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NIOS Class 12 History Chapter 20 राष्ट्रवाद

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NIOS Class 12 History Chapter 20 राष्ट्रवाद

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Chapter: 20

मॉड्यूल – 4 भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तथा तत्कालीन भारत

पाठगत प्रश्न 20.1

1. निम्नलिखित कथनों को पढ़कर सही या गलत बतलाएँः

(i) राष्ट्रवाद के विचार का इतिहास मानव इतिहास जितना प्राचीन है। (सही/गलत)

उत्तर: गलत।

(ii) राष्ट्रवाद के विचार की जड़ें आधुनिक यूरोप के इतिहास में हैं। (सही/गलत)

उत्तर: सही।

(iii) राष्ट्रवाद, आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था का परिणाम था। (सही/गलत)

उत्तर: सही।

(iv) भारत में राष्ट्रवाद का अहसास 19वीं सदी के मध्य तक अस्तित्व में नहीं आया था। (सही/गलत)

उत्तर: सही।

2. ऐसे दो मुख्य मुद्दों का वर्णन करें जो भारतीय राष्ट्रवाद को समझने के लिए निर्णायक हैं।

उत्तर: भारतीय राष्ट्रवाद को समझने के लिए दो सबसे प्रमुख आधार हैं: पहला, ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन का सामूहिक रूप से विरोध करना और दूसरा, सभी भारतीय लोगों के बीच आपसी एकता की भावना का विकास होना।

पाठगत प्रश्न 20.2

1. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें:

(i) उस सुधारक का नाम बताएँ, जिसने सती प्रथा का विरोध किया।

उत्तर: राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का कड़ा विरोध किया था।

(ii) विधवा विवाह पर किस भारतीय सुधारक ने बल दिया?

उत्तर: ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह के समर्थन में प्रमुख रूप से बल दिया था।

(iii) राममोहन राय द्वारा स्थापित संगठन का नाम बताएँ।

उत्तर: राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित संगठन का नाम ‘ब्रह्म समाज’ था (जिसका गठन 1828 में हुआ था)।

2. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दो मुख्य विशेषताएं बताएं।

उत्तर: 19वीं सदी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दो मुख्य विशेषताएं थीं: पहला, पारंपरिक भारतीय संस्कृति में मौजूद कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध कर उसमें सुधार लाना, और दूसरा, लोगों के जीवन पर जबरन थोपी जा रही विदेशी (उपनिवेशवादी) संस्कृति के अतिक्रमण का विरोध करना।

पाठगत प्रश्न 20.3

1. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें:

(i) भारत के कुछ ऐसे नेताओं के नाम लिखें जिन्होंने यह तर्क दिया कि ब्रिटिश शासन द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था का शोषण किया जा रहा था।

उत्तर: दादाभाई नौरोजी, आर. सी. दत्त, महादेव गोविंद रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले और जी. वी. जोशी जैसे नेताओं ने यह तर्क दिया था कि अंग्रेज भारत की अर्थव्यवस्था का बुरी तरह शोषण कर रहे हैं।

(ii) निष्कासन सिद्धांत क्या था और इसे किसने प्रतिपादित किया?

उत्तर: ‘धन निष्कासन सिद्धांत’ (Drain of Wealth) दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इसका अर्थ यह था कि ब्रिटिश शासन द्वारा एक व्यवस्थित प्रणाली के तहत (जैसे ब्रिटिश अधिकारियों के भारी वेतन के जरिए) भारत के धन और संसाधनों को इंग्लैंड भेजा जा रहा था, जिससे भारत लगातार गरीब हो रहा था।

(iii) आर्थिक राष्ट्रवाद का क्या महत्व है?

उत्तर: आर्थिक राष्ट्रवाद का भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में बहुत गहरा महत्व था।

राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा तैयार किए गए इस विचार के महत्व को मुख्य रूप से दो प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है:

(i) ब्रिटिश सरकार के ‘कल्याणकारी’ होने का भ्रम तोड़ना: सबसे पहले, आर्थिक राष्ट्रवाद ने 19वीं सदी के शिक्षित वर्ग के मन में बैठी इस गलत धारणा को हमेशा के लिए जड़ से खत्म कर दिया कि ब्रिटिश सरकार एक ‘कल्याणकारी सरकार’ है। उस समय कई लोगों को यह भ्रम था कि लंबे समय तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहने से अंततः भारत का भी आर्थिक विकास होगा और वह ब्रिटेन की तरह एक समृद्ध देश बन जाएगा। लेकिन दादाभाई नौरोजी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने तथ्यों के साथ यह साबित कर दिया कि यह सोच बिल्कुल गलत थी और ब्रिटिश शासन वास्तव में भारतीयों के हितों के लिए बेहद हानिकारक था।

(ii) शक्तिशाली राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखना: दूसरा बड़ा महत्व यह था कि आर्थिक राष्ट्रवाद ने ही ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन के खिलाफ एक बहुत ही शक्तिशाली आंदोलन की मजबूत नींव तैयार की। बाद में 20वीं सदी में महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने इन्ही आर्थिक राष्ट्रवाद के विचारों को देश की आम जनता तक पहुँचाया और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। जब भारी संख्या में आम जनमानस को यह सच्चाई समझ आई कि अंग्रेज उनका आर्थिक शोषण कर रहे हैं और वे एकजुट होकर राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े, तो भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का टिके रहना असंभव हो गया।

(iv) 20वीं सदी के राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं द्वारा आर्थिक राष्ट्रवाद के विचार का किस प्रकार उपयोग किया गया?

उत्तर: 20वीं सदी के राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ के विचार को केवल एक सिद्धांत तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसका उपयोग ब्रिटिश शासन की जड़ों को हिलाने वाले एक शक्तिशाली हथियार के रूप में किया।

इसका विस्तृत उपयोग निम्नलिखित तरीकों से किया गया:

(i) शक्तिशाली जन-आंदोलन की नींव रखना: प्रारंभिक राष्ट्रवादी नेताओं (जैसे दादाभाई नौरोजी, आर. सी. दत्त आदि) ने ब्रिटिश शासन के आर्थिक शोषण की जो वैज्ञानिक और व्यवस्थित आलोचना की थी, उसने 20वीं सदी के आंदोलनों के लिए एक ठोस वैचारिक आधार तैयार किया। महात्मा गांधी और अन्य बड़े नेताओं ने इसी आधार पर अपने शक्तिशाली आंदोलनों की नींव रखी।

(ii) आम जनता को जागरूक करना: 20वीं सदी के नेताओं ने ‘धन निष्कासन सिद्धांत’ (भारत का धन ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और व्यापार के जरिए इंग्लैंड भेजना) और असमान व्यापार जैसी जटिल आर्थिक बातों को बहुत ही आसान भाषा में आम भारतीय जनता तक पहुँचाया। उन्होंने किसानों, कारीगरों और आम लोगों को यह समझाया कि उनकी निरंतर बढ़ती गरीबी का असली कारण ब्रिटिश नीतियां हैं।

(iii) ब्रिटिश ‘कल्याणकारी’ छवि को नष्ट करना: इन नेताओं ने आर्थिक राष्ट्रवाद के तर्कों का उपयोग करके जनता के मन से इस भ्रम को पूरी तरह समाप्त कर दिया कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की भलाई के लिए काम कर रही है। उन्होंने यह साबित किया कि उपनिवेशवादी शासक भारत को केवल कच्चे माल (जैसे कपास) के एक स्रोत और अपने ब्रिटिश कारखानों में बने सामान को बेचने के एक बाजार के रूप में शोषित कर रहे हैं।

(iv) राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित करना: जब देश की आम जनता को अपने आर्थिक शोषण की सच्चाई समझ में आ गई, तो उनके भीतर भारी आक्रोश पैदा हुआ। नेताओं ने इसी आर्थिक राष्ट्रवाद की भावना का उपयोग लोगों को एकजुट करने और उन्हें ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से लड़ने के लिए प्रेरित करने में किया।

ब्रिटिश शासन को असंभव बनाना: इन नेताओं के प्रयासों का ही परिणाम था कि जनमानस बहुत विशाल संख्या में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जुड़ गया। जब इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों का विरोध करना शुरू किया, तो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का भारत में टिके रहना लगभग असंभव हो गया।

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