NCERT Class 9 Science Chapter 13 पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन Solutions Hindi Medium As Per New Syllabus. to each chapter is provided in the list so that you can easily browse through different chapters NCERT Class 9 Science Chapter 13 पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन Notes and select need one. NCERT Class 9 Science Chapter 13 पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन Question Answers Download PDF. CBSE Class 9 Science Notes in Hindi.
NCERT Class 9 Science Chapter 13 पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
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पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
Chapter: 13
| TEXTUAL SOLUTIONS |
चिंतन कीजिए (Page No. 253)
1. अरब सागर के जल के गर्म होने से भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: अरब सागर के जल के गर्म होने के कारण समुद्र से अधिक मात्रा में वाष्पीकरण होता है। इसके परिणामस्वरूप, दक्षिण-पश्चिम मानसून में भारी उतार-चढ़ाव होता है और वर्षा में असमानता आती है। इस असमानता के कारण भारत के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है, जबकि अन्य क्षेत्र सूखाग्रस्त रह सकते हैं। इसके अलावा, गर्म वायु अधिक नमी को धारण करती है, जिससे मानसून और भी अधिक प्रचंड हो सकता है जो कृषि के लिए खतरा बन सकता है।
2. यदि किसी बड़े वन क्षेत्र को हटा दिया जाए तो उस क्षेत्र की नदी के प्रवाह पर इसका क्या प्रभाव हो सकता है?
उत्तर: किसी बड़े वन क्षेत्र को हटा देने (वनोन्मूलन) से पौधों द्वारा होने वाला वाष्पोत्सर्जन घट जाता है, जिससे स्थानीय वर्षा में कमी आ सकती है। साथ ही, मृदा को बाँधकर रखने वाली वृक्षों की जड़ों के अभाव में मृदा अपरदन (soil erosion) बढ़ जाता है और सतही जल का अपवाह भी तेज हो जाता है। इससे जल का भूमि के नीचे रिसाव कम हो जाता है और नदियों में अचानक पानी का बहाव तेज़ होने से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
3. यदि हिमानियाँ (glaciers) और ध्रुवीय बर्फ तेजी से पिघलती रही तो भारत के तटीय शहरों पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?
उत्तर: तापमान वृद्धि के कारण यदि हिमानियाँ और ध्रुवीय बर्फ तेजी से पिघलती हैं, तो नदियों में जल की मात्रा बहुत अधिक हो जाएगी और अंततः समुद्र का जल स्तर बढ़ जाएगा। समुद्र के जल स्तर में वृद्धि होने से भारत के तटीय शहरों, जैसे— मुंबई और चेन्नई के डूबने का खतरा उत्पन्न हो सकता है और निचले क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
4. वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से महासागरीय प्लवक (plankton) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर: वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा बढ़ने से महासागरों द्वारा इसका अवशोषण बढ़ जाता है, जिसके कारण समुद्री जल अधिक अम्लीय (acidic) हो जाता है। जल का यह अम्लीयकरण सूक्ष्म प्लवकों (plankton) और प्रवाल भित्तियों (coral reefs) के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है, जिससे संपूर्ण समुद्री पारितंत्र (ecosystem) बाधित हो सकता है।
सोचिए और बताइए (Page No. 258, 261, 263 and 265)
1. दिए गए वेबपृष्ठ का अवलोकन कीजिए और यह समझें कि हरित गृह गैसों की मात्रा सतही ताप को किस प्रकार प्रभावित करती है— https://phet.colorado.edu/en/simulations/greenhouse-effect
उत्तर: हरित गृह गैसों (Greenhouse Gases) की मात्रा पृथ्वी के सतही तापमान को सीधे तौर पर नियंत्रित और प्रभावित करती है।
इसका प्रभाव इस प्रकार होता है:
(i) ऊष्मा को रोकना: पृथ्वी की सतह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर लेती है और उसे अवरक्त (infrared) ऊष्मा के रूप में पुनः अंतरिक्ष की ओर विकिरित करती है। वायुमंडल में उपस्थित हरितगृह गैसें, जैसे— कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄) और जलवाष्प इस बाहर जाने वाली ऊष्मा को अवशोषित कर लेती हैं और उसे अंतरिक्ष में जाने से रोक देती हैं।
(ii) सतही ताप में वृद्धि: जब मानवीय गतिविधियों के कारण वायुमंडल में अतिरिक्त CO₂ और अन्य हरितगृह गैसों की मात्रा बढ़ती है, तो वे अधिक मात्रा में ऊष्मा को सोखने लगती हैं। इससे हरित गृह प्रभाव (Greenhouse Effect) बढ़ जाता है।
(iii) परिणाम: हरित गृह गैसों के बढ़ने से वैश्विक ताप में वृद्धि (Global Warming) होती है और पृथ्वी की सतह का तापमान लगातार बढ़ता जाता है। यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो अत्यधिक गर्मी के कारण पृथ्वी पर जीवन दुष्कर हो सकता है।
2. शीतल पर्वतीय समीर कृषि कार्यों, विशेषतः फसलों और मृदा के लिए किस प्रकार लाभदायक होती है?
उत्तर: पर्वतीय ढलानों पर सूर्यास्त के पश्चात् ऊष्मा का क्षय तीव्रता से होता है और वे ठंडी हो जाती हैं, जिससे वहां की वायु सघन होकर नीचे घाटी की ओर बहने लगती है जिसे पर्वतीय समीर कहते हैं। यह शीतल पर्वतीय समीर पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम की स्थिति, कृषि और दैनिक जीवन को अनुकूल रूप से प्रभावित करती है। यह मुख्य रूप से ताप और आर्द्रता की परिस्थितियों को नियंत्रित करने में सहायता करती है, जिससे मृदा एवं फसलों की गुणवत्ता बनी रहती है।
3. भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर जल की गर्म सतह का क्या होता है? इस संचलन का उस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: जल की गर्म सतह का क्या होता है: भूमध्य रेखा का उष्ण (गर्म) जल, महासागर की सतह से बहते हुए ध्रुवों की ओर बढ़ता है, जबकि महासागर के गहरे निचले स्तर का ठंडा और सघन जल मंद रूप से भूमध्य रेखा की ओर पुनः प्रवाहित होता है।
क्षेत्र पर प्रभाव: इस प्रकार का संचलन (महासागरीय धाराएँ) भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा का स्थानांतरण करके भूमंडल के ताप के अंतर को कम करता है और जलवायु को नियंत्रित करता है। उदाहरण के लिए, उत्तरी अटलांटिक प्रवाह जैसी उष्ण महासागरीय धाराएँ शीतकाल में भी उच्च अक्षांशों पर स्थित कई बंदरगाहों को बर्फ से मुक्त रखती हैं। यह जलवायु पर संतुलनकारी प्रभाव डालती है जो व्यापार और वाणिज्य के लिए सहायक होता है, तथा पोषक तत्वों के परिवहन द्वारा विशाल समुद्री पारितंत्र को भी सहायता प्रदान करता है।
4. वैश्विक तापमान में वृद्धि से महासागरों में घुली CO2 का संतुलन बिगड़ जाता है। इसका समुद्री जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर: वायुमंडलीय CO₂ की अधिकता के कारण महासागरों में इसका अवशोषण बढ़ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्री जल अधिक अम्लीय (acidic) हो जाता है। जल के इस अम्लीयकरण के कारण सूक्ष्म प्लवकों (plankton) और प्रवाल भित्तियों (coral reefs) के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है, जो संपूर्ण समुद्री पारितंत्र (ecosystem) को बुरी तरह बाधित कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण जब महासागरीय जल गर्म होता है, तो गर्म जल महासागर की CO₂ को अवशोषित करने की क्षमता को घटा देता है, जिससे उनकी प्रभावी कार्बन भंडारण क्षमता कम हो जाती है।
5. यदि जैव-भूरासायनिक चक्र बाधित हो जाए अथवा रुक जाए तो पृथ्वी पर पादपों और जंतुओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: पृथ्वी के निर्जीव (abiotic) और सजीव (biotic) घटकों के मध्य आवश्यक पोषक तत्वों (जैसे— कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और जल) और ऊर्जा के चक्रीय संचलन को जैव-भूरासायनिक चक्र कहा जाता है। यदि यह चक्र बाधित हो जाए अथवा रुक जाए, तो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने वाले आवश्यक पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण (recycling) नहीं हो पाएगा। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी के विभिन्न पारिस्थतिक तंत्रों का संतुलन बिगड़ जाएगा और पादपों तथा जंतुओं का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
उदाहरण:
(i) ऑक्सीजन और कार्बन चक्र का रुकना: पादप प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सूर्य के प्रकाश, जल और वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उपयोग करके अपना भोजन (ग्लूकोज) बनाते हैं और जीवनदायिनी ऑक्सीजन (O2) उत्सर्जित करते हैं। यदि यह चक्र रुक जाए (जैसे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बंद हो जाए), तो वायुमंडल में ऑक्सीजन का प्रवाह रुक जाएगा। इसके बिना जंतुओं और मनुष्यों के लिए श्वसन करना और जीवित रहना असंभव हो जाएगा।
(ii) नाइट्रोजन चक्र का बाधित होना: सभी सजीवों में प्रोटीन और न्यूक्लीक अम्लों के संश्लेषण के लिए नाइट्रोजन एक अत्यंत आवश्यक तत्व है। यदि नाइट्रोजन चक्र रुक जाए, तो पादपों को मिट्टी से आवश्यक घुलनशील नाइट्रोजन यौगिक नहीं मिल पाएंगे, जिससे पादपों की वृद्धि रुक जाएगी और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन पर निर्भर रहने वाले जंतु भी भोजन के अभाव में प्रभावित होंगे।
(iii) जल चक्र का बाधित होना: जल चक्र के बाधित होने या जलवायु परिवर्तन के कारण जल के प्रवाह में असंतुलन आ जाता है। इसके कारण कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक सूखा पड़ सकता है और कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आ सकती है, जिससे कृषि (पादप) नष्ट हो सकती है और कई सजीवों के आवास छिन सकते हैं।
अतः, पादपों और जंतुओं के सतत जीवन तथा पृथ्वी के विभिन्न मंडलों में संतुलन बनाए रखने के लिए जैव-भूरासायनिक चक्रों का निरंतर चलते रहना अत्यंत आवश्यक है।
क्या होता यदि… (Page No. 265)
1. यदि प्रकाश संश्लेषण रुक जाए, तो पृथ्वी पर क्या होगा?
उत्तर: यदि पृथ्वी पर प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया रुक जाए, तो इसके निम्नलिखित गंभीर परिणाम होंगे:
(i) ऑक्सीजन (O2) का उत्पादन बंद होना: पादप प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सूर्य के प्रकाश, जल और वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उपयोग करके अपना भोजन (ग्लूकोज) बनाते हैं और जीवनदायिनी ऑक्सीजन (O2) उत्सर्जित करते हैं। यदि यह प्रक्रिया रुक जाए, तो वायुमंडल में नई ऑक्सीजन का आना बंद हो जाएगा।
(ii) ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का असंतुलन: सजीव (पादप और जंतु) श्वसन (respiration) के लिए और ईंधनों के दहन (combustion) में लगातार ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं। प्रकाश संश्लेषण रुकने से ऑक्सीजन के उपयोग (उपभोग) और उत्पादन के बीच का यह संतुलन पूरी तरह से टूट जाएगा।
(iii) जीवन की समाप्ति: वायुमंडल, स्थल, महासागरों और सजीवों के बीच ऑक्सीजन का परिसंचरण रुक जाएगा। ऑक्सीजन के अभाव और भोजन (ग्लूकोज) के उत्पादन के बिना पृथ्वी पर मौजूद सभी सजीवों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और पृथ्वी के मंडलों में जीवन सतत नहीं रह पाएगा।
सोचिए और बताइए (Page No. 266)
1. चर्चा कीजिए कि मानवीय गतिविधियाँ वायुमंडल में हरित गृह गैसों की मात्रा किस प्रकार बढ़ाती हैं? हरित गृह गैसों के बढ़ते उत्सर्जन को रोकने के लिए आप अपने स्तर पर क्या करेंगे?
उत्तर: मानवीय गतिविधियाँ वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और अन्य हरित गृह गैसों की मात्रा को मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार से बढ़ा रही हैं:
(i) जीवाश्म ईंधनों का दहन: वाहनों, उद्योगों और विद्युत उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधनों (जैसे— कोयला, तेल और गैस) का अत्यधिक दहन किया जाता है, जिससे बहुत कम समय में भारी मात्रा में CO2 और अन्य प्रदूषक वायुमंडल में उत्सर्जित होते हैं।
(ii) वनोन्मूलन (वनों की कटाई): बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से प्रकाश संश्लेषण में कमी आती है, जिससे वायुमंडल से CO2 को अवशोषित करने वाले प्राकृतिक स्रोत (कार्बन सिंक) घट रहे हैं।
हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर किए जाने वाले प्रयास: हम अपने स्तर पर पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित योगदान दे सकते हैं:
(i) संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग: प्रत्येक व्यक्ति को ऊर्जा, जल और भोजन जैसे संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण करना चाहिए।
(ii) 3R’s का पालन: अपशिष्ट (कचरा) पदार्थों में कमी लाना (Reduce), पदार्थों का पुन: उपयोग करना (Reuse) और पुनर्चक्रण (Recycle) की प्रक्रिया अपनाना।
(iii) वृक्षारोपण और संरक्षण: अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना और सतत जीवनशैली (मिशन LiFE के अंतर्गत पर्यावरण हितैषी जीवनशैली) को अपनाना।
(iv) नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग: ऊर्जा के पारंपररिक स्रोतों की जगह नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों (जैसे— सौर ऊर्जा एवं पवन ऊर्जा) के उपयोग को बढ़ावा देना।
अभ्यास प्रश्न
1. पारितंत्र में जैव-भू रासायनिक चक्रों की भूमिका का वर्णन करने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त विकल्प चुनिए।
(i) समस्त जीवों को प्रत्यक्ष रूप से भोजन उपलब्ध कराना।
(ii) जैविक और अजैविक घटकों के मध्य आवश्यक पोषक पुनर्चक्रण करना।
(iii) सजीवों के उपयोग के लिए नए तत्वों का निर्माण करना।
(iv) जीव से प्रदूषक और विषाक्त पदार्थों को हटाना।
उत्तर: (ii) जैविक और अजैविक घटकों के मध्य आवश्यक पोषक पुनर्चक्रण करना।
2. निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प पृथ्वी के गर्म होने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है?
(i) सौर विकिरण शीघ्रता से कार्बन डाईआक्साइड द्वारा अवशोषित हो जाती है, जो इसे ऊष्मा के रूप में निर्मुक्त करती है।
(ii) वायुमंडल के सूक्ष्म कण आगामी सौर विकिरण को अवशोषित करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को गर्म करते हैं।
(iii) पृथ्वी की सतह, सौर विकिरण का अवशोषण करती है, जो पुन: विकिरित होती है और हरित गृह गैसों द्वारा रोक ली जाती है।
(iv) पृथ्वी का वातावरण बादलों द्वारा परावर्तित सौर विकिरण से ही गर्म होता है।
उत्तर: (iii) पृथ्वी की सतह, सौर विकिरण का अवशोषण करती है, जो पुन: विकिरित होती है और हरित गृह गैसों द्वारा रोक ली जाती है।
3. स्पष्ट कीजिए कि जलवायु परिवर्तन, जल चक्र को किस प्रकार प्रभावित करता है? उदाहरणों द्वारा दर्शाइए।
उत्तर: जलवायु परिवर्तन जल चक्र को कई स्तरों पर गंभीरता से प्रभावित कर रहा है। अधिक गर्म वायुमंडल अधिक नमी को संचित कर लेता है, जिसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों (जैसे तीव्र मानसून वाले इलाके) में अत्यधिक वर्षा होती है और बाढ़ आ सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में भयंकर सूखा पड़ सकता है। तापमान में वृद्धि के कारण हिमानियां (glaciers) तेजी से पिघलती हैं, जिससे नदियों में जल की अधिकता होती है और अंततः समुद्र का जल स्तर बढ़ जाता है; यह तटीय शहरों (जैसे— मुंबई और चेन्नई) के लिए बड़ा संकट है। इसके अलावा, आकस्मिक तीव्र वर्षा से सतही जल का अपवाह (runoff) बढ़ जाता है और मृदा अपरदन होता है, जिससे भूजल का पुनर्भरण (रीचार्ज) कम हो जाता है, जो कृषि और प्राकृतिक जीवन को प्रभावित करता है।
4. वर्णन कीजिए कि एल्बिडो किस प्रकार पृथ्वी की सतह के ताप और इसकी जलवायु को प्रभावित करता है।
उत्तर: किसी सतह द्वारा सौर विकिरण को परावर्तित करने वाले अंश को ‘एल्बिडो’ (Albedo) कहा जाता है। उच्च एल्बिडो वाली सतहें, जैसे हिम (बर्फ), आने वाले सौर विकिरण का एक बहुत बड़ा भाग (0.80 – 0.90) परावर्तित कर देती हैं। अधिक प्रकाश परावर्तित करने के कारण ये सतहें ठंडी रहती हैं; यही कारण है कि ध्रुवीय प्रदेश हमेशा अत्यधिक ठंडे होते हैं। इसके विपरीत, निम्न एल्बिडो वाली सतहें, जैसे काली मृदा और महासागरीय जल, प्रकाश का कम परावर्तन और अधिक अवशोषण करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे अपेक्षाकृत अधिक गर्म हो जाती हैं। इस प्रकार पृथ्वी के विभिन्न भागों का एल्बिडो वहां के ताप और अंततः वहां की जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
5. पर्वतीय और घाटी समीर किस प्रकार बनती हैं? मान लीजिए दो पर्वत हैं, एक घास द्वारा आच्छादित है और दूसरा बंजर चट्टानों से, क्या दोनों पर्वतीय समीरों के ताप भिन्न-भिन्न होंगे? यदि ऐसा है तो किस प्रकार?
उत्तर: दिन के समय सूर्य के सामने वाली पर्वतीय ढलानें, घाटी के तल की तुलना में अधिक तीव्रता से गर्म होती हैं। इससे वहाँ की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और निम्न दाब उत्पन्न होता है। तब घाटी से ठंडी वायु ढलान से ऊपर की ओर उठकर उस वायु को विस्थापित करती है, जिसे ‘घाटी समीर’ कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात ढलानों से ऊष्मा का क्षय तेजी से होता है और वे ठंडी हो जाती हैं। तब ढलानों की सघन और ठंडी वायु नीचे घाटी की ओर बहने लगती है, जिसे ‘पर्वतीय समीर’ कहते हैं।
घास और बंजर चट्टानों का प्रभाव: हाँ, दोनों पर्वतों से आने वाली समीरों के ताप भिन्न होंगे। घास से आच्छादित पर्वत पर वनस्पति की उपस्थिति और पादप वाष्पोत्सर्जन के कारण वह हिस्सा अधिक ठंडा रहेगा। दूसरी ओर, बंजर चट्टानें सौर विकिरण का अधिक अवशोषण करती हैं और ऊष्मा को संचित रखती हैं, जिससे वे रात में भी ऊष्मा का विकिरण करती हैं।
अतः, बंजर चट्टानों वाले पर्वत से बहने वाली पर्वतीय समीर, घास वाले पर्वत की समीर की तुलना में कम ठंडी (अपेक्षाकृत गर्म) होगी।
6. आप पवन, तूफान और वर्षा आदि मौसमी परिघटनाओं के साक्षी रहे हैं। वायुमंडल की कौन-सी परतें इनके लिए उत्तरदायी हैं? और इन परिघटनाओं के होने का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर: उत्तरदायी परत: पवन, तूफान और वर्षा जैसी लगभग सभी मौसमी परिघटनाएँ वायुमंडल की सबसे निचली परत, अर्थात् क्षोभमंडल (Troposphere) में घटित होती हैं।
प्रमुख कारण: इन परिघटनाओं का प्रमुख कारण सूर्य द्वारा पृथ्वी की सतह का ‘असमान ऊष्मण’ है। भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच तथा जल और थल के बीच ताप में अंतर के कारण वायु दाब में भिन्नता उत्पन्न होती है। क्षोभमंडल पृथ्वी की सतह से गर्म होता है, और जब यह गर्म वायु ऊपर उठती है, तो यह तेज हवाएं, आंधी-तूफान और वर्षा जैसे मौसम के विभिन्न पैटर्न उत्पन्न करती है।
7. नाइट्रोजन चक्र में होने वाली प्रक्रियाओं की व्याख्या कीजिए। यदि नाइट्रोजन का चक्रण नहीं हो तो पृथ्वी पर जीवन किस प्रकार प्रभावित होगा?
उत्तर: नाइट्रोजन चक्र की प्रक्रियाएँ:
(i) नाइट्रोजन स्थिरीकरण: राइजोबियम और एजोटोबैक्टर जैसे जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस (N2) को अमोनिया (NH3) में बदल देते हैं।
(ii) नाइट्रीकरण: नाइट्रोसोमोनास जीवाणु अमोनिया को नाइट्राइट (NO2−) में तथा नाइट्रोबैक्टर उसे नाइट्रेट (NO3−) में परिवर्तित करते हैं।
(iii) स्वांगीकरण: पादप मिट्टी से इन नाइट्रोजन यौगिकों का अवशोषण (स्वांगीकरण) करते हैं। जंतु पादपों या अन्य जंतुओं को खाकर नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।
(iv) अमोनीकरण: जब पादप या जंतु मर जाते हैं, तो अपघटक (जीवाणु/कवक) उनके कार्बनिक द्रव्यों को अपघटित कर अमोनिया को पुनः मिट्टी में लौटा देते हैं।
(v) विनाइट्रीकरण: स्यूडोमोनास जैसे जीवाणु नाइट्रेट को पुनः नाइट्रोजन गैस में बदल देते हैं, जो वायुमंडल में लौट जाती है।
जीवन पर प्रभाव: सजीवों में प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों के निर्माण के लिए नाइट्रोजन अत्यंत आवश्यक है। यदि इसका चक्रण न हो, तो पादपों को मिट्टी से घुलनशील नाइट्रोजन नहीं मिलेगी। इसके परिणामस्वरूप पादपों की वृद्धि रुक जाएगी और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन पर निर्भर रहने वाले जंतु और संपूर्ण जीवन पृथ्वी पर समाप्त हो जाएगा।
8. वनोन्मूलन का पृथ्वी के ऑक्सीजन और कार्बन चक्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है? वनोन्मूलन के अन्य परिणाम क्या हैं?
उत्तर: ऑक्सीजन और कार्बन चक्र पर प्रभाव: वनोन्मूलन (वनों की कटाई) से वृक्षों की संख्या कम हो जाती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया घट जाती है। इससे वायुमंडल में जीवनदायिनी ऑक्सीजन (O2) का उत्पादन कम हो जाता है। साथ ही, वृक्ष कार्बन के प्राकृतिक अवशोषक (सिंक) होते हैं; इनकी कमी से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को सोखने की क्षमता घट जाती है, जिससे वायुमंडल में CO2 की मात्रा बढ़ जाती है और कार्बन चक्र बाधित होता है।
अन्य परिणाम: वनोन्मूलन से पौधों द्वारा होने वाला वाष्पोत्सर्जन घट जाता है, जिससे स्थानीय वर्षा में कमी आ सकती है। वृक्षों की जड़ों के अभाव में मिट्टी को बांधकर रखने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे मृदा अपरदन बढ़ जाता है। इसके अलावा, वनों के कटने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास छिन जाता है, जिसके परिणामस्वरूप जैव विविधता में भारी कमी आती है।
9. उपर्युक्त चित्र से उस पथ की व्याख्या कीजिए जिससे कार्बन पुनः वायुमंडल में जाता है। इस चित्र का आरंभ आप पादपों द्वारा वायुमंडलीय CO2 के उपयोग से कर सकते हैं।
उत्तर: कार्बन चक्र में सबसे पहले पादप प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) ग्रहण करके भोजन का निर्माण करते हैं। यह कार्बन भोजन के माध्यम से शाकाहारी और मांसाहारी जीवों तक पहुँचता है। पादप तथा जंतु श्वसन के दौरान CO₂ को पुनः वायुमंडल में छोड़ते हैं। इनके मरने के बाद अपघटक उनके मृत अवशेषों का अपघटन करते हैं, जिससे कार्बन फिर से CO₂ के रूप में वायुमंडल में पहुँच जाता है। कुछ कार्बन लंबे समय तक जीवाश्म ईंधनों के रूप में संचित रहता है, जो दहन के समय CO₂ के रूप में पुनः वायुमंडल में मुक्त हो जाता है। इस प्रकार प्रकाश-संश्लेषण, श्वसन, अपघटन तथा जीवाश्म ईंधनों के दहन जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से कार्बन निरंतर वायुमंडल में वापस जाता रहता है और कार्बन चक्र पूर्ण होता है।
10. वायुमंडल में CO2 की अधिकता को अवांछनीय क्यों माना जाता है जबकि पादपों को इसकी आवश्यकता होती है?
उत्तर: यद्यपि पादपों को प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाने के लिए CO2 की आवश्यकता होती है और पृथ्वी को जीवन के अनुकूल गर्म रखने के लिए इसकी कुछ मात्रा अनिवार्य है, लेकिन वायुमंडल में इसकी अधिकता अवांछनीय है क्योंकि यह हरित गृह प्रभाव (Greenhouse Effect) को बहुत अधिक तीव्र कर देती है। CO2 की अधिकता बाहर जाने वाली ऊष्मा को अधिक मात्रा में रोक लेती है, जिससे वैश्विक तापन (Global Warming) होता है। इसके कारण हिमानियां पिघलती हैं, समुद्र का जल स्तर बढ़ता है, और मौसम में अत्यधिक चरम (extreme) परिवर्तन होते हैं। इसके अलावा, CO2 की अधिकता से महासागर इसे अधिक अवशोषित करते हैं, जिससे समुद्री जल अधिक अम्लीय हो जाता है जो समुद्री जीवन (सूक्ष्म प्लवक और प्रवाल भित्तियों) के लिए बड़ा खतरा है।
11. पृथ्वी की सतह से ऊष्मा का क्षय किस प्रकार होता है? इसकी क्या सार्थकता है?
उत्तर: पृथ्वी की सतह दिन के समय सूर्य के प्रकाश (लघु तरंगदैर्ध्य वाले विकिरण) को अवशोषित करती है और गर्म हो जाती है। इसके पश्चात, गर्म हुई पृथ्वी की सतह इस ऊष्मा को अवरक्त विकिरण (Infrared Radiation) या दीर्घ तरंगदैर्ध्य के रूप में पुनः वायुमंडल और अंतरिक्ष की ओर विकिरित (radiate) करती है। इसी प्रक्रिया से ऊष्मा का क्षय होता है।
सार्थकता: यह प्रक्रिया पृथ्वी के ऊर्जा-संतुलन (Heat Balance) को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि पृथ्वी इस ऊष्मा को वापस अंतरिक्ष में न भेजे, तो पृथ्वी लगातार गर्म होती जाएगी और यहाँ जीवन असंभव हो जाएगा। इस बाहर जाने वाली ऊष्मा के एक छोटे से हिस्से को हरित गृह गैसें रोककर पृथ्वी को उपयुक्त रूप से गर्म रखती हैं।
12. यदि पृथ्वी गोलाकार न होकर एक तश्तरी के समान चपटी होती तब सौर विकिरण और ताप के पैटर्न किस प्रकार भिन्न होते?
उत्तर: यदि पृथ्वी तश्तरी के समान पूरी तरह से चपटी होती, तो सूर्य की किरणें (सौर विकिरण) इसके सभी हिस्सों पर एक समान कोण (लंबवत) से पड़तीं। वर्तमान में पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण भूमध्य रेखा पर किरणें सीधी और ध्रुवों पर तिरछी पड़ती हैं, जिससे असमान ऊष्मण होता है। पृथ्वी के चपटी होने की स्थिति में, भूमध्य रेखा से लेकर ध्रुवों तक सर्वत्र एक समान ताप होता और ताप का कोई अक्षांशीय अंतर नहीं होता। इस असमान ऊष्मण (ताप के अंतर) के अभाव में, वैश्विक पवनें, वायुमंडलीय परिसंचरण और महासागरीय धाराएं उत्पन्न ही नहीं हो पातीं, जो कि वर्तमान में पूरी पृथ्वी की जलवायु को संचालित करती हैं।
13. कल्पना कीजिए कि पृथ्वी पर वायुमंडलीय ताप बढ़ जाता है। यह किस प्रकार हिममंडल, जलमंडल और जैवमंडल को प्रभावित करेगा?
उत्तर: वैश्विक ताप वृद्धि (Global Warming) का पृथ्वी के मंडलों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा:
(i) हिममंडल (Cryosphere): तापमान बढ़ने से हिमानियों (glaciers) और ध्रुवीय हिम छत्रकों के पिघलने की दर अत्यधिक तेज हो जाएगी, जिससे बर्फ के प्राकृतिक भंडार खत्म हो सकते हैं।
(ii) जलमंडल (Hydrosphere): बर्फ पिघलने से महासागरों का जल स्तर बढ़ जाएगा, जिससे तटीय शहरों (जैसे मुंबई, चेन्नई) के डूबने का खतरा होगा। जल चक्र असंतुलित होगा, जिससे कुछ क्षेत्रों में भयंकर बाढ़ आएगी और कुछ क्षेत्रों में सूखा पड़ेगा। महासागरों का जल गर्म होने से उनकी CO2 सोखने की क्षमता भी घट जाएगी।
(iii) जैवमंडल (Biosphere): ताप वृद्धि और जल चक्र बिगड़ने से कृषि पर संकट आएगा और कई जीवों के प्राकृतिक आवास (पर्यावास) नष्ट हो जाएंगे। समुद्री पारितंत्र में प्रवाल भित्तियों और सूक्ष्म प्लवकों का विनाश हो सकता है, जिससे संपूर्ण जैव विविधता को भारी क्षति पहुँचेगी।
14. व्याख्या कीजिए कि किस प्रकार पृथ्वी का वायुमंडल, इसका ताप उपयुक्त बनाए रखने के लिए सहायता करता है जो कि पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है।
उत्तर: वायुमंडल मुख्य रूप से दो प्रक्रियाओं द्वारा पृथ्वी का ताप संतुलित और जीवन के अनुकूल बनाए रखता है:
(i) हानिकारक विकिरण और अत्यधिक ऊष्मा से बचाव: वायुमंडल के समतापमंडल में स्थित ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित कर लेती है। इसके अलावा, वायुमंडल में मौजूद बादल, धूल कण और अन्य गैसें दिन के समय आने वाले सौर विकिरण के कुछ हिस्से को परावर्तित और अवशोषित कर लेते हैं, जिससे पृथ्वी अत्यधिक गर्म होने से बच जाती है।
(ii) हरित गृह प्रभाव (Greenhouse Effect) द्वारा ऊष्मा को रोकना: पृथ्वी की सतह जो ऊष्मा अवशोषित करती है, उसे वह वापस अवरक्त विकिरण के रूप में अंतरिक्ष की ओर छोड़ती है। वायुमंडल में उपस्थित हरित गृह गैसें (जैसे- CO2, मीथेन और जलवाष्प) इस पुनः विकिरित ऊष्मा को रोक (अवशोषित कर) लेती हैं, जिससे यह अंतरिक्ष में नहीं जा पाती। यदि वायुमंडल ऐसा न करे, तो रात में पृथ्वी इतनी ठंडी हो जाएगी कि यहाँ जीवन संभव ही नहीं हो पाएगा।
15. पृथ्वी के विभिन्न मंडलों के मध्य अंतःसंबंधों का वर्णन कीजिए। उदाहरण सहित समझाइए कि ये मंडल किस प्रकार एक सूक्ष्म संतुलन में कार्य करते हैं।
उत्तर: पृथ्वी के सभी पाँच प्रमुख मंडल (भूमंडल, जलमंडल, हिममंडल, वायुमंडल और जैवमंडल) स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि वे आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और ऊर्जा तथा द्रव्य (पदार्थ) का निरंतर आदान-प्रदान करते हैं।
उदाहरण (जल और पोषक तत्वों का चक्रण): सूर्य (ऊर्जा स्रोत) के ताप से जलमंडल (महासागरों) का जल वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में जाता है और बादल बनता है। यह जल भूमंडल और हिममंडल पर वर्षा या बर्फ के रूप में गिरता है। यही वर्षा का जल भूमंडल पर नदियों के रूप में बहता है, जिससे चट्टानों के खनिज घुलकर महासागरों तक पहुँचते हैं। जैवमंडल (पेड़-पौधे और जंतु) जीवित रहने के लिए इसी जल और खनिजों का उपयोग करते हैं और वाष्पोत्सर्जन (transpiration) के माध्यम से नमी को पुनः वायुमंडल में लौटा देते हैं। यह अंतःसंबंध इतना सूक्ष्म है कि यदि एक मंडल में कोई विकार उत्पन्न होता है—जैसे वायुमंडल में अत्यधिक कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ना—तो इससे हिममंडल (बर्फ का पिघलना) और जलमंडल (समुद्र का जल स्तर बढ़ना) प्रभावित होता है, जो अंततः जैवमंडल (पर्यावास विनाश) में असंतुलन पैदा कर देता है।

