NIOS Class 12 Painting Chapter 4 सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला

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NIOS Class 12 Painting Chapter 4 सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला

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Chapter: 4

Part – 1: सिद्धांत
पाठगत प्रश्न 4.1

1. योगी आवक्ष की मूर्ति किससे बनी है? 

उत्तर: योगी आवक्ष की मूर्ति बहुत ही मुलायम ‘सेलखड़ी पत्थर’ (Steatite Stone) को तराश कर बनाई गई है।

2. योगी आवक्ष मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई? 

उत्तर: यह विशिष्ट मूर्ति मोहनजोदड़ो के गढ़ी वाले टीले (Citadel) की सबसे ऊपरी सतह (अंतिम परत) से खुदाई के दौरान प्राप्त हुई है।

3. योगी की भुजा पर कौन-सा आभूषण है? 

उत्तर: योगी के माथे और दाएँ हाथ की भुजा पर आभूषण हैं, विशेष रूप से उसकी दाएँ हाथ की भुजा पर एक ‘भुजबंद’ (Armband) बंधा हुआ है।

पाठागत प्रश्न 4.2

1. ‘नर्तकी’ मूर्तिशिल्प कहाँ संग्रहित है? 

उत्तर: सिंधु सभ्यता की यह विश्व प्रसिद्ध कांस्य मूर्ति वर्तमान में नई दिल्ली के ‘नेशनल म्यूजियम’ (राष्ट्रीय संग्रहालय) में सुरक्षित रखी गई है।

2. ‘नर्तकी’ मूर्ति किस माध्यम में बनी है? 

उत्तर: यह मूर्ति कांसे (Bronze) धातु का उपयोग करके बनाई गई है।

3. ‘नर्तकी’ मूर्ति को ढालने में किस तकनीक का उपयोग किया गया है? 

उत्तर: इसे ढालने में ‘लॉस्ट-वैक्स’ (Lost-wax) ढलाई तकनीक का उपयोग किया गया है, जिसमें मोम की मूर्ति बनाकर उसे मिट्टी से कवर किया जाता था और फिर पिघलाकर निकाल लिया जाता था।

पाठागत प्रश्न 4.3

A. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

1. मातृदेवी की मूर्ति को बनाने के लिए ___________ का उपयोग किया गया है। 

उत्तर: मातृदेवी की मूर्ति को बनाने के लिए टेराकोटा (Terracotta – आग में पकाई गई मिट्टी) का उपयोग किया गया है।

2. मातृदेवी मूर्ति ___________ से प्राप्त हुई। 

उत्तर: मातृदेवी की यह सुंदर मूर्ति मोहनजोदड़ो के पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुई है।

पाठांत प्रश्न

1. सिंधु घाटी सभ्यता में निर्मित मूर्तियों की तकनीक और विधि का वर्णन कीजिए। 

उत्तर: सिंधु घाटी सभ्यता में मूर्तियों के निर्माण के लिए मुख्य रूप से तीन माध्यमों का प्रयोग होता था: पत्थर, धातु और मिट्टी। 

प्रत्येक की तकनीक भिन्न थी:

पत्थर की मूर्तियां: सेलखड़ी (Steatite) जैसे मुलायम पत्थर का उपयोग होता था। कलाकार इसे नुकीले पत्थर, हड्डी या तांबे/कांसे के औजारों से धीरे-धीरे खुरचकर और खोदकर मूर्तियां बनाते थे।

धातु की मूर्तियां (लॉस्ट-वैक्स तकनीक): धातु ढलाई के लिए ‘लॉस्ट-वैक्स’ (Lost-wax) तकनीक का उपयोग किया जाता था। इसमें पहले मोम से मूर्ति तैयार की जाती थी और उस पर मिट्टी तथा गोबर का लेप लगाकर सुखाया जाता था। इसके बाद इसे गर्म करके मोम पिघलाकर निकाल लिया जाता था और उस खाली स्थान पर पिघली हुई धातु (जैसे कांसा) डाल दी जाती थी। धातु के ठंडे होने पर मिट्टी का ढांचा तोड़कर मूर्ति प्राप्त कर ली जाती थी।

मिट्टी की मूर्तियां (टेराकोटा तकनीक): इन्हें हाथों से आकार दिया जाता था। आंखें और स्तन मिट्टी की गोलियों से चिपकाए जाते थे, तथा उंगलियों से दबाकर नाक का आकार बनाया जाता था। सूखने के बाद इन्हें भट्ठी में पकाया जाता था, जिससे इनका रंग लाल हो जाता था। इस विधि को टेराकोटा कहा जाता है।

2. सिंधु घाटी सभ्यता में मूर्तियों की विषयवस्तु के बारे में आप क्या जानते हैं? उल्लेख कीजिए। 

उत्तर: सिंधु घाटी सभ्यता में निर्मित मूर्तियों की विषयवस्तु अत्यंत व्यापक और विविध थी। मिट्टी की मूर्तियों में मुख्य रूप से मानव आकृतियाँ, पशु मूर्तियाँ और बच्चों के खिलौने बहुतायत में बनाए जाते थे। इसके अतिरिक्त, मुद्राओं, मुहरों और आभूषणों पर भी मानवीय आकृतियों, पशु-पक्षियों तथा दैनिक जीवन से संबंधित दृश्यों का बहुत ही कलात्मक ढंग से चित्रण किया गया था। धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से मातृदेवी, योगी/पुरोहित और नर्तकी जैसी आकृतियां इनकी प्रमुख विषयवस्तु थीं।

3. योगी की आवक्ष मूर्ति का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए। 

उत्तर: ‘योगी की आवक्ष मूर्ति’ मोहनजोदड़ो के गढ़ी वाले टीले की ऊपरी सतह से प्राप्त हुई है। यह 14.5 × 11 सेंटीमीटर आकार की है और मुलायम सेलखड़ी (Steatite) पत्थर से तराश कर बनाई गई है। इस मूर्ति का केश-विन्यास बहुत आकर्षक है, जिसमें बाल सलीके से संवारे गए हैं और पीछे की ओर फीते से बंधे हैं। दाढ़ी बहुत सलीके से तराशी गई है और आंखें आधी झुकी हुई हैं जो ध्यान या योग की मुद्रा को दर्शाती हैं। माथा छोटा है और गर्दन सामान्य से अधिक मोटी है। योगी ने जो उत्तरीय (वस्त्र) पहना है, उस पर बहुत सुंदर ‘त्रिफुलिया’ (Trefoil) डिजाइन बना है, जो प्राचीन मेसोपोटामिया आदि में पुजारियों द्वारा पहना जाता था। उसके दाएं हाथ पर एक भुजबंद भी है, जो दर्शाता है कि यह किसी कुलीन व्यक्ति या पुरोहित की मूर्ति है।

4. नर्तकी की कांस्य मूर्ति का विवरण लिखिए। 

उत्तर: ‘नर्तकी’ की मूर्ति मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे की बनी एक उत्कृष्ट प्रतिमा है, जिसका निर्माण लगभग 2500 ईसा पूर्व में हुआ था। यह मूर्ति मात्र 4.2 सेंटीमीटर लंबी है और इसे ‘लॉस्ट-वैक्स’ तकनीक से ढाला गया है। इस मूर्ति में एक आदिवासी नारी को यथार्थवादी ढंग से ‘त्रिभंगी’ (Tribhanga) मुद्रा में खड़ा दिखाया गया है। उसके शरीर के अंग छरहरे और लंबे हैं। सिर एक तरफ झुका हुआ है, होंठ मोटे और नाक चपटी है, तथा घुंघराले बालों को पीछे एक जूड़े में बांधा गया है। उसने गले में पेंडेंट वाला हार पहना हुआ है। यह मूर्ति अपनी गतिशीलता के लिए जानी जाती है, जो ऐसा प्रतीत होता है मानो नर्तकी नृत्य के बाद थोड़ा आराम कर रही हो और आगे के नृत्य के बारे में सोच रही हो।

5. मातृदेवी की प्रतिमाओं के महत्व का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर: मातृदेवी की मूर्तियां सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों के धार्मिक जीवन और मान्यताओं में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। ये दर्शाती हैं कि उस काल में मातृ-पूजा का विशेष प्रचलन था। इसका संबंध संभवतः लोगों की आजीविका और कृषि से था, जहाँ धरती माता को ‘पोषण करने वाली देवी’ के रूप में पूजा जाता था। इसी धार्मिक मान्यता ने आगे चलकर भारतीय संस्कृति में शक्ति देवी, मातृ देवी और ग्राम देवी की पूजा की परंपरा की नींव रखी।

6. मातृदेवी की मूर्तियों का उपयोग लिखिए। 

उत्तर: मातृदेवी की मूर्तियों का उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक पूजा-पाठ और ‘मन्नत’ (Votive offerings) मांगने के लिए किया जाता था। मूर्ति के सिर पर पंखों के आकार का मुकुट बना है, जिसके दोनों ओर कटोरियां जुड़ी हुई हैं। इन कटोरियों में कालिख के निशान मिले हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इनका उपयोग दीपक (Lamp) के रूप में या अगरबत्ती जलाने के लिए किया जाता था।

7. मातृदेवी की मूर्तियों के आधार पर अन्य सभ्यताओं से क्या समानता ढूँढी जा सकती है? 

उत्तर: मातृदेवी की मूर्तियों के आधार पर प्राचीन काल की अन्य सभ्यताओं, विशेष रूप से ‘मेसोपोटामिया’ (Mesopotamia) के साथ समानता ढूँढी जा सकती है। सिंधु घाटी की तरह मेसोपोटामिया की सभ्यता में भी मातृ-पूजन का व्यापक प्रचलन था, जो यह सिद्ध करता है कि प्राचीन सभ्यताओं में धरती माता या मातृदेवी की उपासना एक साझा और महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यता थी।

8. ‘नर्तकी’ के दाएँ और बाएँ हाथ के आभूषणों में अंतर लिखिए। 

उत्तर: नर्तकी की मूर्ति के दोनों हाथों के आभूषणों में बड़ा अंतर है। उसकी दाईं भुजा में केवल दो चूड़ियाँ दिखाई गई हैं। इसके विपरीत, उसकी बाईं भुजा कलाई से लेकर कंधे तक पूरी तरह से चूड़ियों से भरी हुई है।

9. ‘नर्तकी’ की मूर्ति के बारे में अपने शब्दों में टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर: कांसे से बनी ‘नर्तकी’ की यह मूर्ति सिंधु घाटी सभ्यता के कलाकारों की उच्च कोटि की तकनीकी क्षमता और कलात्मक दृष्टि का बेहतरीन उदाहरण है। यद्यपि यह मूर्ति आकार में बहुत छोटी है, फिर भी इसमें गजब का शारीरिक संतुलन, गतिशीलता और यथार्थवाद झलकता है। लॉस्ट-वैक्स ढलाई तकनीक से बनी यह प्रतिमा अपने लंबे अंगों, स्फूर्ति और हाव-भाव के कारण अत्यंत सजीव प्रतीत होती है। यह मूर्ति इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उस युग के मूर्तिकार धातु-शिल्प में पूरी तरह पारंगत थे।

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