NCERT Class 11 Economics Chapter 6 रोजगार संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे Solutions Hindi Medium As Per New Syllabus. to each chapter is provided in the list so that you can easily browse through different chapters NCERT Class 11 Economics Chapter 6 रोजगार संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे Notes and select need one. NCERT Class 11 Economics Chapter 6 रोजगार संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे Question Answers Download PDF. NCERT Class 11 Economics Bharatiya Arthavyavastha ka Vikas Hindi Medium Solutions.
NCERT Class 11 Economics Chapter 6 रोजगार संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे
Also, you can read the NCERT book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Central Board of Secondary Education (CBSE) Book guidelines. CBSE Class 11 Economics Bharatiya Arthavyavastha ka Vikas Textual Solutions are part of All Subject Solutions. Here we have given NCERT Class 11 Economics Notes Hindi Medium, CBSE Class 11 Economics Bharatiya Arthavyavastha ka Vikas in Hindi Medium Solutions for All Chapters, You can practice these here.
रोजगार संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे
Chapter: 6
| भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास |
| अभ्यास |
1. श्रमिक किसे कहते हैं?
उत्तर: जो व्यक्ति वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन से संबंधित किसी आर्थिक गतिविधि में लगा होता है, उसे श्रमिक कहते हैं।
2. श्रमिक-जनसंख्या अनुपात की परिभाषा दें।
उत्तर: श्रमिक-जनसंख्या अनुपात का अर्थ यह है देश की कुल जनसंख्या का वह प्रतिशत जो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है। इसका आकलन देश में कार्य कर रहे सभी श्रमिकों की कुल संख्या को देश की कुल जनसंख्या से भाग देकर और उसे 100 से गुणा करके किया जाता है।
3. क्या ये भी श्रमिक हैं: एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर, एक जुआरी? क्यों?
उत्तर: नहीं, ये श्रमिक नहीं हैं। श्रमिक उन्हें माना जाता है जो किसी आर्थिक गतिविधि में भाग लेकर देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GDP/GNP) में सकारात्मक योगदान देते हैं। भिखारी, चोर, तस्कर और जुआरी का कार्य न तो कोई आर्थिक क्रिया है और न ही वे वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन में कोई योगदान दे रहे हैं, इसलिए उन्हें श्रमिक नहीं माना जाता।
4. इस समूह में कौन असंगत प्रतीत होता है:
(क) नाई की दुकान का मालिक।
(ख) एक मोची।
(ग) मदर डेयरी का कोषपाल या अपने क्षेत्र के दुग्ध सहकारी समिति।
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक।
(ङ) परिवहन कंपनी संचालक।
(च) निर्माण मजदूर।
उत्तर: इस समूह में मदर डेयरी का कोषपाल या अपने क्षेत्र के दुग्ध सहकारी समिति असंगत है। कारण: मदर डेयरी का कोषपाल एक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी है। इसके विपरीत समूह के अन्य विकल्प जैसे नाई, मोची, ट्यूशन शिक्षक और परिवहन कंपनी संचालक स्वनियोजित की श्रेणी में आते हैं तथा निर्माण मजदूर एक अनियत दिहाड़ी मजदूर है।
5. नये उभरते रोजगार मुख्यतः ____________ क्षेत्रक में ही मिल रहे हैं। (सेवा/विनिर्माण)
उत्तर: नये उभरते रोजगार मुख्यतः सेवा क्षेत्रक में ही मिल रहे हैं।
6. चार व्यक्तियों को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान को _______________ क्षेत्रक कहा जाता है। (औपचारिक/अनौपचारिक)
उत्तर: चार व्यक्तियों को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान को अनौपचारिक क्षेत्रक कहा जाता है।
7. राज स्कूल जाता है। पर जब वह स्कूल में नहीं होता, तो प्रायः अपने खेत में काम करता दिखाई देता है। क्या आप उसे श्रमिक मानेंगे? क्यों?
उत्तर: हाँ, राज को एक श्रमिक माना जाएगा। यद्यपि वह एक छात्र है, फिर भी वह खाली समय में खेती के कार्यों में हाथ बँटाकर आर्थिक क्रियाओं में भाग ले रहा है। आर्थिक गतिविधियों में लगे मुख्य श्रमिकों की सहायता करने वालों को भी श्रमिक ही माना जाता है।
8. शहरी महिलाओं की अपेक्षा अधिक ग्रामीण महिलाएँ काम करती दिखाई देती हैं। क्यों?
उत्तर: शहरी महिलाओं की अपेक्षा अधिक ग्रामीण महिलाएँ काम करती दिखाई देती हैं क्योंकि-
(i) आर्थिक विवशता और गरीबी: ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के अवसर अत्यंत सीमित होते हैं। परिवारों की खराब आर्थिक दशा महिलाओं को घर पर बैठने की अनुमति नहीं देती है। अतः अपने परिवार की आजीविका चलाने के लिए ग्रामीण महिलाओं को विवश होकर रोजगार बाज़ार (विशेषकर कृषि और खेतों में) में उतरना ही पड़ता है।
(ii) शिक्षा के अवसरों का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश लोग (विशेषकर महिलाएँ) स्कूल, कॉलेज या किसी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं जा पाते। यदि कुछ लोग जाते भी हैं तो वे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर श्रमबल में शामिल हो जाते हैं। इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में एक बड़ा वर्ग शैक्षणिक संस्थानों में अध्ययन करने में सक्षम होता है, जिससे शहरी महिलाएँ कम उम्र में श्रमबल में शामिल होने के बजाय अपनी पढ़ाई पूरी करती हैं।
(iii) सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण: यह एक सामान्य प्रवृत्ति देखी गई है कि विशेष रूप से शहरों में, जहाँ पुरुष पर्याप्त रूप से उच्च आय अर्जित करने में सफल रहते हैं, वहाँ परिवार की महिलाओं को घर से बाहर जाकर रोजगार प्राप्त करने के लिए प्रायः हतोत्साहित किया जाता है।
(iv) अवैतनिक पारिवारिक कार्य: ग्रामीण महिलाएँ घर के कामों (जैसे खाना बनाना, पानी लाना, ईंधन बीनना) के साथ-साथ खेतों में भी काम करती हैं, यद्यपि उन्हें इसके लिए नकद या अनाज के रूप में कोई मजदूरी नहीं मिलती। खेतों के रख-रखाव में मदद के कारण उन्हें आर्थिक क्रियाओं में संलग्न माना जाता है।
9. मीना एक गृहिणी है। घर के कामों के साथ-साथ वह अपने पति की कपड़े की दुकान के काम में भी हाथ बँटाती है। क्या उसे एक श्रमिक माना जा सकता है? क्यों?
उत्तर: हाँ, मीना को निश्चित रूप से एक श्रमिक माना जाएगा। क्योंकि-
(i) आर्थिक क्रिया में योगदान: अर्थशास्त्र की दृष्टि में, सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP/GDP) में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को ‘आर्थिक क्रियाएँ’ कहा जाता है और जो भी व्यक्ति इनमें संलग्न होते हैं, वे ‘श्रमिक’ कहलाते हैं। मीना अपने पति की कपड़े की दुकान के संचालन में मदद कर रही है, जो कि सीधे तौर पर एक आर्थिक और उत्पादक गतिविधि है।
(ii) मुख्य श्रमिक की सहायिका: अर्थशास्त्र में केवल मुख्य काम करने वाले को ही नहीं, बल्कि “मुख्य श्रमिकों की सहायता करने वालों को भी श्रमिक ही माना जाता है”। मीना दुकान में अपने पति (मुख्य श्रमिक) की सहायता कर रही है, इसलिए वह भी श्रमिक की श्रेणी में आएगी।
(iii) पारिश्रमिक या नकद वेतन का भ्रम: आम तौर पर लोग यह सोचते हैं कि केवल उसी व्यक्ति को श्रमिक कहा जाता है जिसे काम के बदले नियोक्ता द्वारा कोई नकद भुगतान (वेतन) मिलता है, परंतु अर्थशास्त्र में ऐसा नहीं है। मीना को अपने पति से इस काम के लिए भले ही नकद वेतन न मिलता हो, लेकिन उसका श्रम दुकान की आर्थिक गतिविधियों में मूल्य जोड़ रहा है, इसलिए उसे एक श्रमिक माना जाएगा।
10. यहाँ किसे असंगत माना जाएगा:
(क) किसी अन्य के अधीन रिक्शा चलाने वाला।
(ख) राजमिस्त्री।
(ग) किसी मैकेनिक की दुकान पर काम करने वाला श्रमिक।
(घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का।
उत्तर: (घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का।
11. निम्न सारणी में 1972-73 में भारत के श्रमबल का वितरण दिखाया गया है। इसे ध्यान से पढ़कर श्रमबल के वितरण के स्वरूप के कारण बताइए। ध्यान रहे कि ये आँकड़े लगभग 50 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।
| निवास स्थान | श्रमबल (करोड़ में) | ||
| पुरुष | महिलाएँ | कुल योग | |
| ग्रामीण | 12.5 | 6.9 | 419.5 |
| शहरी | 3.2 | 0.7 | 3.9 |
उत्तर: 1972–73 के दिए गए आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि उस समय भारत का अधिकांश श्रमबल ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्रित था तथा पुरुष श्रमिकों की संख्या महिलाओं से अधिक थी।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं—
(i) उस समय भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित थी, इसलिए अधिकतर लोग ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि एवं उससे जुड़े कार्यों में लगे थे।
(ii) ग्रामीण जनसंख्या शहरी जनसंख्या से अधिक थी, इसलिए ग्रामीण श्रमबल भी अधिक था।
(iii) उस समय उद्योग और सेवा क्षेत्र का विकास सीमित था, जिससे शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम थे।
(iv) पुरुषों की श्रम भागीदारी महिलाओं की तुलना में अधिक थी, क्योंकि सामाजिक परंपराओं और शिक्षा की कमी के कारण महिलाओं की कार्य भागीदारी कम दर्ज की जाती थी।
(v) ग्रामीण महिलाओं का बड़ा भाग खेती, पशुपालन और घरेलू कार्यों में लगा रहता था, लेकिन इनमें से कई कार्यों को उस समय औपचारिक रोजगार के रूप में नहीं गिना जाता था।
12. इस सारणी में 1999-2000 में भारत की जनसंख्या और श्रमिक जनअनुपात दिखाया गया है। क्या आप भारत के (शहरी और सकल) श्रमबल का अनुमान लगा सकते हैं?
| क्षेत्र | अनुमानित जनसंख्या (करोड़ में) | श्रमिक जनसंख्या अनुपात | श्रमिकों की अनुमानित संख्या (करोड़ में) |
| ग्रामीण | 71.88 | 41.9 | 71.88 × 41.9/100 = 30.12 |
| शहरी | 28.52 | 33.7 | ? |
| योग | 100.40 | 39.5 | ? |
उत्तर: शहरी श्रमबल की गणना:

सकल (कुल) श्रमबल की गणना:

| क्षेत्र | अनुमानित जनसंख्या (करोड़ में) | श्रमिक जनसंख्या अनुपात (%) | श्रमिकों की अनुमानित संख्या (करोड़ में) |
| ग्रामीण | 71.88 | 41.9 | 71.88 × 41.9 ÷ 100 = 30.12 |
| शहरी | 28.52 | 33.7 | 28.52 × 33.7 ÷ 100 = 9.61 |
| योग | 100.40 | 39.5 | 100.40 × 39.5 ÷ 100 = 39.66 |
13. शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्र से अधिक क्यों होते हैं?
उत्तर: शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक होते हैं क्योंकि शहरों में कार्य का स्वरूप बिल्कुल अलग होता है। शहरों में कारखाने, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान, बैंक और कार्यालय होते हैं जिन्हें सुचारू रूप से चलाने के लिए नियमित आधार पर कर्मचारियों (Regular salaried employees) की आवश्यकता होती है। चूँकि हर व्यक्ति अपना कारखाना या कार्यालय नहीं चला सकता, इसलिए शहरों में वेतनभोगी रोजगार की प्रधानता होती है। इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश लोग अपनी खुद की ज़मीन के टुकड़ों पर काम करते हैं, जिसके कारण वहाँ स्वनियोजित श्रमिकों की संख्या सबसे अधिक होती है।
14. नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों में महिलाएँ कम क्यों हैं?
उत्तर: नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों में पुरुषों की तुलना में महिलाएँ कम हैं (देश के 21% पुरुष इस वर्ग में हैं जबकि महिलाएँ केवल 16% हैं)।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
शिक्षा और कौशल का अभाव: नियमित वेतनभोगी नौकरियों (जैसे दफ्तरों या कारखानों में काम) के लिए प्रायः विशेष तकनीकी या शैक्षिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है। ऐतिहासिक रूप से महिलाओं में साक्षरता और उच्च शिक्षा का स्तर कम रहा है।
सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण: भारतीय समाज में अक्सर यह देखा गया है कि जब पुरुष पर्याप्त आय अर्जित कर लेते हैं, तो परिवार की महिलाओं को घर से बाहर (विशेषकर शहरों में नियमित नौकरियों के लिए) काम पर जाने के लिए हतोत्साहित किया जाता है।
15. भारत में श्रमबल के क्षेत्रकवार वितरण की हाल की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करें।
उत्तर: भारत में श्रमबल के क्षेत्रकवार (प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक) वितरण में हाल के दशकों में काफी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। आँकड़े दर्शाते हैं कि श्रमबल अब बड़े पैमाने पर कृषि कार्यों से हटकर गैर-कृषि कार्यों की ओर बढ़ रहा है।
इसकी मुख्य प्रवृत्तियाँ (2023-24 के आँकड़ों के आधार पर) इस प्रकार हैं:
(i) प्राथमिक क्षेत्रक (कृषि एवं खनन): यद्यपि यह अभी भी रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है, लेकिन इसमें रोजगार पाने वालों का प्रतिशत 1972-73 के 74.3% से घटकर 2023-24 में 46.1% रह गया है।
(ii) द्वितीयक क्षेत्रक (विनिर्माण एवं निर्माण): इस क्षेत्रक में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। इसका हिस्सा 1972-73 में 10.9% था, जो अब बढ़कर 24.1% हो गया है।
(iii) तृतीयक या सेवा क्षेत्रक: सेवा क्षेत्रक में भी रोजगार के कई नए अवसर उभरे हैं। इसमें श्रमबल की हिस्सेदारी 14.8% से बढ़कर 29.8% तक पहुँच गई है।
16. 1970 से अब तक विभिन्न उद्योगों में श्रमबल के वितरण में शायद ही कोई परिवर्तन आया है। टिप्पणी करें।
उत्तर: यह कथन पूरी तरह से गलत और भ्रामक है क्योंकि 1970 के दशक (विशेषकर 1972-73) से लेकर अब तक भारत में विभिन्न उद्योगों में श्रमबल के वितरण में बहुत बड़े और उल्लेखनीय बदलाव आए हैं। सारणी के आँकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि समय के साथ विकास प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारत का श्रमबल बड़े पैमाने पर कृषि कार्यों से हटकर गैर-कृषि कार्यों (उद्योगों और सेवाओं) की ओर स्थानांतरित हुआ है। 1972-73 में भारत का 74.3 प्रतिशत श्रमबल अपनी आजीविका के लिए प्राथमिक क्षेत्रक (कृषि और उससे जुड़े कार्य) पर निर्भर था, जो वर्ष 2023-24 में काफी घटकर 46.1 प्रतिशत रह गया है। इसके विपरीत, द्वितीयक (विनिर्माण एवं निर्माण) और तृतीयक (सेवा) क्षेत्रक भारत के श्रमबल के लिए एक आशावादी भविष्य का संकेत दे रहे हैं और रोजगार सृजन में इनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। द्वितीयक क्षेत्रक की हिस्सेदारी 1972-73 के 10.9 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 24.1 प्रतिशत हो गई है। इसी प्रकार, रोजगार के नए अवसरों के कारण सेवा क्षेत्रक का हिस्सा भी 14.8 प्रतिशत से बढ़कर 29.8 प्रतिशत तक पहुँच गया है। इसके अतिरिक्त, कार्य की स्थिति के आधार पर भी रोजगार के स्वरूप में बदलाव आया है, जहाँ लोग पिछले पाँच दशकों में स्वनियोजन और नियमित वेतनभोगी रोजगार से हटकर अनियत (दिहाड़ी) श्रम की ओर बढ़े हैं, जिसे अर्थशास्त्रियों ने ‘श्रमबल का अनियतीकरण’ कहा है। अतः यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि पिछले 50 वर्षों में श्रमबल के वितरण में व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन हुए हैं और यह पुराने स्वरूप में बिल्कुल भी स्थिर नहीं रहा है।
17. क्या आपको लगता है कि 1950-2010 के दौरान भारत में रोजगार के सृजन में भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुरूप वृद्धि हुई है? कैसे?
उत्तर: नहीं, 1950 से 2010 के दौरान भारत में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में तो तेज़ वृद्धि हुई, लेकिन उसी अनुपात में रोजगार के अवसर नहीं बढ़े। इसका मुख्य कारण आधुनिक तकनीक, मशीनों और पूँजी-प्रधान उत्पादन का अधिक उपयोग था, जिससे उत्पादन तो बढ़ा, पर श्रमिकों की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम रही। इस कारण रोजगार की वृद्धि धीमी रही। इस स्थिति को रोजगारविहीन वृद्धि कहा जाता है।
18. क्या औपचारिक क्षेत्रक में ही रोजगार का सृजन आवश्यक है? अनौपचारिक में नहीं? कारण बताइए।
उत्तर: हाँ, रोजगार का सृजन मुख्य रूप से औपचारिक (संगठित) क्षेत्रक में ही आवश्यक है।
कारण:
(i) नियमित आय और सामाजिक सुरक्षा: औपचारिक क्षेत्रक के श्रमिकों को नियमित आय के साथ-साथ मातृत्व लाभ, भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी और पेंशन जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षाएं मिलती हैं, जिनसे उनका भविष्य सुरक्षित होता है।
(ii) अनौपचारिक क्षेत्रक की दयनीय स्थिति: इसके विपरीत, अनौपचारिक क्षेत्रक में श्रमिकों की आय अनियमित होती है और उन्हें सरकार से कोई विशेष संरक्षण या नियमन प्राप्त नहीं होता। यहाँ ठेकेदार या मालिक बिना किसी क्षतिपूर्ति (मुआवजे) के मजदूर को कभी भी काम से निकाल सकते हैं। इस क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली तकनीक अक्सर पुरानी होती है और काम की स्थितियाँ असुरक्षित होती हैं (श्रमिक प्रायः गंदी बस्तियों में रहते हैं)। अतः बेहतर जीवन स्तर के लिए औपचारिक रोजगार ही आवश्यक है।
19. विक्टर को दिन में केवल दो घंटे काम मिल पाता है। बाकी सारे समय वह काम की तलाश में रहता है। क्या वह बेरोजगार है? क्यों? विक्टर जैसे लोग क्या काम करते होंगे?
उत्तर: राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (NSSO) और अर्थशास्त्रियों के अनुसार, बेरोजगार उसे माना जाता है जिसे आधे दिन की अवधि में एक घंटे का भी रोजगार न मिल सके। चूँकि विक्टर को दिन में 2 घंटे का काम मिल रहा है, इसलिए वह तकनीकी रूप से पूर्णतः बेरोजगार (Openly Unemployed) नहीं है, बल्कि वह ‘अल्परोजगार’ (Underemployed) का शिकार है।
विक्टर जैसे लोग प्रायः अनौपचारिक क्षेत्रक में अनियत (Casual) काम करते होंगे। जैसे— सड़क किनारे फेरी लगाना, रेलवे स्टेशन/बस स्टैंड पर कुली का काम करना, किसी दुकान पर कुछ घंटों के लिए बोरे ढोना, या निर्माण स्थलों पर अल्पकालिक दिहाड़ी मजदूरी करना।
20. क्या आप गाँव में रह रहे हैं? यदि आपको ग्राम पंचायत को सलाह देने को कहा जाए तो आप गाँव की उन्नति के लिए किस प्रकार के क्रियाकलाप का सुझाव देंगे, जिससे रोजगार सृजन भी हो?
उत्तर: यदि मुझे ग्राम पंचायत को सलाह देने का अवसर मिले, तो मैं कृषि के आधुनिकीकरण, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, डेयरी एवं पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, कुटीर एवं लघु उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प तथा कौशल विकास प्रशिक्षण को बढ़ावा देने का सुझाव दूँगा। इसके साथ ही ग्रामीण सड़कों, भंडारण और विपणन सुविधाओं का विकास भी आवश्यक है। इन गतिविधियों से गाँव का आर्थिक विकास होगा तथा स्थानीय लोगों के लिए स्थायी रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध होंगे।
21. अनियत दिहाड़ी मजदूर कौन होते हैं?
उत्तर: अनियत दिहाड़ी मजदूर वे श्रमिक होते हैं जिन्हें स्थायी रोजगार प्राप्त नहीं होता। उन्हें केवल काम मिलने पर ही दैनिक मजदूरी मिलती है और काम न मिलने पर कोई आय नहीं होती। ऐसे श्रमिकों को नौकरी की सुरक्षा, भविष्य निधि (PF), पेंशन, चिकित्सा सुविधा या सवेतन अवकाश जैसी सुविधाएँ भी नहीं मिलतीं। ये अधिकतर निर्माण कार्य, कृषि, ईंट-भट्टों तथा अन्य अस्थायी कार्यों में लगे होते हैं।
22. आपको यह कैसे पता चलेगा कि कोई व्यक्ति अनौपचारिक क्षेत्रक में काम कर रहा है?
उत्तर: यदि किसी व्यक्ति को नियमित वेतन नहीं मिलता, उसकी नौकरी स्थायी नहीं है, उसे भविष्य निधि (PF), पेंशन, चिकित्सा सुविधा, सवेतन अवकाश या अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्त नहीं होते तथा उसका रोजगार अस्थायी या दिहाड़ी आधार पर होता है, तो यह माना जाएगा कि वह अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहा है। ऐसे श्रमिकों की आय भी अनिश्चित होती है और उनकी नौकरी की सुरक्षा बहुत कम होती है।
Subject Ka Complete Video Solution Dekhein
Step-by-step easy concept explanation aur full questions Answer ke liye watch karein ya app download karein:



