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NCERT Class 11 Psychology Chapter 8 अभिप्रेरणा एवं संवेग

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NCERT Class 11 Psychology Chapter 8 अभिप्रेरणा एवं संवेग

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Chapter: 8

समीक्षात्मक प्रश्न

1. अभिप्रेरणा के संप्रत्यय की व्याख्या कोजिए।

उत्तर: अभिप्रेरणा का संप्रत्यय इस बात पर ध्यान करता है कि व्यवहार में ‘गति’ कैसे आती है। अंग्रेज़ी भाषा में ‘Motivation’ लैटिन शब्द ‘movere’ से बना है, जिसका संदर्भ क्रियाकलाप की गति से होती है। हमारे दैनिक जीवन में अधिकांश व्यवहारों की व्याख्या भी अभिप्रेरकों के आधार पर की जाती है। इस व्यवहार के कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि हम ज्ञान अर्जित करना चाहते हैं या मित्र बनाना चाहते हैं, या फिर हमें एक अच्छी नौकरी पाने के लिए एक डिप्लोमा या डिग्री की आवश्यकता होती है। इन कारणों की कोई संयुक्ति या अन्य कारण भी हमें उच्च शिक्षा लेने की व्याख्या कर सकती हैं। अभिप्रेरक व्यवहारों का पूर्वानुमान करने में भी सहायता करते हैं। यदि किसी व्यक्ति में तीव्र उपलब्धि अभिप्रेरक हो तो वह विद्यालय में, खेल में, व्यापार में, संगीत में, तथा अनेक अन्य परिस्थितियों में कड़ा परिश्रम करेगा। अतः अभिप्रेरक वे सामान्य स्थितियाँ हैं जिनके आधार पर हम भिन्न परिस्थितियों में व्यवहार के बारे में पूर्वानुमान लगा सकते हैं। दूसरे शब्दों में, अभिप्रेरणा व्यवहार के निर्धारकों में से एक है। मूल प्रवृत्तियाँ, अंतर्नोद, आवश्यकताएँ, लक्ष्य तथा उत्प्रेरक, अभिप्रेरणा के विस्तृत दायरे में आते हैं।

2. भूख तथा प्यास की आवश्यकताओं के जैविक आधार क्या है?

उत्तर: भूख और प्यास की आवश्यकताएँ मुख्य रूप से जैविक और तंत्रिका तंत्र से संबंधित होती हैं। भूख को नियंत्रित करने में हाइपोथैलेमस का महत्वपूर्ण योगदान होता है। भूख के उद्दीपकों में अन्तर्निहित हैं- अमाशय में संकुचन, जो यह इंगित करता है कि अमाशय रिक्त है; रक्त में ग्लूकोज़ की निम्न प्रोटीन का निम्न स्तर तथा शरीर में वसा के भंडारण की मात्रा हो। शरीर में ईंधन की कमी के प्रति यकृत भी प्रतिक्रिया करता है तथा वह मस्तिष्क को तंत्रिका आवेग प्रेषित करता है, तो यह प्यास की अनुभूति विकसित करता है। भोजन की सुगंध, स्वाद या दर्शन भी खाने की इच्छा उत्पन्न करते हैं। ज्ञातव्य है कि इनमें से कोई भी एक अपने आप में यह भाव नहीं जगाते कि आप भूखे हैं। ये सब बाह्य कारकों (जैसे-स्वाद, रंग, दूसरों को भोजन करते हुए देखना तथा भोजन की सुगंध इत्यादि) के साथ संयुक्त होकर, आपको यह समझने में सहायता करते हैं कि आप भूखे हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि हमारी भूख अधश्चेतक में स्थित पोषण-तृप्ति की जटिल व्यवस्था, यकृत और शरीर के अन्य अंगों तथा परिवेश में स्थित बाह्य संकेतों द्वारा नियंत्रित होती है।

3. किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताएँ कैसे प्रभावित करती हैं? उदाहरणों के साथ समझाइए।

उत्तर: किशोरों का व्यवहार उनकी आवश्यकताओं और सामाजिक प्रभावों से प्रभावित होती है। उपलब्धि की आवश्यकता से प्रेरित किशोर अपने लक्ष्य के प्राप्ति अधिक मेहनत करते हैं और प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेते हैं।

उदाहरण के लिए, एक छात्र परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। संबंधन की आवश्यकता उन्हें समाज और परिवार से जोड़ती है। किशोरावस्था में मित्रता और समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए, एक किशोर अपनी पहचान स्थापित करने के लिए किसी विशेष समूह का हिस्सा बनना पसंद करता है।

शक्ति के द्वारा व्यक्ति दूसरे के संवेग और तथा व्यवहारों पर विपरीत प्रभाव डालता है। शक्ति अभिप्रेरक के विभिन्न लक्ष्य होते हैं, जैसे प्रभाव स्थापित करना, नियंत्रण रखना, नेतृत्व करना और दूसरों को आकर्षित करना आदि। उपलब्धि अभिप्रेरणा: विद्यार्थी कठिन परिश्रम करते हैं, क्योंकि वह परीक्षा में अच्छे अंक पाना चाहते हैं।

4. मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार क्या है? उपयुक्त उदाहरणों को सहायता से व्याख्या कीजिए।

उत्तर: मैस्लो का मॉडल एक पिरामिड के रूप में संप्रत्ययित किया जा सकता है, जिसमें पदानुक्रम के तल में मूल शरीरक्रियात्मक या जैविक आवश्यकताएँ होती हैं जो कि जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक हैं; जैसे भूख, प्यास इत्यादि। जब इन आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है तभी व्यक्ति में खतरे से सुरक्षा की आवश्यकता उत्पन्न होती है। इसका तात्पर्य भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रकार के खतरों से सुरक्षा का है। इसके पश्चात दूसरों का उनसे प्रेम करना तथा उनका प्रेम प्राप्त करना आता है। पदानुक्रम में इससे ऊपर आत्म-सिद्धि की आवश्यकता है, जो एक व्यक्ति की अपनी सम्भाव्यताओं को पूर्ण रूप से विकसित करने के अभिप्रेरण में परिलक्षित होती है। आत्म-सिद्ध व्यक्ति आत्म-जागरूक, समाज के प्रति अनुक्रियाशील, सर्जनात्मक, स्वतः स्फूर्त तथा नवीनता एवं चुनौती के प्रति मुक्त होता है। ऐसे व्यक्ति में हास्य भावना होती है तथा गहरे अंतवैयक्तिक संबंध बनाने की क्षमता होती है।

उदाहरण: एक छात्र जो आर्थिक रूप से स्थिर नहीं है, तो उन्हें पहले अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति पर ध्यान देना चाहिए, जबकि एक समृद्ध छात्र अपने आत्म-विकास और रचनात्मक क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।

5. संस्कृति संवेगों को अभिव्यक्ति को कैसे प्रभावित करती है?

उत्तर: संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति को कई तरीकों से प्रभावित करती है। जैसे विभिन्न संस्कृतियों में संवेगों को व्यक्त करने के नियम और मानदंड भिन्न होते हैं। कुछ संस्कृतियों में संवेगों को खुलकर व्यक्त करने की स्वीकृति होती है, जबकि कुछ में इन्हें संयमित रूप से व्यक्त किया जाता है।

उदाहरण के लिए, पश्चिमी देशों में लोग खुशी, गुस्सा या दुख को खुलकर व्यक्त करते हैं, जबकि पूर्वी देशों में संवेगों पर नियंत्रण रखना अधिक स्वीकार्य माना जाता है। इसी प्रकार, जापानी संस्कृति में लोग सार्वजनिक रूप से अपने नकारात्मक संवेगों को छिपाने की प्रवृत्ति रखते हैं, जबकि अमेरिकी समाज में लोग अधिक खुले होते हैं।

6. निषेधात्मक संवेगों का प्रबंधन क्यों महत्वपूर्ण है? निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय सुझाइए।

उत्तर: निषेधात्मक संवेग, जैसे गुस्सा, चिंता, भय और निराशा, व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। इन संवेगों का उचित प्रबंधन न होने पर तनाव, आक्रामकता और अवसाद जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए, संवेगों को नियंत्रित करना आवश्यक है ताकि व्यक्ति स्वस्थ मानसिक और सामाजिक जीवन जी सके।

निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन के निम्नलिखित उपाय है:

(i) आत्म-जागरूकता: अपनी भावनाओं को पहचानें और उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास करें।

(ii) गहरी श्वसन तकनीक: जब गुस्सा या चिंता महसूस हो, तो गहरी सांस लें और धीरे-धीरे छोड़ें।

(iii) सकारात्मक दृष्टिकोण: नकारात्मक परिस्थितियों में भी सकारात्मकता बनाए रखें।

(iv) मनोवैज्ञानिक सहायता: आवश्यकता होने पर परामर्शदाता या मनोवैज्ञानिक से मदद लें।

(v) सामाजिक समर्थन: अपने परिवार और मित्रों के साथ बातचीत करें और अपनी भावनाओं को साझा करें।

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