NIOS Class 10 Indian Culture and Heritage Chapter 21 भारतीय संस्कृति का विदेश में प्रसार

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NIOS Class 10 Indian Culture and Heritage Chapter 21 भारतीय संस्कृति का विदेश में प्रसार

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Chapter: 21

पाठगत प्रश्न 21.1

1. हमारी संस्कृति का विदेश में किसने प्रसार किया?

उत्तर: हमारी संस्कृति का विदेश में प्रसार व्यापारियों, शिक्षकों, राजदूतों और धर्म प्रचारकों ने किया। प्राचीन काल में भारतीय व्यापारियों ने ‘संस्कृति-दूत’ की भूमिका निभाई और जहाँ भी वे गए, वहां सांस्कृतिक संबंध स्थापित किए।

2. चीनी तीर्थयात्री हयूनसांग ने कौन से दो विश्विद्यालयों में यात्रा की?

उत्तर: चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) ने पूर्व में नालंदा और पश्चिम में वल्लभी विश्वविद्यालयों में यात्रा की। उन्होंने उन सभी विश्वविद्यालयों का विस्तार से वर्णन किया है जहाँ वे गए या अध्ययन किया।

3. विक्रमशिला विश्वविद्यालय का किस तिब्बती आचार्य ने वर्णन किया है?

उत्तर: विक्रमशिला विश्वविद्यालय का विस्तृत वर्णन तिब्बती विद्वान तारानाथ ने किया है।

4. सन् 67 ई. के दौरान किन दो आचार्यों ने चीन की यात्रा की?

उत्तर: सन् 67 ई. में चीनी सम्राट के निमंत्रण पर कश्यप मातंग और धर्मरक्षित नामक दो भारतीय आचार्यों ने चीन की यात्रा की।

5. आचार्य कुमारजीव चीन क्यों गए थे?

उत्तर: आचार्य कुमारजीव चीनी सम्राट के अनुरोध पर संस्कृत ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद करने के लिए चीन गए थे।

6. प्राचीन काल में जिप्सी कौन थे?

उत्तर: प्राचीन काल में जिप्सी वे भारतीय समूह थे जो भारत से घूमते-घूमते यूरोप के अनेक देशों में जा बसे थे। वे स्वयं को ‘रोम’ कहते थे और उनकी भाषा ‘रोमानी’ थी, परन्तु यूरोप में उन्हें ‘जिप्सी’ कहा जाता था।

पाठगत प्रश्न 21.2

1. चीन मार्ग को रेशम मार्ग क्यों कहा जाता है?

उत्तर: चीन मार्ग को ‘रेशम मार्ग’ qइसलिए कहा जाता है क्योंकि चीन से इस मार्ग के द्वारा रेशम का व्यापार किया जाता था। प्राचीन काल में चीन का मुख्य व्यापार मूल्यवान रेशम का था, इसी कारण इस मार्ग का यह नाम पड़ा।

2. कुची कहां है? यह क्यों प्रसिद्ध है?

उत्तर: कुची मध्य एशिया में स्थित एक राज्य था,। यह इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यह भारतीय संस्कृति का एक प्रसिद्ध केंद्र था और यहाँ से रेशम मार्ग दो भागों (उत्तरी और दक्षिणी) में विभाजित हो जाता था।

3. पहली सदी में एक ओर चीनी भाषा में खुदे हुए और दूसरी ओर खरोष्टी लिपि में प्रकृति लिखे सिक्के कहाँ प्राप्त हुए?

उत्तर: ऐसे सिक्के खोतान में प्राप्त हुए हैं,। यहाँ रेत के अंदर दबे मठों की खुदाई और प्राप्त सिक्कों से पता चलता है कि खोतान की मिश्रित संस्कृति थी।

4. दुन हुआंग, युन कांग और लुंग-मेन क्या थे?

उत्तर: दुन-हुआंग, युन-कांग और लुंग-मेन दुनिया के सुप्रसिद्ध गुफा परिसर हैं, जहाँ चट्टानों को काटकर विशालकाय मूर्तियां और अद्भुत चित्रकारी की गई है।

5. कोरिया में ‘ध्यान-योग’ दर्शन कब पहुंचा?

उत्तर: कोरिया में ‘ध्यान-योग’ दर्शन भारत से आठवीं और नौवीं शताब्दी के बीच पहुंचा।

6. जापान में भारतीय संस्कृति कैसे पहुंची?

उत्तर: जापान में भारतीय संस्कृति कोरिया के माध्यम से पहुंची। सन् 552 ई. में कोरिया के सम्राट ने जापानी सम्राट के लिए बौद्ध मूर्तियां, सूत्र, पूजा सामग्री, और कलाकारों को भेंट स्वरूप भेजा था, जिससे वहां भारतीय संस्कृति का प्रवेश हुआ।

7. जापान में ‘शित्तन’ क्या है?

उत्तर: जापान में जिस लिपि में संस्कृत मंत्र लिखे जाते थे, उसे ‘शित्तन’ कहा जाता है। ‘शित्तन’ वास्तव में ‘सिद्धम्’ का ही दूसरा रूप है, जिसका अर्थ है ऐसी लिपि जो सिद्धि देती है।

8. ईशा पश्चात् सातवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी के बीच संस्कृत भाषा की कितनी पुस्तकों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया गया?

उत्तर: इस अवधि के दौरान 96,000 (छियानवे हजार) संस्कृत ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया गया।

पाठगत प्रश्न 21.3

1. श्रीलंका के प्रथम दो मठों के नाम बतायें।

उत्तर: श्रीलंका के प्रथम दो मठों के नाम महाविहार और अभयगिरि हैं।

2. बौद्ध धर्म श्रीलंका कैसे पहुँचा?

उत्तर: सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को अन्य विद्वानों के साथ बौद्ध धर्म के संदेशों और बोधिवृक्ष की एक शाखा के साथ श्रीलंका भेजा, जिससे वहां बौद्ध धर्म पहुँचा।

3. कौन सी भाषा श्रीलंका की साहित्य की भाषा बनी?

उत्तर: पालि भाषा श्रीलंका की साहित्य की भाषा बनी।

4. ‘अंकोर वाट’ क्या है?

उत्तर: ‘अंकोर वाट’ कंबोडिया में स्थित संसार का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर है (जिसे विष्णु का आवास माना जाता है)।

5. ‘अंकोर वाट’ के पांच शिखर क्या कहलाते हैं?

उत्तर: ‘अंकोर वाट’ के पांच शिखर सुमेरु पर्वत के पांच शिखर माने जाते हैं।

6. ‘अंकोर वाट’ में क्या चित्रित है और क्यों?

उत्तर: अंकोर वाट में वहां के राजा सूर्यवर्मन को विष्णु के रूप में चित्रित (मूर्तिमान) किया गया है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि माना जाता है कि राजा अपने पुण्य-कार्यों के कारण विष्णुलोक चले गए थे।

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