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NCERT Class 11 Economics Chapter 5 ग्रामीण विकास

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NCERT Class 11 Economics Chapter 5 ग्रामीण विकास

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Chapter: 5

भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास
अभ्यास

1. ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्नों को स्पष्ट करें।

उत्तर: ग्रामीण विकास एक व्यापक शब्द है जो मूलतः ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन घटकों के विकास पर ध्यान केंद्रित करने पर बल देता है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं।

ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्न निम्नलिखित हैं:

(i) मानव संसाधनों का विकास, जिसमें साक्षरता (विशेषकर नारी साक्षरता), शिक्षा, कौशल का विकास और स्वास्थ्य (स्वच्छता और जन-स्वास्थ्य) शामिल हैं।

(ii) भूमि-सुधार और प्रत्येक क्षेत्र के उत्पादक संसाधनों का विकास।

(iii) आधारिक संरचना का विकास (जैसे- बिजली, सिंचाई, साख, विपणन, परिवहन, अनुसंधान और सूचना प्रसार की सुविधाएँ)।

(iv) निर्धनता निवारण और समाज के कमजोर वर्गों की जीवन दशाओं में सुधार, जिसमें उत्पादक रोजगार उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

2. ग्रामीण विकास में साख के महत्व पर चर्चा करें।

उत्तर: कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि मुख्य रूप से समय-समय पर पूंजी के प्रयोग पर निर्भर करती है। खेतों में बीजारोपण से लेकर फसल पकने और आमदनी होने तक की अवधि बहुत लंबी होती है। इसी कारण किसानों को बीज, उर्वरक, औज़ार आदि खरीदने के लिए ऋण (साख) लेने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त, किसानों को अपने पारिवारिक निर्वाह खर्च और शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों जैसे कार्यों के लिए भी कर्ज़ का ही सहारा लेना पड़ता है।

3. गरीबों की ऋण आवश्यकताएँ पूरी करने में अतिलघु साख व्यवस्था की भूमिका की व्याख्या करें।

उत्तर: औपचारिक साख व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी और ऋण के लिए गिरवी (ऋणाधार) की आवश्यकता होती थी, जिससे बहुसंख्यक गरीब ग्रामीण परिवार ऋण से वंचित रह जाते थे। इस कमी को दूर करने में ‘स्वयं सहायता समूहों’ (SHGs) के माध्यम से अतिलघु साख (Micro-credit) व्यवस्था उभरी। यह व्यवस्था सदस्यों में बचत की भावना बढ़ाती है और एकत्रित राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को उचित ब्याज दर पर आसान किश्तों में ऋण देती है। इसके माध्यम से महिला सशक्तिकरण में भी सहायता मिली है।

4. सरकार द्वारा ग्रामीण बाज़ारों के विकास के लिए किए गए प्रयासों की व्याख्या करें।

उत्तर: सरकार ने कृषि विपणन सुधारने के लिए चार प्रमुख उपाय किए हैं:

(i) व्यवस्थित एवं पारदर्शी विपणन दशाओं के निर्माण के लिए बाज़ार का नियमन करना।

(ii) सड़कों, रेलमार्गों, भंडारगृहों, गोदामों, शीतगृहों और प्रसंस्करण इकाइयों जैसी भौतिक आधारिक संरचनाओं का प्रावधान करना।

(iii) सहकारी विपणन के द्वारा किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य सुलभ कराना।

(iv) नीतिगत साधनों का प्रयोग, जैसे— न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनिश्चित करना, भारतीय खाद्य निगम द्वारा बफर स्टॉक (सुरक्षित भंडार) रखना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन व्यवस्था) के माध्यम से अनाज का वितरण करना।

5. आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण क्यों आवश्यक है?

उत्तर: विविधीकरण इसलिए आवश्यक है क्योंकि केवल खेती के आधार पर आजीविका कमाने में जोखिम बहुत अधिक होता है। विविधीकरण से खेती का जोखिम कम होता है और ग्रामीण समुदाय को उत्पादक एवं वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर उपलब्ध होते हैं। इसके अलावा, कृषि क्षेत्र पर पहले से ही बहुत बोझ है और रबी के मौसम में पर्याप्त सिंचाई के अभाव में रोजगार दुर्लभ हो जाता है, इसलिए श्रम शक्ति को गैर-कृषि कार्यों में लगाना आवश्यक है।

6. भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

उत्तर: सकारात्मक प्रभाव: बैंकिंग व्यवस्था के विस्तार का ग्रामीण कृषि, आय और रोजगार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। हरित क्रांति के बाद किसानों को ऋण और सेवाएँ देने से उत्पादन बढ़ा है और हम खाद्य सुरक्षा की मंजिल तक पहुँच सके हैं। 

नकारात्मक प्रभाव (आलोचना): अभी भी हमारी बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह उचित नहीं बन पाई है। औपचारिक साख संस्थाएँ प्रभावी ऋण वसूली व्यवस्था और जमा प्रवाह की संस्कृति विकसित करने में विफल रही हैं। कृषि ऋणों की वसूली न हो पाने की समस्या गंभीर है और किसान बड़े पैमाने पर ऋण अदा करने से इनकार कर रहे हैं। सुधारों (1991) के बाद बैंकिंग क्षेत्र के प्रसार में कमी आई थी, हालाँकि हाल ही में जनधन योजना जैसी पहलों से सुधार का प्रयास किया गया है।

7. कृषि विपणन से आपका क्या अभिप्राय है?

उत्तर: कृषि विपणन से अभिप्राय उस सम्पूर्ण प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से कृषि उपज को खेत से उपभोक्ता तक पहुँचाया जाता है। इसमें उपज का संग्रहण, छँटाई, ग्रेडिंग, पैकिंग, भंडारण, परिवहन, मूल्य निर्धारण तथा विक्रय जैसी सभी गतिविधियाँ शामिल होती हैं। कृषि विपणन का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना तथा उपभोक्ताओं तक गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद पहुँचाना है। एक प्रभावी कृषि विपणन व्यवस्था किसानों की आय बढ़ाने और कृषि क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

8. कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ बताइए।

उत्तर: कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ है-

(i) भंडारण सुविधाओं का अभाव (जिसके कारण 10 प्रतिशत से अधिक कृषि उत्पादन क्षतिग्रस्त हो जाता है)।

(ii) किसानों को बाज़ार भाव की पूरी जानकारी न होना और व्यापारियों द्वारा तौल में हेराफेरी।

(iii) सड़कों, परिवहन और शीतगृहों (Cold storage) जैसी आधारिक सुविधाओं का अपर्याप्त होना।

(iv) निजी व्यापारियों, साहूकारों और अमीर किसानों का अभी भी बाज़ार पर वर्चस्व होना (सरकारी/सहकारी संस्थाएँ केवल 10% अंश ही संभाल पाती हैं)।

9. कृषि विपणन के कुछ उपलब्ध वैकल्पिक माध्यमों की उदाहरण सहित चर्चा करें।

उत्तर: वैकल्पिक माध्यम किसानों को सीधे उपभोक्ताओं को अपना उत्पाद बेचने की सुविधा देते हैं, जिससे उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है। 

उदाहरण:

(i) पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में ‘अपनी मंडी’।

(ii) पुणे की ‘हड़पसार मंडी’।

(iii) आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की ‘रायथू बाज़ार’ (फल-सब्जी मंडियां)।

(iv) तमिलनाडु की ‘उझावर मंडी’ (कृषक बाज़ार)।

(v) राष्ट्रीय/बहुराष्ट्रीय फ़ास्ट फ़ूड कंपनियों द्वारा किसानों से पूर्व-निर्धारित कीमतों पर उत्पादन (अनुबंध खेती) के लिए समझौते करना।

10. ‘स्वर्णिम क्रांति’ तथा ‘हरित क्रांति’ में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर: स्वर्णिम क्रांति’ तथा ‘हरित क्रांति’ में अंतर है-

हरित क्रांति (Green Revolution)स्वर्णिम क्रांति (Golden Revolution)
इसका संबंध खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने से है।इसका संबंध बागवानी, फल, फूल, शहद, मसाले आदि के उत्पादन से है।
इसका मुख्य उद्देश्य गेहूँ और चावल का उत्पादन बढ़ाना था।इसका मुख्य उद्देश्य बागवानी एवं उच्च मूल्य वाली फसलों का विकास करना था।
इसकी शुरुआत 1960 के दशक में हुई।इसका विकास मुख्यतः 1990 के दशक के बाद हुआ।
इसमें उच्च उपज वाले बीज, सिंचाई और उर्वरकों का अधिक उपयोग किया गया।इसमें आधुनिक बागवानी तकनीक, प्रसंस्करण और निर्यात पर बल दिया गया।

11. क्या सरकार द्वारा कृषि विपणन सुधार के लिए अपनाए गए विभिन्न उपाय पर्याप्त हैं? व्याख्या कीजिए।

उत्तर: सरकार ने कृषि विपणन सुधार के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। कृषि उपज मंडियों (APMC) का विकास, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था, भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा खरीद, गोदाम एवं शीतगृहों का निर्माण, ग्रामीण सड़कों और परिवहन सुविधाओं का विस्तार तथा राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) की शुरुआत ऐसे प्रमुख उपाय हैं। इन प्रयासों से किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक अवसर मिले हैं तथा विपणन व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक संगठित हुई है।

फिर भी ये उपाय पूरी तरह पर्याप्त नहीं कहे जा सकते। आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में भंडारण, शीतगृह और परिवहन सुविधाओं का अभाव है। छोटे और सीमांत किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता तथा बिचौलियों का प्रभाव कई स्थानों पर बना हुआ है। किसानों को बाजार संबंधी जानकारी और आधुनिक विपणन सुविधाएँ भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए सरकार को कृषि विपणन व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी, आधुनिक तथा किसान हितैषी बनाने के लिए निरंतर सुधार करते रहना चाहिए।

12. ग्रामीण विविधीकरण में गैर-कृषि रोजगार का महत्व समझाइए।

उत्तर: ग्रामीण विविधीकरण में गैर-कृषि रोजगार का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। केवल कृषि पर निर्भर रहने से किसानों की आय मौसम और फसल पर निर्भर रहती है। इसलिए डेयरी, पशुपालन, मत्स्यपालन, बागवानी, मधुमक्खी पालन, कुक्कुट पालन, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, ग्रामीण पर्यटन तथा छोटे व्यवसाय जैसे गैर-कृषि रोजगारों का विकास आवश्यक है। इन गतिविधियों से किसानों और ग्रामीण परिवारों की आय के अनेक स्रोत विकसित होते हैं तथा पूरे वर्ष रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।

गैर-कृषि रोजगार से ग्रामीण बेरोजगारी और गरीबी में कमी आती है, महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार के अवसर मिलते हैं तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत बनती है। इससे कृषि पर निर्भरता कम होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में संतुलित एवं धारणीय विकास को बढ़ावा मिलता है। इसलिए ग्रामीण विकास और किसानों की आय बढ़ाने के लिए गैर-कृषि रोजगार का विस्तार अत्यंत आवश्यक है।

13. विविधीकरण के स्रोत के रूप में पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के महत्व पर टिप्पणी करें।

उत्तर: पशुपालन: यह परिवार की आय में स्थिरता लाता है और बिना किसी कृषि अवरोध के खाद्य सुरक्षा, परिवहन और पोषण प्रदान करता है। यह 7 करोड़ छोटे/सीमांत किसानों और महिलाओं को आजीविका देता है।

मत्स्यपालन: मत्स्य उत्पादन देश के कुल GDP का लगभग 1.5% है। यह मछुआरा समुदायों के लिए जीवन का मुख्य स्रोत है और इसमें महिलाएँ 60% निर्यात व्यापार संभालती हैं।

बागवानी: यह रोजगार के साथ-साथ पोषण भी उपलब्ध कराती है। यह कुल कृषि उत्पाद का लगभग एक-तिहाई और GDP का 6% है। इसके कारण पुष्परोपण, नर्सरी, और खाद्य प्रसंस्करण जैसे उच्च आय वाले रोज़गार बढ़े हैं।

14. ‘सूचना प्रौद्योगिकी, धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान करती है।’ टिप्पणी करें।

उत्तर: सूचना प्रौद्योगिकी आज ग्रामीण विकास, धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन बन गई है। इसके माध्यम से किसानों को मौसम की जानकारी, आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों, उर्वरकों, सिंचाई की विधियों तथा बाजार भाव की सही जानकारी समय पर प्राप्त होती है। इससे किसान उचित निर्णय लेकर उत्पादन बढ़ा सकते हैं और अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी ई-नाम (e-NAM), ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान तथा कृषि सलाह सेवाओं के माध्यम से कृषि विपणन को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाती है। यह प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देकर धारणीय विकास में भी सहायता करती है। साथ ही कृषि उत्पादन बढ़ने से खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित होती है, जिससे खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिलती है। इसलिए सूचना प्रौद्योगिकी ग्रामीण विकास, धारणीय विकास और खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

15. जैविक कृषि क्या है? यह धारणीय विकास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?

उत्तर: जैविक कृषि खेती करने की वह पद्धति है जो पर्यावरण संतुलन को पुनः स्थापित करके उसका संरक्षण और संवर्धन करती है। यह रासायनिक उर्वरकों और विषाक्त कीटनाशकों के प्रयोग से बचती है (जो मिट्टी और जल को दूषित करते हैं), जिससे पर्यावरण का विनाश रुकता है। इस प्रकार यह पर्यावरण-मित्र प्रौद्योगिकी का उपयोग करके धारणीय विकास को बढ़ावा देती है।

16. जैविक कृषि के लाभ और सीमाएँ स्पष्ट करें।

उत्तर: जैविक कृषि के लाभ और सीमाएँ है-

लाभसीमाएँ
इसमें स्थानीय रूप से बने सस्ते जैविक आगतों का प्रयोग होता है, जिससे निवेश पर प्रतिफल अधिक मिलता है।इसे अपनाने के लिए किसानों में इच्छाशक्ति और जागरूकता की आवश्यकता है।
जैविक उत्पादों की विश्व भर में भारी मांग है, जिससे निर्यात के जरिए अच्छी आय हो सकती है।इसके विपणन (marketing) की समस्याएं हैं और उपयुक्त नीतियों का अभाव है।
यह भोजन रासायनिक कृषि की तुलना में अधिक स्वास्थ्यवर्धक और पोषक तत्वों से भरपूर होता है।जैविक उत्पाद जल्दी खराब हो जाते हैं।
यह अधिक श्रम-प्रधान है, जिससे अधिक रोजगार पैदा होता है।बे-मौसमी फसलों का उत्पादन बहुत सीमित होता है।

17. जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारंभिक वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

उत्तर: जैविक कृषि अपनाने वाले किसानों को प्रारंभिक वर्षों में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। रासायनिक खेती छोड़ने के बाद शुरुआती समय में उत्पादन कम हो सकता है, जिससे किसानों की आय प्रभावित होती है। जैविक खाद और जैव उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता भी कई स्थानों पर नहीं होती। इसके अलावा किसानों को नई तकनीकों की जानकारी और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

जैविक उत्पादों के लिए अलग बाजार और उचित मूल्य प्राप्त करना भी एक बड़ी चुनौती होती है। जैविक प्रमाणन की प्रक्रिया समय लेने वाली और खर्चीली हो सकती है। इन कारणों से कई किसान प्रारंभिक वर्षों में आर्थिक और तकनीकी समस्याओं का सामना करते हैं। इसलिए सरकार की सहायता, प्रशिक्षण और प्रभावी विपणन व्यवस्था जैविक कृषि को सफल बनाने के लिए आवश्यक है।

18. “जनधन योजना ग्रामीण विकास में मदद करती है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? समझाएँ।

उत्तर: हाँ, यह कथन सही है। जनधन योजना के तहत वयस्कों के बैंक खाते खोले गए, जिससे 40 करोड़ से अधिक लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया। 

इन खातों के कई लाभ ग्रामीण विकास में सीधे मदद करते हैं:

(i) खाताधारकों को 1-2 लाख रुपये का आकस्मिक बीमा और 10,000 रुपये की ओवरड्राफ्ट सुविधा मिलती है।

(ii) सरकारी योजनाओं (जैसे मनरेगा) का वेतन, वृद्धावस्था पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा भुगतान सीधे बैंक खातों में आते हैं।

(iii) इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बचत की आदत बढ़ी है और वित्तीय संसाधनों का कुशल आवंटन हुआ है (बैंकों के पास 1,40,000 करोड़ रुपये से अधिक का फंड आया है)।

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