NIOS Class 12 Painting Chapter 6 मध्यकालीन चित्रकला Solutions Hindi Medium As Per New Syllabus. to each chapter is provided in the list so that you can easily browse throughout different chapters NIOS Class 12 Painting Chapter 6 मध्यकालीन चित्रकला Notes and select need one. NIOS Class 12 Painting Chapter 6 मध्यकालीन चित्रकला Question Answers Download PDF. NIOS Study Material of Class 12 Painting Paper Code: 332.
NIOS Class 12 Painting Chapter 6 मध्यकालीन चित्रकला
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मध्यकालीन चित्रकला
Chapter: 6
| Part – 1: सिद्धांत |
| पाठगत प्रश्न 6.1 |
A. निम्नलिखित को मिलाएं:
| 1. पाल वंश का काल | (i) टेंपरा |
| 2. माध्यम में प्रयुक्त चित्रकला | (ii) पाल शैली |
| 3. चित्रकला की शैली का उल्लेख करें | (iii) 8वीं से 13वीं सदी ईसवी |
उत्तर:
| 1. पाल वंश का काल | (iii) 8वीं से 13वीं सदी ईसवी |
| 2. माध्यम में प्रयुक्त चित्रकला | (i) टेंपरा |
| 3. चित्रकला की शैली का उल्लेख करें | (ii) पाल शैली |
| पाठगत प्रश्न 6.2 |
1. जैन लघुचित्र कब और कहाँ विकसित हुए?
उत्तर: ताड़पत्रों पर लिखी गई जैन पांडुलिपियों में बनाए गए जैन लघुचित्र दसवीं से चौदहवीं सदी ईसवी के मध्य मुख्य रूप से भारत के पश्चिमी क्षेत्रों, विशेषकर गुजरात, राजस्थान तथा उनके आस-पास के क्षेत्रों में विकसित हुए थे।
2. ‘कल्पसूत्र’ क्या है? इसकी रचना किसने की?
उत्तर: ‘कल्पसूत्र’ श्वेतांबर जैन समुदाय का एक अत्यंत पवित्र और धार्मिक ग्रंथ है। इस ग्रंथ में जैन तीर्थंकरों के जीवन से संबंधित कथाओं का विस्तृत उल्लेख किया गया है। यह ग्रंथ अर्धमागधी प्राकृत लिपि में लिखा गया है और इसकी रचना का श्रेय ‘भद्रबाहु’ को दिया जाता है।
3. जैन लघुचित्रों का माध्यम क्या है?
उत्तर: प्रारंभिक जैन लघुचित्रों का मुख्य माध्यम ‘ताड़पत्र’ (Palm leaf) पर ‘टेंपरा’ (Tempera) विधि है। इन चित्रों को ताड़ के पत्तों को विशेष रूप से तैयार करके उन पर उकेरा जाता था। यद्यपि, बाद के समय में यह चित्र कागजों पर भी बनाए जाने लगे थे।
| पाठगत प्रश्न 6.3 |
1. राजस्थानी चित्रों की सामान्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर: प्रारंभिक राजस्थानी चित्रों में एक विशिष्ट और अपनी अलग शैली दिखाई देती है। इन चित्रों की सबसे प्रमुख विशेषताएँ मानव आकृतियों के चेहरे की बाहरी सीमा से बाहर निकली हुई आँखें (protruding eyes) तथा उस समय की समकालीन पोशाकों (वस्त्रों) का सटीक चित्रण है। यद्यपि, सोलहवीं सदी के अंत तक आते-आते मुगल लघुचित्र कला के संपर्क और प्रभाव के कारण राजस्थानी शैली में भी कई परिवर्तन देखने को मिले।
2. राजस्थानी चित्रकला की कुछ प्रसिद्ध शैलियों के नाम लिखिए।
उत्तर: 16वीं सदी तक राजस्थान में चित्रकला अपने परिपक्व रूप में आ चुकी थी और इसके कई केंद्र विकसित हो गए थे। इनमें से सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध शैलियाँ हैं: मेवाड़, बूँदी, कोटा, प्रतापगढ़, किशनगढ़ और मालवा।
3. राजस्थानी चित्रकारों को किस काव्य रचना ने चित्र बनाने हेतु सर्वाधिक प्रेरित किया? उस काव्य तथा लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर: राजस्थानी चित्रकला में धार्मिक, राजसी, और धर्मनिरपेक्ष जैसे कई विविध विषय थे। परंतु महान कवि ‘जयदेव’ द्वारा रचित प्रसिद्ध काव्य ‘गीत गोविन्द’ ने चित्रकारों को चित्र बनाने के लिए सर्वाधिक प्रेरित किया और यह विषय पूरे राजस्थान में अत्यंत लोकप्रिय रहा।
| पाठांत प्रश्न |
1. मध्यकाल में लघुचित्रों की पृष्ठभूमि और उनके विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर: भारत में गुप्त शासकों के पतन और देश के अन्य हिस्सों में शक्तिशाली राजवंशों के कमज़ोर होने के बाद, 11वीं और 12वीं सदी के मध्य देश में भारी राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता का वातावरण बना रहा। इस दौरान बड़े पैमाने पर कला और वास्तुकला (जैसे बड़े मंदिर या महल) के क्षेत्र में काम होने की संभावना बहुत कम थी। किंतु, इस काल में भारतीय कला को ‘लघुचित्रों’ (Miniatures) के रूप में एक नई दिशा मिली। मुख्य रूप से ताड़ के पत्तों पर बौद्ध, जैन और हिंदू धर्मों की चित्रित पांडुलिपियां तैयार की गईं। पूर्वी भारत (बंगाल, बिहार) में पाल शासकों के अधीन बौद्ध पांडुलिपियाँ विकसित हुईं, जबकि पश्चिमी भारत (गुजरात, राजस्थान) में जैन धर्म से संबंधित लघुचित्रों का विकास हुआ। यह काल भारतीय चित्रकला के इतिहास में पांडुलिपि चित्रण के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
2. ताड़पत्रों को तैयार करके उन पर किस प्रकार चित्रकारी की जाती थी? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर: ताड़पत्रों (Palm leaves) को चित्रकारी के योग्य बनाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती थी:
तैयारी: सबसे पहले ताड़ के पत्तों को लगभग एक महीने तक पानी में डुबोकर रखा जाता था। इसके बाद उन्हें पानी से निकालकर सुखाया जाता और शंख की मदद से रगड़कर चिकना किया जाता था। फिर इन्हें एक समान आयताकार आकार में काट लिया जाता था (सर्वोत्तम ताड़पत्रों को ‘श्रीतादा’ कहा जाता था)।
चित्रण प्रक्रिया: इन पत्रों पर पांच से सात पंक्तियां लिखने के बाद बीच का खाली स्थान चित्रकारी के लिए छोड़ दिया जाता था। रेखांकन से पहले पृष्ठभूमि में रंग भरा जाता था, उसके बाद आकृतियों में रंग भरे जाते थे।
मॉडलिंग: चित्र में उभार (3D प्रभाव या मॉडलिंग) लाने के लिए गहरे शेड और हाईलाइट का प्रयोग किया जाता था।
रेखांकन और रंग: अंत में काले या लाल रंग से आकृतियों की बाहरी रेखाएं खींची जाती थीं। रंगों के लिए पीले, सफेद, नीले, काजल से बने काले, सिंदूर से बने लाल और पीले-नीले को मिलाकर बने हरे रंग का उपयोग होता था।
3. ताड़पत्र पर बनाए गए जैन लघुचित्रों की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: ताड़पत्र पर निर्मित जैन लघुचित्रों की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है:
रंग-योजना और आँखें: इनकी सबसे प्रमुख पहचान चमकदार रंग-योजना और आँखों का कोणीय (angular) रेखांकन है।
बाहर निकली आँखें: मानव आकृतियों के चेहरे एक तरफ (प्रोफाइल) देखते हुए बनाए जाते हैं, लेकिन उनकी दूसरी आँख भी दिखाई देती है। ये लंबी आँखें चेहरे की बाहरी सीमा से बाहर निकली हुई चित्रित की जाती हैं।
पृष्ठभूमि: चित्रों की पृष्ठभूमि अधिकतर लाल रंग की होती है जिसमें सपाट रंग भरा जाता है।
ठोसपन: किनारों पर गहरे रंगों के प्रयोग से चित्रों में भारीपन या ठोसपन (volume) का आभास उत्पन्न किया जाता है।
गतिशीलता: आकृतियों के रेखांकन में बहुत अधिक लयात्मकता होती है जिसके कारण चित्र स्थिर होने के बावजूद गतिशील प्रतीत होते हैं।
4. ‘तोड़ी रागिनी’ का वर्णन कीजिए।
उत्तर: ‘तोड़ी रागिनी’ (1710 ईस्वी, प्रतापगढ़ शैली) राजस्थानी चित्रकला की रागमाला श्रृंखला का एक अत्यंत सुंदर चित्र है जो टेंपरा माध्यम में बनाया गया है। इस चित्र में तोड़ी रागिनी (एक स्त्री) को एक बहुत ही मनोरम और प्राकृतिक उपवन में एक वाद्ययंत्र (वीणा के समान) बजाते हुए दर्शाया गया है। संगीत की मधुर धुन से आकर्षित होकर दो हिरण उनके पास आ गए हैं और वे संगीत की लय पर पूरी तरह से मंत्रमुग्ध दिखाई दे रहे हैं। यह चित्र प्रकृति, मानव और पशुओं के बीच संगीत के माध्यम से बने एक सुंदर और काव्यात्मक संबंध को दर्शाता है।
5. ‘रागमाला’ क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: ‘रागमाला’ (जिसका शाब्दिक अर्थ है रागों की माला) भारतीय शास्त्रीय संगीत और चित्रकला का एक अनूठा संगम है। रागमाला चित्र, भारतीय शास्त्रीय संगीत की विभिन्न मनोदशाओं (moods), भावनाओं और ऋतुओं को व्यक्त करने वाले राग तथा रागिनियों का चाक्षुष (दृश्य) रूप हैं। इन चित्रों के माध्यम से कलाकार संगीत के स्वरों से उत्पन्न होने वाली भावनाओं (जैसे प्रेम, विरह, भक्ति आदि) को रंगों, आकृतियों और मानवीकृत रूपों (नायक-नायिका) के माध्यम से चित्रित करते हैं।
6. ‘तोड़ी रागिनी’ चित्रकला दिखने में कैसी है?
उत्तर: यह चित्रकला दिखने में अत्यंत संतुलित (highly balanced) और आकर्षक है। यद्यपि इसकी पृष्ठभूमि में सपाट रंग भरा गया है, फिर भी चित्र को देखने पर उसमें एक गहराई (depth) का स्पष्ट अनुभव होता है। चित्रकार ने चमकदार रंगों का इस्तेमाल किया है और चित्र के प्रभाव को और अधिक बढ़ाने के लिए स्त्री (रागिनी) के वस्त्रों तथा आसपास के पेड़ों पर महीन (छोटे-छोटे) बिंदुओं का बड़ी बारीकी से प्रयोग किया है। इस चित्र में उपस्थित मानवाकृति और पशु दोनों ही बहुत जीवंत और गतिशील (lively and dynamic) लगते हैं, जो एक गहरी गीतात्मक और भावनात्मक अनुभूति पैदा करते हैं।
7. जैन शैली की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: जैन शैली (मुख्यतः श्वेतांबर कल्पसूत्र चित्र) की विशेषताएँ बहुत स्पष्ट और पारम्परिक हैं:
(i) आकृतियों का बहुत ही कोणीय (angular) और तीखा रेखांकन।
(ii) चेहरे की बाहरी सीमा से बाहर की ओर निकली हुई लंबी आँखें इस शैली की सबसे बड़ी पहचान हैं।
(iii) प्रायः लाल रंग की सपाट पृष्ठभूमि का बहुतायत से प्रयोग।
(iv) चित्रों के बाहरी किनारों के पास गहरे रंगों का इस्तेमाल, जिससे आकृतियों में Bठोसता (Solidness) का आभास होता है।
(v) रेखाओं में गतिशीलता और एक लय (rhythm) होती है, जो चित्र को सजीव बनाती है।
8. ‘कल्पसूत्र’ चित्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर: 1509 ईस्वी का यह ‘कल्पसूत्र’ चित्र ताड़पत्र पर टेंपरा माध्यम से बनाया गया एक सचित्र पृष्ठ है। इसका आकार 8 x 22 सेंटीमीटर है।
इस पूरे चित्रित पृष्ठ को मुख्य रूप से दो खंडों (हिस्सों) में बाँटा गया है:
दाहिना खंड: चित्र के दाहिने हिस्से में एक देवता की आकृति है, जिसका शरीर तो मानव का है परंतु उसका सिर एक पशु (संभवतः हरिण या गाय) का है। यह देव आकृति अपने हाथों में एक नवजात शिशु को लिए हुए है।
बायां खंड: चित्र के बाएँ हिस्से में एक सुसज्जित पलंग पर एक रानी (माँ) को अपने नवजात शिशु के साथ लेटे हुए दर्शाया गया है।
9. सूचीबद्ध चित्र कल्पसूत्र क्या दर्शाता है?
उत्तर: यह विशिष्ट कल्पसूत्र चित्र मुख्य रूप से एक जैन तीर्थंकर के जन्म से संबंधित पवित्र कथा को प्रदर्शित करता है। जैन धर्मग्रंथों के अनुसार तीर्थंकरों के जन्म के समय देवी-देवताओं द्वारा कई चमत्कारिक घटनाएं की जाती हैं; यह चित्र उसी जन्म-कथा के दृश्यों (माँ के पास लेटा शिशु और देव द्वारा शिशु की सुरक्षा/स्थानांतरण) का प्रतीकात्मक चित्रण करता है।

