UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 5 स्वतंत्र भारत में शिक्षा

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UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 5 स्वतंत्र भारत में शिक्षा

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Also, you can read the UPMSP book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Uttar Pradesh Madhyamik Shiksha Parishad (UPMSP) Book guidelines. These solutions are part of UP Board All Subject Solutions. Here we have given UP Board Class 12 Pedagogy Hindi Medium Solutions, UP Board of Secondary Education Course Pedagogy Notes in Hindi for All Chapter, You can practice these here.

Chapter: 5

खण्ड ‘क’ आधुनिक शैक्षिक विचारधारा का विकास

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. स्वतंत्रता के बाद भारत में शिक्षा के विकास का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

उत्तर: स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा का विकास:

15 अगस्त, 1947 ई० को भारत में एक दीर्घकालीन संघर्ष के बाद स्वतन्त्रता का सूर्योदय हुआ। स्वतन्त्रता के बाद देश में शिक्षा का प्रसार एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी। अतः जनसाधारण तथा सरकार दोनों का ध्यान शिक्षा के प्रसार की ओर जाना स्वाभाविक था। शिक्षा की समस्या का निराकरण करने से अनेक अन्य समस्याओं का समाधान हो सकता था। अत: देश में शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर सुधार और विकास के अनेक प्रयत्न आरम्भ हुए, जो आज भी जारी हैं।

(i) बेसिक शिक्षा-महात्मा गाँधी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा या ‘वर्धा शिक्षा योजना को सरकार ने राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा बनाकर सम्पूर्ण देश में लागू कर दिया। देश में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और नि:शुल्व कर दिया गया है। इस शिक्षा को स्थानीय सुविधा के अनुसार हस्तंकला पर आधारित करने का प्रयास किया गया।

(ii) विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग-स्वतन्त्र भारत में उच्च शिक्षा को सुसंगठित और, नियोजित करने के लिए सर्वप्रथम डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग की नियुक्ति की गई। नवम्बर, 1948 ई० में गठित विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग में डॉ० जाकिर हुसैन, डॉ० लक्ष्मण स्वामी मुदालियर, डॉ० मेघनाथ शाह, डॉ० ताराचन्द, डॉ० बहल, डॉ० आर्थर मार्गन, डॉ० जोन टिगर्ट तथा डॉ० जेम्स डफ आदि विख्यात शिक्षाशास्त्री सदस्य बनाए गए।

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(iii) माध्यमिक शिक्षा आयोग-देश में लोकतन्त्र को मजबूत बनाने और शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिए माध्यमिक शिक्षा को एक नवीन दिशा देना आवश्यक एवं अनिवार्य समझा गया। इसी । उद्देश्य की पूर्ति के लिए 23 दिसम्बर, 1952 ई० को ‘माध्यमिक शिक्षा आयोग की नियुक्ति की गई। इस शिक्षा आयोग के अध्यक्ष डॉ० लक्ष्मण स्वामी मुदालियर थे। इसी कारण इसे ‘मुदालियर आयोग भी कहा जाता है। इस आयोग ने वर्तमान माध्यमिक शिक्षा के दोषों पर दृष्टिपात करते हुए भाषाओं की शिक्षा, शिक्षा में अंग्रेजी का स्थान, प्राच्य भाषाओं को स्थान, पाठ्यक्रम के निर्माण के सिद्धान्त, धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा, चरित्र-निर्माण, अनुशासन, शारीरिक शिक्षा, परीक्षा तथा मूल्यांकन, अध्यापकों की प्रगति एवं प्रशिक्षण आदि विषयों पर व्यापक रूप से विचार करके अनेक विस्तृत सुझाव दिए। सरकार इन्हीं सुझावों के आधार पर माध्यमिक शिक्षा को एक नया रूप देने का प्रयास कर रही है।

(iv) शिक्षा आयोग-भारत में शिक्षा की स्थिति का पूर्ण सर्वेक्षण करने और वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार उसकी रूपरेखा बनाने के सम्बन्ध में सिफारिशें देने के लिए 1964 ई० में डॉ० दौलतसिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग की नियुक्ति की गई। इस आयोग को ‘कोठारी कमीशन के नाम से भी जाना जाता है। इस आयोग ने 1966 ई० में भारतीय शिक्षा के हर पहलू का विस्तृत अध्ययन कर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार की।

इस आयोग ने शिक्षा और राष्ट्रीय लक्ष्य, विद्यालय शिक्षा की संरचना, पूर्व प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा तथा कृषि शिक्षा के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। आयोग ने शिक्षक की स्थिति, अध्यापक शिक्षा, शैक्षिक अवसरों की समानता, विद्यालय प्रशासन और निरीक्षण, शिक्षण विधियाँ, मार्ग प्रदर्शन एवं मूल्यांकन, त्रिभाषा फॉर्मूला, हिन्दी का स्थान, विभिन्न भारतीय भाषाओं का स्थान, आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास, अंग्रेजी का स्थान आदि विषयों पर विचार करके अनेक सिफारिशें दी हैं। इस आयोग की बहुत-सी सिफारिशों को सरकार ने स्वीकार करके कार्यान्वित भी कर दिया है।

(v) पंचवर्षीय योजनाएँ और शिक्षा-भारत सरकार ने सभी पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देकर इसकी प्रगति को आगे बढ़ाया है। नियोजित एवं क्रमबद्ध रूप से विकास होने के कारण देश में शिक्षा का प्रसार निरन्तर प्रगति पर है। विगत वर्षों में सरकार ने नवीन शिक्षा नीति लागू की है। इस नीति के अन्तर्गत देश में प्रचलित शिक्षा के गुणात्मक सुधार पर विशेष बल दिया जा रहा है। नवोदय विद्यालय व खुले विश्वविद्यालय आदि की स्थापना नई शिक्षा-नीति के प्रतीक हैं। वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल शिक्षा के उद्देश्यों में परिवर्तन किया जा रहा है। पाठ्यक्रमों को वैज्ञानिक रूप दिया जा रहा है। परीक्षाओं में आमूल-चूल परिवर्तन किया गया है। शोध और अनुसन्धान को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उच्च शिक्षा, स्त्री-शिक्षा, कृषि अनुसन्धान, वैज्ञानिक शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, अध्यापकों को प्रशिक्षण आदि के क्षेत्र में नूतन प्रयोग किए जा रहे हैं। शैक्षिक प्रशासन को भी पुनर्गठित और गतिशील किया जा रहा है।

2. वर्तमान भारतीय शिक्षा की नवीन प्रवृत्तियों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।

उत्तर: वर्तमान भारतीय शिक्षा में अनेक नवीन प्रवृत्तियाँ उभर कर सामने आई हैं, जो शिक्षा को आधुनिक, व्यावहारिक और सर्वांगीण बनाने में सहायक हैं।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं—

(i) नई शिक्षा नीति (2020) का क्रियान्वयन।

(ii) शिक्षा का डिजिटलीकरण – ऑनलाइन शिक्षा, ई-लर्निंग, स्मार्ट क्लास।

(iii) कौशल विकास शिक्षा – व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा पर बल।

(iv) निरंतर एवं समग्र मूल्यांकन (CCE) की व्यवस्था।

(v) बहुभाषिकता और मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा।

(vi) शिक्षा में समान अवसर – लड़कियों, अनुसूचित जाति, जनजाति व ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए विशेष योजनाएँ।

(vii) जीवनोपयोगी एवं रोजगारोन्मुख शिक्षा।

(viii) पर्यावरण शिक्षा एवं नैतिक शिक्षा पर बल।

3. ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986′ की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 को “सभी के लिए शिक्षा” के लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से बनाया गया था। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

(i) समानता और गुणवत्ता पर बल।

(ii) बालिका शिक्षा का प्रोत्साहन।

(iii) शिक्षा का सार्वभौमिकरण (Universalization of Education)।

(iv) निरंतर और समग्र मूल्यांकन की संकल्पना।

(v) शिक्षा का व्यावसायीकरण और तकनीकीकरण।

(vi) शिक्षक प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक विकास पर ध्यान।

(vii) राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना।

(viii) 12 वर्षों की समान शिक्षा प्रणाली (10+2) को प्रोत्साहन।

(ix) शिक्षा में विकेन्द्रीकरण व सामुदायिक सहभागिता।

(x) सांस्कृतिक मूल्यों, पर्यावरण और नैतिक शिक्षा पर बल।

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. ‘राधाकृष्णन आयोग द्वारा शिक्षा के माध्यम सम्बन्धी दी गई सिफारिशों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा के माध्यम का विशेष महत्त्व होता है। ‘राधाकृष्णन् आयोग ने तत्कालीन भारतीय परिस्थितियों का विस्तृत अध्ययन करने के उपरान्त शिक्षा के माध्यम के विषय में निम्नलिखित सिफारिशें प्रस्तुत की थीं सर्वप्रथम सुझाव दिया गया कि उच्च शिक्षा के लिए प्रादेशिक भाषाओं को माध्यम बनाना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ संघीय भाषा अर्थात् हिन्दी को शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वीकार करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसके साथ-ही-साथ यह भी निर्देश दिया गया कि हिन्दी भाषा के लेखन के लिए केवल देवनागरी लिपि को ही अपनाना चाहिए। यह भी निर्देश दिया गया कि संघीय भाषा के साथ-ही-साथ प्रादेशिक भाषाओं के समुचित विकास के लिए यथासम्भव प्रयास किए जाने चाहिए। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि भले ही आयोग ने शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दी एवं प्रादेशिक भाषाओं को अपनाने का सुझाव दिया परन्तु आयोग ने हाईस्कूल से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक अंग्रेजी भाषा के अध्ययन को भी आवश्यक माना था। वास्तव में नवीन ज्ञान को अर्जित करने के लिए अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य माना गया था।

2. आचार्य नरेन्द्र देव समिति का सामान्य परिचय दीजिए।

उत्तर: उत्तर प्रदेश सरकार ने सन् 1952 ई० में प्रदेश में शैक्षिक प्रगति के मूल्यांकन तथा सुधार के लिए उपयोगी सुझाव प्रस्तुत करने के लिए अलग से एक विशेष समिति का गठन किया। इस समिति को ‘माध्यमिक शिक्षा पुनर्गठन समिति के नाम से गठित किया गया था तथा आचार्य नरेन्द्र देव को इस समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। अध्यक्ष के नाम के आधार पर इस समिति को आचार्य नरेन्द्र देव समिति के नाम से भी जाना जाता है।

आचार्य नरेन्द्र देव समिति को गठित करने का मुख्य उद्देश्य यह ज्ञात करना था कि उत्तर प्रदेश में उच्चतर माध्यमिक शिक्षा की स्थिति क्या है तथा उसकी सफलता की क्या स्थिति है। प्रदेश के उन छात्रों को क्या सफलता प्राप्त हुई है, जिन छात्रों ने व्यावहारिक तथा व्यावसायिक विषयों की शिक्षा प्राप्त की है। समिति को यह भी ज्ञात करना था कि सामान्य-शिक्षा तथा प्राविधिक शिक्षा में समन्वय स्थापित करने के लिए क्या उपाय किये जाएँ। समिति को यह भी ज्ञात करना था कि प्रदेश में साहित्यिक, वैज्ञानिक, व्यावसायिक, रचनात्मक तथा कलात्मक वर्गों की शिक्षा की वास्तविक स्थिति क्या है तथा इन वर्गों की शिक्षा की क्या उपयोगिता है। इस व्यवस्था से छात्रों को अपनी अभिरुचि तथा अभिवृत्ति के अनुसार विषयों के चुनाव में क्या सुविधा प्रदान की है। इन मुख्य विषयों के साथ-ही-साथ समिति के अध्ययन-क्षेत्र में विद्यालयों में प्रवेश, पाठ्यक्रम, पाठ्य-पुस्तकों के चुनाव, शिक्षण संस्थाओं में अवकाश के निर्धारण तथा प्रदेश में स्थापित की गयी व्यक्तिगत संस्थाओं के दोषों के निवारण के उपायों आदि को सम्मिलित किया गया था। इस प्रकार स्पष्ट है कि आचार्य नरेन्द्र देव समिति का अध्ययन-क्षेत्र पर्याप्त विस्तृत था। आचार्य नरेन्द्र देव समिति ने उत्तर-प्रदेश की शैक्षिक स्थिति का विस्तृत अध्ययन किया तथा रिपोर्ट प्रस्तुत की। प्रदेश की सरकार ने राष्ट्रीय शैक्षिक-नीतियों के परिप्रेक्ष्य में कुछ सुधारों एवं परिवर्तनों को लागू करने के प्रयास किये।

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