UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 4 ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा

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UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 4 ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा

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Chapter: 4

खण्ड ‘क’ आधुनिक शैक्षिक विचारधारा का विकास

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. ब्रिटिशकालीन शिक्षा के आरम्भ एवं विकास का सविस्तार वर्णन कीजिए।

या भारतीय शिक्षा के लिए वुड-डिस्पैच की सिफारिशों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: ब्रिटिशकालीन शिक्षा का आरम्भ एवं विकास/वुड-डिस्पैच (1854) – विवरण ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय शिक्षा का स्वरूप महत्वपूर्ण रूप से बदला। इसे दो प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है:

ब्रिटिशकालीन शिक्षा का आरम्भ:

(i) 1773 में भारत में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई।

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(ii) प्रारंभ में शिक्षा का उद्देश्य मुख्यतः अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से प्रशासनिक और सरकारी सेवाओं के लिए कर्मियों का निर्माण करना था।

(iii) पाठ्यक्रम में यूरोपीय विज्ञान, गणित, भाषा और साहित्य को महत्व दिया गया।

(iv) प्रारंभिक शिक्षा केवल कुछ शहरी और अमीर वर्ग तक ही सीमित थी।

वुड-डिस्पैच (1854) – भारतीय शिक्षा के लिए सिफारिशें:

चार्ल्स वुड ने 1854 में शिक्षा के सुधार हेतु घोषणा-पत्र जारी किया, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख सिफारिशें थीं:

(i) अंग्रेज़ी साहित्य और पाश्चात्य ज्ञान का प्रचार: शिक्षा का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी ज्ञान और साहित्य का प्रसार होना चाहिए।

(ii) शिक्षा का माध्यम: उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी भाषा, और प्राथमिक शिक्षा में भारतीय भाषाओं का प्रयोग।

(iii) शिक्षा विभाग में प्रशासन: शिक्षा सचिव और शिक्षा-निरीक्षक नियुक्त किए जाएँ।

(iv) सार्वजनिक शिक्षा का विस्तार: बड़े विद्यालयों तक सीमित न रहकर आम जनता तक शिक्षा पहुँचाई जाए।

(v) आर्थिक सहायता: नए विद्यालयों के भवन निर्माण, पुस्तकालय, अध्यापकों के वेतन और छात्रवृत्तियों के लिए अनुदान प्रणाली लागू की जाए।

महत्त्व: 

(i) वुड-डिस्पैच ने जन-शिक्षा को प्राथमिकता दी।

(ii) यह ब्रिटिशकालीन शिक्षा नीति का आधार बन गया और भारतीय शिक्षा में आधुनिक और व्यवस्थित शिक्षा प्रणाली का विकास सुनिश्चित किया।

(iii) इसे कुछ विद्वानों ने भारतीय शिक्षा का ‘महाधिकार-पत्र’ (Magna Carta) भी कहा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. हमारे देश में आधुनिक शिक्षा के आरम्भ होने में ईसाई मिशनरियों की क्या भूमिका थी?

उत्तर: पंद्रहवीं शताब्दी में जब यूरोप की अनेक व्यापारिक कंपनियाँ भारत में व्यापार के उद्देश्य से आने लगीं, उसी समय यूरोप की कई ईसाई मिशनरियाँ भी भारत पहुँचीं। इन मिशनरियों का मूल उद्देश्य भारत में ईसाई धर्म का प्रचार और प्रसार करना था। अपने इस लक्ष्य को शीघ्र और प्रभावी ढंग से प्राप्त करने के लिए उन्होंने शिक्षा को एक सशक्त साधन के रूप में अपनाया। भारतीय जनता से सीधा संपर्क स्थापित करने और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से इन मिशनरियों ने देश के विभिन्न भागों में विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। इस प्रकार, शिक्षा का उपयोग केवल ज्ञानार्जन के साधन के रूप में नहीं, बल्कि धर्म-प्रसार के प्रभावी माध्यम के रूप में भी किया गया।

इन शिक्षण संस्थाओं में सामान्य शिक्षा के साथ-ही-साथ ईसाई धर्म के प्रचार एवं प्रसार का कार्य भी किया जाने लगा। इन शिक्षण संस्थाओं में मिशनरियों द्वारा शिक्षा के पाश्चात्य प्रारूप को अपनाया गया। इस प्रयास से हमारे देश में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात हुआ। इस तथ्य को ही ध्यान में रखते हुए विभिन्न विद्वान ईसाई मिशनरियों को ही भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रवर्तक मानते हैं। स्पष्ट है कि हमारे देश में आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में ईसाई मिशनरियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका तथा उल्लेखनीय योगदान है।

2. ब्रिटिशकालीन शिक्षा के सन्दर्भ में लॉर्ड मैकाले के विवरण-पत्र का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: लॉर्ड मैकाले का विवरण-पत्र (1835) – विवरण:

(i) सन् 1835 में लॉर्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा के सुधार हेतु एक प्रसिद्ध विवरण-पत्र (Minute on Education) प्रस्तुत किया। 

इसमें मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:

(ii) अंग्रेज़ी भाषा का प्रचार: मैकाले ने प्रस्ताव रखा कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी भाषा होना चाहिए, ताकि भारतीय छात्रों को पश्चिमी ज्ञान और विज्ञान से परिचित कराया जा सके।

(iii) भारतीय भाषाओं का अवमूल्यन: उन्होंने भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा की आवश्यकता को कम महत्व दिया और इसे अप्रचलित माना।

(iv) पाश्चात्य ज्ञान का उद्देश्य: शिक्षा का मुख्य उद्देश्य पाश्चात्य साहित्य, विज्ञान और तर्कशक्ति का प्रचार होना चाहिए।

(v) शिक्षा का वर्गीकरण: शिक्षा का लाभ केवल समाज के पढ़े-लिखे और अधिकारी वर्ग तक सीमित होना चाहिए, ताकि प्रशासनिक और सरकारी कार्यों के लिए योग्य कर्मी तैयार हो सकें।

(vi) आर्थिक एवं प्रशासनिक पहलू: शिक्षा की व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए सरकार द्वारा वित्तीय सहायता और अनुदान की सिफारिश की गई।

महत्त्व: मैकेले का विवरण-पत्र भारतीय शिक्षा में अंग्रेज़ी भाषा और पश्चिमी ज्ञान के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करने वाला था। इसने ब्रिटिशकालीन शिक्षा नीति को आकार दिया और भारतीय शिक्षा में एक नई दिशा निर्धारित की।

3. वुड का घोषणा-पत्र टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: टिप्पणी – वुड का घोषणा-पत्र (1854)

सन् 1854 में चार्ल्स वुड ने शिक्षा सम्बन्धी एक घोषणा-पत्र प्रस्तुत किया। 

इसमें भारतीय शिक्षा के लिए निम्नलिखित मुख्य प्रस्ताव रखे गए:

(i) भारतीय शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेज़ी साहित्य और पाश्चात्य ज्ञान का प्रचार होना चाहिए।

(ii) शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होना चाहिए, ताकि आधुनिक ज्ञान का प्रसार हो सके।

(iii) शिक्षा विभाग में शिक्षा सचिव और शिक्षा-निरीक्षकों की नियुक्ति की जाए, जिससे विभागीय कार्य सुचारु रूप से चल सके।

(iv) शिक्षा के व्यय को केवल बड़े विद्यालयों तक सीमित न रखा जाए; इससे भारतीयों को शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ दूसरों को शिक्षा देने में भी समर्थ बनाया जा सके।

(v) नए विद्यालयों की स्थापना की जाए, जिनमें शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ भी हो।

वुड के घोषणा-पत्र में जन-शिक्षा को प्राथमिकता दी गई थी। इसे सफल बनाने के लिए शिक्षा संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करने हेतु अनुदान प्रणाली की सिफारिश की गई थी। इसके अंतर्गत विद्यालय भवन निर्माण, पुस्तकालय, अध्यापकों के वेतन और छात्रों के लिए छात्रवृत्ति हेतु अलग-अलग अनुदान निर्धारित किए गए।

इन सिफारिशों के कारण वुड का घोषणा-पत्र विशेष महत्त्वपूर्ण माना गया। कुछ विद्वानों ने इसे भारतीय शिक्षा का ‘महाधिकार-पत्र’ (Magna Carta) तक कहा है।

यदि चाहो तो मैं इसे और भी संक्षिप्त और परीक्षा-अनुकूल रूप में भी तैयार कर सकता हूँ।

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