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UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 10 पर्यावरण शिक्षा
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पर्यावरण शिक्षा
Chapter: 10
| खण्ड ‘क’ आधुनिक शैक्षिक विचारधारा का विकास |
विस्तृत उतरीय प्रश्न
1. पर्यावरण-शिक्षा से आप क्या समझते हैं। परिभाषा निर्धारित कीजिए तथा इसका स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पर्यावरण-शिक्षा का अर्थ: पर्यावरण-शिक्षा वह शिक्षा है जिसके माध्यम से मनुष्य प्राकृतिक तथा सामाजिक परिवेश को समझकर उसके संरक्षण, संतुलन और समुचित उपयोग की जानकारी प्राप्त करता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति में पर्यावरण के प्रति जागरूकता, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व उत्पन्न करना है।
पर्यावरण-शिक्षा की परिभाषा:
यूनेस्को (1977): “पर्यावरण-शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति और समाज पर्यावरण की समस्याओं को समझते हैं, उनके समाधान के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल, दृष्टिकोण और प्रेरणा प्राप्त करते हैं।”
सरल शब्दों में – पर्यावरण-शिक्षा वह शिक्षा है जो व्यक्ति को पर्यावरण के संरक्षण, संतुलन तथा सतत विकास के लिए जागरूक बनाती है।
पर्यावरण-शिक्षा का स्वरूप/प्रकृति:
बहुआयामी स्वरूप: इसमें प्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक पहलू सम्मिलित होते हैं।
जागरूकता एवं संवेदनशीलता: पर्यावरणीय समस्याओं (प्रदूषण, वनों की कटाई, जल-संकट आदि) के प्रति सचेत करना।
व्यावहारिक स्वरूप: केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि संरक्षण के व्यावहारिक उपाय सिखाना (जैसे वृक्षारोपण, जल-संरक्षण)।
निरंतर प्रक्रिया: जीवन के प्रत्येक स्तर पर आवश्यक, केवल विद्यालय तक सीमित नहीं।
मानव-केंद्रितता और उत्तरदायित्व: व्यक्ति में यह भावना जागृत करना कि वह पर्यावरण की रक्षा हेतु उत्तरदायी है।
2. पर्यावरण-शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: पर्यावरण-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मानव और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करना तथा भावी पीढ़ियों के लिए पर्यावरण का संरक्षण करना है।
पर्यावरण-शिक्षा के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं–
(i) जागरूकता का विकास: विद्यार्थियों व समाज को पर्यावरणीय समस्याओं जैसे प्रदूषण, वनों की कटाई, जल-संकट आदि के प्रति सचेत करना।
(ii) ज्ञान का संवर्धन: पर्यावरण के घटकों, संरचना और उनके आपसी संबंधों की जानकारी प्रदान करना।
(iii) दृष्टिकोण का निर्माण: प्रकृति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण तथा संरक्षण की भावना विकसित करना।
(iv) कौशल का विकास: पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक कौशल व तकनीकी ज्ञान प्राप्त कराना।
(v) उत्तरदायित्व की भावना: प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण-संरक्षण की जिम्मेदारी का अनुभव कराना।
(vi) व्यवहारिक परिवर्तन: ऐसे आचरण व आदतें विकसित करना जो पर्यावरण के लिए उपयोगी हों (जैसे वृक्षारोपण, जल-संरक्षण, पुनर्चक्रण)।
(vii) सतत विकास की भावना: वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण करना।
3. पर्यावरण-शिक्षा की शिक्षण विधियों एवं साधनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: पर्यावरण-शिक्षा की शिक्षण विधियाँ एवं साधन-
पर्यावरण-शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता, संवेदनशीलता तथा संरक्षण की भावना उत्पन्न करना है।
इसके लिए शिक्षण विधियाँ एवं साधन इस प्रकार अपनाए जाते हैं–
(क) शिक्षण विधियाँ:
(i) व्याख्यान पद्धति: शिक्षक द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं, उनके कारण व समाधान की जानकारी देना।
(ii) प्रश्नोत्तर पद्धति: छात्रों को पर्यावरण से संबंधित प्रश्न पूछने व विचार-विमर्श करने का अवसर देना।
(iii) प्रदर्शन पद्धति: प्रयोगशाला या कक्षा में प्रदूषण, ऊर्जा स्रोत आदि का प्रत्यक्ष प्रदर्शन।
(iv) परियोजना पद्धति: वृक्षारोपण, कचरा प्रबंधन, वर्षा जल संचयन जैसी परियोजनाओं के माध्यम से व्यावहारिक ज्ञान।
(v) सहभागिता पद्धति: छात्रों को समूह कार्य, चर्चाएँ, वाद-विवाद एवं निबंध लेखन में सम्मिलित करना।
(vi) शैक्षिक भ्रमण (Field Trip): प्राकृतिक स्थलों, उद्योगों, वन क्षेत्रों, जलाशयों आदि का निरीक्षण कराना।
(vii) अनुभवात्मक पद्धति: वास्तविक जीवन के अनुभवों के आधार पर पर्यावरण के महत्व को समझाना।
(ख) शिक्षण साधन:
(i) चार्ट, मानचित्र, चित्र, मॉडल, स्लाइड, वीडियो, पोस्टर।
(ii) रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट, मल्टीमीडिया।
(iii) पर्यावरणीय अभियान, रैलियाँ और प्रदर्शनी।
4. पर्यावरण-शिक्षा की मुख्य समस्याएँ क्या हैं? इन समस्याओं के समाधान के उपाय भी बताइए।
या
भारत में पर्यावरण-शिक्षा की क्या समस्याएँ हैं?
उत्तर: पर्यावरण-शिक्षा की मुख्य समस्याएँ एवं समाधान:
(क) मुख्य समस्याएँ:
(i) जागरूकता की कमी: छात्रों और समाज में पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति उदासीनता।
(ii) पुस्तक-केंद्रित शिक्षा: शिक्षा अधिकतर सैद्धांतिक है, व्यावहारिक पहलू पर कम ध्यान।
(iii) प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी: पर्यावरण-शिक्षा के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक नहीं।
(iv) साधनों व संसाधनों की कमी: प्रयोगशाला, मॉडल, ऑडियो-वीडियो सामग्री की कमी।
(v) पाठ्यक्रम की सीमाएँ: पाठ्यक्रम में पर्यावरण-शिक्षा को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता।
(vi) आर्थिक व प्रशासनिक कठिनाइयाँ: योजनाओं के लिए पर्याप्त धन और प्रबंधन का अभाव।
(ख) समाधान उपाय:
(i) जन-जागरूकता अभियान: रैलियाँ, प्रदर्शनी, मीडिया और सामाजिक संगठनों के माध्यम से।
(ii) व्यावहारिक शिक्षा: वृक्षारोपण, जल-संरक्षण, स्वच्छता अभियान जैसे कार्यों को शिक्षा का हिस्सा बनाना।
(iii) शिक्षकों का प्रशिक्षण: पर्यावरण-शिक्षण के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम।
(iv) साधन-संपन्नता: विद्यालयों में प्रयोगशालाएँ, मॉडल और मल्टीमीडिया साधन उपलब्ध कराना।
(v) पाठ्यक्रम में सुधार: सभी स्तरों पर पर्यावरण-शिक्षा को अनिवार्य और व्यावहारिक बनाना।
(vi) नीतिगत समर्थन: सरकार द्वारा ठोस नीतियाँ और योजनाएँ बनाना, स्थानीय निकायों का सहयोग।

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