NCERT Class 8 Hindi Chapter 5 कबीर के दोहे

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NCERT Class 8 Hindi Chapter 5 कबीर के दोहे

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Chapter: 5

पाठ से

आइए, अब हम इन दोहों को थोड़ा और विस्तार से समझते हैं। नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।

मेरी समझ से

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

1.”गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।” इस दोहे में किसके विषय में बताया गया है?

(i) श्रम का महत्व।

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(ii) गुरु का महत्व।

(iii) ज्ञान का महत्व।

(iv) भक्ति का महत्व।

उत्तर: (ii) गुरु का महत्व।

2. “अति का भला न बोलना अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना अति की भली न धूप।।” इस दोहे का मूल संदेश क्या है?

(i) हमेशा चुप रहने में ही हमारी भलाई है।

(ii) बारिश और धूप से बचना चाहिए।

(iii) हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।

(iv) हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए।

उत्तर: (iii) हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।

3. “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।” यह दोहा किस जीवन कौशल को विकसित करने पर बल देता है?

(i) समय का सदुपयोग करना।

(ii) दूसरों के काम आना।

(iii) परिश्रम और लगन से काम करना।

(iv) सभी के प्रति उदार रहना।

उत्तर: (ii) दूसरों के काम आना।

4. “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को सीतल करे आपहुँ सीतल होया।।” इस दोहे के अनुसार मधुर वाणी बोलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

(i) लोग हमारी प्रशंसा और सम्मान करने लगते हैं।

(ii) दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है।

(iii) किसी से विवाद होने पर उसमें जीत हासिल होती है।

(iv) सुनने वालों का मन इधर-उधर भटकने लगता है।

उत्तर: (ii) दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है।

5. “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप।।” इस दोहे से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

(i) सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं होता है।

(ii) सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है।

(iii) बाहरी परिस्थितियाँ ही जीवन में सफलता तय करती हैं।

(iv) सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है।

उत्तर: (ii) सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है।

(iv) सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है।

6. “निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाया बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाया।” यहाँ जीवन में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है?

(i) आलोचना से बचना चाहिए।

(ii) आलोचकों को दूर रखना चाहिए।

(iii) आलोचकों को पास रखना चाहिए।

(iv) आलोचकों की निंदा करनी चाहिए।

उत्तर: (iii) आलोचकों को पास रखना चाहिए।

7. “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देइ उड़ाय।।” इस दोहे में ‘सूप’ किसका प्रतीक है?

(i) मन की कल्पनाओं का।

(ii) सुख-सुविधाओं का।

(iii) विवेक और सूझबूझ का।

(iv) कठोर और क्रोधी स्वभाव का।

उत्तर: (iii) विवेक और सूझबूझ का।

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

उत्तर: (ii) गुरु का महत्व:

कारण: गुरु हमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं, इसलिए उनका स्थान सबसे ऊँचा है।

(iii) हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है:

कारण: किसी भी चीज़ की अति हानिकारक होती है, जीवन में संतुलन ही सुख और शांति देता है।

(ii) दूसरों के काम आना:

कारण: केवल बड़ा होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दूसरों के लिए उपयोगी होना ही सच्ची महानता है।

(ii) दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है:

कारण: मधुर वाणी सुनकर सामने वाले को प्रसन्नता मिलती है और बोलने वाले को भी आत्मसंतोष व शांति मिलती है।

(ii) सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है:

(iv) सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है।

कारण: सत्य इंसान को भीतर से मजबूत और निर्मल बनाता है, जबकि झूठ पाप के समान है।

(iii) आलोचकों को पास रखना चाहिए:

कारण: आलोचक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधारने का अवसर देते हैं और हमें बेहतर बनाते हैं।

(iii) विवेक और सूझबूझ का:

कारण: जैसे सूप काम की चीज़ को अलग कर देता है और बेकार को उड़ा देता है, वैसे ही इंसान को भी विवेक से अच्छा अपनाना और बुरा छोड़ना चाहिए।

मिलकर करें मिलान

(क) पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे स्तंभ 1 में दी गई हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें स्तंभ 2 में दिए गए इनके सही अर्थ या संदर्भ से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।

क्रम स्तंभ 1स्तंभ 2
1.गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लार्गो पाँय।सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।
2.अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।
3.ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।
4.निदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।
5.साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।
6.कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।
7.साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।
8.बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।

उत्तर:

क्रम स्तंभ 1स्तंभ 2
1.गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लार्गो पाँय।3. गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।
2.अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।5. जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।
3.ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।6. हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।
4.निदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।8. आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।
5.साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।7. विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।
6.कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।4. मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।
7.साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।1. सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।
8.बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।2. बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।

(ख) नीचे स्तंभ 1 में दी गई दोहों की पंक्तियों को स्तंभ 2 में दी गई उपयुक्त पंक्तियों से जोड़िए-

क्रम स्तंभ 1स्तंभ 2
1.गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लार्गी पाँय।1. बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।
2.अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।2. औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
3.ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।3. जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
4.निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।4. सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।
5.साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।5. पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
6.कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।6. अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
7.बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।7. जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।
8.साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।8. बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।

उत्तर: 

क्रम स्तंभ 1स्तंभ 2
1.गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लार्गी पाँय।8. बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
2.अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।6. अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
3.ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।2. औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
4.निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।1. बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।
5.साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।4. सार सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय।।
6.कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।7. जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।
7.बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।5. पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
8.साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।3. जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए-

(क) “कबिरा मन पंछी भया भावै तहाँ जाय। 

जो जैसी संगति करे सो तैसा फल पाय”

उत्तर: इस पंक्ति का अर्थ है कि मन बहुत चंचल होता है और पक्षी की तरह जहाँ चाहता है वहाँ चला जाता है। मनुष्य जिस प्रकार की संगति करता है, उसका प्रभाव उसी पर पड़ता है। यदि हम अच्छे लोगों की संगति करेंगे तो अच्छे विचार और गुण हमारे भीतर आएँगे, और यदि बुरी संगति करेंगे तो बुरे फल मिलेंगे। इस दोहे से शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा अच्छे लोगों की संगति करनी चाहिए।

(ख) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। 

जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप।।”

उत्तर: इस पंक्ति का अर्थ है कि सत्य बोलने से बढ़कर कोई तपस्या नहीं और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिसके हृदय में सत्य होता है, वही सच्चा ज्ञानी और पवित्र माना जाता है। कबीरदास जी का संदेश है कि जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, हमें सत्य का पालन करना चाहिए क्योंकि सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है।

सोच-विचार के लिए

पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए-

(क) गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागी पाँया” इस दोहे में गुरु को गोविंद (ईश्वर) से भी ऊपर स्थान दिया गया है। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने विचार लिखिए।

उत्तर: हाँ, मैं सहमत हूँ कि गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। गुरु ही वह व्यक्ति हैं जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं और ईश्वर को पहचानने का मार्ग बताते हैं। यदि गुरु न हों तो हमें सही मार्गदर्शन और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए कबीरदास जी ने गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया है।

(ख) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।” इस दोहे में कहा गया है कि सिर्फ बड़ा या संपन्न होना ही पर्याप्त नहीं है। बड़े या संपन्न होने के साथ-साथ मनुष्य में और कौन-कौन सी विशेषताएं होनी चाहिए? अपने विचार साझा कीजिए।

उत्तर: केवल बड़ा होना या संपन्न होना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य में विनम्रता, दया, सहानुभूति, मददगार स्वभाव और दूसरों के काम आने की भावना भी होनी चाहिए। यदि कोई बड़ा व्यक्ति समाज के लिए उपयोगी नहीं है, तो उसका बड़ा होना व्यर्थ है। इसलिए धन और पद के साथ-साथ अच्छे गुण भी आवश्यक हैं।

(ग) “ऐसी बानी चोलिए मन का आपा खोय।” क्या आप मानते हैं कि शब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही नहीं स्वयं पर भी पड़ता है? आपके बोले गए शब्दों ने आपके या किसी अन्य के स्वभाव या मनोदशा को कैसे परिवर्तित किया? उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर: हाँ, मैं मानता हूँ कि शब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही नहीं, स्वयं पर भी पड़ता है। जब हम मधुर वाणी बोलते हैं, तो सामने वाले को खुशी और सुकून मिलता है और हमारे मन को भी शांति मिलती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी उदास मित्र से हम प्यार और सहानुभूति से बातें करें, तो उसका मन प्रसन्न हो जाता है और हमें भी आत्मसंतोष मिलता है। इसके विपरीत, कठोर शब्द बोलने से विवाद और अशांति बढ़ती है।

(घ) “जो जैसी संगति करे सो तैसा फल पाया।” हमारे विचारों और कार्यों पर संगति का क्या प्रभाव पड़ता है? उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर: हमारी संगति का हमारे विचारों और कार्यों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि हम अच्छे मित्रों के साथ रहते हैं, तो उनके अच्छे विचार और आदतें हममें भी आ जाती हैं। जैसे– पढ़ाई में अच्छे मित्रों के साथ रहने से हममें मेहनत और लगन बढ़ती है। इसके विपरीत, यदि हम बुरी संगति में पड़ते हैं तो बुरी आदतें और गलत काम करने की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। इसलिए कहा गया है कि जैसी संगति होगी, वैसा ही फल मिलेगा।

दोहे की रचना

“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। 

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।”

इन दोनों पंक्तियों पर ध्यान दीजिए। इन दोनों पंक्तियों के दो-दो भाग दिखाई दे रहे हैं। इन चारों भागों का पहला शब्द है ‘अति’। इस कारण इस दोहे में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो गया है। आप ध्यान देंगे तो इस कविता में आपको ऐसी कई विशेषताएँ दिखाई देंगी, जैसे – दोहों की प्रत्येक पंक्ति को बोलने में एक-समान समय लगता है। अपने-अपने समूह में मिलकर पाठ में दिए गए दोहों की विशेषताओं की सूची बनाइए।

(क) दोहों की उन पंक्तियों को चुनकर लिखिए, जिनमें –

1. एक ही अक्षर से प्रारंभ होने वाले (जैसे – राजा, रस्सी, रात) दो या दो से अधिक शब्द एक साथ आए हैं।

उत्तर: “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।”

(यहाँ “गुरु” और “गोविंद” दोनों ‘ग’ अक्षर से शुरू होते हैं।)

2. एक शब्द एक साथ दो बार आया है। (जैसे – बार-बार)।

उत्तर: “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।”

(यहाँ “अति” शब्द बार-बार आया है।)

3. लगभग एक जैसे शब्द, जिनमें केवल एक मात्रा भर का अंतर है (जैसे – जल, जाल) एक ही पंक्ति में आए हैं।

उत्तर: “औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।”

(यहाँ “औरन” और “आपहुँ” – समान ध्वनि का आभास देते हैं।)

4. एक ही पंक्ति में विपरीतार्थक शब्दों (जैसे – अच्छा-बुरा) का प्रयोग किया गया है।

उत्तर: “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।”

(यहाँ “साँच–झूठ” विपरीतार्थक शब्द हैं।)

5. किसी की तुलना किसी अन्य से की गई है। (जैसे – दूध जैसा सफेद)।

उत्तर: “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।”

(मनुष्य की तुलना खजूर के पेड़ से की गई है।)

6. किसी को कोई अन्य नाम दे दिया गया है। (जैसे – मुख चंद्र है)।

उत्तर: “जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।”

(यहाँ सत्य को ‘गुरु’ कहा गया है।)

7. किसी शब्द की वर्तनी थोड़ी अलग है। (जैसे – ‘चुप’ के स्थान पर ‘चूप’)।

उत्तर: “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।”

(यहाँ ‘चूप’ शब्द ‘चुप’ का ही रूप है।)

8. उदाहरण द्वारा कही गई बात को समझाया गया है।

उत्तर: “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।”

(यहाँ आलोचक को पास रखने का महत्व उदाहरण से समझाया गया है।)

(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।

उत्तर: हमारे समूह की सूची से यह स्पष्ट होता है कि कबीर के दोहों में भाषा की सरलता, लय, पुनरावृत्ति, तुलना, उदाहरण, विपरीतार्थक शब्द, और शब्दों का विशेष प्रयोग (जैसे चूप–चुप) जैसी विशेषताएँ हैं। इन सबके कारण दोहे अधिक प्रभावशाली और यादगार बनते हैं।

अनुमान और कल्पना से

अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए-

(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।”

यदि आपके सामने यह स्थिति होती तो आप क्या निर्णय लेते और क्यों? 

यदि संसार में कोई गुरु या शिक्षक न होता तो क्या होता?

उत्तर: यदि मेरे सामने यह स्थिति होती तो मैं पहले गुरु के चरण छूता, क्योंकि गुरु ही हमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।

यदि संसार में कोई गुरु या शिक्षक न होता तो मनुष्य अज्ञान में ही भटकता रहता और सही–गलत का भेद समझना कठिन हो जाता।

(ख) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।”

यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक बोलता है या बहुत चुप रहता है तो उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

यदि वर्षा आवश्यकता से अधिक या कम हो तो क्या परिणाम हो सकते हैं?

आवश्यकता से अधिक मोबाइल या मल्टीमीडिया का प्रयोग करने से क्या परिणाम हो सकते हैं?

उत्तर: यदि कोई व्यक्ति बहुत बोलता है तो लोग उससे ऊब सकते हैं और उसकी बातों का मूल्य कम हो जाता है। यदि वह बहुत चुप रहता है तो उसकी भावनाएँ व्यक्त नहीं हो पातीं और वह अकेलापन महसूस कर सकता है।

यदि वर्षा आवश्यकता से अधिक हो तो बाढ़ आ सकती है और यदि कम हो तो सूखा पड़ सकता है।

इसी प्रकार मोबाइल या मल्टीमीडिया का अधिक प्रयोग करने से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, पढ़ाई पर ध्यान नहीं रहता और जीवन असंतुलित हो जाता है।

(ग) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।”

झूठ बोलने पर आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

कल्पना कीजिए कि आपके शिक्षक ने आपके किसी गलत उत्तर के लिए अंक दे दिए हैं, ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे?

उत्तर: झूठ बोलने से विश्वास टूट जाता है और जीवन में असफलता तथा मानसिक अशांति आती है।

यदि मेरे शिक्षक ने गलत उत्तर पर अंक दे दिए, तो मैं ईमानदारी से उन्हें बताऊँगा क्योंकि सत्य बोलना ही सबसे बड़ा धर्म है।

(घ) “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोया”

यदि सभी मनुष्य अपनी वाणी को मधुर और शांति देने वाली बना लें तो लोगों में क्या परिवर्तन आ सकते हैं?

क्या कोई ऐसी परिस्थिति हो सकती है जहाँ कटु वचन बोलना आवश्यक हो? अनुमान लगाइए।

उत्तर: यदि सभी लोग मधुर और शांति देने वाली वाणी बोलें, तो समाज में प्रेम, सहयोग और भाईचारा बढ़ेगा।

हाँ, कभी–कभी कटु वचन भी आवश्यक हो सकते हैं—जैसे किसी को बुरी आदत या गलती से रोकने के लिए डाँटना पड़ सकता है।

(ङ) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूरा”

यदि कोई व्यक्ति अपने बड़े होने का अहंकार रखता हो तो आप इस दोहे का उपयोग करते हुए उसे ‘बड़े होने या संपन्न होने’ का क्या अर्थ बताएँगे या समझाएँगे?

खजूर, नारियल आदि ऊँचे वृक्ष अनुपयोगी नहीं होते हैं। वे किस प्रकार से उपयोगी हो सकते हैं? बताइए।

आप अपनी कक्षा का कक्षा नायक या नायिका (मॉनीटर) चुनने के लिए किसी विद्यार्थी की किन-किन विशेषताओं पर ध्यान देंगे?

उत्तर: यदि कोई व्यक्ति अपने बड़े होने का अहंकार रखे, तो मैं उसे समझाऊँगा कि बड़े होने का अर्थ केवल ऊँचा पद या संपन्नता नहीं, बल्कि समाज के लिए उपयोगी होना है।

खजूर और नारियल जैसे ऊँचे वृक्ष भी अनुपयोगी नहीं हैं—वे फल, रस, तेल और लकड़ी के रूप में मनुष्य को लाभ पहुँचाते हैं।

कक्षा का मॉनीटर चुनते समय मैं पढ़ाई में मेहनती, ईमानदार, जिम्मेदार और मददगार छात्र को प्राथमिकता दूँगा।

(च) “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।”

यदि कोई आपकी गलतियों को बताता रहे तो आपको उससे क्या लाभ होगा?

यदि समाज में कोई भी एक-दूसरे की गलतियाँ न बताए तो क्या होगा?

उत्तर: यदि कोई मेरी गलतियाँ बताता रहे, तो मुझे अपनी कमियाँ सुधारने का अवसर मिलेगा और मैं और बेहतर बनूँगा।

यदि समाज में कोई एक-दूसरे की गलतियाँ न बताए, तो लोग और भी अधिक गलतियाँ करेंगे और समाज की प्रगति रुक जाएगी।

(छ) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।”

कल्पना कीजिए कि आपके पास ‘सूप’ जैसी विशेषता है तो आपके जीवन में कौन-कौन से परिवर्तन आएँगे?

यदि हम बिना सोचे-समझे हर बात को स्वीकार कर लें तो उसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

उत्तर: यदि मेरे पास ‘सूप’ जैसी विशेषता हो, तो मैं केवल अच्छे विचारों और गुणों को अपनाऊँगा और व्यर्थ बातों को छोड़ दूँगा। इससे मेरा जीवन सफल और शांतिपूर्ण होगा।

यदि हम बिना सोचे-समझे हर बात को मान लें, तो गलत आदतें और विचार भी जीवन में आ सकते हैं, जिससे नुकसान होगा।

(ज) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।”

यदि मन एक पंछी की तरह उड़ सकता तो आप उसे कहाँ ले जाना चाहते और क्यों?

संगति का हमारे जीवन पर क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है?

उत्तर: यदि मेरा मन पंछी की तरह उड़ सकता, तो मैं उसे ज्ञान और शांति की ओर ले जाता, ताकि जीवन में सफलता और सुकून मिले।

संगति का हमारे जीवन पर गहरा असर पड़ता है—अच्छी संगति हमें अच्छे गुण देती है, जबकि बुरी संगति गलत राह पर ले जा सकती है।

वाद-विवाद

“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। 

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।”

(क) इस दोहे का आज के समय में क्या महत्व है? इसके बारे में कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। एक समूह के साथी इसके पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करेंगे और दूसरे समूह के साथी इसके विपक्ष में बोलेंगे। एक तीसरा समूह निर्णायक बन सकता है।

उत्तर: यह दोहा आज भी अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि आधुनिक जीवन में “अति” हर जगह दिखाई देती है—

बोलने या चुप रहने की अति,

मोबाइल और सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग,

खानपान और विलासिता की अति।

इन सबके दुष्परिणाम समाज और व्यक्ति दोनों पर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। इसलिए यह दोहा हमें संतुलन की महत्ता बताता है।

(ख) पक्ष और विपक्ष के समूह अपने-अपने मत के लिए तर्क प्रस्तुत करेंगे, जैसे–

पक्ष – वाणी पर संयम रखना आवश्यक है।

विपक्ष – अत्यधिक चुप रहना भी उचित नहीं है।

उत्तर: वाद–विवाद में पक्ष और विपक्ष के तर्क:

पक्ष (समर्थन में):

वाणी पर संयम रखना आवश्यक है, क्योंकि ज़्यादा बोलने से विवाद और गलतफहमियाँ बढ़ती हैं।

अधिक चुप रहना भी अच्छा नहीं है, उचित समय पर विचार प्रकट करना ज़रूरी है।

प्रकृति भी संतुलन पर आधारित है—अत्यधिक धूप या वर्षा दोनों हानिकारक हैं।

हर कार्य मध्यम और संतुलित ढंग से करने पर ही सफलता मिलती है।

आधुनिक जीवन में अति करने से तनाव, रोग और अशांति बढ़ रही है।

विपक्ष (विरोध में):

कभी–कभी अधिक बोलना आवश्यक होता है, जैसे अन्याय या गलत कामों के विरुद्ध आवाज़ उठाना।

बहुत ज़्यादा चुप रहना व्यक्ति की कमजोरी या डर भी दर्शा सकता है।

कभी–कभी “अति” ही समाज को आगे बढ़ाती है—जैसे अत्यधिक परिश्रम, अभ्यास या शोध।

लगातार बरसने वाली वर्षा फसलों के लिए हानिकारक हो सकती है, परंतु कुछ क्षेत्रों में वही जीवनदाता भी होती है।

हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना हमेशा संभव नहीं होता, कई बार चरम पर जाना ही समाधान होता है।

(ग) पक्ष और विपक्ष में प्रस्तुत तकों की सूची अपनी लेखन-पुस्तिका में लिख लीजिए।

उत्तर: लेखन-पुस्तिका के लिए सूची:

पक्ष के तर्क:

वाणी पर संयम रखना चाहिए।

ज़्यादा बोलना या चुप रहना हानिकारक है।

प्रकृति भी संतुलन सिखाती है।

हर कार्य मध्यम रूप से करना श्रेष्ठ है।

संतुलन से ही सुख और शांति मिलती है।

विपक्ष के तर्क:

अन्याय के खिलाफ ज़्यादा बोलना ज़रूरी है।

चुप रहना कई बार नुकसानदायक साबित होता है।

“अति” परिश्रम और अभ्यास से ही महान उपलब्धियाँ मिलती हैं।

कुछ परिस्थितियों में चरम पर जाना ही उचित है।

संतुलन हमेशा व्यवहार में लाना संभव नहीं है।

शब्द से जुड़े शब्द

नीचे दिए गए स्थानों में कबीर से जुड़े शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए और अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए-

उत्तर: वाणी,सत्य,गुरु,निंदक,संगति,विवेक।

दोहे और कहावतें

“कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। 

जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।”

इस दोहे को पढ़कर ऐसा लगता है कि यह बात तो हमने पहले भी अनेक बार सुनी है। यह दोहा इतना अधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय है कि इसकी दूसरी पंक्ति लोगों के बीच कहावत- ‘जैसा संग वैसा रंग’ (व्यक्ति जिस संगति में रहता है, वैसा ही उसका व्यवहार और स्वभाव बन जाता है।) की तरह प्रयुक्त होती है। कहावतें ऐसे वाक्य होते हैं जिन्हें लोग अपनी बात को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। इसमें सामान्यतः जीवन के गहरे अनुभव को सरल और संक्षेप में बता दिया जाता है।

अब आप ऐसी अन्य कहावतों का प्रयोग करते हुए अपने मन से कुछ वाक्य बनाकर लिखिए।

उत्तर: कबीरदास का दोहा – “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।

इससे यही शिक्षा मिलती है कि मनुष्य की संगति उसके स्वभाव और व्यवहार को प्रभावित करती है। इसी भाव को कहावत में कहा गया है – “जैसा संग वैसा रंग”। कहावतें अनुभव से निकली हुई छोटी, सारगर्भित और शिक्षाप्रद बातें होती हैं। नीचे कुछ प्रमुख कहावतों को प्रयोग करते हुए वाक्य दिए गए हैं।

कहावतों का प्रयोग करते हुए वाक्य:

जैसा बीज, वैसा फल।

वाक्य: जो मेहनत से पढ़ाई करता है वही अच्छे अंक लाता है, क्योंकि जैसा बीज, वैसा फल।

एकता में बल है।

वाक्य: गाँव के सभी लोग मिलकर बाढ़ की समस्या से लड़े, यह सिद्ध करता है कि एकता में बल है।

लोहे को लोहा काटता है।

वाक्य: बुराई का अंत करने के लिए साहस और दृढ़ता जरूरी है, क्योंकि लोहे को लोहा काटता है।

मेहनत का फल मीठा होता है।

वाक्य: रमेश ने कठिन परिश्रम से परीक्षा पास की, सच है मेहनत का फल मीठा होता है।

जैसा संग, वैसा रंग।

वाक्य: अच्छे मित्रों की संगति से स्वभाव और विचार भी अच्छे बनते हैं, इसलिए कहा गया है जैसा संग, वैसा रंग।

सबकी प्रस्तुति

पाठ के किसी एक दोहे को चुनकर अपने समूह के साथ मिलकर भिन्न-भिन्न प्रकार से कक्षा के सामने प्रस्तुत कीजिए। उदाहरण के लिए-

गायन करना, जैसे लोकगीत शैली में।

भाव-नृत्य प्रस्तुति।

कविता पाठ करना।

संगीत के साथ प्रस्तुत करना।

अभिनय करना, जैसे एक दोस्त गुस्से में आकर कुछ गलत कह देता है लेकिन दूसरा दोस्त उसे समझाता है कि मधुर भाषा का कितना प्रभाव पड़ता है। (ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोया)।

उत्तर: कहावतों के वाक्य:

जैसा संग वैसा रंग – बुरी संगति में पड़कर रवि का स्वभाव भी बदल गया।

ऊँट के मुँह में जीरा – इतने पैसे से बड़ा काम करना ऊँट के मुँह में जीरा है।

नाच न जाने आँगन टेढ़ा – अपनी गलती छुपाने के लिए बहाने बनाना नाच न जाने आँगन टेढ़ा कहलाता है।

सबकी प्रस्तुति: चुना हुआ दोहा –

“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।

औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होय।। ”

प्रस्तुति के तरीके:

लोकगीत की तरह गाना।

कविता पाठ करना।

संगीत/वाद्य के साथ गाना।

अभिनय: एक दोस्त गुस्से में बोलता है, दूसरा शांति से समझाता है।

पाठ से आगे

आपकी बात

(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँया” क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने आपको सही दिशा दिखाने में सहायता की हो? उस व्यक्ति के बारे में बताइए।

उत्तर: मेरे जीवन में मेरे शिक्षक (या माता-पिता) ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने मुझे सही दिशा दिखाई है। जब भी मैं किसी कठिनाई में होता हूँ या निर्णय लेने में असमर्थ होता हूँ, वे मुझे धैर्य, परिश्रम और सत्य के मार्ग पर चलने की सलाह देते हैं। उनके मार्गदर्शन से ही मैं आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ पाया हूँ।

(ख) “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।” क्या कभी किसी ने आपकी कमियों या गलतियों के विषय में बताया है जिनमें आपको सुधार करने का अवसर मिला हो? उस अनुभव को साझा कीजिए।

उत्तर:  हाँ, एक बार मेरे मित्र ने बताया कि मैं पढ़ाई के समय बहुत ध्यान भटकाता हूँ और काम अधूरा छोड़ देता हूँ। पहले मुझे बुरा लगा, लेकिन बाद में मैंने अपनी गलती समझी और पढ़ाई के समय मोबाइल से दूरी बना ली। इस आलोचना से मेरी पढ़ाई सुधरी और अच्छे अंक भी आए। इस अनुभव से मुझे लगा कि निंदक हमें सुधारने का अवसर देते हैं।

(ग) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।” क्या आपने कभी अनुभव किया है कि आपकी संगति (जैसे- मित्र) आपके विचारों और आदतों या व्यवहारों को प्रभावित करती है? अपने अनुभव साझा कीजिए।

उत्तर: जी हाँ, मैंने अनुभव किया है कि हमारी संगति हमारे विचारों और आदतों पर बहुत असर डालती है। जब मैं मेहनती और ईमानदार मित्रों के साथ रहा, तो पढ़ाई में रुचि बढ़ी और अच्छे परिणाम मिले। लेकिन जब कभी मैं लापरवाह मित्रों की संगति में गया, तो आलस्य और समय की बर्बादी जैसी आदतें आ गईं। इस अनुभव से मैंने सीखा कि हमें हमेशा अच्छी संगति चुननी चाहिए।

सृजन

(क) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।”

इस दोहे पर आधारित एक कहानी लिखिए जिसमें किसी व्यक्ति ने कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। (संकेत- किसी खेल में आपकी टीम द्वारा नियमों के उल्लंघन का आपके द्वारा विरोध किया जाना।)

उत्तर: हमारे विद्यालय में फुटबॉल प्रतियोगिता हो रही थी। हमारी टीम फाइनल में पहुँची थी। खेल बहुत रोमांचक था। आखिरी समय में हमारे एक साथी ने गेंद को हाथ से छू लिया, परंतु रेफरी ने वह गलती नहीं देखी। सभी खिलाड़ी खुश थे कि अब हम जीत सकते हैं।

लेकिन मैंने सोचा—“सत्य सबसे बड़ा तप है और झूठ सबसे बड़ा पाप।” मैंने हिम्मत करके रेफरी को बताया कि हमारे खिलाड़ी से गलती हुई है। रेफरी ने विपक्षी टीम को पेनल्टी किक दे दी। परिणामस्वरूप हम मैच हार गए, पर मेरे मन को शांति मिली।

उस दिन मुझे लगा कि हार-जीत से भी बड़ा है सत्य और ईमानदारी। पूरे विद्यालय ने मेरे साहस की सराहना की और यह सिखाया कि सच बोलना ही असली जीत है।

(ख) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लार्गी पाँय।”

इस दोहे को ध्यान में रखते हुए अपने किसी प्रेरणादायक शिक्षक से साक्षात्कार कीजिए और उनके योगदान पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर: मेरे जीवन में मेरे गणित के शिक्षक सबसे प्रेरणादायक रहे हैं। मैंने उनसे साक्षात्कार करते समय पूछा कि वे हमेशा छात्रों को इतनी धैर्यपूर्वक क्यों पढ़ाते हैं। उन्होंने कहा—“शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना नहीं है, बल्कि बच्चों को सही दिशा दिखाना है। जैसे गुरु ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।”

उन्होंने यह भी बताया कि कठिन विषय को सरल बनाना, छात्रों की समस्याएँ सुनना और उन्हें आत्मविश्वास दिलाना ही उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है। उनकी प्रेरणा से मैंने भी कठिन परिश्रम करना सीखा और गणित से डरना छोड़ दिया।

उनका योगदान मेरे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। सचमुच, यदि भगवान और गुरु दोनों सामने हों, तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ही हमें भगवान तक ले जाते हैं।

कबीर हमारे समय में

(क) कल्पना कीजिए कि कबीर आज के समय में आ गए हैं। वे आज किन-किन विषयों पर कविता लिख सकते हैं? उन विषयों की सूची बनाइए।

उत्तर: यदि कबीर हमारे समय में आ जाएँ तो वे इन विषयों पर कविता लिख सकते हैं—

पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति की रक्षा।

मोबाइल और सोशल मीडिया का दुरुपयोग।

शिक्षा और नैतिक मूल्यों का महत्व।

भ्रष्टाचार और बेईमानी के दुष्परिणाम।

भाईचारा, शांति और धार्मिक सहिष्णुता।

मेहनत और सादगी का महत्व।

नारी सम्मान और समानता।

(ख) इन विषयों पर आप भी दो-दो पंक्तियाँ लिखिए।

उत्तर: इन विषयों पर मेरी दो-दो पंक्तियाँ:

1. पर्यावरण पर: 

पेड़ लगाओ धरती बचाओ, यही है जीवन का सच।

हरियाली से ही मिलेगा, मन को सुकून और सच्च।

2. मोबाइल/सोशल मीडिया पर: 

मोबाइल अच्छा सेवक है, पर मालिक बन जाए बुरा।

संतुलन रखकर इसका प्रयोग, तभी मिलेगा सच्चा सुरा।

3. शिक्षा और मूल्य पर:

पढ़ाई से ही चमके जीवन, सच्चे ज्ञान का दीप जलाओ।

सत्य-अहिंसा, करुणा-प्रेम, जीवन का आधार बनाओ।

4. भ्रष्टाचार पर:

झूठ और रिश्वत से मिले धन, टिकता नहीं है देर तलक।

सत्य और ईमान से जो जीए, उसका ही जीवन चमक।

5. भाईचारे पर:

मंदिर-गिरजे, मस्जिद-गुरुद्वारे, सबका संदेश है एक।

प्रेम करो सब जीवों से, यही है जीवन का टेक।

साइबर सुरक्षा और दोहे

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में विचार-विमर्श कीजिए और साझा कीजिए-

(क) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” इंटरनेट पर अनावश्यक सूचनाएँ साझा करने के क्या-क्या संकट हो सकते हैं?

उत्तर: दोहा “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप” हमें संतुलन की शिक्षा देता है। यदि हम इंटरनेट पर अनावश्यक सूचनाएँ साझा करते हैं, तो कई संकट हो सकते हैं—

निजी जानकारी (फ़ोन नंबर, पता, पासवर्ड) गलत हाथों में जाकर दुरुपयोग हो सकती है।

फर्जी खातों और धोखाधड़ी (फ्रॉड) का शिकार बनने का खतरा रहता है।

अफवाहें और गलत सूचनाएँ फैल सकती हैं, जिससे समाज में भ्रम पैदा होता है।

इसलिए इंटरनेट पर जानकारी सोच-समझकर और सीमित मात्रा में ही साझा करनी चाहिए।

(ख) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” किसी भी वेबसाइट, ईमेल या मीडिया पर उपलब्ध जानकारी को ‘सूप’ की तरह छानने की आवश्यकता क्यों है? कैसे तय करें कि कौन-सी सूचना उपयोगी है और कौन-सी हानिकारक?

उत्तर: दोहा “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय” विवेक का संदेश देता है। जैसे सूप अनाज से भूसी अलग कर देता है, वैसे ही इंटरनेट पर हमें उपयोगी और हानिकारक सूचनाओं को छाँटना चाहिए।

हर वेबसाइट या ईमेल सही नहीं होता, इसलिए स्रोत (source) की विश्वसनीयता परखना ज़रूरी है।

संदिग्ध लिंक, स्पैम ईमेल और नकली समाचारों को नज़रअंदाज़ करना चाहिए।

केवल विश्वसनीय, प्रमाणिक और उपयोगी जानकारी को अपनाना चाहिए।

इस प्रकार विवेक और सावधानी से ही साइबर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

आज के समय में

1. नीचे कुछ घटनाएँ दी गई हैं। इन्हें पढ़कर आपको कबीर के कौन-से दोहे याद आते हैं? घटनाओं के नीचे दिए गए रिक्त स्थान पर उन दोहों को लिखिए-

(i) अमित का मन पढ़ाई में नहीं लगता था और वह गलत संगति में चला गया। कुछ समय बाद जब उसके अंक कम आए तो उसे समझ में आया “संगति का असर जीवन पर पड़ता है।”

उत्तर: “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।

जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।। ”

(ii) एक विद्यार्थी इंटरनेट पर लगातार सूचनाएँ खोज रहा था। उसके पिता ने कहा नहीं होती, सही बातों को चुनो और बेकार छोड़ दो।”

उत्तर: “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।

सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।। ”

(iii) आपका एक मित्र आपकी किसी गलत बात पर आपकी आलोचना करता है। आप पहले परेशान होते हैं, लेकिन फिर आपने सोचा – “आलोचना मुझे सुधरने का मौका देती है, मुझे इन बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए। इसे सकारात्मक रूप से लेना चाहिए।”

उत्तर: “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।। ”

(iv) रीमा ने अपने गुस्से में सहकर्मी को बुरा-भला कह दिया, जिससे वातावरण बिगड़ गया। बाद में उसने समझा कि अगर वह शांति से बात करती तो समस्या हल हो जाती।

उत्तर: “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।

औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।। ”

(v) कक्षा में मोहन ने बहुत अधिक बोलकर सबको परेशान कर दिया, जबकि रमेश बिल्कुल चुप रहा। गुरुजी ने कहा- “बोलचाल में संतुलन आवश्यक है, न अधिक बोलो, न अधिक चुप रहो।”

उत्तर:

(vi) सुरेश को जब ‘प्रतिभा सम्मान’ मिला तो उसने कहा – “इसमें मेरे परिश्रम के साथ मेरे गुरुजनों का मार्गदर्शन भी सम्मिलित है।”

उत्तर:

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