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NCERT Class 9 Hindi Chapter 10 भारति, जय, विजयकरे!
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भारति, जय, विजयकरे!
Chapter: 10
| काव्य खंड |
| अभ्यास |
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
1. “भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से—
(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।
(ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।
(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।
उत्तर: (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
कारण: इस कविता में भारतभूमि को ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ कहकर इसकी कृषि-परंपरा (संपन्नता) और ज्ञान के सौंदर्य को दर्शाया गया है। इसके साथ ही हिमालय, गंगा, वनस्पति और सागर जैसी प्राकृतिक शोभा का भी बहुत सुंदर ढंग से चित्रण किया गया है।
2. “कनक-शस्य-कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है—
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता।
(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य।
(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता।
(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास।
उत्तर: (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता।
कारण: व्याकरण खंड के अनुसार ‘कनक-शस्य’ का अर्थ होता है— कनक के समान शस्य अर्थात् सोने जैसी फसलें। यह भारत की समृद्ध कृषि-परंपरा और उसकी अपार धन-धान्य संपन्नता का प्रतीक है।
3. समस्त विश्व में भारत के महत्त्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—
(क) गंगा ज्योतिर्मय-कण/धवल धार हार गले।
(ख) गर्जितोर्मि सागर-जल/धोता शुचि चरण युगल।
(ग) भारति, जय, विजयकरे/कनक-शस्य-कमलधरे!
(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/शतमुख-शतरव-मुखरे!
उत्तर: (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/शतमुख-शतरव-मुखरे!
कारण: कविता के भावार्थ में स्पष्ट किया गया है कि भारत एक चेतन सत्ता है, जिसकी दिशाओं में ‘ओंकार’ की गूँज हो रही है और जो अनेक तरह के स्वरों और विचारों (शतमुख-शतरव) से समृद्ध है। दिशाओं का गुंजायमान होना पूरे विश्व में भारत के ज्ञान और वैचारिक महत्त्व के उद्घोष (घोषणा) को ही दर्शाता है।
4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
(क) सरल, बोल-चाल की भाषा।
(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त।
(ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण।
(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक।
उत्तर: (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त।
कारण: पाठ्यपुस्तक में कविता के सौंदर्य और खोजबीन के अंतर्गत स्पष्ट रूप से बताया गया है कि यह कविता संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग और सामासिक पदों (समस्त पद) से युक्त है। ‘कनक-शस्य-कमलधरे’, ‘शतदल’, ‘ज्योतिर्जल’ जैसे शब्द इसके सटीक उदाहरण हैं।
5. भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक।
(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम।
(ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक।
(घ) सामाजिक और राजनीतिक।
उत्तर: (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक।
कारण: कवि ने नदी (गंगा), वन, और पुष्प (तरु-तृण-वन-लता) जैसी प्राकृतिक शोभा को भारत माता के वस्त्राभूषण (कपड़े और गहने) की तरह प्रस्तुत किया है। प्रकृति को माता के शृंगार के रूप में देखना हमारी ‘सांस्कृतिक’ धरोहर है, और वन-नदियों का यह उल्लेख ‘पर्यावरणीय’ महत्व (प्रकृति संरक्षण) के प्रति चेतना जगाता है।
अर्थ और भाव
1. नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए—
(क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!”
उत्तर: अर्थ: भारत माता के पैरों के नीचे (पदतल) स्थित लंका एक खिले हुए कमल (शतदल) के समान सुशोभित है। विशाल समुद्र अपनी गरजती हुई लहरों (गर्जितोर्मि) से भारत माता के दोनों पवित्र चरणों (शुचि चरण युगल) को धोता (पखारता) है।
भाव: इन पंक्तियों में कवि ने भारत की भौगोलिक सुंदरता का अद्भुत मानवीकरण किया है। कवि भारत को केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक साक्षात देवी के रूप में देखते हैं, जिसके चरणों में स्वयं महासागर नतमस्तक होकर जल चढ़ाता है। यह दृश्य भारतभूमि की प्राकृतिक भव्यता और उसके प्रति कवि की गहरी श्रद्धा व देशप्रेम को दर्शाता है।
(ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”
उत्तर: अर्थ: भारत माता के प्राणों में ‘ओंकार’ (ओम) का पवित्र मंत्र बसा हुआ है, जिसकी गूँज से चारों उदार दिशाएँ झंकृत हो रही हैं। यहाँ एक साथ सैकड़ों मुखों से सैकड़ों प्रकार के स्वर और ध्वनियाँ (शतमुख-शतरव) गूँज रही हैं।
भाव: इसका भाव यह है कि भारत एक जागृत और चेतन सत्ता है, जिसकी रग-रग में आध्यात्मिकता और ज्ञान का वास है। ‘ओंकार’ की गूँज भारत की गहरी आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है, वहीं ‘सैकड़ों मुखों और स्वरों’ की गूँज इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत विभिन्न विचारों, भाषाओं और संस्कृतियों से समृद्ध देश है। यहाँ अनेकता में एकता और विचारों की स्वतंत्रता का उद्घोष होता है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
उत्तर: इस कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की देशप्रेम, राष्ट्रीयता और मातृभूमि के प्रति गहरी श्रद्धा की भावना व्यक्त हुई है। कवि कविता के आरंभ में ही ‘भारत, जय, विजयकरे!’ कहकर भारत माता के गौरवगान और उसे पूरे विश्व में विजयश्री प्राप्त करने की हृदय से कामना करता है।
2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तर: कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सजीव और मानवीकृत रूप में वर्णन किया गया है। कवि ने भारतभूमि को एक साक्षात देवी के रूप में चित्रित किया है, जिसके पवित्र चरणों को स्वयं समुद्र अपनी गरजती लहरों से धोता है। हिमालय को उनके सिर का चमचमाता श्वेत मुकुट, गंगा की निर्मल धारा को गले का हार, और पेड़-पौधों, घास तथा लताओं को भारत माता के वस्त्राभूषण (कपड़े) की तरह प्रस्तुत किया गया है।
हाँ, मैं पूरी तरह मानता हूँ कि प्रकृति का संरक्षण करना भी सच्चे देशप्रेम का ही एक काम है। इसका कारण यह है कि प्रकृति—जैसे हमारे जंगल, नदियाँ, पहाड़ और वनस्पति—हमारी भारत माता का ही भौतिक स्वरूप और उनका शृंगार हैं। यदि हम अपने पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हैं, तो हम प्रत्यक्ष रूप से अपनी मातृभूमि की पर्यावरणीय और सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान और उसकी रक्षा कर रहे होते हैं।
3. “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तर: “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारत की दो प्रमुख विशेषताओं की ओर संकेत करती है:
(i) हमारी कृषि-परंपरा और अपार भौतिक समृद्धि, क्योंकि ‘कनक-शस्य’ का अर्थ है सोने जैसी कीमती और लहलहाती फसलें।
(ii) ज्ञान और संस्कृति का सौंदर्य, जिसका प्रतीक ‘कमलधरे’ (कमल को धारण करने वाली) है। कुल मिलाकर यह पंक्ति भारत की कृषि संपन्नता और उसके आध्यात्मिक व वैचारिक सौंदर्य को दर्शाती है।
4. “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तर: भौगोलिक दृष्टि से हिमालय भारत के सबसे ऊपरी हिस्से (मस्तक) पर स्थित है। हमेशा बर्फ (हिम-तुषार) से ढके रहने के कारण इसकी सफेद और चमचमाती चोटियाँ किसी उज्ज्वल मुकुट जैसी दिखती हैं। कवि ने अपनी अद्भुत कल्पना के बल पर हिमालय को भारत माता के मुकुट का रूप दे दिया है, जिससे भारत की पूरी छवि अत्यंत भव्य, दिव्य और गौरवशाली बन जाती है।
विद्या से संवाद
कविता का सौंदर्य
1. नीचे दी गई पंक्तियों को पढ़िए —
“भारत, जय, विजयकरे!
कनक-शस्य-कमलधरे!”
इन पंक्तियों में कवि ने चित्रात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए भारतभूमि का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। इस कविता की कुछ अन्य विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता में से उन विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए—
| विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
| प्रकृति का मानवीकरण | |
| आलंकारिक प्रयोग | |
| समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग | |
| संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग |
उत्तर:
| विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
| प्रकृति का मानवीकरण | “गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!””तरु-तृण-वन-लता वसन” |
| आलंकारिक प्रयोग | “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” (रूपक अलंकार)”शतमुख-शतरव-मुखरे!” |
| समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग | “लंका पदतल शतदल””तरु-तृण-वन-लता वसन” |
| संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग | “प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार””गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल” |

