NCERT Class 7 Social Science Chapter 16 संघर्ष एवं परिवर्तन का काल : 11वीं और 12वीं शताब्दी Solutions in Hindi Medium As Per CBSE New Syllabus to each chapter is provided in the list so that you can easily browse through different chapters NCERT Class 7 Social Science Chapter 16 संघर्ष एवं परिवर्तन का काल : 11वीं और 12वीं शताब्दी Question Answer and select need one. NCERT Class 7 Social Science Chapter 16 संघर्ष एवं परिवर्तन का काल : 11वीं और 12वीं शताब्दी Notes Download PDF. CBSE Class 7 Solutions for Social Science in Hindi.
NCERT Class 7 Social Science Chapter 16 संघर्ष एवं परिवर्तन का काल : 11वीं और 12वीं शताब्दी
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संघर्ष एवं परिवर्तन का काल : 11वीं और 12वीं शताब्दी
Chapter: 16
| Part – 2 |
महत्त्वपूर्ण प्रश्न
1. 11वीं और 12वीं शताब्दी को भारतीय इतिहास में संक्रमण काल क्यों माना जाता है?
उत्तर: 11वीं और 12वीं शताब्दी को भारतीय इतिहास में संक्रमण काल इसलिए माना जाता है क्योंकि इस युग में बड़े बदलाव और निरंतरता दोनों साथ-साथ दिखाई दिए। एक तरफ जहाँ तुर्क आक्रमणों के कारण उत्तर भारत में कई पुराने राजवंशों का अंत हुआ और एक नए साम्राज्य (दिल्ली सल्तनत) की पृष्ठभूमि तैयार हुई, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण और पूर्वी भारत के स्वतंत्र राजवंशों के तहत कला, संस्कृति, भव्य मंदिर निर्माण और विज्ञान (जैसे भास्कराचार्य का गणितीय कार्य) की समृद्ध परंपराएँ बिना रुके निरंतर फलती-फूलती रहीं।
2. इस कालखंड में कौन-कौन सी नई शक्तियाँ उभरीं? उनकी आर्थिक, सैन्य और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: प्रशासनिक, सैन्य और आर्थिक व्यवस्था की विशेषताएँ है:
प्रशासनिक व्यवस्था: राजाओं ने सामंतों और व्यापारियों से कर एकत्र करने के लिए कुशल प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की। काकतीय शासकों ने ग्राम-स्वशासन पर आधारित स्थानीय प्रशासन को बढ़ावा दिया। वहीं, मुहम्मद गोरी द्वारा स्थापित नई व्यवस्था अधिक केंद्रीकृत थी, जिसमें अधिकारियों को राजस्व संग्रहण के बदले अस्थायी भूमि-अनुदान दिए जाते थे।
सैन्य व्यवस्था: सभी शक्तिशाली राजाओं को एक बड़ी स्थायी सेना रखनी पड़ती थी जिसमें पैदल सैनिक, घुड़सवार और हाथी (और उत्तर-पश्चिमी भारत में परिवहन हेतु ऊँट) शामिल थे। चोल शासकों के पास एक अत्यंत शक्तिशाली नौसेना थी, जिसके बल पर उन्होंने मालदीव, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजय साम्राज्य तक सफल समुद्री अभियान चलाए।
आर्थिक व्यवस्था: अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि थी। शासकों ने अनियमित मानसूनी वर्षा से निपटने के लिए तालाबों, नहरों और विशाल कृत्रिम झीलों का निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त, शक्तिशाली व्यापारिक संघों के सहयोग से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समुद्री व्यापार खूब बढ़ा।
3. इस कालखंड में कला, स्थापत्य, साहित्य, विज्ञान आदि क्षेत्रों में कौन-कौन सी उत्कृष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त हुई?
उत्तर: विज्ञान और गणित: इस युग में महान भारतीय गणितज्ञ भास्कराचार्य ने संस्कृत में ‘लीलावती’ (रोचक गणितीय पहेलियाँ), ‘बीजगणित’ और खगोलीय गणनाओं पर ‘सिद्धांतशिरोमणि’ जैसे कालजयी ग्रंथों की रचना की। इसी दौरान, प्रसिद्ध फारसी विद्वान अल-बरुनी ने भारतीय खगोलशास्त्र, धर्म और विज्ञान का गहन सर्वेक्षण किया तथा पतंजलि के योगसूत्र का अरबी में अनुवाद किया।
स्थापत्य और कला: दक्षिण में चोल शासकों ने भव्य बृहदीश्वर मंदिर, चंदेलों ने खजुराहो के उत्कृष्ट कंदरिया महादेव व लक्ष्मण मंदिर, और पूर्वी गंग वंश ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर का निर्माण आरंभ कराया। इसके अलावा, काकतीयों ने हनमकोंडा का सहस्त्रस्तंभ मंदिर और होयसलों ने यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल बेलूर व हेलेबिडू के बारीक नक्काशीदार मंदिर बनवाए। इसी काल में कंबोडिया में विश्व प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर का निर्माण भी हुआ, जो भारतीय कला के वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है।
साहित्य और दर्शन: मालवा के विद्वान राजा भोज ने वास्तुकला और यंत्रों (mechanical devices) पर प्रसिद्ध ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ लिखा। चालुक्य राजा सोमेश्वर तृतीय ने संगीत, चिकित्सा और खगोलशास्त्र के विशाल ज्ञानकोश ‘मानसोल्लास’ की रचना की। सेन राजवंश के संरक्षण में कवि जयदेव ने सुप्रसिद्ध ‘गीतगोविंदम्’ काव्य लिखा और संत बसवेश्वर ने कन्नड़ भाषा में सामाजिक सुधार व भक्ति को समर्पित लघु कविताएँ ‘वचन’ रचीं।
प्रश्न और क्रियाकलाप
1. इस अध्याय में विचाराधीन कालखंड को भारतीय इतिहास में एक प्रमुख संक्रमण-काल क्यों माना जाता है? इस कालखंड से परिवर्तन और निरंतरता के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर: इस कालखंड में बड़े राजनीतिक बदलावों (परिवर्तनों) के साथ-साथ पुरानी देशज व्यवस्थाओं और उत्कृष्ट सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता दोनों साथ-साथ दिखाई देती हैं।
परिवर्तन के दो उदाहरण हैं:
(i) तुर्क आक्रांताओं के भीषण सैन्य अभियानों से उत्तर भारत के कई पुराने राजवंशों का अंत हुआ, जिससे वहाँ विदेशी शासन (दिल्ली सल्तनत) की नींव पड़ी और इस्लाम का प्रसार शुरू हुआ।
(ii) बख्तियार खिलजी और महमूद गज़नवी जैसे शासकों के आक्रमणों से नालंदा जैसे महान बौद्ध विहारों/शिक्षा केंद्रों और सोमनाथ जैसे समृद्ध सांस्कृतिक व धार्मिक स्थलों का विनाश हुआ।
निरंतरता के दो उदाहरण हैं:
(i) उत्तर भारत के कई क्षेत्र और पूरा दक्षिण भारत तुर्की नियंत्रण से बाहर रहे, जहाँ स्वतंत्र देशज राजवंश पूर्ववत शासन करते रहे और समय-समय पर गठबंधन बनाते रहे।
(ii) अशांति के बावजूद भारत का आंतरिक व बाह्य व्यापार निरंतर सक्रिय रहा और कला, दर्शन तथा स्थापत्य (जैसे चोल व होयसल मंदिर कला) की परंपरा बिना रुके फलती-फूलती रही।
2. पिछले अध्याय में चित्र 3.27 का निरीक्षण कीजिए और इसी प्रकार की ‘वंश परंपरा’ बनाइए जिसमें इस अध्याय में उल्लिखित सभी या अधिकांश वंश सम्मिलित हों।
उत्तर: उत्तर व पश्चिमी भारत: हिंदू शाही वंश → चाहमान (चौहान) / चौलुक्य (सोलंकी) / परमार वंश → गज़नवी और ग़ोरी आधिपत्य
पूर्वी भारत: पाल वंश (पतन के बाद) →सेन वंश और पूर्वी गंग वंश
दक्षिण भारत: चोल → चालुक्य (पूर्वी व पश्चिमी) → काकतीय / होयसल / पांड्य वंश (जिन्होंने चालुक्यों और चोलों का स्थान लिया)
3. उपमहाद्वीप के मानचित्र पर इस अध्याय के अधिकांश या सभी वंशों को समाहित करते हुए एक भौगोलिक यात्रा-मार्ग अंकित कीजिए (अध्याय की कथावस्तु में वर्णित कुछ ‘यात्राओं’ से भी प्रेरणा ली जा सकती है)।
उत्तर: अध्याय में वर्णित प्रमुख ऐतिहासिक अभियानों को जोड़ते हुए हम तीन प्रमुख यात्रा-मार्ग बना सकते हैं:
पश्चिमोत्तर मार्ग (महमूद गज़नवी का मार्ग): गज़नी → खैबर दर्रा → पंजाब (हिंदू शाही क्षेत्र) → मथुरा/कन्नौज → सोमनाथ (गुजरात) → वापस गज़नी
पूर्वी मार्ग (बख्तियार खिलजी का अभियान): बिहार (नालंदा) → नादिया (बंगाल में सेन साम्राज्य) → कामरूप (असम)318.दक्षिणी एवं तटीय मार्ग (राजेंद्र प्रथम का गंगा अभियान): तंजावुर (चोल राजधानी) → ओडिशा (पूर्वी गंग क्षेत्र) → बंगाल (गंगा नदी तक, जहाँ उन्होंने ‘गंगैकोंडचोल’ की उपाधि ली)
4. भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के मानचित्र की सहायता से उस दूरी का अनुमान लगाइए, जो राजेंद्र प्रथम की नौसेना ने अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए की होगी?
उत्तर: चोल बंदरगाह (जैसे नागपट्टिनम या तंजावुर) से बंगाल की खाड़ी को पार करके दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजय साम्राज्य (मलक्का जलडमरूमध्य, सुमात्रा और मलेशिया) तक पहुँचने के लिए राजेंद्र प्रथम की नौसेना को लगभग 2,500 से 3,000 किलोमीटर (लगभग 1,500 से 1,800 मील) की लंबी समुद्री दूरी तय करनी पड़ी होगी।
5. निम्नलिखित युग्मों का मिलान कीजिए-
| (क) पूर्वी गंग | (i) बेलूर |
| (ख) चंदेल | (ii) बृहदीश्वर मंदिर |
| (ग) परमार | (iii) कोणार्क सूर्य मंदिर |
| (घ) होयसल | (iv) कंदरिया महादेव मंदिर |
| (ङ) चोल | (v) भोजेश्वर मंदिर |
उत्तर:
| (क) पूर्वी गंग | (iii) कोणार्क सूर्य मंदिर |
| (ख) चंदेल | (iv) कंदरिया महादेव मंदिर |
| (ग) परमार | (v) भोजेश्वर मंदिर |
| (घ) होयसल | (i) बेलूर |
| (ङ) चोल | (ii) बृहदीश्वर मंदिर |
6. समूहों में कार्य करते हुए इस अध्याय में उल्लिखित वंशों की पिछले अध्याय के वंशों से तुलना कीजिए। एक सारणी बनाकर दोनों कालखंडों में विद्यमान वंशों, पूर्व कालखंड से लुप्त होने वाले वंशों तथा इस अध्याय के कालखंड में उभरने वाले वंशों की सूची बनाइए।
उत्तर:
| श्रेणी | राजवंशों की सूची |
| दोनों कालखंडों में विद्यमान वंश | चोल, चालुक्य (पूर्वी व पश्चिमी), और चाहमान (चौहान) |
| पूर्व कालखंड से लुप्त होने वाले वंश | गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट, और पाल वंश (सेन वंश द्वारा प्रतिस्थापित) |
| इस अध्याय के कालखंड में उभरने वाले नए वंश | सेन वंश, पूर्वी गंग, काकतीय, होयसल, और परमार वंश |
7. इस अध्याय और किसी अतिरिक्त पाठ्य-सामग्री का उपयोग करते हुए एक संक्षिप्त विवरण तैयार कीजिए जिसमें (1) नालंदा जैसे शिक्षा केंद्रों के महत्त्व; और (2) उनके विनाश के भारत की शिक्षा और संस्कृति पर पड़े संभावित प्रभावों की व्याख्या हो।
उत्तर: नालंदा जैसे शिक्षा केंद्रों के महत्त्व और उनके विनाश के प्रभाव:
शिक्षा केंद्रों का महत्त्व: नालंदा और विक्रमशिला भारत के वैश्विक ख्याति प्राप्त बौद्ध विहार और विश्वविद्यालय थे, जहाँ चीनी यात्री ह्वेनसांग व इत्सिंग जैसे विदेशी विद्वानों ने अध्ययन किया था। इसके तीन मंजिला पुस्तकालय में विभिन्न विषयों (विज्ञान, दर्शन, गणित) की लाखों दुर्लभ पांडुलिपियाँ सुरक्षित थीं।
विनाश के संभावित प्रभाव: 12वीं शताब्दी के अंत में बख्तियार खिलजी द्वारा इन केंद्रों को ध्वस्त किए जाने और पुस्तकालय को जलाए जाने से सदियों पुराना अमूल्य ज्ञान सदा के लिए नष्ट हो गया। इसने भारत में बौद्ध धर्म के पतन को तीव्र कर दिया और भारत की सुसंगठित उच्च शिक्षा प्रणाली को गहरा आघात पहुँचाया।
8. आपके अनुसार महमूद गज़नवी ने अफगानिस्तान से भारत में बार-बार आक्रमण क्यों किए जबकि मुहम्मद गोरी ने भारत में क्षेत्रीय विस्तार और दीर्घकालिक नियंत्रण स्थापित करने का लक्ष्य रखा? संक्षेप में लिखिए कि उसके उद्देश्यों ने उसके अभियानों के परिणामों को कैसे आकार दिया?
उत्तर: महमूद गज़नवी का उद्देश्य और परिणाम: उसका मुख्य लक्ष्य भारतीय मंदिरों (जैसे सोमनाथ) में संचित अपार धन को लूटना और मध्य एशिया में अपने साम्राज्य को मजबूत करना था। उसने पंजाब से आगे भारत में स्थायी शासन स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। इसके परिणामस्वरूप उत्तर भारत में व्यापक राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता आई और अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों का विनाश हुआ।
मुहम्मद गोरी का उद्देश्य और परिणाम: उसका उद्देश्य भारत में स्थायी क्षेत्रीय विस्तार और दीर्घकालिक राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना था। यद्यपि वह स्वयं वापस लौट गया, लेकिन उसने विजित क्षेत्रों को संभालने के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक जैसे विश्वासपात्र सेनापतियों को नियुक्त किया। इसके परिणामस्वरूप भारत में स्थायी तुर्की शासन (दिल्ली सल्तनत) की मजबूत नींव पड़ी और देश की प्रशासनिक व्यवस्था अधिक केंद्रीकृत हो गई।
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