UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 2 बौद्ध-काल में भारतीय शिक्षा

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UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 2 बौद्ध-काल में भारतीय शिक्षा

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Chapter: 2

खण्ड ‘क’ आधुनिक शैक्षिक विचारधारा का विकास

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्यों एवं आदर्शों का उल्लेख कीजिए।

बौद्ध शिक्षा-प्रणाली के क्या उद्देश्य थे? वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता की विवेचना कीजिए।

उत्तर: बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्य एवं आदर्श-

उद्देश्य:

सभी के लिए समान शिक्षा।

नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास।

ज्ञानात्मक, व्यावहारिक और तकनीकी शिक्षा।

शारीरिक और मानसिक विकास।

आदर्श:

अनुशासन और संयम।

जीवनोपयोगी ज्ञान।

स्त्री शिक्षा और समान अवसर।

सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना।

वर्तमान प्रासंगिकता:

समान अवसर और लैंगिक समानता।

व्यावहारिक व तकनीकी शिक्षा।

नैतिक शिक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व।

शारीरिक और मानसिक विकास।

2. बौद्धकालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: बौद्धकालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ-

(i) सर्वसमावेशी शिक्षा: जाति-पाँति और धन की परवाह किए बिना सभी को शिक्षा।

(ii) स्त्री-शिक्षा का विकास: महिलाओं को भी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर।

(iii) जीवनोपयोगी पाठ्यक्रम: धर्म, भाषा, विज्ञान, कला, व्यवसायिक और औद्योगिक शिक्षा।

(iv) गुरु-शिष्य परंपरा: अनुशासन, संयम और नैतिक शिक्षा पर बल।

(v) शारीरिक व मानसिक विकास: खेल-कूद, व्यायाम, ध्यान और मानसिक प्रशिक्षण।

(vi) शिक्षण केंद्र: मठ, विश्वविद्यालय और सामूहिक शिक्षा प्रणाली।

(vii) व्यावहारिक शिक्षण विधियाँ: प्रवचन, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तर, निरीक्षण, प्रयोगात्मक और मॉनीटोरियल विधि।

(viii) पुस्तक एवं साहित्य का विकास: पुस्तकालय और लेखन-पाठ पर जोर।

(ix) समान अवसर: सभी वर्गों के बालक घर में रहते हुए शिक्षा ग्रहण कर सकते थे।

यदि चाहें तो मैं इसे और संक्षिप्त रूप में 5-6 बिंदुओं में भी प्रस्तुत कर सकता हूँ।

3. वैदिक और बौद्ध शिक्षा-प्रणालियों की समानताओं और असमानताओं की विवेचना कीजिए।

या वैदिककाल तथा बौद्ध-शिक्षा की समानताओं तथा असमानताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर: वैदिक और बौद्ध शिक्षा की समानताएँ व असमानताएँ-

समानताएँ:

(i) गुरु-शिष्य परंपरा।

(ii) नैतिक और धार्मिक शिक्षा पर बल।

(iii) उच्च शिक्षा में भाषा, दर्शन, तर्क और कला का अध्ययन।

(iv) अनुशासन और संयम आवश्यक।

असमानताएँ:

विशेषतावैदिक शिक्षाबौद्ध शिक्षा
भाषासंस्कृतपालि और स्थानीय भाषाएँ
जाति भेदउच्च जातियों को प्राथमिकतासभी वर्गों के लिए शिक्षा
स्त्री शिक्षासीमितसभी के लिए संभव
व्यावहारिक शिक्षाकमतकनीकी, औद्योगिक व व्यवसायिक शिक्षा
शिक्षण केंद्रआश्रममठ और विश्वविद्यालय

संक्षेप: वैदिक शिक्षा आध्यात्मिक थी, बौद्ध शिक्षा सर्वसमावेशी और जीवनोपयोगी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. बौद्धकालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्धों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: बौद्धकालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध-

बौद्धकालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध अत्यंत गहन और अनुशासित था। इसमें शिक्षक का स्थान सर्वोपरि था और वह न केवल ज्ञान का स्रोत बल्कि नैतिक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी माना जाता था। 

प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं–

(i) सादगी और अनुशासन: शिष्य गुरु के प्रति पूर्ण सम्मान और आज्ञाकारिता रखते थे।

(ii) आधिकारिक अधिकार: गुरु शिक्षा के साथ-साथ शिष्य के नैतिक और सामाजिक जीवन की देखरेख भी करते थे।

(iii) व्यक्तिगत मार्गदर्शन: प्रत्येक शिष्य की क्षमताओं और प्रवृत्तियों के अनुसार शिक्षा दी जाती थी।

(iv) आध्यात्मिक प्रशिक्षण: ज्ञान के साथ ध्यान, ध्यान साधना और आत्म-अनुशासन पर बल।

(v) समीक्षा और परीक्षा: गुरु समय-समय पर शिष्यों के ज्ञान, कौशल और व्यवहार का मूल्यांकन करते थे।

(vi) स्नेह और समर्थन: गुरु-शिष्य सम्बन्ध केवल औपचारिक नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण और मार्गदर्शनात्मक होता था।

2. बौद्धकालीन शिक्षा के पाठ्यक्रम का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: बौद्धकालीन शिक्षा का पाठ्यक्रम बौद्धकालीन शिक्षा का पाठ्यक्रम चार स्तरों में बँटा था – प्रारम्भिक, उच्च, औद्योगिक और व्यावसायिक।

(i) प्रारम्भिक शिक्षा: लिखना-पढ़ना, गणित, पंचविद्या (शब्द, शिल्प, चिकित्सा, हेतु व अध्यात्म)।

(ii) उच्च शिक्षा: धर्म, भाषा, इतिहास, भूगोल, राजनीति, ज्योतिष, न्याय, शिल्प, कला व प्रशासन।

(iii) औद्योगिक शिक्षा: कला-कौशल।

(iv) व्यावसायिक शिक्षा: उद्योग व व्यवसाय।

मुख्य अध्ययन विषय–

(i) धार्मिक शिक्षा: त्रिपिटक (सुत्त, विनय, अभिधम्म)।

(ii) हिन्दू दर्शन: वेद, पुराण, व्याकरण, ज्योतिष, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक।

(iii) भाषाएँ: पालि, संस्कृत, तिब्बती, चीनी।

(iv) विज्ञान व कला: चिकित्सा, शिल्प, तर्क, विधिशास्त्र, कला।

अन्य विषय: आखेट, धनुर्विद्या, सैन्य विज्ञान, शल्य व अस्त्र विज्ञान, लेखा व मुद्रा विज्ञान, प्रकृति अध्ययन आदि।

3. बौद्धकालीन शिक्षा के प्रबन्ध का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: बौद्धकालीन शिक्षा की मुख्य विधियाँ-

(i) शिक्षक शिक्षण: पुराने पाठ का पुनःस्मरण और नया पाठ पढ़ाना।

(ii) प्रवचन/व्याख्यान: विषयों पर व्याख्यान और शुद्ध उच्चारण।

(iii) वाद-विवाद: शास्त्रार्थ व तर्क द्वारा सत्य की स्थापना।

(iv) प्रश्नोत्तर: शंकाओं का समाधान और जिज्ञासा का विकास।

(v) मॉनीटोरियल: वरिष्ठ छात्रों द्वारा कनिष्ठों को पढ़ाना।

(vi) पुस्तक अध्ययन: पुस्तकों से ज्ञान प्राप्ति।

(vii) सम्मेलन: विशेष अवसरों पर सामूहिक चर्चा।

(viii) निदिध्यासन: आत्मचिंतन व ध्यान।

(ix) भ्रमण/निरीक्षण: यात्रा व प्रकृति निरीक्षण से शिक्षा।

(x) व्यावसायिक/प्रयोगात्मक: कारीगरों की देखरेख में शिल्प व व्यवसाय का अभ्यास।

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