NCERT Class 11 Home Science Chapter 12 वस्त्रों की देखभाल तथा रखरखाव Solutions Hindi Medium to each chapter is provided in the list so that you can easily browse through different chapters NCERT Class 11 Home Science Chapter 12 वस्त्रों की देखभाल तथा रखरखाव Notes in Hindi and select need one. NCERT Class 11 Home Science Chapter 12 वस्त्रों की देखभाल तथा रखरखाव Question Answers Download PDF. NCERT Class 11 Solutions for Home Science.
NCERT Class 11 Home Science Chapter 12 वस्त्रों की देखभाल तथा रखरखाव
Also, you can read the NCERT book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Central Board of Secondary Education (CBSE) Book guidelines. NCERT Class 11 Home Science Chapter 12 वस्त्रों की देखभाल तथा रखरखाव Solutions in Hindi are part of All Subject Solutions. Here we have given NCERT Class 11 Home Science Textbook Solutions Hindi Medium for All Chapters, You can practice these here.
वस्त्रों की देखभाल तथा रखरखाव
Chapter: 12
मानव पारिस्थितिकी और परिवार विज्ञान भाग – II
इकाई – (IV) वयस्कावस्था
अंत में कुछ प्रश्न
1. वस्त्रों की देखभाल तथा रखरखाव के विभिन्न पहलू कौन से हैं?
उत्तर: वस्वों की देखभाल तथा रख-रखाव के विभिन्न पहलू है:
मरम्मत: मरम्मत एक सामान्य शब्द है जिसका प्रयोग हम कपड़े को उसके सामान्य प्रयोग के दौरान अथवा आकस्मिक क्षति से मुक्त रखने के प्रयास में करते हैं।
इसमें निम्नलिखित शामिल हैं-
कटे, फटे, छेद हुए कपड़ों की मरम्मत करना।
बटनों/बंधनों, रिबन, लेस या आकर्षक बंधनों को पुनः लगाना।
सिलाई तथा तुरपाई को पुनः करना, यदि वे खुल गई हों।
जैसे ही ये क्षतियाँ उत्पन्न होती हैं इनकी देखभाल उसी समय करना सर्वोत्तम है। यह नितांत आवश्यक है कि धुलाई करने से पूर्व ही यह मरम्मत कर ली जाए क्योंकि धुलाई की रगड़ से कपड़े को और अधिक क्षति पहुँच सकती है।
धुलाई: कपड़ों की दैनिक देखभाल सामान्यतः साफ़ रखने के लिए उन्हें धोना तथा सिलवट रहित दिखाई देने के लिए इस्तरी करना शामिल है। कई प्रकार के कपड़ों को अकस्मात् लगे दाग हटाने, मटमैला या पीला पड़ने से बचाने के लिए, जैसे कि बार-बार कपड़े के धुलने के कारण हो जाता है, तथा उसमें कड़ापन या चरचरापन लाने के लिए अक्सर विशेष उपचार की आवश्यकता होती है। धुलाई में यह समस्त बातें शामिल हैं- दाग-धब्बे हटाना, धुलाई के लिए कपड़ों को तैयार करना, धुलाई द्वारा कपड़ों से गंदगी हटाना, सुंदर दिखने के लिए अंतिम रूप देना (नील लगाना तथा स्टार्च लगाना) तथा अंततः आकर्षक रूप देने के लिए उन पर इस्तरी करना ताकि उन्हें प्रयोग में लाने के लिए तैयार करके रखा जा सके।
2. ‘दाग’ शब्द को परिभाषित कीजिए विभिन्न प्रकार के धब्बे कौन-कौन से हैं और इन्हें हटाने के लिए कौन-सी विभिन्न प्रकार की तकनीकों का प्रयोग किया जा सकता है?
उत्तर: धब्बे को हटाने के लिए सही प्रक्रिया का प्रयोग करने के उद्देश्य से दाग-धब्बे की पहले पहचान की जानी आवश्यक है। यह पहचान रंग, गंध तथा स्पर्श के आधार पर की जा सकती है।
दाग-धब्बों को निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है–
(i) वनस्पति के दाग धब्बे – चाय, काफी, फल तथा सब्जियाँ। ये धब्बे अम्लीय होते हैं तथा इन्हें क्षारीय माध्यम से ही हटाया जा सकता है।
(ii) जंतुजन्य धब्बे – रक्त, दूध, मांस, अंडा इत्यादि। ये धब्बे प्रोटीनी होते हैं तथा इन्हें केवल ठंडे पानी में डिटर्जेंट का प्रयोग करके हटाया जा सकता है।
(iii) तैलीय धब्बे – तेल, घी, मक्खन इत्यादि। इन्हें ग्रीज्ज घोलकों तथा अवशोषकों के प्रयोग द्वारा हटाया जाता है।
(iv) खनिज धब्बे – स्याही, जंग, कोयला, तारकोल, दवाई इत्यादि। इन धब्बों को पहले अम्लीय माध्यम में धोना चाहिए और फिर क्षारीय माध्यम में।
(v) रंग छूटना – धोने आदि के दौरान दूसरे कपड़ों से लगा रंग। कपड़े की कोटि पर निर्भर करते हुए, इन धब्बों को तनु अम्ल द्वारा या तनु क्षार द्वारा छुड़ाया जा सकता है।
दाग-धब्बे हटाने की तकनीकें–
(i) खुरचना – जमे हुए सतही दाग-धब्बों को भोथरे खुरचा जा सकता है। चाकू का प्रयोग करके हल्के से।
(ii) डुबोना – दाग-धब्बे वाले कपड़ों को किसी अभिकर्मक में डुबोया जाता है तथा फिर उसे रगड़ा जाता है।
(iii) स्पंज से साफ़ करना – कपड़े के दाग-धब्बे वाले भाग को एक समतल सतह पर रखा जाता है। दाग-धब्बों वाले भाग पर स्पंज से अभिकर्मक लगाया जाता है तथा उसे नीचे रखे ब्लॉटिंग पेपर द्वारा सोख लिया जाता है।
(iv) ड्रॉपर विधि – दाग-धब्बे लगे कपड़े को एक कटोरे पर फेला दिया जाता है। उस पर ड्रॉपर से अभिकर्मक डाला जाता है।
3. वस्त्रों से अज्ञात दागों को हटाने के लिए किए जा सकने वाले तरीके लिखें।
उत्तर: वस्त्रों से अज्ञात दागों को हटाने के लिए किये जा सकने वाले प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं:
(i) विलायकों, अवशोषकों या पायसीकारकों का प्रयोग करना अर्थात् ड्राइक्लीनिंग करना।
(ii) पानी से धुलाई करना।
(iii) साबुन के घोल का प्रयोग करना।
(iv) डिटर्जेंट से धुलाई करना।
(v) खुली हवा तथा धूप से विरंजित करना।
(vi) हल्के अम्ल का प्रयोग करना।
(vii) हल्के क्षार का प्रयोग करना।
(viii) ऑक्साइड करने वाले पदार्थों का प्रयोग करना।
4. गंदगी क्या है? पानी, साबुन तथा डिटर्जेंट किस प्रकार मिल कर वस्त्रों से गंदगी को दूर करते हैं?
उत्तर: गंदगी, कपड़े के ताने-बाने के बीच फंसी चिकनाई, कालिख तथा धूल के लिए प्रयुक्त किया गया शब्द है। गंदगी दो प्रकार की होती है- एक तो वह जो कपड़े की ऊपरी सतह पर लगी होती है तथा आसानी से हटाई जा सकती है तथा दूसरी जो पसीने तथा चिकनाई के द्वारा उस पर जमी होती है।
(i) पानी धुलाई के कार्य के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभिकर्मक है। कपड़े और पानी के बीच एक प्रकार का जुड़ाव होता है। डुबोने के दौरान पानी कपड़े में प्रविष्ट हो जाता है तथा उसे गीला कर देता है। पेडेसिस या जल कणों का संचलन कपड़े में चिकनाई रहित गंदगी को हटाने में सहायक होता है। हाथ द्वारा या मशीन में संचलन द्वारा केवल पानी मे में धोने से कुछ गंदगी तथा मिट्टी के कण हट जाते हैं। पानी के तापमान में वृद्धि से जलकणों की हलचल तथा भेदन शक्ति बढ़ जाती है। यदि गंदगी चिकनाई युक्त हो तो यह और भी लाभप्रद होता है। किंतु केवल पानी उस गंदगी को दूर नहीं कर सकता जो पानी में घुलनशील नहीं है। इसमें गंदगी को निलंबित रखने का सामर्थ्य भी नहीं है जिसके परिणामस्वरूप हटी हुई गंदगी पुनः कपड़े पर जम जाती है। बार-बार धोने के पश्चात् कपड़े के मटमैले हो जाने का मुख्य कारण गंदगी का पुनः कपड़े पर जम जाना है।
(ii) साबुन तथा डिटर्जेंट धुलाई के कार्य में प्रयुक्त होने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक सफ़ाई अभिकर्मक हैं। साबुन प्राकृतिक तेलों या वसा एवं क्षार से बनाया जाता है। यदि क्षार का अधिक प्रयोग किया जाए तो कपड़े पर साबुन का प्रयोग करते समय वह निकल जाता है। संश्लिष्ट डिटर्जेंटों को रसायनों से बनाया जाता है। साबुन तथा डिटर्जेंट दोनों को पाउडर, फ्लेक, बार (चक्की) तथा तरल स्वरूपों में बेचा जाता है। प्रयुक्त किए जाने वाले साबुन या डिटर्जेंट की किस्म, कपड़े की किस्म, रंग तथा कपड़े पर जमी गंदगी की किस्म पर निर्भर करती है।
साबुन तथा डिटर्जेंट दोनों में एक जैसी महत्वपूर्ण रासायनिक विशिष्टता पाई जाती है- वे सतह पर क्रिया करने वाले अभिकर्मक होते हैं और सरफेक्टेंट कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में, अभिकर्मक पानी के पृष्ठ तनाव को कम कर देते हैं। इस प्रभाव के कम होने से पानी कपड़ों को अधिक सहजता से डुबो लेता है तथा धब्बों और गंदगी को अधिक तेजी से दूर करता है। धुलाई डिटर्जेंटों के सरफेक्टेंट तथा अन्य तत्व भी धुलाई के पानी में हटाई गई मिट्टी/गंदगी को निलम्बित रखने का कार्य भी करते हैं जिससे वह पुनः साफ़ कपड़ों पर नहीं जमती। इससे कपड़ों के मटमैलेपन को रोका जा सकता है।
5. धुलाई के पश्चात फिनिशिंग से वस्त्रों की चमक तथा बुनावट की विशेषताओं में किस प्रकार सुधार आता है?
उत्तर: धुलाई के पश्चात् कपड़े को साफ़ पानी में खंगालना अत्यधिक आवश्यक है जब तक कि इसमें से साबुन या डिटर्जेंट पूरी तरह निकल नहीं जाता। अकसर अंतिम बार खंगालने की प्रक्रिया में कुछ अन्य अभिकर्मक भी पानी में मिलाए जाते हैं जो वस्त्र की चमक को बहाल करने में सहायक होते हैं। कपड़े को अधिक कड़ा तथा चरचरा बनाने के लिए भी कपड़े पर कुछ अन्य अभिकर्मक प्रयुक्त किए जाते हैं।
(i) नील तथा चमक पैदा करने वाले पदार्थ – बार बार प्रयोग किए जाने पर तथा धुलाई के साथ सफ़ेद सूती कपड़ों की सफ़ेदी समाप्त होने लगती है तथा वे पीले पड़ने लगते हैं। संश्लेषित या विनिर्मित वस्त्रों या उनके मिश्रण वाले वस्त्रों के मामले में यह रंग खराब होकर मटमैला-सा हो जाता है।
पीलेपन को दूर करने के लिए तथा सफ़ेदी को वापस लाने के लिए नील का प्रयोग करने की सिफारिश की जाती है। इससे मटमैलेपन का उपचार नहीं हो सकता। नील बाजार में अल्ट्रामेरीन नील (अत्यधिक बारीक पाउडर वर्णक के रूप में) के रूप में तथा तरल रासायनिक रंजक के रूप में उपलब्ध है। अंतिम बार खंगालते समय नील की सही मात्रा का प्रयोग किया जाना चाहिए।
चमक पैदा करने वाले अभिकर्मक या फ्लूरोसेंट चमक पैदा करने वाले अभिकर्मक वे सम्मिश्रण होते है जिनमें निम्न ग्रेड वाले या कमजोर रंजक प्रयुक्त होते हैं और जिनमें फ्लूरोसेंस की विशिष्टता निहित होती है। ये सम्मिश्रण कम तरंग दैधर्य (वेव लेंथ) पर प्रकाश को समाहित कर सकते हैं तथा अधिक तरंगदैधर्य पर पुनः निस्रावित करते हैं। किसी वस्त्र पर फ्लूरोसेंट चमक लाने वाले अभिकर्मक का प्रयोग करने से उसमें गहन चमकदार सफ़ेदी आ जाती है जो पीलेपन तथा मटमैलेपन, दोनों को दूर कर देती है। इनका प्रयोग रंगीन प्रिंटेड वस्त्रों पर भी किया जा सकता है। चमक लाने वाले अभिकर्मकों को कई बार श्वेतकर्ता भी कहा जाता है। किंतु ये रंग को खराब नहीं करते तथा इसलिए इन्हें विरंजक नहीं समझा जाना चाहिए।
(ii) स्टार्च तथा कड़ा करने वाले अभिकर्मक बार-बार धुलाई से वस्त्र के ताने-बाने को नुकसान पहुँचता है जिससे इसकी चमक तथा चटक भी कम हो जाती है। वस्त्र को कड़ा तथा चिकना एवं चमकीला बनाने की सर्वाधिक आम तकनीक स्टार्च लगाना तथा कड़ा करने वाले अभिकर्मकों का प्रयोग करना है। इस फिनिश से न केवल कपड़े के रूप-रंग तथा बुनावट में सुधार आता है बल्कि वस्त्र पर सीधी गंदगी के संपर्क से भी बचाव होता है। स्टार्च लगाने से बाद की धुलाई भी सहज हो जाती है क्योंकि गंदगी वस्त्र के बजाय स्टार्च के साथ चिपकती है। कड़ा करने वाले अभिकर्मक प्रकृति से मुख्यतः पशुओं या पौधों से प्राप्त होते हैं। कड़ा करने वाले सर्वाधिक सामान्य अभिकर्मक हैं- स्टार्च, बबूल का गोंद, बोरेक्स तथा जिलेटिन।
(iii) सिरका रंगीन वस्त्रों, विशेषकर रेशमी कपड़ों की चमक बनाए रखने के लिए उपयोग किया जाता है। यह न केवल वस्त्रों के रंग को स्थायी बनाता है, बल्कि उन पर लगे दाग-धब्बों को हटाने में भी सहायक होता है। इसके उपयोग से कपड़ों की रंगत बनी रहती है और वे अधिक समय तक नए जैसे दिखते हैं।
6. ड्राई-क्लीनिंग क्या है? किस प्रकार के वस्त्रों के लिए ड्राई-क्लीनिंग की सिफ़ारिश की जाती है?
उत्तर: ड्राइ-क्लीनिंग को एक जल-रहित तरल माध्यम में वस्त्रों की सफाई करने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। शुष्क तथा आर्द्र घोलकों के बीच महत्वपूर्ण अंतर यह है कि रेशों द्वारा जल सोख लिया जाता है जिससे कपड़ा सिकुड़ जाता है, उस पर सिलवटें पड़ जाती है तथा उसका रंग निकल जाता है। परंतु वाष्पशील (शुष्क) विलायकों से रेशे फूलते नहीं हैं। अतः ड्राइ-क्लीनिंग नाजुक वस्त्रों को साफ़ करने के लिए एक सुरक्षित विधि है। ड्राई क्लिनिंग के लिए, सर्वाधिक सामान्य रूप से प्रयुक्त विलायक हैं- परक्लोरो-एथीलीन, पेट्रोलियम विलायक या फ्लोरो कार्बन विलायक।
ड्राई-क्लीनिंग सामान्यतः औद्योगिक स्थापनाओं में की जाती है, घरेलू स्तर पर नहीं। वस्त्रादि क्लीनर के पास ले जाए जाते हैं तथा उन पर पहचान के लिए एक टैग लगाया जाता है जिसमें विशेष अनुदेश लिखे होते हैं। वस्त्रादि का पहले निरीक्षण किया जाता है तथा उसकी स्पॉट बोर्ड पर सफ़ाई की जाती है। क्योंकि विलायक का प्रयोग किया जाता है, अतः जल में घुलनशील दाग-धब्बों तथा अन्य कठिनाई से हटाए जा सकने वाले दागों की सफ़ाई स्पॉट बोर्ड पर की जानी आवश्यक है। जो ग्राहक ड्राइक्लीनर को कपड़ों के दाग धब्बे दिखा देते हैं, वे सफ़ाई के कार्य को अपेक्षाकृत सरल बना देते हैं और अंततः ड्राइ-क्लीनिंग भी अधिक संतोषजनक होती है।
कई ड्राइक्लीनर अतिरिक्त प्रबंध करने का प्रावधान रखते हैं, जैसे बटन बदलना, वस्त्रों में छोटी-मोटी मरम्मत करना, आकार को बदलना, जलरोधन करना तथा अन्य फिनिशिंग जैसे स्थायी क्रीज़, कीड़ा रोधन तथा फर एवं चमड़े की सफ़ाई। कुछ ड्राइक्लीनर फ़ेदर के तकियों, कंबलों, रजाइयों तथा कारपेटों की सफाई तथा स्वच्छता भी करते हैं, तथा पर्दो आदि को साफ़ और प्रेस भी करते हैं।

Hi! my Name is Parimal Roy. I have completed my Bachelor’s degree in Philosophy (B.A.) from Silapathar General College. Currently, I am working as an HR Manager at Dev Library. It is a website that provides study materials for students from Class 3 to 12, including SCERT and NCERT notes. It also offers resources for BA, B.Com, B.Sc, and Computer Science, along with postgraduate notes. Besides study materials, the website has novels, eBooks, health and finance articles, biographies, quotes, and more.