकते हैं।
4.6 माह वे पेट के बल लेटे हुए अपनी छाती को ऊपर उठा सकते हैं (अधोमुख स्थिति)।
5.3 माह शिशु अपना सिर उठाकर टिकाना शुरू कर देता है और यह विकास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यदि शिशु ऐसा 6 माह की आयु तक भी करने में असमर्थ रहता है तो यह दर्शाता है कि विकास में विलम्ब हो रहा है।
6.4 – 6 माह वह पीठ से पेट के बल तथा पेट से पीठ के बल उलटा-सीधा हो सकता है।
7.6 – 8 माह वह किसी बड़े व्यक्ति (वयस्क) की सहायता से अथवा सहारा देने वाली पट्टी के सहयोग से बैठ सकता है।
बिना सहायता के बैठ सकता है।
8.8 – 9 माह रेंगना (घुटनों के बल चलना); यद्यपि कुछ बच्चे रेंगते घुटनों के बल नहीं चलते तथा बैठना सीखने के पश्चात सीधे खड़ा होना सीख लेते हैं।
किसी के सहारे खड़ा होना अथवा किसी चीज को पकड़कर खड़े होना।
9.10 – 11 माह बैठने की स्थिति से उठकर खड़ा हो सकता है. थोड़े से समय के लिए अपने आप स्वतंत्र रूप से खड़ा हो सकता है।
10.12 – 18 माह चलना (आरम्भ में बच्चे की चाल असंतुलित होती है किंतु धीरे-धीरे उसमें संतुलन आ जाता है।)
भागना ( चलना सीखने के पश्चात बच्चा भागना शुरू करता है तथा प्रायः गिरता रहता है। जैसे जैसे उसका संतुलन बनता जाता है वह 2 वर्ष की आयु तक वार-बार बिना गिरे अधिक समन्वित रूप से भागने में समर्थ हो जाता है।
11.18 – 24 माह किसी का हाथ पकड़कर दोनों पैर प्रत्येक सीढ़ी पर रखते हुए सीढ़ियाँ चढ़ना।
12.2 बर्ष उलटा चलना, फिसल कर नीचे खिसकना, सीढ़ी पर चढ़ना।
किसी कम ऊँचाई वाले चबूतरे से दोनों पैरों के सहारे नीचे छलांग लगाना।
13.3 वर्ष एक पैर पर सतुलन करना।बड़ी गेंद को ठोकर मारना।गेंद फेंकना तथा पकड़ना।
14.3 – 4 वर्ष वह वयस्कों की भाति एक-एक पैर रख कर किसी सहारे को पकड़ कर सीढ़ी पर ऊपर की और चढ़ सकता है।
15.5 वर्ष उछल कूद करना तथा तिपहिया साइकिल को पैडल मार कर चलाना।
16.6 बर्ष भलीभांति समन्वित ढंग से कूदना, छलांग लगाना तथा चढ़ना।
17.7 वर्ष संतुलन बनाना तथा दुपहिया साइकिल को पैडल मार कर चलाना।
18.8 – 10 वर्ष उसमें संतुलन, समन्वय तथा शक्ति आ जाती है जो विभिन्न खेलों तथा जिमनास्टिक्स में बच्चे को प्रतिभागिता हेतु सक्षम बनाती है।

5. स्पष्ट करें कि शिशु के जन्म के प्रथम वर्ष में अपनी देखभाल करने वालों के साथ लगाव किस प्रकार विकसित होता है।

उत्तर: शिशु जन्म के पहले दिन से ही ऐसे व्यवहार प्रदर्शित करता है, जो देखभाल करने वालों को उसकी ओर आकृष्ट करते हैं। वहीं, देखभाल करने वाले भी स्नेह और सुरक्षा प्रदान कर शिशु से जुड़ने का प्रयास करते हैं। इस परस्पर क्रिया से शिशु और देखभाल करने वालों के बीच गहरा भावनात्मक संबंध विकसित होता है।

(i) देखभाल देखभाल करने वालों के साथ शिशु का काफ़ी शारीरिक संपर्क रहता है। हम बच्चों को न केवल दैनिक क्रियाकलापों के दौरान गोद में उठाना चाहते हैं बल्कि उन्हें इसलिए भी गोद में उठाते हैं कि हमें इसमें आनंद आता है। शिशुओं को शारीरिक संपर्क की अंतर्जात आवश्यकता होती है तथा जब देखभाल करने वाले बच्चे को उठाते हैं तो वे उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति करते हैं।

(ii) वयस्क व्यक्ति तथा बड़े बच्चे शिशुओं से बातचीत करते समय, एक विशेष प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं। इसे मदरीज़ (माता समान) कहा जाता है। इसमें बहुत छोटे वाक्य, सरल शब्द, आवाज़ के कुछ उतार-चढ़ाव तथा निरर्थक ध्वनियाँ जैसे ‘टप-टप’ की आवाज़ शामिल होते हैं, ऐसी भाषा शिशु को प्रसन्न करती है तथा वह कूकू कर के या तुतला कर अनुक्रिया करता है।

(iii) हम शिशु को देख कर मुस्कराते हैं तथा हमें मुस्कराता देखकर शिशु भी मुस्कराता, कूकू करता तथा तुतलाता है।

(iv) देखभाल करने वाले शिशु को निरंतर देखना पसंद करते हैं जिससे देखभाल करने वाले तथा शिशु के बीच एक संचार स्थापित हो जाता है। इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को देखना दोनों के बीच एक कड़ी स्थापित करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है तथा सामाजिक-भावात्मक परस्पर क्रियाओं के प्रथम स्वरूपों में से एक है।

(v) शिशु से बातचीत करते समय देखभाल करने वाले अपने चेहरे पर कुछ हाव-भाव लाते हैं तथा यह शिशु को विभिन्न भावात्मक अभिव्यक्तियों में अंतर करना सीखने में सहायता करता है।

(vi) देखभाल करने वाले शिशु के साथ परस्पर क्रिया करते समय अनेक लयात्मक क्रियाएँ भी करते हैं। हम सिर को हिलाते. इधर-उधर झटकते हैं तथा उसे आगे की ओर झुकाते हैं। हमारी कुछ क्रियाएँ तथा ध्वनियों, जैसे झूला झूलाना तथा हिलाना-डुलाना बच्चे को सुखद लगता है।

(vii) देखभाल करने वाले शिशु के साथ उसके थोड़ा सा बड़ा होने पर सरल खेल भी खेलते हैं, उदाहरणार्थ पीक एव (लुकाछिपी) सभी संस्कृतियों में एक आम खेल है।

(viii) जिस प्रकार देखभाल करने वाले शिशु के साथ संचार करते हैं, शिशु भी सामाजिक संपर्क बनाने के लिए व्यवहार आरम्भ करते हैं। जब शिशु असहज होने पर चिल्लाते या रोते हैं तो माँ दौड़ी आती है। जब वे अपनी स्वयं की पहल पर कूकू करते, कुलबुलाते, मुस्कराते या निहारते हैं तो ये व्यवहार देखभाल करने वालो में संरक्षणात्मक भावना सृजित करते हैं।

6. अनुशासन निर्माण में शक्ति-उन्मुखी तथा स्नेह-उन्मुखी दृष्टिकोण के बीच अंतर बताइए। आपकी राय में, बेहतर दृष्टिकोण कौन-सा है और क्यों?

उत्तर: अनुशासन निर्माण में शक्ति-उन्मुखी तथा स्नेह-उन्मुखी दृष्टिकोण के बीच अंतर:

अनुशासन निर्माण में शक्ति-उन्मुखी और स्नेह-उन्मुखी दृष्टिकोण दो भिन्न तरीकों को दर्शाते हैं। शक्ति-उन्मुखी दृष्टिकोण में माता-पिता कठोर अनुशासन अपनाते हैं, जिसमें बच्चे को बिना कोई तर्क दिए आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता है। इसमें डर, धमकी और कभी-कभी शारीरिक दंड का उपयोग किया जाता है, जिससे बच्चे में भय, असुरक्षा और विद्रोह की भावना उत्पन्न हो सकती है। इसके विपरीत, स्नेह-उन्मुखी दृष्टिकोण में माता-पिता बच्चे को अनुशासन सिखाने के दौरान संवाद, समझ और सहानुभूति का प्रयोग करते हैं। वे कठोरता के बजाय प्रेमपूर्वक सही और गलत का अंतर समझाते हैं, जिससे बच्चा नैतिक रूप से सशक्त बनता है और आत्म-अनुशासन विकसित करता है।

बेहतर दृष्टिकोण और उसका प्रभाव:

स्नेह-उन्मुखी अनुशासन दृष्टिकोण अधिक प्रभावी और लाभदायक माना जाता है क्योंकि यह बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास में सकारात्मक भूमिका निभाता है। जब बच्चे को तर्क और कारण के माध्यम से अनुशासन सिखाया जाता है, तो वह खुद निर्णय लेने और अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी लेने की क्षमता विकसित करता है। इससे उसमें आत्मविश्वास, सहानुभूति और नैतिकता जैसी महत्वपूर्ण विशेषताएँ पनपती हैं। इसके विपरीत, शक्ति-उन्मुखी दृष्टिकोण बच्चे को या तो डरपोक बना सकता है या फिर उसे विद्रोही बना सकता है, जिससे उसके व्यक्तित्व विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए, माता-पिता को दंड के बजाय संवाद और प्रेम से अनुशासन सिखाने का तरीका अपनाना चाहिए, ताकि बच्चा एक संतुलित और जिम्मेदार व्यक्ति बन सके।

या

बच्चे के लालन-पालन की उन प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए जो बच्चों के सर्वतोन्मुखी विकास में योगदान देती हैं।

उत्तर: माता-पिता अपने बच्चों का लालन-पालन किस प्रकार करते हैं, इस बात का बच्चों के व्यक्तित्व पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है। हम सब उसी प्रकार व्यवहार करना सीखते हैं जैसा हमारे समाज में उपयुक्त माना जाता है। हम यह अपने माता-पिता तथा अपने आस-पास के लोगों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से कहने पर अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दूसरों को उस तरीके से व्यवहार करते हुए देखने के परिणामस्वरूप सीखते हैं। वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा बच्चे ऐसे व्यवहार, कौशल, मान्यताएँ, धारणाएँ तथा मानक सीखते हैं जो उनकी संस्कृति में लाक्षणिक, उपयुक्त तथा वांछनीय होते हैं, समाजीकरण कहलाता है।

बच्चे के लालन-पालन में अभिभावक ‘उत्साह’ तथा ‘उपेक्षा’ की प्रक्रियाओं द्वारा, या ‘प्रतिबंधात्मक या अनुमतिदाता’ की प्रक्रियाओं द्वारा करते हैं। इसी प्रकार वे अनुशासन हेतु शक्ति-उन्मुखी या स्नेह-उन्मुखी दृष्टिकोण अपनाते हैं।

सामान्यतः हम यह कह सकते हैं कि माता-पिता और देखभाल करने वाले अपने बच्चों में उन गुणों को तभी डाल सकते हैं जब वे स्वयं उन्हें अपने आचरण में अपनाएँ, बच्चे को अनुशासित करने के लिए दण्ड, खासतौर से शारीरिक दण्ड का प्रयोग न करें तथा वांछनीय व्यवहार निर्दिष्ट करने के लिए स्पष्टीकरण का सहारा लें। बच्चे के लालन-पालन की यह प्रणाली बच्चे के सर्वन्तोमुखी व्यक्तित्व को आकार देने में योगदान देती है।

7. संज्ञानात्मक विकास के निम्नलिखित चरणों में से प्रत्येक की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें –

(i) संवेदी क्रियात्मक चरण।

उत्तर: संवेदी क्रियात्मक चरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. विकास का यह चरण जन्म से लेकर दो वर्ष की आयु तक रहता है। 

2. इस अवधि के दौरान, शिशु अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से तथा अपनी क्रियात्मक क्षमताओं (अर्थात क्रियाओं) के माध्यम से परिवेश को समझने का प्रयास करते हैं- इसीलिए इसे विकास की संवेदी क्रियात्मक अवधि कहा जाता है।

3. बच्चे में चूषण प्रतिवर्त सहित अनेक प्रतिवर्त होते हैं। 

4. दो माह की आयु का होने पर शिशु अपने आस-पास की वस्तुओं में रुचि प्रकट करने लगता है। तीन माह की आयु तक वह समझने लगता है कि दूसरों की क्रियाओं से क्या संकेत मिलता है।

शिशु में कारण-प्रभाव की समझ और मानसिक विकास:

4-8 माह की आयु में शिशु यह समझने लगता है कि उसकी क्रियाओं का प्रभाव पड़ता है, जैसे पैर मारने से गेंद हिलती है या वस्तु गिराने से आवाज होती है। 8-12 माह के बीच वह जानबूझकर क्रियाएँ करने लगता है, यह समझते हुए कि किस क्रिया का क्या परिणाम होगा। 12-18 माह में वह अलग-अलग तरीकों से कार्य करने के प्रयास करता है, जैसे खिलौने को विभिन्न ऊँचाइयों से गिराकर उसके प्रभाव को देखना। 18-24 माह की आयु में एक महत्वपूर्ण विकास होता है, जब शिशु मानसिक रूप से वस्तुओं, घटनाओं और लोगों को स्मरण करने लगता है। यह मानसिक निरूपण की क्षमता का संकेत है, जिससे वह अपने दिमाग में चित्र और विचार बना सकता है।

(ii) पूर्व प्रचालनात्मक चरण।

उत्तर: पूर्व-प्रचालनात्मक चरण बच्चे के ज्ञानात्मक विकास के पूर्व-प्रचालनात्मक चरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. 2-7 वर्ष – इस चरण तथा पूर्ववर्ती चरण के बीच महत्वपूर्ण अंतर यह है कि इस अवधि के दौरान बच्चा प्रारंभिक संकल्पनाएँ विकसित करना आरम्भ कर देता है।

2. प्रारंभिक संकल्पनाएँ बनाना– इस अवधि के दौरान बच्चा प्रारंभिक संकल्पनाएँ विकसित करना आरम्भ कर देता है। वह बनावट, स्थान, आकार, समय, दूरी, गति, संख्या, रंगों, क्षेत्र, मात्रा, भार, सजीव, निर्जीव, लंबाई, तापमान आदि के आधार पर – उस प्रत्येक वस्तु की, जिसे वह अपने परिवेश में देखता हैं, आरम्भिक संकल्पनाएं बना लेता है।

3. संरक्षण बनाए रखना– इस शब्द का अर्थ यह है कि किसी पदार्थ की मात्रा समान रहती है भले ही इसका आकार परिवर्तित कर दिया जाए अथवा यदि उसे एक पात्र से दूसरे पात्र में स्थानांतरित कर दिया जाए। उदाहरण के तौर पर, समान व्यास तथा ऊँचाई के दो गिलास लें तथा उनमें एक ही स्तर तक पानी डालें। तब, बच्चे के सामने इन में से एक गिलास का पानी किसी तीसरे संकरे गिलास में डाल दें, स्वभावतः पानी का स्तर संकरे गिलास में बढ़ जाएगा। जैसे-जैसे बच्चा 6-7 वर्ष की आयु का होने लगता है,वह इस विचार को बनाए रखने में समर्थ हो जाता है।

4. क्रमांकन – इस का अर्थ है वस्तुओं को क्रमानुसार रखने का कार्य करना। इसका एक सामान्य उदाहरण लंबी से छोटी या इसके उल्टे क्रम में विभिन्न आकारों की पाँच पेंसिलों को व्यवस्थित करना है। पूर्व विद्यालयी आयु का बच्चा तीन पेंसिल सही क्रम में रख सकता है (अर्थात उन्हें क्रमांकित कर सकता है), चौथी पेंसिल के बारे में संदेहपूर्ण होगा तथा पाँचवीं पेंसिल के संबंध में विफल रहेगा।

5. किसी अन्य व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य (नज़रिए) को समझना – इस अवस्था में बच्चा स्थिति के एक ही पहलू पर ध्यान केंद्रित करता है तथा किसी अन्य व्यक्ति के नजरिए से वस्तुओं को समझ या देख नहीं सकता। यदि आप गेंद को किसी ऐसे स्थान पर छिपाते हैं जहाँ से बच्चा उसे नहीं देख सकता किंतु वह कमरे के भिन्न स्थल पर खड़े किसी अन्य व्यक्ति को दिखाई देता है तो बच्चा यह नहीं समझ सकता कि दूसरे व्यक्ति को गेंद नजर आ रही है। पूर्व विद्यालयी बच्चा यह मानकर चलता है कि दूसरे व्यक्ति स्थिति को उसी प्रकार देखते हैं जैसे वह देखता है तथा बच्चे की सोच की इस विशेषता को अहम संकेन्द्रण कहा जाता है। पुनः यह एक सामान्य अनुक्रिया है पूर्व विद्यालयी आयु के अंत तक बच्चा स्थिति को किसी अन्य व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से समझने में समर्थ हो जाता है।

6. जीववाद – इस अवस्था में सोच की एक अन्य रोचक विशिष्टता यह है कि बच्चे यह समझते हैं कि प्रत्येक वस्तु में जीवन होता है इसे जीववाद कहते हैं। अतः जब हम उन्हें ऐसे पेड़ों तथा बादलों की कहानियाँ सुनाते हैं तो हम जो बोलते हैं, वे इसे सत्य मान लेते हैं। इन उदाहरणों के प्रयोग से यह स्पष्ट हो जाता है कि बच्चे “अचानक ही” सोचना आरम्भ नहीं कर देते। सोच ज्ञानेन्द्रियों और मस्तिष्क के बढ़ते तालमेल के द्वारा धीरे-धीरे मानसिक कौशलों के उद्भव की प्रक्रिया है।

(iii) ठोस प्रचालनात्मक चरण।

उत्तर: ठोस प्रचालनात्मक चरण बच्चे के ज्ञानात्मक विकास के ठोस प्रचालनात्मक चरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. 7-11 वर्ष – यह अवस्था मध्य बाल्यावस्था के चरण के समरूप है।

2. बच्चा अब मानसिक रूप से कार्यों को प्रतिवर्तित कर सकता है। साथ ही, पूर्व प्रचालनात्मक बच्चा, जो एक समय में एक समस्या के केवल एक ही आयाम पर ध्यान केंद्रित कर सकता है, वहीं ठोस प्रचालनात्मक बच्चा एक ही समय में समस्या के बहुत आयामों या पहलुओं पर खुद को केंद्रित कर सकता है। इस प्रकार, बच्चा किसी भी स्थिति में अथवा किसी भी सामग्री के साथ संरक्षण या क्रमांकन कर सकता है।

3. कम अहम् केन्द्रित-इस अवस्था में बच्चे कम अहम् केन्द्रित होते हैं। वे यह देखते हैं कि विभिन्न लोग विभिन्न स्थितियों तथा विभिन्न मूल्यों के समुच्च्य के कारण एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से अवलोकित कर सकते हैं।इससे सामान्यतः भावनाओं के विकास में विशेषतया सहानुभूति तथा दया की भावनाओं के विकास में सहायता मिलती है।

4. स्थिर संख्या संकल्पना का विकास-इस अवधि के दौरान, बच्चा एक स्थिर संख्या संकल्पना का विकास करता है। वह यह समझ सकता है कि किसी विशिष्ट संख्या से कितनी मात्रा कही गई है तथा वह गिनती में गलतियाँ नहीं करता। वह यह समझ सकता है कि श्रेणियों के विकास के लिए निर्धारित मानदण्ड के आधार पर कोई विशिष्ट वस्तु अनेक श्रेणियों से संबंधित हो सकती है। उनके विचार क्रमबद्ध और तर्कयुक्त हो जाते हैं। वे वर्गीकरण कर सकते हैं तथा सोच-विचार कर सकते हैं।

(iv) औपचारिक प्रचालन चरण।

उत्तर: औपचारिक प्रचालनों का चरण औपचारिक प्रचालनों के चरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. 11-18 वर्ष – बच्चा इस चरण में 11-12 वर्ष की आयु में प्रवेश करता है। वस्तुतः इस चरण पर अब वह बच्चा नहीं रह जाता बल्कि एक किशोर बन जाता है।

2. विचारों के रूप में सोचने की क्षमता का विकास-इस अवस्था में किशोर की अमूर्त रूप में (विचारों के रूप में) सोच सकने की क्षमता का विकास हो जाता है तथा वह अनेक संभावनाओं के बारे में विचार कर सकता है। इस क्षमता के कारण किशोर कल्पना के संसार की खोज कर लेता है। प्राक्काल्पनिक सोच के कारण किशोर विस्तृत कल्पनाओं में डूब जाते हैं जिनमें संसार को बदल देने के विचार शामिल होते हैं। उनकी सोच आदर्शवादी तथा कल्पनालोक की होती।

3. तर्कपूर्ण सोच-किशोरों की सोच अधिक तर्कपूर्ण हो जाती है और उनकी उक्तियाँ अधिक प्रणालीबद्ध हो जाती हैं।

4. प्रभावी ढंग से समस्याओं का समाधान-वे समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से करने लगते हैं। वे प्रणालीबद्ध ढंग से उनका समाधान ढूंढते हैं।

5. अधि-सोच-किशोर अपने स्वयं के विचारों की जाँच करने में अधिक सक्षम हो जाते हैं तथा सोच के बारे में विचार करते हैं इसे अधि-सोच कहा जाता है।

6. काल्पनिक श्रोता समूह का सृजन काल्पनिक श्रोता समूह से तात्पर्य यह है कि किशोर यह मानते हैं कि दूसरे हमेशा उन्हें ही देखते रहते हैं तथा मानते हैं कि वे उनकी प्रत्येक क्रिया तथा कार्य का अवलोकन कर रहे हैं। इससे किशोर अपनी शारीरिक उपस्थित के बारे में चिंतित हो जाते हैं। इस प्रकार किशोर एक काल्पनिक श्रोता समूह का सृजन कर लेते हैं तथा अपने बारे में व्यक्तिगत चोला ओढ़ लेते हैं कि वह दूसरों से भिन्न हैं, अद्वितीय हैं।

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