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NCERT Class 7 Social Science Chapter 13 भारत में कृषि की यात्रा

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NCERT Class 7 Social Science Chapter 13 भारत में कृषि की यात्रा

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Chapter: 13

Part – 2

महत्वपूर्ण प्रश्न

1. भारतीय कृषि की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर: भारतीय कृषि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(i) पारंपरिक और आधुनिक का मिश्रण: भारतीय कृषि परिदृश्य पारंपरिक और आधुनिक कृषि पद्धतियों का एक जीवंत मिश्रण है, जिसमें पंजाब के गेहूं के खेतों से लेकर केरल के हरे-भरे धान के खेत और कश्मीर की केसर घाटी तक विविध भौगोलिक पहचान शामिल है।

(ii) आर्थिक और आजीविका का आधार: राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि और सहायक गतिविधियों का योगदान 18% से थोड़ा अधिक है। इसके अलावा, देश की लगभग 46% कार्यशील जनसंख्या आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है।

(iii) कृषि का व्यापक स्वरूप: इसमें केवल फसल उगाना (खेती) ही नहीं, बल्कि पशुपालन, वानिकी (वाणिज्यिक वृक्षारोपण), बागवानी, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन और रेशम उत्पादन जैसी सहायक गतिविधियाँ भी शामिल हैं।

(iv) ऋतु-चक्र पर आधारित: भारतीय कृषि मुख्य रूप से तीन मौसमों— खरीफ, रबी और जायद के फसल-चक्र पर चलती है।

(v) महिला श्रम की प्रधानता: ग्रामीण भारत में कृषि क्षेत्र में काम करने वाले कुल लोगों में 75% से अधिक महिलाएँ हैं, जो बुआई, कटाई और मड़ाई जैसे प्रमुख कार्यों को संभालती हैं।

2. खेती, जलवायु, मिट्टी और जल आपस में कैसे संबंधित हैं?

उत्तर: खेती, जलवायु, मिट्टी और जल आपस में बहुत गहराई से जुड़े हैं। मिट्टी फसलों को बढ़ने के लिए आधार और जरूरी पोषक तत्व देती है। जल पौधों को जीवित रखने और मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने का काम करता है। जलवायु यह तय करती है कि पौधों को कितनी धूप, गर्मी और बारिश मिलेगी, जिससे फसलों का मौसम तय होता है। जब इन तीनों का सही संतुलन मिलता है, तभी सफल खेती संभव हो पाती है; जैसे भारी बारिश और गर्मी वाले इलाकों में धान की खेती होती है और सूखे इलाकों में मोटे अनाज उगाए जाते हैं ।

3. पारंपरिक और समकालीन पद्धतियाँ एक-दूसरे की पूरक कैसे हो सकती हैं?

उत्तर: पारंपरिक पद्धतियाँ पर्यावरण के अनुकूल और लंबे समय तक चलने वाली होती हैं, लेकिन इनसे फसल का उत्पादन कम होता है। दूसरी ओर, समकालीन (आधुनिक) पद्धतियाँ बहुत अधिक उत्पादक होती हैं और भोजन की जरूरतों को तेजी से पूरा कर सकती हैं, लेकिन इनके अत्यधिक रासायनिक उपयोग से मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाकर यानी आधुनिक तकनीकों की उत्पादकता को पारंपरिक ज्ञान (जैसे जैविक खाद, नीम-आधारित उपाय और फसल चक्र) की विवेकशीलता के साथ मिलाकर हम एक संधारणीय (सस्टेनेबल) मार्ग अपना सकते हैं, जिससे ये पद्धतियाँ एक-दूसरे की पूरक बनती हैं।

प्रश्न और क्रियाकलाप

1. केरलम के कृषक चावल उगाते हैं जबकि पंजाब के कृषक अधिकतर गेहूँ उगाते हैं, क्यों? दोनों राज्यों के कृषक अपनी-अपनी फसलें बदल लें तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं?

उत्तर: केरलम में उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु होने और दोनों मानसूनों से प्रचुर वर्षा मिलने के कारण धान (चावल) की खेती के लिए भरपूर पानी और गर्मी मिल जाती है, जबकि पंजाब की उपोष्णकटिबंधीय जलवायु, उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और अनुकूल परिस्थितियाँ रबी की फसल यानी गेहूँ की अच्छी उपज के लिए आदर्श हैं। यदि दोनों राज्य अपनी फसलें आपस में बदल लें, तो केरलम की अत्यधिक गर्मी और साल भर की नमी के कारण गेहूँ की फसल खराब हो जाएगी क्योंकि गेहूँ को विकसित होने के लिए कम पानी और ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। दूसरी तरफ, पंजाब जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्र में बड़े पैमाने पर धान उगाने से सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन होगा, जिससे वहाँ पानी का संकट खड़ा हो जाएगा और भूजल स्तर बहुत तेजी से नीचे गिर जाएगा।

2. निम्नलिखित का मिलान करें-

स्तंभ अस्तंभ ब
(क) खरीफ फसलें(i) शीत ऋतु में उगाई जाने वाली फसलें
(ख) रबी फसलें(ii) मानसून के समय उगाई जाने वाली फसलें
(ग) जलोढ़ मृदा(iii) पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली पतली, खुरदरी और पथरीली मृदा
(घ) सीढ़ीदार कृषि(iv) ग्रीष्म ऋतु में उगाई जाने वाली फसलें
(ङ) पर्वतीय मृदा(v) नदियों द्वारा जमा की गई पोषक तत्त्वों से समृद्ध मृदा
(च) जायद फसलें(vi) पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली कृषि पद्धति

उत्तर:

स्तंभ अस्तंभ ब
(क) खरीफ फसलें(ii) मानसून के समय उगाई जाने वाली फसलें
(ख) रबी फसलें(i) शीत ऋतु में उगाई जाने वाली फसलें
(ग) जलोढ़ मृदा(v) नदियों द्वारा जमा की गई पोषक तत्त्वों से समृद्ध मृदा
(घ) सीढ़ीदार कृषि(vi) पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली कृषि पद्धति
(ङ) पर्वतीय मृदा(iii) पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली पतली, खुरदरी और पथरीली मृदा
(च) जायद फसलें(iv) ग्रीष्म ऋतु में उगाई जाने वाली फसलें

3. कुछ फसलें केवल विशिष्ट क्षेत्रों में ही क्यों अच्छी तरह विकसित होती हैं?

उत्तर: प्रत्येक फसल की अपनी कुछ विशिष्ट प्राकृतिक ज़रूरतें होती हैं, जो केवल चुनिंदा क्षेत्रों में ही पूरी हो पाती हैं:

(i) मिट्टी की अनुकूलता: फसलों की जड़ें और पोषक तत्वों की जरूरत विशिष्ट मिट्टी के प्रकार से पूरी होती है। जैसे कपास को केवल काली मिट्टी और चाय को पर्वतीय/लैटेराइट मिट्टी पसंद होती है।

(ii) तापमान और प्रकाश: कुछ फसलों को अधिक तापमान (जैसे खरीफ फसलें) चाहिए होता है, जबकि कुछ को ठंडी जलवायु (जैसे रबी फसलें)।

(iii) जल की आवश्यकता: नारियल और धान प्रचुर वर्षा वाले तटीय या आर्द्र मैदानी क्षेत्रों में ही उग सकते हैं, जबकि बाजरा और शकरकंद जैसे शुष्क-प्रतिरोधी पौधे रेतीली या कम पानी वाली मिट्टी में उगते हैं।

4. आधुनिक प्रौद्योगिकी ने कृषकों की सहायता किस प्रकार की है?

उत्तर: आधुनिक प्रौद्योगिकी ने खेती को सरल, तीव्र और अधिक उत्पादक बनाकर कृषकों की बहुत सहायता की है। खेतों में ट्रैक्टर, ट्रांसप्लांटर और थ्रेशर (मड़ाई) जैसी आधुनिक मशीनों के प्रयोग से जुताई, रोपाई और फसल की कटाई जैसे कठिन कार्य अब बेहद कम श्रम और समय में पूरे हो जाते हैं। प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक पद्धतियों से तैयार किए गए उन्नत और कीट-प्रतिरोधी बीजों से फसलों का उत्पादन कई गुना बढ़ गया है। गिरते भूजल स्तर के इस दौर में बूँद-बूँद (ड्रिप) और फुहारा (स्प्रिंकलर) जैसी आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों ने सीधे पौधों की जड़ों तक कुशलतापूर्वक पानी पहुँचाकर जल की बर्बादी को न्यूनतम किया है। इसके अतिरिक्त, फसलों को सुरक्षित रखने के लिए ग्रीनहाउस, मिट्टी में नमी की जाँच के लिए ड्रोन का अभिनव उपयोग, और बिना मिट्टी के केवल पोषक तत्वों से भरपूर पानी में खेती करने की ‘जल-संवर्धन’ (हाइड्रोपोनिक्स) जैसी आधुनिक पद्धतियों ने कृषि का परिदृश्य बदल दिया है। साथ ही, डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से मौसम के सटीक पूर्वानुमान की जानकारी मिलना, शीत भंडारण और सरकार द्वारा फसल बीमा जैसी सहयोगी प्रणालियों ने किसानों को वित्तीय रूप से अधिक सुरक्षित और सशक्त बनाया है।

5. संधारणीय कृषि क्यों आवश्यक है? इस पर एक छोटी टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: 1960 के दशक की ‘हरित क्रांति’ ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो बनाया, लेकिन इसके दीर्घकालिक दुष्प्रभावों ने पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचाई है। रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घट गई है, भूजल का अंधाधुंध दोहन हुआ है, जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर जैसी बीमारियाँ बढ़ी हैं। अतः संधारणीय कृषि (सस्टेनेबल फार्मिंग) आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह एक ऐसी प्रणाली है जो पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए दीर्घकाल तक खेती को संभव बनाती है। इसमें रसायनों के स्थान पर प्राकृतिक खाद (गोबर, केंचुआ खाद), नीम-आधारित कीटनाशक, फसल चक्र और जैविक कृषि को अपनाया जाता है।

6. वर्तमान में कृषकों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उनके नाम बताइए। इनका जन-सामान्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

उत्तर: कृषकों की मुख्य कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं:

(i) छोटे भू-जोत: पीढ़ियों दर पीढ़ी जमीन के बंटवारे के कारण भारत में औसत जोत का आकार घटकर केवल तीन-चौथाई हेक्टेयर (एक फुटबॉल मैदान के बराबर) रह गया है, जिससे आधुनिक मशीनों का उपयोग कठिन और कम आय देने वाला हो गया है।

(ii) जलवायु परिवर्तन: बेमौसम बारिश, अत्यधिक सूखा या भारी बाढ़ के कारण फसलें नष्ट हो जाती हैं, जिससे किसान गहरे वित्तीय संकट में आ जाते हैं।

(iii) ऋण जाल: फसल खराब होने पर ऋण न चुका पाने के कारण किसान ऋण के जाल में फँस जाते हैं, जिससे प्रतिदिन लगभग 2300 किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं।

(iv) कंपनियों पर निर्भरता: आधुनिक व्यावसायिक बीज अगली फसल की बुआई के योग्य नहीं होते, जिससे किसानों को हर बार महंगी कंपनियों से बीज खरीदने पड़ते हैं।

जन-सामान्य पर प्रभाव:

(i) फसलों की बर्बादी और उत्पादन घटने से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी (महंगाई) और गरीबों के लिए भोजन पाना कठिन हो जाएगा।

(ii) किसानों के बड़े पैमाने पर शहरों की तरफ पलायन करने से शहरी संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।

(iii) देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

7. कक्षा में इस विषय पर चर्चा कीजिए विधियों से उन्नत हैं”। “पारंपरिक सिंचाई की विधियाँ आधुनिक विधियों से उन्नत हैं”।

उत्तर: पारंपरिक विधियों के पक्ष में तर्क (जैसे कुल, कुंड, आहर, पोखर, फड़ प्रणाली और बाँस ड्रिप प्रणाली): ये विधियाँ पर्यावरण के अनुकूल होती हैं। ये भूजल स्तर को प्राकृतिक रूप से रीचार्ज करती हैं और पानी के समान सामाजिक वितरण (जैसे महाराष्ट्र की फड़ प्रणाली) को बढ़ावा देती हैं। इसमें भारी बिजली या महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं होती।

आधुनिक विधियों के पक्ष में तर्क (ड्रिप और फुहारा प्रणाली): ये विधियाँ पानी की एक-एक बूंद का सटीक उपयोग करती हैं और शुष्क या कम पानी वाले इलाकों में भी अधिक उपज सुनिश्चित करती हैं।

निष्कर्ष (चर्चा का सार): पूर्ण रूप से दोनों में से किसी एक को बेहतर नहीं कहा जा सकता। संधारणीयता और पारिस्थितिकी संतुलन के मामले में पारंपरिक प्रणालियाँ उन्नत हैं, परंतु पानी की अधिक बचत और शुष्क क्षेत्रों में खेती के लिए आधुनिक ड्रिप प्रणाली उत्कृष्ट है। सबसे बेहतरीन मार्ग दोनों का समन्वय है— जैसे पारंपरिक तालाबों में वर्षा का जल संचित करना और फिर खेतों में ड्रिप तकनीक से सिंचाई करना।

8. एक छोटा निबंध लिखिए जिसमें बताइए कि जब आपकी आयु 60 वर्ष होगी, तब कृषि कैसी हो सकती है। आप अपनी कल्पना को चित्रों एवं रंगों के माध्यम से भी अभिव्यक्त कर सकते हैं।

उत्तर: जब मैं 60 वर्ष का होऊँगा (लगभग वर्ष 2070-2080 के आसपास), तब तक भारत में कृषि तकनीक और स्थिरता का एक अद्भुत शिखर छू चुकी होगी। भविष्य के खेत पूरी तरह से स्मार्ट और सौर ऊर्जा से संचालित होंगे। खेतों में इंसानों के स्थान पर रोबोटिक जुताई और एआई-संचालित सौर ड्रोन

 घूम रहे होंगे जो केवल रोगग्रस्त पौधों को पहचानकर सटीक उपचार करेंगे। तेजी से घटती कृषि योग्य भूमि की समस्या को दूर करने के लिए शहरों में गगनचुंबी इमारतों के भीतर वर्टिकल फार्मिंग (खड़ी खेती) और जल-संवर्धन (Hydroponics) तकनीक का इस्तेमाल होगा, जहाँ बिना मिट्टी के केवल पोषक तत्वों से भरपूर पानी में सब्जियाँ और फल उगाए जाएँगे। केमिकल रसायनों का दौर पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा और सिक्किम की तरह संपूर्ण भारत जैव-कृषि मॉडल पर काम कर रहा होगा। किसान प्राचीन बीजामृत और पंचगव्य  के उन्नत नैनो-संस्कररणों का उपयोग करेंगे। इस प्रकार, भविष्य की कृषि अत्यधिक तकनीकी रूप से उन्नत होने के साथ-साथ प्रकृति के साथ पूर्ण रूप से अनुकूलित होगी।

9. छोटे-छोटे समूह बनाइए और गंगा के बेसिन को प्रभावित करने वाली समस्याओं पर चर्चा कीजिए। अपने समाधानों और उनके कारणों (आपके तर्क) के साथ एक प्रस्तुति तैयार कर कक्षा में साझा कीजिए और उस पर चर्चा कीजिए। आपके अध्यापक इस कार्य में आपका मार्गदर्शन करेंगे।

उत्तर: विद्यार्थी स्वयं करे।

10. ‘अतीत की गूंज’ अनुभाग में उल्लिखित फसलों को देखकर बताइए कि आपके घर में कौन-कौन सी फसलें उपयोग में लाई जाती हैं? आप अपने अवलोकनों के आधार पर क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? 

उत्तर: ‘अतीत की गूँज’ में उल्लिखित फसलें: जौ, गेहूँ, चावल, मोटा अनाज (श्रीअन्न/बाजरा/रागी), तिलहन (तिल, सरसों, अलसी), फलियाँ व दालें (मूंग, उड़द, मेथी), सब्जियाँ तथा फल (कटहल, आम, जामुन, अंगूर, बेर)।

घर में उपयोग होने वाली फसलें: हमारे घरों के रसोईघर में आज भी दैनिक भोजन के रूप में चावल, गेहूँ (रोटी के लिए), सरसों का तेल, मूंग और उड़द की दालें, हरी सब्जियाँ और फल (जैसे आम और जामुन) नियमित रूप से उपयोग किए जाते हैं।

इस अवलोकन से हम यह बहुत ही महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भारतीय भोजन और कृषि संस्कृति में अद्भुत निरंतरता (Continuity) रही है। जो फसलें आज से लगभग 7,000–9,000 वर्ष पूर्व मेहरगढ़, सिंधु-सरस्वती सभ्यता और हड़प्पा काल में हमारे पूर्वज उगाते और खाते थे, वे आज भी हमारी थाली का मुख्य हिस्सा हैं। यह साबित करता है कि हमारी पारंपरिक कृषि प्रणालियाँ और खान-पान का ज्ञान कितना सुदृढ़, वैज्ञानिक और समय की कसौटी पर खरा उतरने वाला रहा है।

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