UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 26 निर्देशन शैक्षिक तथा व्यावसायिक

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UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 26 निर्देशन शैक्षिक तथा व्यावसायिक

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Also, you can read the UPMSP book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per Uttar Pradesh Madhyamik Shiksha Parishad (UPMSP) Book guidelines. These solutions are part of UP Board All Subject Solutions. Here we have given UP Board Class 12 Pedagogy Hindi Medium Solutions, UP Board of Secondary Education Course Pedagogy Notes in Hindi for All Chapter, You can practice these here.

Chapter: 26

खण्ड ‘ख’ शिक्षा मनोविज्ञान

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. निर्देशन से आप क्या समझते हैं? निर्देशन की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: निर्देशन का अर्थ: ‘निर्देशन’ सामाजिक सम्पर्को पर आधारित एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा अन्य किसी व्यक्ति को इस प्रकार से सहायता प्रदान की जाती है कि वह अपनी जन्मजात और अर्जित योग्यताओं व क्षमताओं को समझते हुए अपनी समस्याओं का स्वतः समाधान करने में उपयोग कर सके।

आवश्यकता:

(i) जीवन की जटिलताओं को समझने हेतु।

(ii) शिक्षा, व्यवसाय और व्यक्तिगत निर्णयों में सहायता के लिए।

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(iii) आत्म-ज्ञान और आत्म-विकास के लिए।

महत्त्व एवं उपयोगिता:

(i) व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का सही ज्ञान होता है।

(ii) उचित निर्णय लेने में सहायता मिलती है।

(iii) शैक्षिक और व्यावसायिक जीवन में सफलता मिलती है।

(iv) समाज में संतुलित और उपयोगी नागरिक का विकास होता है।

2. शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: शैक्षिक निर्देशन का अर्थ एवं प्रक्रिया:

अर्थ: शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) का तात्पर्य विद्यार्थी को उसकी रुचि, क्षमता और योग्यता के अनुसार उपयुक्त विषय, अध्ययन विधि तथा शैक्षिक वातावरण चुनने में सहायता देना है।

प्रक्रिया:

(i) विद्यार्थी का अध्ययन (Collection of Data)– उसकी रुचि, क्षमता और उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त करना।

(ii) समस्या की पहचान (Diagnosis)– शैक्षिक कठिनाइयों का पता लगाना।

(iii) समाधान (Prognosis) – उपयुक्त उपाय सुझाना।

(iv) कार्यान्वयन (Implementation) – सुझाए गए उपायों का पालन करना।

(v) अनुवर्ती कार्य (Follow-up) – परिणामों का मूल्यांकन करना।

3. शैक्षिक निर्देशन की उपयोगिता एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए। 

या

शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।

या

शैक्षिक निर्देशन की क्या आवश्यकता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: शैक्षिक निर्देशन की उपयोगिता एवं महत्त्व:

(i) विद्यार्थी को अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार विषय चुनने में सहायता।

(ii) अध्ययन की कठिनाइयों को दूर करने में मदद।

(iii) शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार।

(iv) आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का विकास।

(v) उचित अध्ययन आदतों का निर्माण।

(vi) शैक्षिक असफलता और निराशा से बचाव।

4. सामूहिक शैक्षिक निर्देशन विधि और प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

या

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन और सामूहिक शैक्षिक निर्देशन विधियों का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए।

या

शैक्षिक निर्देशन की कितनी विधियाँ हैं ? उन्हें संक्षेप में समझाइए। 

उत्तर: शैक्षिक निर्देशन की दो मुख्य विधियाँ हैं—

वैयक्तिक शैक्षिक निर्देशन (Individual Guidance):

(i) प्रत्येक विद्यार्थी को अलग से परामर्श दिया जाता है।

(ii) व्यक्ति की समस्या का गहराई से विश्लेषण होता है।

(iii) अधिक सटीक और प्रभावी विधि।

सामूहिक शैक्षिक निर्देशन (Group Guidance):

(i) समान समस्याओं वाले विद्यार्थियों को एक साथ परामर्श दिया जाता है।

(ii) समय की बचत होती है।

(iii) जैसे—व्याख्यान, समूह चर्चा, कार्यशाला आदि।

5. व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया का भी विवरण प्रस्तुत कीजिए।

या

व्यावसायिक निर्देशन का क्या अर्थ है? माध्यमिक विद्यालयों में व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।

उत्तर: व्यावसायिक निर्देशन का अर्थ, परिभाषा एवं प्रक्रिया:

अर्थ: व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance) से आशय व्यक्ति को उसकी रुचि, योग्यता और परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त व्यवसाय चुनने में सहायता देना है।

परिभाषा:

(i) फ्रैंक पार्सन्स: “व्यावसायिक निर्देशन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति को अपने लिए सबसे उपयुक्त कार्य चुनने में सहायता दी जाती है।”

प्रक्रिया:

(i) व्यक्ति का अध्ययन: उसकी रुचि, क्षमता, स्वास्थ्य आदि का मूल्यांकन।

(ii) व्यवसायों की जानकारी: विभिन्न व्यवसायों के स्वरूप, योग्यता और अवसरों की जानकारी देना।

(iii) मेल-जोल (Matching): व्यक्ति की योग्यता और व्यवसाय की आवश्यकता में सामंजस्य।

(iv) निर्णय और कार्यान्वयन: उपयुक्त व्यवसाय का चयन और तैयारी।

(v) अनुवर्ती कार्य: सफलता और समायोजन का मूल्यांकन।

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