NIOS Class 10 Social Science Chapter 24 भारतीय लोकतन्त्र के समक्ष चुनौतियाँ

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NIOS Class 10 Social Science Chapter 24 भारतीय लोकतन्त्र के समक्ष चुनौतियाँ

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Chapter: 24

मॉड्यूल – 4 समसामयिक भारत : मुद्दे एवं चुनौतियाँ

पाठगत प्रश्न 24.1

1. राजनीतिक लोकतंत्र का क्या आशय है?

उत्तर: लोकतंत्र को सरकार के एक ऐसे स्वरूप की तरह परिभाषित किया जाता है, जिसमें सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित रहती है और जिसका जनता द्वारा नियमित अन्तराल में होने वाले स्वतंत्र चुनावों में एक प्रतिनिधि प्रणाली के माध्यम से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रयोग किया जाता है। मूलतः लोकतंत्र सरकार का एक ऐसा स्वरूप है जिसको जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि चलाते हैं।

2. क्या आप सोचते हैं कि लोकतंत्र की परिभाषा तब तक अपूर्ण है जब तक इसे सामाजिक एवं व्यक्तिगत संदर्भों में परिभाषित नहीं किया जाता है? अपने उत्तर के पक्ष में इसके कारणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: लोकतंत्र की परिभाषा तब तक अपूर्ण रहती है, जबतक उसे सामाजिक एवं व्यक्तिगत सन्दर्भों में भी परिभाषित नहीं किया जाता। वर्तमान युग में लोकतन्त्र मात्र सरकार के एक स्वरूप से अधिक है। अपने व्यापक रूप में लोकतंत्र का अर्थ है (i) सरकार का एक स्वरूप, (ii) राज्य का एक प्रकार (iii) सामाजिक व्यवस्था का एक ढाँचा (iv) आर्थिक विकास की एक रूपरेखा (v) संस्कृति तथा जीवनयापन का एक तरीका। अतः जब हम यह कहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र है तो हम इसका अर्थ केवल यही नहीं समझते कि यहाँ की राजनीतिक संस्थाएँ और प्रक्रियाएँ लोकतान्त्रिक हैं, बल्कि भारतीय समाज तथा प्रत्येक भारतीय नागरिक भी लोकतान्त्रिक है। जहाँ व्यक्तियों के चिन्तन और व्यवहार में समानता, स्वतन्त्रता, भाईचारा, पंथ निरपेक्षता और न्याय जैसे लोकतान्त्रिक मूल्य प्रतिविम्वित होते हैं।

3. राजनीतिक एवं सामाजिक लोकतंत्र की कम से कम दो अनिवार्य स्थितियों का वर्णन कीजिए।

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उत्तर: किसी व्यवस्था को प्रामाणिक लोकतंत्र तभी कहा जा सकता है जब वह निम्नलिखित राजनीतिक शर्तें पूरी करता है:

(अ) (i) एक संविधन जिसकी सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित होती है और यह बुनियादी अधिकारों जैसे समानता, चिन्तन एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आस्था, एक जगह से दूसरी जगह आने-जाने तथा संचार की स्वतंत्रता एवं संघ बनाने की स्वतंत्रता की रक्षा करता है; (ii) प्रतिनिधियों का निर्वाचन सार्वभौम वयस्क मताधिकार के आधार पर होता हो तथा (iii) एक उत्तरदायी सरकार हो, जिसमें कार्यपालिका विधायिका के प्रति एवं विधायिका जनता के प्रति जवाब देय हो।

(ब) निम्नलिखित सामाजिक एवं आर्थिक शर्तें पूरी करता है (i) ऐसी व्यवस्था जो सामाजिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक स्थिति की समानता, सामाजिक सुरक्षा तथा समाज कल्याण जैसे लोकतान्त्रिक मूल्यों एवं मानकों को पूरा करती हो; तथा (ii) व्यवस्था जो ऐसी स्थिति बनाने में मदद करें जिसमें आर्थिक विकास के प्रतिफल सबको तथा विशेष रूप से गरीब एवं समाज के वंचित वर्गों को मिलें।

पाठगत प्रश्न 24.2

1. निरक्षरता, असमानता एवं गरीबी, भारतीय लोकतंत्र पर किस प्रकार प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

उत्तर: निरक्षता, असमानता तथा गरीबी भारतीय लोकतंत्र की कार्यशीलता पर बुरा प्रभाव डालते हैं। (i) निरक्षर नागरिक प्रभावशाली भूमिका निभाने में सक्षम नहीं होते हैं और ना ही वे अपने मताधिकार का सार्थक उपयोग कर सकते हैं, जो जनशक्ति की एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है। साक्षरता नागरिकों को देश के विभिन्न मुद्दों, समस्याओं माँगों तथा हितों के बारें में जागरूक बनाती है, स्वतन्त्रता और सब की समानता के सिद्धातों के प्रति जागरूक बनाती है तथा यह सुनिश्चित करती हहै कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि समाज के सभी हितों का सही अर्थों में प्रतिनिधित्व करें। (ii) गरीबी लोकतंत्र का सबसे बड़ा अभिशाप है। यह सभी तरह की वंचनाओं एवं असमानताओं की जड़ है; यह लोगों को स्वस्थ एवं पूर्ण जीवन जीने के अवसरों से वंचित रखती है।

2. क्या आप सहमत हैं कि मनोरंजन के लोकप्रिय चैनलों या फिल्मों के द्वारा महिलाओं की प्रस्तुती लैंगिक भेदभाव को चित्रित करती हैं। उदाहरण देकर पुष्टि कीजिए।

उत्तर: लोकप्रिय मनोरंजन चैनल टेलिविजन में दिखाए जानेवाले कार्यक्रम एवं फिल्में प्रायः लैंगिक भेदभाव को प्रदर्शित करती हैं। सच तो यह है कि सीरियल परम्परागत रूप से प्रचलित पारिवारिक सम्बन्धों को प्रचलित करते हैं तथा महिलाओं को माता, बहन, पत्नी, पुत्री, सास तथा बहू की परम्परागत भूमिकाएँ निभाते हुए दिखलाते हैं। यह सच है कि कुछ सीरियल इन परम्परागत भूमिकाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं, लेकिन उनमें भी लैंगिक भेदभाव प्रतिविम्बित होता रहता है।

3. जातिवाद अथवा साम्प्रदायिकता हमारे दैनिक जीवन तथा भारतीय लोकतंत्र पर कैसा प्रभाव डालते हैं? दो उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: जातिवादः छूआछूत की प्रथा जातिवाद का सर्वाधिक घृणित एवं अमानवीय पहलू है जो सवैध ॥निक प्रतिबंध के बावजूद हमारे समाज में जारी है। दलित अभी भी भेदभाव एवं वंचनाओं के शिकार हैं। इसके कारण तथाकथित निचली जातियों का अलगाव हो रहा है तथा उन्हें शिक्षा तथा जन्य सामाजिक लाभों से वंचित रखा रहा है। दूसरा उदाहरण जातिवाद के राजनीतिकरण का है। जातिवाद का उपयोग संकीर्ण राजनीतिक लाम के लिए का शोषण द्वारा जातिगत चेतना का अनुचित लाभ उठाने की रणनीति के रूप में हुआ है। जातिवाद लोकतंत्र के मूल तत्वों का विरोधी है। साम्प्रदायिकता, यह बहुधार्मिक भारतीय समाज में सह-अस्तित्व की सहज प्रक्रिया मार्ग में अक्सर बाधा उत्पन्न करती है। देश में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बद से ही हो रहे साम्प्रदायिक दंगे सामाजिक शान्ति और भाईचारे के लिए खतरा बने हुए हैं। इसके अलावा, कट्टरपंथियों द्वारा चुनावों में तथा अन्य अवसरों पर धर्म का दुरूपयोग हमेशा नकारात्मक प्रभाव डालता है।

4. यदि क्षेत्रीयवाद एवं उप-क्षेत्रीयवाद, भारतीय लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं तो इन्हें चुनौतियों क्यों माना गया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: यद्यपि देश की विकास प्रक्रिया का उद्देश्य सभी क्षेत्रों की प्रगति एवं उनका विकास करना रहा है, फिर भी क्षेत्रीय असमानता एवं असन्तुलन बने हुए हैं। क्षेत्रीय असमानता की मौजूदगी एवं उसकी निरंतरता जो प्रतिव्यक्ति आय, साक्षरता दर, स्वास्थ्य एवं शिक्षा की आधारभूत संरचना एवं सेवाओं की स्थिति, जनसंख्या स्थिति तथा राज्यों के बीच एवं एक ही राज्य के भीतर औद्योगिक एवं कृषि के अन्तर के रूप में होती है, उपेक्षा, वंचना और भेदभाव की भावना पैदा करती है।

5. भारत में राजनीति के अपराधीकरण के कौन-कौन से कारण हैं।

उत्तर: एक लम्बे अर्से से, भारतीय राजनीति में वाहुबल का प्रभाव जीवन की सच्चाई रहा है। लगभग सभी राजनीतिक दल चुनाव जीतने एवं चुनावी दृश्यों पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए अपराधी तत्वों की सहायता लेते है। पिछली शताब्दी के छठे दशक तक अपराधीगण छुपकर राजनीतिज्ञों को चुनाव जीतने में मदद करते थे, ताकि राजनीतिज्ञ बाद में उन्हें संरक्षण प्रदान करें। लेकिन अब भूमिकाएँ बदल गई हैं। अब राजनीतिज्ञ ही अपराधियों से संरक्षण प्राप्त करते हैं।

6. भारत में राजनीतिक हिंसा में वृद्धि के कौन-कौन से कारण हैं?

उत्तर: कृषि संबंधी विकास, जमींदारी व्यवस्था के उन्मूलन तथा हरित क्रान्ति एवं श्वेत क्रान्ति जैसे विकास कार्यों के फलस्वरूप उच्चतर एवं मध्य जातियों के बीच हितों का संघर्ष राजनीतिक हिंसा में बढ़ोतरी का एक मुख्य कारण वन गया है। दोनों जाति वर्गों के बीच राजनीतिक सत्ता के लिए आक्रमक प्रतिद्वन्द्विता होने लगी है, जिसके चलते अक्सर राजनीतिक हिंसाएँ होती हैं। इसका दूसरा कारण तथाकथित निम्न जातियों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों तथा पिछड़ी जातियों में अपने अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता तथा प्रभावशाली ढंग से उन अधिकारों का दावा करने की प्रवृत्ति का उच्चतर जातियों द्वारा किया जाने वाला अवरोध है। इसके अतिरिक्त अलग राज्य बनाने की माँग राज्यों के पुनर्गठन तथा सीमा में परिवर्तन आदि मांगों के साथ भी राजनीतिक हिंसा जुड़ी होती है। जैसाकि हमने देखा है, आंध्र प्रदेश में तेलांगना को राज्य बनाने का आन्दोलन प्रायः हिंसक हो जाता है। औद्योगिक हड़तालें, कृषकों के आन्दोलन, विद्यार्थी आन्दोलन तथा अन्य कई आन्दोलनों के दौरान भी हिंसाएं होती है।

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