NIOS Class 12 Painting Chapter 5 मौर्य एवं उत्तर-मौर्यकला Solutions Hindi Medium As Per New Syllabus. to each chapter is provided in the list so that you can easily browse throughout different chapters NIOS Class 12 Painting Chapter 5 मौर्य एवं उत्तर-मौर्यकला Notes and select need one. NIOS Class 12 Painting Chapter 5 मौर्य एवं उत्तर-मौर्यकला Question Answers Download PDF. NIOS Study Material of Class 12 Painting Paper Code: 332.
NIOS Class 12 Painting Chapter 5 मौर्य एवं उत्तर-मौर्यकला
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मौर्य एवं उत्तर-मौर्यकला
Chapter: 5
| Part – 1: सिद्धांत |
| पाठगत प्रश्न 5.1 |
1. सुमेलित कीजिए:
| 1. चँवरधारिणी यक्षिणी | (क) मोड़ और प्लेटें |
| 2. मेखला | (ख) सिरबंध |
| 3. आभूषण | (ग) बालू पत्थर |
उत्तर:
| 1. चँवरधारिणी यक्षिणी | (ग) बालू पत्थर |
| 2. मेखला | (क) मोड़ और प्लेटें |
| 3. आभूषण | (ख) सिरबंध |
| पाठगत प्रश्न 5.2 |
A. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:
1. हाथ में पिंजरा लिए यक्षिणी की मूर्ति —————— से बनी है।
उत्तर: हाथ में पिंजरा लिए यक्षिणी की मूर्ति लाल बालूरेत (लाल बलुआ पत्थर) से बनी है।
2. पतली छैनी द्वारा पत्थर की ——————- की जाती है।
उत्तर: पतली छैनी द्वारा पत्थर की नक्काशी की जाती है।
| पाठगत प्रश्न 5.3 |
1. खड़े हुए बुद्ध की मूर्ति का निर्माण काल क्या है?
उत्तर: इस मूर्ति का निर्माण काल दूसरी शताब्दी ईसवी (गांधार काल) है।
2. मानव आकृति में अंकन से पहले बुद्ध को किन रूपों में दर्शाया जाता था?
उत्तर: गांधार कला के अस्तित्व में आने से पूर्व, बुद्ध को मानव रूप में नहीं दर्शाया जाता था। इनकी उपस्थिति को केवल प्रतीकों के माध्यम से दिखाया जाता था जैसे— वृषभ, गज (हाथी), अश्व, अवक्ष, बोधिसत्व, छत्र, और स्तूप।
| पाठांत प्रश्न |
1. मौर्यकाल और उत्तर-मौर्यकालीन मूर्तिकला की विषयवस्तु का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर: मौर्यकाल की विषयवस्तु: इस काल में मूर्तिकला अपने चरम पर थी। इस समय की विषयवस्तु में मुख्य रूप से नर-नारी, विभिन्न देवी-देवताओं, राजाओं, वनस्पति, पशुओं तथा पक्षियों का चित्रण शामिल था। इन मूर्तियों में शारीरिक भाव-अभिव्यक्ति, सुंदरता और सुडौलपन पर विशेष जोर दिया गया और इन पर एक खास प्रकार की चमक (पॉलिश) होती थी। उत्तर-मौर्यकाल की विषयवस्तु: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शुंग, कुषाण और सातवाहन काल में मूर्तिकला का विकास हुआ। इस काल की विषयवस्तु मुख्य रूप से बौद्ध, जैन और ब्राह्मणवादी (हिंदू) धर्मों पर केंद्रित हो गई थी। इसमें बुद्ध, बोधिसत्व, जातक कथाओं के प्रसंगों के साथ-साथ हिंदू देवी-देवताओं (जैसे विष्णु, सूर्य, कुबेर, नाग) और सुंदर स्त्री आकृतियों (यक्षिणी, अप्सराओं) का व्यापक निर्माण किया गया।
2. मौर्यकाल की मूर्तिकला की विषयवस्तु, कुषाणकाल और गांधार की मूर्तिकला से कैसे भिन्न थी?
उत्तर: मौर्यकाल: इसमें मुख्य रूप से स्वतंत्र खड़ी हुई विशालकाय यक्ष-यक्षिणी और पशुओं की मूर्तियां गढ़ी गईं। इनमें शारीरिक बल (बलिष्ठता) और एक अत्यधिक चमकदार पॉलिश (जो धातु जैसी दिखती थी) सबसे बड़ी विशेषता थी।
गांधार कला: इसकी विषयवस्तु पूरी तरह से बौद्ध धर्म तक सीमित थी। इसमें यूनानी (ग्रीक) और रोमन कला का प्रभाव था, जिसके कारण बुद्ध को विदेशी देवताओं जैसा रूप दिया गया।
कुषाण (मथुरा) कला: कुषाण काल की विषयवस्तु सबसे अधिक विविधतापूर्ण थी। इसमें हिन्दू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों की मूर्तियां बनाई गईं। मूर्तिकारों ने वनस्पति और पशु-पक्षियों के साथ गतिशील, सुडौल और कामुक महिला आकृतियों (यक्षिणी, शालभंजिका) को गढ़ने में विशेष रुचि दिखाई, जो भारतीय सौंदर्य से प्रेरित थी।
3. गांधार और कुषाण मूर्तिकला में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इन दोनों शैलियों में निम्नलिखित स्पष्ट अंतर हैं:
शैली और प्रभाव: गांधार कला में यूनानी (ग्रीक) और रोमन परंपराओं का गहरा मिश्रण था, जबकि कुषाण (मथुरा) कला पूरी तरह से स्वदेशी (भारतीय) परंपरा और लोक-कला पर आधारित थी।
विषय-वस्तु: गांधार में केवल बुद्ध, बोधिसत्व और जातक कथाओं से जुड़ी मूर्तियां बनीं। वहीं कुषाण कला में जैन तीर्थंकरों, हिंदू देवताओं (विष्णु, कुबेर आदि) और बौद्ध धर्म तीनों की मूर्तियां लाल बलुआ पत्थर पर बनीं।
शारीरिक बनावट: गांधार कला में बुद्ध को ग्रीक देवता ‘अपोलो’ के आदर्श पर गढ़ा गया, जिसमें भारी आभूषण, घुंघराले बाल और कपड़ों की गहरी सिलवटें दर्शाई गईं। कुषाण कला में मूर्तियों (विशेषकर यक्षिणियों) को अधिक कामुक, क्षीण कटि(पतली कमर) और भारी आभूषणों के साथ भारतीय सौंदर्यशास्त्र के अनुसार उकेरा गया।
4. चँवरधारिणी यक्षी की प्रतिमा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: यह मौर्यकाल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) की सबसे उत्कृष्ट आदमकद (162.2 सेमी) प्रतिमा है, जो दीदारगंज (पटना) से प्राप्त हुई थी।
शारीरिक संरचना: बलुआ पत्थर से बनी यह मूर्ति शारीरिक अनुपात, उन्नत उरोज, लचीली कमर और मांसपेशियों की लोच का बेहतरीन नमूना है।
वस्त्र और आभूषण: यह स्पष्ट रूप से एक शाही सेविका (परिचारिका) की मूर्ति है जिसने दाहिने हाथ में चँवर पकड़ा है (बायां हाथ खंडित है)। इसके माथे पर सिरबंध, कानों में भारी बालियां, गले में लंबा हार और कमर में पांच लड़ियों वाली करधनी (मेखला) है।
विशिष्टता: इस मूर्ति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अत्यंत चमकदार पॉलिश है, जो पत्थर पर भी धातु (Metal) जैसी चमक पैदा करती है और इसे विश्वभर में प्रसिद्ध बनाती है।
5. “गांधार मूर्तिकला की आत्मा भारतीय और शैली विदेशी थी” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह कथन पूरी तरह सत्य है। गांधार कला की ‘आत्मा’ भारतीय थी क्योंकि इसका मूल विषय पूरी तरह से भारतीय था—अर्थात बुद्ध का जीवन, बोधिसत्व और जातक कथाएं। किंतु, इसे बनाने का तरीका या ‘शैली’ विदेशी (यूनानी और रोमन) थी। इसका प्रमाण यह है कि बुद्ध की मूर्तियों को भारतीय योगियों की बजाय यूनानी सूर्य देवता ‘अपोलो’ की तरह गढ़ा गया। मूर्तियों में बोधिसत्वों को इतने अधिक आभूषण पहनाए गए कि वे बौद्ध भिक्षु कम और यूनानी सम्राट अधिक लगते थे। साथ ही, घुंघराले बाल, और वस्त्रों में गहरी सिलवटें दिखाना पूरी तरह से विदेशी कला का प्रभाव था।
6. “पिंजरा हाथ में लिए यक्षिणी” के बनाने की प्रक्रिया लिखिए।
उत्तर: मूर्तिकारों द्वारा इस मूर्ति को तराशने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया अपनाई गई थी:
रेखांकन: सर्वप्रथम उचित पत्थर चुनकर उस पर डिजाइन (प्रारूप) के अनुसार रेखांकन किया जाता है।
प्रारंभिक कटाई: इसके बाद एक मोटी छैनी की मदद से पत्थर के फालतू हिस्से को मोटे तौर पर काटकर एक मूल ढांचा तैयार किया जाता है।
बारीक नक्काशी: ढांचा बन जाने के बाद, पतली छैनी की सहायता से बहुत ही ध्यानपूर्वक हर बारीक हिस्से (जैसे आभूषण, उंगलियां) की नक्काशी की जाती है।
पॉलिशिंग: अंत में, मूर्ति की सतह के खुरदरेपन को सपाट करने के लिए उसे भिन्न-भिन्न प्रकार के पत्थरों से रगड़कर चिकना और चमकदार बनाया जाता है।
7. सौंदर्य के दृष्टिकोण से खड़े बुद्ध की प्रतिमा पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: गांधार कला (दूसरी शताब्दी ईसवी) के अंतर्गत सलेटी बालू पत्थर से बनी यह 250 सेमी ऊँची प्रतिमा सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण है।
मुखमंडल और बाल: बुद्ध के बाल ग्रीक शैली में घुंघराले हैं और ऊपर की ओर जूड़ा (उष्णीष) बंधा है। उनके आधे खुले नेत्र और चेहरे पर छाई शांति, माधुर्य और चमक एक गहरा आध्यात्मिक प्रभाव पैदा करती है।
वस्त्र और शारीरिक चित्रण: शरीर की मांसपेशियों का अंकन बहुत यथार्थवादी है। बुद्ध के शरीर पर एक बड़ी चादर जैसा वस्त्र है, जिसमें गहरी रेखाओं से सिलवटों को बहुत ही सुंदरता से उकेरा गया है।
आध्यात्मिकता: लंबे कान और सिर के पीछे बना विस्तृत ‘प्रभामंडल (Halo)’ इसे लौकिक सौंदर्य के साथ-साथ ईश्वरीय दिव्यता भी प्रदान करता है।
8. पिंजरा हाथ में यक्षिणी का प्राप्ति स्थल क्या है?
उत्तर: “पिंजरा हाथ में लिए यक्षिणी” की यह सुंदर प्रतिमा कुषाण काल में मथुरा से प्राप्त हुई थी (वर्तमान में यह राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में है)।
9. गांधार कला की विशेषताएं लिखिए।
उत्तर: गांधार कला की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
(i) यह भारतीय विषयवस्तु (बौद्ध धर्म) और ग्रीक-रोमन शैली का उत्कृष्ट मिश्रण थी।
(ii) आध्यात्मिक दिव्यता दर्शाने के लिए सिर के पीछे ‘प्रभामंडल’ (Halo) का प्रयोग इसी शैली की महत्वपूर्ण देन है।
(iii) मूर्तियों में बुद्ध को यूनानी देवता अपोलो के रूप में गढ़ा गया, जिसमें घुंघराले बालों को प्रमुखता दी गई।
(iv) मूर्तियों में वस्त्रों की सिलवटों (Folds) का बहुत ही गहरा और सूक्ष्म अंकन किया गया और बोधिसत्वों को भारी आभूषणों से लादा गया।
10. खड़े हुए बुद्ध के हाथों के विषय में लिखिए।
उत्तर: खड़े हुए बुद्ध की इस प्रतिमा में उनके हाथों की स्थिति विशिष्ट है। मूर्ति का दाहिना हाथ टूटा हुआ (खंडित) है। वहीं, इनका बायां हाथ नीचे की तरफ है, जिसमें उंगलियों का बहुत ही सूक्ष्म और बारीक नक्काशी के साथ अंकन किया गया है।

