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UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 6 भारतीय शिक्षाशास्त्री-पण्डित मदन मोहन मालवीय
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भारतीय शिक्षाशास्त्री-पण्डित मदन मोहन मालवीय
Chapter: 6
| खण्ड ‘क’ आधुनिक शैक्षिक विचारधारा का विकास |
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
1. पण्डित मदनमोहन मालवीय जी के अनुसार शिक्षा के अर्थ, उद्देश्यों तथा विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
या पण्डित मदनमोहन मालवीय के शैक्षिक विचारों का वर्णन कीजिए।
या पण्डित मदन मोहन मालवीय के अनुसार शिक्षा के उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: पण्डित मदन मोहन मालवीय के शैक्षिक विचार-
मालवीय जी एक महान शिक्षाविद्, राष्ट्रभक्त और समाज-सुधारक थे। उनके अनुसार शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज का सर्वांगीण विकास है।
उनके विचार इस प्रकार हैं—
शिक्षा का अर्थ:
(i) शिक्षा का उद्देश्य केवल पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिक विकास और राष्ट्रीय चेतना का जागरण है।
(ii) शिक्षा से व्यक्ति के जीवन में धर्म, संस्कृति और आचार का समावेश होना चाहिए।
शिक्षा के उद्देश्य:
(i) धार्मिक एवं नैतिक विकास: शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य धर्म, सदाचार और नैतिक मूल्यों का विकास करना।
(ii) राष्ट्रीय भावना का विकास: शिक्षा से भारतवासियों में देशप्रेम और राष्ट्रीय एकता की भावना जागृत करना।
(iii) सांस्कृतिक पुनरुत्थान: भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला का संरक्षण एवं संवर्धन।
(iv) जीवनोपयोगी शिक्षा: शिक्षा ऐसी हो जो समाज और जीवन की आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
(v) सर्वजन हेतु शिक्षा: समाज के सभी वर्गों—स्त्रियों और शूद्रों सहित—को शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना।
शिक्षा के विभिन्न प्रकार:
(i) धार्मिक शिक्षा: प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुरूप धर्म और अध्यात्म पर आधारित।
(ii) सांस्कृतिक शिक्षा: भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति का संरक्षण करने वाली।
(iii) भाषा शिक्षा: संस्कृत को सांस्कृतिक, मातृभाषा को सामान्य जीवन, और अंग्रेज़ी को उच्च शिक्षा व आधुनिक ज्ञान हेतु आवश्यक माना।
(iv) राष्ट्रीय शिक्षा: शिक्षा को भारतीय परंपराओं से जोड़कर राष्ट्रीय उत्थान का साधन बनाना।
(v) स्त्री-शिक्षा: स्त्रियों को भी समान अवसर प्रदान करने पर बल।
निष्कर्ष:
मालवीय जी के अनुसार शिक्षा का लक्ष्य धर्म, संस्कृति, चरित्र, राष्ट्रीयता और आधुनिकता का समन्वय है। उनकी शिक्षा-दृष्टि के कारण ही उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे महान संस्थान की स्थापना की, जो आज भी उनके विचारों की जीवंत अभिव्यक्ति है।
लघु उत्तरीय प्रश्न-
1. मालवीय जी के जीवन-वृत्त का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: पण्डित मदनमोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर, 1861 ई० को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने सन् 1884 ई० में बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे कुछ समय तक दैनिक हिन्दी पत्र ‘हिन्दुस्तान के सम्पादक रहे। उन्होंने स्वयं ‘अभ्युदय नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ करवाया था। मालवीय जी का जीवन सरलता तथा पवित्रता का आदर्श जीवन था। वे एक महान् वक्ता थे। उनका हिन्दी, संस्कृत तथा अंग्रेजी तीनों भाषाओं पर असाधारण अधिकार था। मालवीय जी ने अखिल भारतीय कांग्रेस के 1909 ई० के लाहौर और 1918 ई० के दिल्ली अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। सन् 1902 ई० में इनका चुनाव प्रान्तीय विधान परिषद् के लिए हुआ। सन् 1910 ई० में वे इम्पीरियल लेजिस्लेंटिव कौंसिल के सदस्य चुन लिए गए और सन् 1920 ई० तक सदस्य रहे।
सन् 1919 ई० में इन्होंने रौलेट ऐक्ट के विरोध में जोरदार ऐतिहासिक भाषण दिया था। सन् 1924 ई० में मालवीय जी भारतीय विधानसभा के सदस्य चुने गए तथा सन् 1927 ई० में वे राष्ट्रीय दल के असेम्बली में नेता रहे। सन् 1931 ई० में मालवीय जी द्वितीय गोलमेज परिषद् की बैठक में भाग लेने के लिए लन्दन गए। सन् 1932 ई० में उन्होंने अखिल भारतीय एकता सम्मेलन का सभापतित्व ग्रहण किया। मालवीय जी हिन्दुत्व के पोषक थे। सनातन धर्म महासभा के वे प्राण समझे जाते थे। इन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना करके अपना नाम अमर कर लिया। 12 नवम्बर, 1946 ई० को इस महान् राजनीतिज्ञ, देशभक्त, समाजोद्धारक तथा शिक्षाशास्त्री ने अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया।
2. शिक्षा के पाठ्यक्रम के विषय में मालवीय जी के विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: मालवीय जी का मत यह था कि पाठ्यक्रम का आधार व्यक्ति, समाज एवं देश की आवश्यकता, संस्कृति एवं जीवन दर्शन होना चाहिए, इसलिए उन्होंने संस्कृत एवं धर्म की शिक्षा को पाठ्यक्रम का अनिवार्य विषय बनाने पर बल दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने कलात्मक विषयों को भी स्वीकार किया। उनका कहना था कि अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा का अध्ययन तभी करना चाहिए जब कि उससे भारतीय साहित्य, विज्ञान एवं भाषा के अध्ययन में सहायता मिले। उन्होंने पाठ्यक्रम में कुछ ऐसे विषयों को भी स्थान दिया जिनसे विद्यार्थी अपने जीविकोपार्जन की समस्या हल कर सकें; जैसे-चिकित्सा, कानून, अध्यापन आदि। इसके अतिरिक्त उन्होंने सामाजिक विषयों-इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि को भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया। मालवीय जी ने सन् 1904 ई० में व्यावहारिक दृष्टिकोण से शिक्षा के एक व्यापक पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार की, जिसमें प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक का सम्पूर्ण शिक्षा-पाठ्यक्रम निहित था।

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