NIOS Class 12 Painting Chapter 9 दक्षिण भारतीय चित्रकला

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NIOS Class 12 Painting Chapter 9 दक्षिण भारतीय चित्रकला

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Chapter: 9

Part – 1: सिद्धांत
पाठगत प्रश्न 9.1

A. सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प चुनकर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

1. तंजौर चित्रकला का काल है:

(i) समकालीन। 

(ii) प्राचीन। 

(iii) पूर्व-ऐतिहासिक। 

(iv) इनमें से कोई नहीं। 

उत्तर: (i) समकालीन।

2. तंजौर चित्रों में प्रयुक्त सामग्री का नाम है: 

(i) मिट्टी। 

(ii) सोना। 

(iii) चाँदी। 

(iv) कांस्य।

उत्तर: (ii) सोना।

3. ‘पंचमुखी’ शब्द का अर्थ है:

(i) चार आँखें। 

(ii) चार हाथ। 

(iii) पाँच सिरवाला। 

(iv) ये सभी।

उत्तर: (iii) पाँच सिरवाला।

पाठगत प्रश्न 9.2

1. मैसूर चित्रों को मैसूर चित्र क्यों कहा जाता है? 

उत्तर: क्योंकि इन चित्रों का विकास कर्नाटक के मैसूर नगर में हुआ था।

2. मैसूर चित्रों का विकास किस काल में हुआ? 

उत्तर: इस चित्र-शैली का विकास कर्नाटक राज्य के मैसूर नगर में 18वीं सदी के दौरान हुआ।

3. मैसूर चित्र किस दक्षिण भारतीय चित्रशैली की उपशाखा है? 

उत्तर: मैसूर चित्र-शैली विजयनगर चित्र-शैली की एक उपशाखा (उपशैली) है।

4. मैसूर चित्रों की क्या विशेषताएँ हैं? 

उत्तर: मैसूर चित्र अपनी भद्रता (सादगी), शांत व सहज रंग-योजना और विवरणात्मक चित्रांकन के लिए जाने जाते हैं।

पाठगत प्रश्न 9.3

A. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1. दक्कन लघुचित्रों का निर्माणकाल _____________ है। 

उत्तर: दक्कन लघुचित्रों का निर्माणकाल 16वीं एवं 17वीं शताब्दी के मध्य है।

2. दक्कन लघुचित्रों का मुख्य केंद्र _____________ है। 

उत्तर: दक्कन लघुचित्रों का मुख्य केंद्र शासकों के व्यक्ति चित्र है। 

3. दक्कन शैली के चित्रों के रंग समृद्ध और _____________ हैं। 

उत्तर: दक्कन शैली के चित्रों के रंग समृद्ध और चमकदार है।

4. दक्कन के कलाकारों ने _____________ से प्रेरणा ली है। 

उत्तर: दक्कन के कलाकारों ने  मुग़ल स्कूल से प्रेरणा ली है। 

पाठांत प्रश्न

1. दक्षिण भारत की पारंपरिक चित्र-शैलियों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर: दक्षिण भारत की अपनी समृद्ध पारंपरिक चित्र-शैलियां हैं, जिनका विकास एक लंबे कालखंड में विभिन्न राजवंशों के संरक्षण में हुआ। इनमें प्रमुख रूप से तंजौर, मैसूर, दक्कनी लघुचित्र, आंध्र प्रदेश की कलमकारी और केरल के मंदिरों की दीवारों पर बने भित्तिचित्र शामिल हैं। दक्कनी लघुचित्रों का विकास 16वीं से 19वीं सदी के मध्य बीजापुर और हैदराबाद के मुस्लिम शासकों के संरक्षण में हुआ। वहीं, तंजौर शैली विजयनगर के नायकों और मराठों के अधीन, जबकि मैसूर शैली वोडेयार शासकों के प्रोत्साहन से पल्लवित हुई। इन सभी चित्र-शैलियों की अपनी अलग पहचान है, लेकिन इन सब पर विजयनगर कला शैली का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है, जो इन्हें एक सूत्र में बांधता है।

2. तंजौर चित्रों के विकास के बारे में लिखिए। 

उत्तर: तंजौर चित्र-शैली का उद्गम तमिलनाडु के तंजौर शहर में हुआ। इस शैली का विकास 16वीं सदी से लेकर 18वीं सदी के मध्य तक मुख्य रूप से विजयनगर के नायक शासकों और मराठा शासकों के संरक्षण में हुआ। इन चित्रों के उत्थान और लोकप्रियता को बढ़ाने में तंजौर तथा त्रिची के ‘राजू’ समुदाय और मदुरई के ‘नायडू’ समुदाय के कलाकारों का भी अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यह शैली उस काल में फली-फूली जब इस क्षेत्र में विशाल मंदिरों का निर्माण कार्य जोरों पर था, जिसके कारण इन चित्रों में भक्ति और समर्पण का भाव गहराई से झलकता है।

3. तंजौर चित्र किस माध्यम से बनाए गए? इन चित्रों के विषयों का भी उल्लेख कीजिए। 

उत्तर: माध्यम: तंजौर चित्र मुख्य रूप से लकड़ी के तख्ते पर सूती कपड़ा चिपकाकर बनाए जाते हैं, इसी कारण इन्हें तमिल में ‘पलागई पदम’ (लकड़ी पर बने चित्र) भी कहा जाता है। चित्र बनाने के लिए चॉक पाउडर, गोंद, खनिज रंग, शुद्ध सोने के वर्क, कीमती पत्थर (नग) और शीशे के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा ये चित्र कांच पर भी बनाए गए हैं।

विषय: इन चित्रों के मुख्य विषय हिंदू देवी-देवता, राजा, रजवाड़े और पौराणिक या मिथकीय चरित्र होते हैं। बालकृष्ण की विभिन्न बाल लीलाओं और भंगिमाओं को चित्रित करना इन चित्रों का सबसे प्रिय विषय रहा है।

4. तंजौर चित्रों की विशेषताएँ क्या हैं? 

उत्तर: तंजौर चित्र दक्षिण भारतीय परंपराओं और धर्म से गहराई से जुड़े हैं, इसलिए इनमें पवित्रता और समर्पण का भाव होता है। इनकी सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि बुनियादी चित्रांकन के ऊपर कीमती पत्थरों, मोतियों, शीशे के टुकड़ों और शुद्ध स्वर्ण (सोने) के वर्क से सजावट की जाती है। इनमें चमकदार और भड़कीले रंगों का प्रयोग होता है। उभारदार काम (Relief work) और रत्नों की सजावट के कारण इन चित्रों में एक शानदार त्रि-आयामी (3D) प्रभाव उत्पन्न होता है, जो इन्हें अन्य भारतीय चित्र-शैलियों से अलग और अनूठा बनाता है। देवी-देवताओं के चेहरे आमतौर पर गोल और दैवीय तेज से परिपूर्ण बनाए जाते हैं।

5. मैसूर चित्रों को मैसूर चित्र क्यों कहा जाता है? 

उत्तर: दक्षिण भारतीय शास्त्रीय चित्र-शैलियों में मैसूर चित्रकला का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इस चित्र-शैली का विकास कर्नाटक राज्य के मैसूर नगर (शहर) में हुआ था। इसी भौगोलिक उद्गम और मुख्य केंद्र के कारण इन चित्रों को ‘मैसूर चित्र-शैली’ कहा जाता है।

6. मैसूर चित्रों का विकास किस सदी में और किन शासकों के प्रयासों से हुआ? 

उत्तर: मैसूर चित्रों का मुख्य रूप से विकास 18वीं सदी के दौरान हुआ था। 16वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद, राजा वोडेयार ने इस क्षेत्र की चित्रकला को पुनर्जीवित करने का महत्वपूर्ण कार्य आरंभ किया। हालांकि उनके समय के कई चित्र टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के युद्धों में नष्ट हो गए, लेकिन 18वीं सदी में मुम्माडि कृष्णराज वोडेयार के शासनकाल में मैसूर राजपरिवार ने कला, संगीत और साहित्य को पुनः समृद्धि के शिखर पर पहुँचाया। मुम्माडि कृष्णराज वोडेयार के संरक्षण में ही इस शैली ने अपने उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त किया।

7. मैसूर चित्रों की विषयवस्तु तथा विशेषताएँ क्या हैं? 

उत्तर: विषयवस्तु: मैसूर चित्रों के मुख्य विषय हिंदू देवी-देवता और उनसे संबंधित पौराणिक कथाएं हैं। इसके अलावा राजाओं के काल में रची गई पांडुलिपियों (जैसे ‘श्रीतत्त्वनिधि’) में विभिन्न रागों, ऋतुओं, पर्यावरण संबंधी घटनाओं, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों का भी बहुत प्रभावशली चित्रण किया गया है।

विशेषताएँ: ये चित्र अपनी भद्रता (सादगी), शांत व सहज रंग-योजना और अत्यंत सूक्ष्म विवरणात्मक चित्रांकन के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें हल्का उभारदार काम किया जाता है, जो सफेद पाउडर, गोंद और पीले रंग के मिश्रण से तैयार होता है। अंत में इन चित्रों को सोने के वर्क और कीमती पत्थरों से सजाया जाता है।

8. मध्यकालीन भारत में ‘दक्कन’ के अंतर्गत कौन-सी रियासतें सम्मिलित थीं? दक्कन शैली के चित्र किस कालखण्ड में बनाए गए? 

उत्तर: मध्यकालीन भारतीय प्रायद्वीप का वह हिस्सा जो तत्कालीन बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा और हैदराबाद की रियासतों के अधीन आता था, उसे ‘दक्कन’ के नाम से जाना जाता था। दक्कन शैली के लघुचित्रों का निर्माण इन्ही रियासतों में 16वीं से 19वीं शताब्दी के मध्य के कालखंड में किया गया था।

9. दक्कन शैली पर किन संस्कृतियों का प्रभाव था तथा दक्कन शैली की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? 

उत्तर: प्रभाव: दक्कन शैली पर तत्कालीन भारतीय चित्र परंपराओं के साथ-साथ ईरानी, फारसी और तुर्की संस्कृति के कला-मूल्यों का गहरा समन्वय देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त, दक्कनी चित्रकारों ने मुगल शैली से भी प्रेरणा ली और इसमें यूरोपीय छवि-चित्रण का भी प्रभाव झलकता है।

विशेषताएँ: इस शैली की मुख्य विशेषता इसके चमकदार रंग, रहस्यमयी पृष्ठभूमि तथा लयबद्ध कोमलता है। मानव आकृतियों में सुंदर और भरे हुए चेहरे, गोरा रंग, बड़ी व खुली आँखें, चौड़ा माथा, ऊँची गर्दन, पतली कमर और सलीके से पहनी गई आकर्षक वेशभूषा तथा आभूषणों का बारीकी से किया गया अंकन इसे विशिष्ट बनाता है।

10. दक्कन के लघुचित्रों के मुख्य विषय क्या हैं? 

उत्तर: दक्कन के लघुचित्रों में मुख्य रूप से राजदरबार और राजपुरुषों के छविचित्र (Portraits) तथा उनकी जीवनी पर आधारित दृश्य उकेरे गए हैं। इसके अलावा शिकार के दृश्य (जैसे चाँद बीबी का बाज के साथ शिकार करते हुए चित्र), हाथियों की लड़ाई, और पशु-पक्षियों (जैसे ‘बाज़’) का सजीव चित्रण इसके प्रमुख विषयों में शामिल रहा है।

11. दक्कन लघुचित्र की रंग-योजना का वर्णन कीजिए। 

उत्तर: दक्कनी लघुचित्रों की रंग-योजना अत्यंत चमकदार, संवेदी और प्रभावशाली होती है। इन चित्रों में सुनहरे (Golden) और सफेद रंग का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया है, जो मुख्य रूप से इस शैली पर पड़े फारसी प्रभाव को दर्शाता है। चित्रकार अवसर और माध्यम (जैसे वसली, कागज या दीवार) के अनुसार प्राकृतिक और खनिज रंगों का चुनाव करते थे। इन चित्रों के जीवंत रंग एक विशिष्ट रोमांस और रहस्य की मनोदशा का सृजन करते हैं।

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