NCERT Class 11 Home Science Chapter 11 वित्तीय प्रबंधन एवं योजना

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NCERT Class 11 Home Science Chapter 11 वित्तीय प्रबंधन एवं योजना

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Chapter: 11

मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान भाग – II

इकाई – (IV) वयस्कावस्था

अंत में कुछ और अभ्यास

1. बताइए कि निम्नलिखित कथन “सत्य” हैं अथवा “असत्य”।

(i) बजट धन प्रबंधन के अंतर्गत प्रथम चरण है। (सत्य/असत्य) _____________।

उत्तर: सत्य।

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(ii) धन वस्तुओं के आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में कार्य करता है। (सत्य/असत्य) _______________।

उत्तर: सत्य।

(iii) कारोबार तथा उपहार से प्राप्त लाभ आय के रूप हैं। (सत्य/असत्य) _______________।

उत्तर: सत्य।

(iv) व्यक्ति को पहले लागत का आकलन करना चाहिए तत्पश्चात बजट बनाते समय आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं की सूची बनानी चाहिए। (सत्य/असत्य) ____________।

उत्तर: सत्य।

(v) आर्थिक संदर्भ में भौतिक परिसंपत्तियों में बचतें उत्पादक होती हैं। (सत्य/असत्य) _______________।

उत्तर: सत्य।

(vi) कारोबार चक्र में प्रवृत्ति, सुरक्षा के सिद्धांत के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण विचार है। (सत्य/असत्य) _____________।

उत्तर: सत्य।

(vii) किसी निवेश पर विचार करने एवं निर्णय लेते समय समयावधि का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए। (सत्य/असत्य) ______________।

उत्तर: असत्य।

(viii) क्रेडिट के चार सी चरित्र, क्षमता, पूँजी एवं संपार्श्विक हैं। (सत्य/असत्य) ______________।

उत्तर: सत्य।

(ix) उद्यम की प्रकृति महत्वपूर्ण सुरक्षा विचार नहीं है। (सत्य/असत्य) _____________।

उत्तर: असत्य।

अंत में कुछ और प्रश्न

(i) ‘वित्त प्रबंधन’ से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: वित्तीय प्रबंधन का परिवार के संदर्भ में सामान्य अर्थ वित्त के प्रबंधन से है। परिवार को उपलब्ध सभी प्रकार की आय वित्त के अंतर्गत आती है जिनमें वेतन, मजदूरी, किराया, ब्याज, लाभांश, बोनस, सेवानिवृत्ति लाभ तथा अन्य प्रकार की सभी आर्थिक प्राप्तियाँ शामिल हैं। इन सभी प्रकार की आय का उपयोग करने की योजना बनाना, नियंत्रण तथा मूल्यांकन वित्त प्रबंधन कहलाता है। इसका उद्देश्य परिवार को उपलब्ध स्रोतों से अधिकतम संतोष प्रदान करना है। 

जीवन की गुणवत्ता जिसे वित्तीय संसाधनों के बदले प्राप्त किया जा सकता है, केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती है कि कितनी आय उपलब्ध है, अपितु आय की नियमितता तथा स्थिरता पर यह महत्वपूर्ण रूप से निर्भर करती है। इसलिए, स्रोत के रूप में धन के प्रबंधन का कौशल सीखना महत्वपूर्ण है। यह अध्याय पारिवारिक आय के प्रकार, आय का प्रबंधन तथा पारिवारिक बजट बनाने के सम्मिलित चरणों से संबंधित है।

(ii) विभिन्न प्रकार की आय पर चर्चा करें।

उत्तर: विभिन्न प्रकार की आय पर चर्चा –

(क) धन आय – धन आय रुपयों तथा पैसे के रूप में क्रय शक्ति है जो एक निश्चित अवधि में पारिवारिक कोष में जाती है। यह परिवार को मज्जदूरी, वेतन, बोनस, कमीशन, किराया, लाभांश, ब्याज, सेवानिवृत्ति आय, रॉयल्टि और परिवार के किसी सदस्य को भत्ते के रूप में प्राप्त होती है। धन आय दैनिक जीवन के लिए वस्तुओं तथा आवश्यक सेवाओं में परिवर्तित (खर्च) होती है तथा उसका एक भाग अक्सर भविष्य में इस्तेमाल के लिए अथवा निवेश उद्देश्यों हेतु बचत के लिए किया जाता है।

विभिन्न परिवारों में धन आय की आवृत्ति और प्रवाह की प्रणाली अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि मुख्य पेशा है। किसान की आय नियमित नहीं होती है किंतु जब वह अपनी फसल बेचता है तो वह धन अर्जित करता है। वर्ष में दो फसल- रबी और खरीफ होती है। इसके विपरीत नौकरीपेशा व्यक्ति की आय नियमित होगी।

(ख) वास्तविक आय – वास्तविक आय की परिभाषा अर्थशास्त्रियों द्वारा एक निश्चित अवधि के भीतर मानवीय जरूरतों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपलब्ध वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह के रूप में की गई है।

इस परिभाषा में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं, जो इस प्रकार हैं-

वास्तविक आय वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह है, यह स्थिर नहीं होती।

इसमें ऐसी वस्तुएँ एवं सेवाएँ शामिल हैं जो धन से उपलब्ध हो भी सकती हैं या नहीं भी। उदाहरण के लिए अपने खेत के उत्पाद, घरेलू सेवाएँ।

इसमें समय सम्मिलित है- यह एक माह अथवा एक वर्ष हो सकता है।

वास्तविक आय दो प्रकार की होती है प्रत्यक्ष आय तथा अप्रत्यक्ष आय।

1. प्रत्यक्ष आय – इसमें धन का उपयोग किए बिना परिवार के सदस्यों को उपलब्ध वस्तुएँ तथा सेवाएँ शामिल हैं। उदाहरण के लिए परिवार के सदस्यों, विशेषकर महिलाओं द्वारा प्रदान की गई सेवाएँ जैसे भोजन पकाना, कपड़े धुलना, सिलाई करना, घरेलू बागवानी आदि। एक घर जिसके लिए पूर्णतया भुगतान किया जाता है तथा सामुदायिक सेवाएँ जैसे उद्यान, सड़कें, पुस्तकालय भी प्रत्यक्ष आय के अंतर्गत आते हैं।

2. अप्रत्यक्ष आय – इसमें वे वस्तुएँ तथा सेवाएँ शामिल हैं जो विनिमय (सामान्यतया धन) के कुछ साधनों के उपरांत ही प्राप्त हो पाती हैं। उदाहरण के लिए अच्छी किस्म की सब्जी खरीदने के लिए धन का इस्तेमाल क्योंकि इसके चयन में व्यक्ति की योग्यता एवं कौशल निहित होता है।

(ग) मानसिक आय – मानसिक आय वह संतोष है जो सेवाओं तथा माल के स्वामित्व एवं उपयोग के फलस्वरूप प्राप्त होता है। इसे वास्तविक आय से प्राप्त संतोष के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। मानसिक आय को रुपये या राशि में बता पाना कठिन है। यह गुप्त आय का एक रूप है। यह अगोचर एवं वस्तुपरक होती है तथा जीवन की गुणवत्ता के संदर्भ में बहुत आवश्यक है।

(iii) बजट बनाने में सम्मिलित चरणों की चर्चा करें।

उत्तर: बजट बनाने के मुख्यत पाँच चरण हैं जो निम्नलिखित हैं-

(i) प्रस्तावित बजट योजना के दौरान परिवार के सदस्यों के लिए आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं की सूची तैयार करें। संबंधित वस्तुओं तथा सेवाओं को समूह में वर्गीकृत करें। निम्नलिखित समूह सहायक हो सकते हैं–

भोजन तथा संबंधित लागत,आवास,घरेलू कार्य – ईधन, उपयोगी वस्तुएँ, शिक्षा, परिवहन, वस्त्र, आय कर, चिकित्सा, व्यक्तिगत भत्ते, विविध-मनोरंजन, घर की साज-सज्जा, भविष्य के लिए प्रावधान बचत, सेवानिवृत्ति।

(ii) प्रत्येक वर्गीकरण एवं समग्र रूप से बजट का योग करते हुए वांछित मदों की लागत का पूर्व आकलन करके अनुमान लगाएँ। अनुमान लगाते समय सामान्य बाजार प्रवृत्तियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कीमतों में वृद्धि हो रही है, तो ऐसी वृद्धि को ध्यान में रखकर पर्याप्त गुंजाइश रखी जानी चाहिए।

(iii) कुल संभावित आय का अनुमान कीजिए। आय को दो शीर्षकों सुनिश्चित एवं संभावित, के अंतर्गत रखते हुए तैयार करना सहायक है। बजट द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सुनिश्चित आय द्वारा आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए और ‘अच्छी किंतु आवश्यक नहीं’ मदों को संभावित आय से प्राप्त किया जा सकता है।

(iv) संभावित आय तथा व्यय के बीच संतुलन रखें। कभी-कभी व्यय आय से अधिक होता है। उसे संतुलित करने के दो तरीके हैं। एक आय में वृद्धि के द्वारा (उदाहरण के लिए, अतिरिक्त कार्य करके) अथवा व्यय में कटौती द्वारा (बाहर जाना कम करना अथवा उत्सवों पर व्यय कम करके)।

(v) यह सुनिश्चित करने के लिए योजनाओं की जाँच करें कि उनके सफल होने के लिए तर्कसंगत समय है। निम्नलिखित कारकों के मद्देनजर योजनाओं की जाँच की जाती है

परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति हो गई है।

आपातकाल के लिए बजट में प्रावधान होने चाहिए। आपातकालीन अवधि के लिए अलग से एक संयुक्त निधि रखी जानी चाहिए।

समाशोधन की सुनिश्चितता हो। समाशोधन, जैसे कि बिल या ऋण के देय होने पर उनका भुगतान कर देना।

राष्ट्रीय तथा विश्वव्यापी दशाओं पर विचार किया जाए। (उदाहरण के लिए वैश्विक आर्थिक मंदी)।

परिवार के दीर्घकालिक लक्ष्यों की पहचान की जाए।

(iv) वे कौन से नियंत्रण हैं जिसका उपयोग धन प्रबंधन में किया जा सकता है?

उत्तर: धन प्रबंधन में नियंत्रण:

धन प्रबंधन में नियोजन के बाद नियंत्रण दूसरा महत्वपूर्ण चरण होता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बजट और वित्तीय योजना सही दिशा में आगे बढ़ रही है तथा आवश्यकता पड़ने पर उसमें उचित समायोजन किया जा सके। धन प्रबंधन में नियंत्रण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—

(i) योजना की प्रगति की जाँच करना, और।

(ii) आवश्यकतानुसार उसमें समायोजन करना। जाँच की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि व्यय सही तरीके से हो रहा है या नहीं और यदि कहीं असंतुलन है तो उसे समय रहते सुधारा जा सके।

(a) मानसिक एवं यांत्रिकीय जाँच:

यह जाँच दो स्तरों पर की जाती है—मानसिक जाँच और यांत्रिकीय जाँच। मानसिक जाँच के अंतर्गत व्यक्ति अपने खर्चों का मानसिक विश्लेषण करता है और यह तय करता है कि उसके पास उपलब्ध धन को कैसे विभाजित किया जाए। उदाहरण के लिए, एक विद्यार्थी यदि 1000 रुपये प्राप्त करता है, तो उसे यह सोचना होगा कि यह राशि जूते, कपड़े और किताबों के लिए कैसे पर्याप्त होगी। यह उसे विवेकपूर्ण वित्तीय निर्णय लेने में मदद करता है। दूसरी ओर, यांत्रिकीय जाँच एक व्यावहारिक तरीका है जिसमें धन को विभिन्न खर्चों के लिए अलग-अलग रखा जाता है। उदाहरण के लिए, कई गृहिणियाँ भोजन के खर्च के लिए अलग से एक लिफाफा रखती हैं, जिससे महीने के अंत तक वे जान पाती हैं कि उनका धन कितनी तेजी से खर्च हो रहा है।

(b) अभिलेख एवं खाते:

धन प्रबंधन में अभिलेख और खाते रखना एक प्रभावी नियंत्रण उपाय है। इसमें प्रतिदिन के खर्चों को लिखित रूप में दर्ज किया जाता है या बिल और रसीदें सुरक्षित रखी जाती हैं। यह विधि पारिवारिक बजट को संतुलित बनाए रखने में सहायक होती है क्योंकि इससे यह पता चलता है कि किस मद पर कितना व्यय किया गया और कहाँ आवश्यकता से अधिक खर्च हो रहा है। मासिक खर्चों की तुलना योजना से करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भविष्य में कौन-से क्षेत्रों में अधिक सतर्कता बरती जानी चाहिए। इसके अलावा, बिल और रसीदें रखने से उपभोक्ता को यह सुविधा मिलती है कि यदि किसी सेवा या उत्पाद में कोई खराबी आती है तो वह शिकायत दर्ज करा सके।

(c) योजना का समायोजन:

योजना को सही दिशा में बनाए रखने के लिए समायोजन आवश्यक होता है। कई बार अप्रत्याशित परिस्थितियाँ, जैसे—परिवार में आपातकालीन खर्च, बिना योजना के की गई खरीदारी या फिर अपर्याप्त जाँच प्रक्रिया, बजट को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में यदि योजना को समय-समय पर समायोजित नहीं किया जाता, तो वित्तीय असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। इसलिए, पारिवारिक बजट में लचीलापन बनाए रखना जरूरी होता है ताकि आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन किया जा सके।

(d) मूल्यांकन प्रक्रिया: 

धन प्रबंधन का अंतिम चरण मूल्यांकन होता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि योजना से वांछित लाभ मिल रहे हैं या नहीं। मूल्यांकन के तहत यह देखा जाता है कि खर्च किए गए धन से उचित संतोष प्राप्त हो रहा है या नहीं, परिवार की वित्तीय स्थिति में सुधार हो रहा है या नहीं, और भविष्य के लिए धन की पर्याप्त व्यवस्था की जा रही है या नहीं। यदि मूल्यांकन के दौरान किसी भी प्रकार की वित्तीय असंगति पाई जाती है, तो उसे भविष्य की योजना में सुधार कर दूर किया जाता है।

(v) विवेकपूर्ण निवेशों के अंतर्निहित सिद्धांतों पर चर्चा करें।

उत्तर: विवेकपूर्ण निवेशों में अंतर्निहित सिद्धांत:

परिवार बचत का संचयन करते-करते पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। इन बचतों का निवेश बुद्धिमत्तापूर्वक किया जाना चाहिए ताकि परिवार को इसकी अच्छी वापसी प्राप्त हो सके तथा यह सुनिश्चित हो सके कि धन सुरक्षित है और आवश्यकता पड़ने पर वह उनको उपलब्ध हो सकेगा। आइए अब हम विवेकपूर्ण निवेश के प्रमुख सिद्धांतों पर चर्चा करें।

(i) मूल धन राशि की सुरक्षा – मूल धन पर यदि लाभांश या ब्याज अर्जित करना है तो इसका सुरक्षित होना जरूरी है। सुरक्षित निवेश के लिए मूलधन सबसे महत्वपूर्ण कारक है। निम्नलिखित के द्वारा धन की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र, लोक भविष्य निधि (PPF), किसान विकास पत्र, और बैंकों में सावधि जमा जैसे सरकारी एवं निजी दोनों क्षेत्रों की प्रतिभूतियों में निवेश करके।

विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की कंपनियों में निवेश करके।

विभिन्न कंपनियों में शेयरों एवं बंध पत्रों में धन का निवेश करके।

प्रतिभूतियों के मुद्दों की बाजार-प्रवृत्तियों का अध्ययन करके।

क्रय की गई प्रतिभूतियों की किस्म में अंतर करना कृषि भूमि, भू-संपदा (रियल स्टेट) स्टॉक्स, बंधपत्र, सावधि जमा आदि।

व्यवसाय चक्र के मौजूदा चरण को समझना।

(ii) प्रतिलाभ की तर्कसंगत दर – सामान्य तौर पर किसी निवेश पर प्रतिलाभ की दर जितनी अधिक होगी जोखिम उतना अधिक होगा, अर्थात मूलधन की सुरक्षा एवं उस पर मिलने वाले लाभ की दर विलोमानुपाती रूप से संबंधित है। कुछ लोगों के विचार से, विशेषकर उन लोगों के विचार से जो आय के प्रमुख स्रोत के रूप में निवेशों पर निर्भर हैं उच्च एवं अस्थिर आय की अपेक्षा आय की नियमितता ज्यादा महत्त्व रखती है। इसका निर्धारण प्रतिभूतियों के चयन द्वारा किया जाता है। अतः धन को निवेश करने से पहले व्यक्ति को विभिन्न योजनाओं एवं विकल्पों के अंतर्गत ब्याज की दर तथा संबंधित खतरे की तुलना करनी चाहिए।

(iii) तरलता – यह मूल्य के साथ समझौता किए बिना प्रतिभूतियों को नकदी में परिवर्तित करने की योग्यता है। कोई निवेश जितना अधिक तरल होगा उसकी कीमत उतनी अधिक होगी, अथवा दूसरे शब्दों में, निवेशक को मिलने वाली आय उतनी कम होगी। इसलिए आय तथा तरलता में संतुलन होना ही चाहिए।

(iv) वैश्विक स्थितियों के प्रभाव की मान्यता – कारोबार प्रवृत्ति में परिवर्तन अपेक्षित आवश्यक सुरक्षा, इसके प्रदान करने की सुगमता तथा इसे प्रदान करने के लिए चुने गए तरीके दोनों को प्रभावित करेगा। दीर्घकालीन कारोबार प्रवृत्तियों पर विचार करके परिवार को संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर अपनी बचत के प्रभाव को स्वीकार करना चाहिए। चक्र में विभिन्न चरणों पर कारोबार उद्यम में निवेश करने की इच्छा अथवा अनिच्छा चक्र की चरम सीमा को कम करने में प्रभावी होगी।

(v) सुलभ पहुँच तथा सुविधा – पारिवारिक निधि के लिए निवेश का चयन करते समय व्यक्ति को इसकी सफलता के लिए अपेक्षित जानकारी पर विचार करना चाहिए। परिवार ऐसे निवेश का चयन कर सकता है जिसमें उसे हानि हो सकती है क्योंकि वे सुरक्षा के प्रबंधन अथवा अधिप्राप्त संपत्ति में निहित समस्या का पता पहले नहीं लगा पाए।

(vi) आवश्यक वस्तुओं में निवेश – जिस तारीख को निवेश परिपक्व होता है वह तिथि उस परिवार के लिए महत्वपूर्ण होती है। इससे ज्ञात भावी जरूरतों के लिए निधियाँ उपलब्ध रखने की योजना बनाई जाती है। अतएव, धन का निवेश करते समय परिवार को लंबी अवधि वाली प्रतिभूतियाँ खरीदनी चाहिए ताकि वे सुविचारित आवश्यकता अथवा आवश्यकताओं के समय परिपक्व हो सकें उदाहरण के लिए, बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए।

(vii) कर कुशलता – निवेश उन योजनाओं में किया जाना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप कर में बचत होती है। करों की बचत के लिए आयकर अधिनियम में उपलब्ध अनेक उपबंधों का इस्तेमाल किया जा सकता है। बीमा पॉलिसियों, कर्मचारी भविष्य निधि, पीपीएफ आदि में निवेश विशिष्ट सीमा सहित कर में छूट का प्रावधान देता है।

(viii) निवेश उपरांत सेवा – निवेश का चयन करते समय ग्राहक देखभाल अथवा ग्राहक सेवा निर्णायक कारक होना चाहिए। अच्छी ग्राहक सेवा में प्रतिभूतियों का आसान नकदीकरण, अच्छा संचार नेटवर्क, ब्याज अथवा लाभांश वारंटों का समय से प्रेषण, निवेश अवधि के पूरा होने के उपरांत देय राशि का समय पर वितरण, पॉलिसियों, ब्याज दर आदि में परिवर्तनों के बारे में ग्राहक को अवगत कराते रहना शामिल है। ग्राहक हितैषी कंपनी जरूरत पड़ने पर निवेशक को आवश्यक समर्थन एवं संरक्षण प्रदान करती है।

(ix) समयावधि – लॉक इन अवधि (वह अवधि जिसमें धन को एक निश्चित अवधि के बाद ही निकाला जा सकता है) एक महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर किसी निवेश पर निर्णय लेने के पहले विचार किया जाना चाहिए। निवेश की अवधि जितनी लंबी होगी, वापसी की राशि उतनी अधिक होगी। उदाहरण के लिए अधिकतम सावधि योजनाओं में अल्पावधि जमा की तुलना में दीर्घकालीन जमाओं के लिए ब्याज की दर अधिक होती है। इस प्रकार निवेश को अधिक समय तक प्रतीक्षा अवधि वाली उच्च आय अथवा अपने परिवार की आवश्यकता एवं अपेक्षा के आधार पर अल्प ‘लॉक इन’ के लिए सापेक्षतया कम आय के मध्य चयन करना चाहिए।

(x) क्षमता व्यक्ति को अपनी क्षमता से अधिक निवेश नहीं करना चाहिए ताकि निवेश अनावश्यक कठिनाइयों से मुक्त रह सके। वर्तमान आवश्यकताओं का भावी आवश्यकताओं एवं सुरक्षा के साथ संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

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