UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 9 भारतीय शिक्षाशास्त्री-रवीन्द्रनाथ टैगोर

UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 9 भारतीय शिक्षाशास्त्री-रवीन्द्रनाथ टैगोर Solutions Hindi Medium As Per New Syllabus to each chapter is provided in the list so that you can easily browse throughout different chapters UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 9 भारतीय शिक्षाशास्त्री-रवीन्द्रनाथ टैगोर Notes and select need one. UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 9 भारतीय शिक्षाशास्त्री-रवीन्द्रनाथ टैगोर Question Answers Download PDF. UP Board Study Material of Class 12 Pedagogy.

UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 9 भारतीय शिक्षाशास्त्री-रवीन्द्रनाथ टैगोर

Join Telegram channel
Follow us:
facebook sharing button
whatsappp sharing button
instagram sharing button

Also, you can read the UPMSP book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Uttar Pradesh Madhyamik Shiksha Parishad (UPMSP) Book guidelines. These solutions are part of UP Board All Subject Solutions. Here we have given UP Board Class 12 Pedagogy Hindi Medium Solutions, UP Board of Secondary Education Course Pedagogy Notes in Hindi for All Chapter, You can practice these here.

Chapter: 9

खण्ड ‘क’ आधुनिक शैक्षिक विचारधारा का विकास

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. टैगोर के शिक्षा-दर्शन की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

या

टैगोर के अनुसार शिक्षा के अर्थ एवं उद्देश्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा-दर्शन मानवतावादी और प्राकृतिक था।

मुख्य विशेषताएँ/उद्देश्य:

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Join Now

(i) सर्वांगीण विकास: शारीरिक, मानसिक, नैतिक व आध्यात्मिक उन्नति।

(ii) प्रकृति के निकट शिक्षा: प्राकृतिक वातावरण में स्वतंत्र व आनंदमय शिक्षण।

(iii) सृजनात्मकता का विकास: साहित्य, कला, संगीत व काव्य के माध्यम से।

(iv) सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्य: भारतीय संस्कृति व मानवता की भावना का संवर्धन।

(v) विश्वबंधुत्व: अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण व सार्वभौमिक संस्कृति का विकास।

(vi) स्वतंत्रता व आत्म-अभिव्यक्ति: बालक की रुचि व स्वभाव को महत्व।

2. रवीन्द्रनाथ टैगोर के शैक्षिक प्रयोग का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने शिक्षा-दर्शन को व्यावहारिक रूप देने के लिए शांति निकेतन (1901) और बाद में विश्वभारती विश्वविद्यालय (1921) की स्थापना की। 

उनके शैक्षिक प्रयोग का मूल्यांकन इस प्रकार किया जा सकता है–

सकारात्मक पक्ष:

(i) प्रकृति आधारित शिक्षा: बच्चों को खुले वातावरण में प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच शिक्षा देना।

(ii) आनंदमयी वातावरण: शिक्षा को बोझ न मानकर संगीत, कला, नृत्य व साहित्य के साथ जोड़ना।

(iii) सृजनात्मकता का विकास: छात्रों की प्रतिभा को स्वतंत्रता व आत्म-अभिव्यक्ति से विकसित करना।

(iv) सांस्कृतिक उन्नति: भारतीय संस्कृति, अध्यात्म व कला का संरक्षण तथा पश्चिमी शिक्षा के साथ समन्वय।

(v) अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण: शिक्षा को संकीर्णता से मुक्त कर विश्वबंधुत्व व मानवता की भावना विकसित करना।

सीमाएँ:

(i) आर्थिक कठिनाइयाँ: संस्थाओं को पर्याप्त आर्थिक सहयोग न मिलने से कार्य प्रभावित रहा।

(ii) व्यावहारिक शिक्षा की कमी: शिक्षा में वैज्ञानिक व तकनीकी प्रशिक्षण पर अपेक्षाकृत कम बल।

(iii) सीमित प्रभाव: यह प्रयोग मुख्यतः उच्च वर्ग व संपन्न वर्ग तक सीमित रह गया, आम जनता तक पूरी तरह नहीं पहुँच सका।

निष्कर्ष:

(i) टैगोर का शैक्षिक प्रयोग शिक्षा को स्वतंत्रता, सृजनात्मकता और मानवता से जोड़ने वाला था। यद्यपि इसमें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ रहीं, फिर भी यह भारतीय शिक्षा को एक नया दृष्टिकोण देने वाला और आज भी प्रेरणादायक माना जाता है।

3. विद्यालय के आधार पर रबीन्द्रनाथ टैगोर के शैक्षिक विचारों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने शैक्षिक विचारों को व्यवहार में परिणत करने के लिए शांति निकेतन विद्यालय (1901) और बाद में विश्वभारती विश्वविद्यालय (1921) की स्थापना की। 

उनके विद्यालय-आधारित शैक्षिक विचारों की व्याख्या इस प्रकार है–

प्रकृति के बीच शिक्षा:

(i) विद्यालय को प्राकृतिक वातावरण में स्थापित किया गया।

(ii) कक्षाएँ खुले आकाश के नीचे लगती थीं ताकि बालक प्रकृति से सीधे जुड़ सकें।

स्वतंत्रता एवं आनंदमय शिक्षा:

(i) विद्यार्थियों को कठोर अनुशासन और दमन से मुक्त रखा गया।

(ii) शिक्षा को बोझ न बनाकर गीत, संगीत, नृत्य और साहित्य के साथ जोड़ा गया।

सृजनात्मकता का विकास:

(i) कला, चित्रकला, संगीत, काव्य एवं हस्तकला के माध्यम से बालकों की रचनात्मक क्षमताओं का संवर्धन।

सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा:

(i) भारतीय संस्कृति, धर्म और अध्यात्म को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया गया।

(ii) साथ ही पश्चिमी विज्ञान और ज्ञान की उपयोगिता को भी स्वीकार किया।

अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण:

(i) विश्वभारती विश्वविद्यालय में विभिन्न देशों के विद्यार्थियों व विद्वानों को आमंत्रित किया गया।

(ii) उद्देश्य था – विद्यार्थियों में विश्वबंधुत्व एवं सार्वभौमिक मानवता का भाव विकसित करना।

व्यावहारिकता और जीवनोपयोगिता:

(i) शिक्षा को केवल पुस्तकीय न बनाकर जीवनोपयोगी बनाया गया।

(ii) कृषि, बागवानी, हस्तशिल्प और ग्रामीण जीवन से जुड़ी गतिविधियों को शिक्षा का हिस्सा बनाया गया।

4. शिक्षा में अन्तर्राष्ट्रीय तथा प्रकृतिवाद पर टैगोर के विचार दीजिए।

उत्तर: रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा-दर्शन मानवीयता, स्वतंत्रता और प्रकृति-प्रेम पर आधारित था। उन्होंने शिक्षा में अन्तर्राष्ट्रीयता और प्रकृतिवाद दोनों को विशेष महत्व दिया।

शिक्षा में अन्तर्राष्ट्रीयता:

(i) टैगोर का विश्वास था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय न होकर विश्वबंधुत्व का विकास होना चाहिए।

(ii) शिक्षा से छात्रों में संकीर्णता, जाति-भेद और राष्ट्र-भेद की भावना समाप्त कर सार्वभौमिक मानवता का निर्माण होना चाहिए।

(iii) इसी हेतु उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय (1921) की स्थापना की, जहाँ विभिन्न देशों के छात्र-शिक्षक मिलकर अध्ययन करते थे।

(iv) उनका कथन था – “भारत का आत्मा भारत से बाहर भी बोले और विश्व की आत्मा भारत में आकर अपना स्थान बनाए।”

शिक्षा में प्रकृतिवाद:

(i) टैगोर के अनुसार शिक्षा का सर्वोत्तम स्थान प्रकृति की गोद है।

(ii) बच्चे प्रकृति से जुड़कर स्वतंत्र, आनंदमय और रचनात्मक वातावरण में सीखते हैं।

(iii) शांति निकेतन विद्यालय में कक्षाएँ खुले वातावरण में लगाई जाती थीं।

(iv) उनका मानना था कि प्रकृति बच्चों को स्वतंत्रता, सौन्दर्य-बोध और सृजनात्मक प्रेरणा देती है।

(v) शिक्षा को पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखकर प्रकृति, कला और जीवन से जोड़ना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

1. रबीन्द्रनाथ टैगोर का जीवन-परिचय संक्षेप में लिखिए।

उत्तर: रवीन्द्रनाथ टैगोर – जीवन परिचय (संक्षेप में):

(i) जन्म: 7 मई 1861 ई., कोलकाता (जोरासांको, ठाकुर परिवार)।

(ii) पिता: देवेंद्रनाथ ठाकुर (प्रसिद्ध ब्रह्मसमाजी नेता)

(iii) माता: शारदा देवी।

(iv) टैगोर बचपन से ही प्रकृति, साहित्य और संगीत के प्रेमी थे।

(v) उन्होंने इंग्लैंड जाकर थोड़े समय तक पढ़ाई की, परंतु डिग्री पूरी नहीं की।

रचनात्मक योगदान:

(i) महान कवि, दार्शनिक, शिक्षाविद, चित्रकार, कथाकार और संगीतकार।

(ii) गीतांजलि काव्य-संग्रह के लिए 1913 ई. में नोबेल पुरस्कार प्राप्त (पहले एशियाई नोबेल विजेता)।

(iii) उन्होंने जन-गण-मन (भारत का राष्ट्रगान) और आमार सोनार बांग्ला (बांग्लादेश का राष्ट्रगान) की रचना की।

(iv) शांति निकेतन और बाद में विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना कर शिक्षा को नया रूप दिया।

(v) मृत्यु: 7 अगस्त 1941 ई., कोलकाता।

निष्कर्ष: रवीन्द्रनाथ टैगोर को “गुरुदेव” कहा जाता है। वे विश्वकवि, मानवतावादी और महान शिक्षाविद् थे जिनका योगदान साहित्य, कला और शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य है।

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

This will close in 0 seconds

Scroll to Top