UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 21 शिक्षा में पुरस्कार एवं दण्ड

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UP Board Class 12 Pedagogy Chapter 21 शिक्षा में पुरस्कार एवं दण्ड

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Chapter: 21

खण्ड ‘ख’ शिक्षा मनोविज्ञान

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1. पुरस्कार का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। छात्रों को दिये जाने वाले पुरस्कारों के मुख्य प्रकारों का भी उल्लेख कीजिए।

उत्तर: पुरस्कार का अर्थ: पुरस्कार वह प्रोत्साहन है जो किसी व्यक्ति को उसके अच्छे कार्य, उत्कृष्ट प्रदर्शन या विशेष उपलब्धि के लिए दिया जाता है। यह विद्यार्थियों में उत्साह, रुचि तथा आत्मविश्वास उत्पन्न करने का एक प्रभावी माध्यम है। शिक्षा के क्षेत्र में पुरस्कार विद्यार्थियों के अच्छे आचरण, नियमितता, परिश्रम, विद्या-अर्जन, अनुशासन तथा सह-पाठ्य क्रियाओं में सफलता के लिए दिए जाते हैं।

परिभाषा: शिक्षा मनोविज्ञान के अनुसार—

“जब किसी व्यक्ति के किसी अच्छे कार्य के पश्चात् उसे कोई ऐसी वस्तु या अनुभव प्राप्त होता है जिससे उसे सुख की अनुभूति होती है, तो उसे पुरस्कार कहा जाता है।”

या सरल शब्दों में “किसी उत्तम कार्य के परिणामस्वरूप प्राप्त सुखद अनुभूति या प्रोत्साहन को पुरस्कार कहते हैं।”

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छात्रों को दिये जाने वाले पुरस्कारों के मुख्य प्रकार:

(i) भौतिक (Material) पुरस्कार: जैसे—पुस्तकें, नोटबुक, प्रमाणपत्र, पदक, ट्रॉफी, वस्त्र, पेन आदि। ये प्रत्यक्ष रूप से विद्यार्थियों को दिए जाने वाले पुरस्कार हैं।

(ii) अभौतिक (Non-material) पुरस्कार: जैसे—प्रशंसा, सराहना, शाबाशी, विशेष स्थान देना, सम्मानपूर्वक नाम लेना, कक्षा में तालियाँ बजवाना आदि। ये विद्यार्थियों के भावनात्मक प्रोत्साहन के साधन हैं।

(iii) सामाजिक पुरस्कार: जैसे—विद्यालय सभा में सम्मान, विद्यालय पत्रिका में नाम प्रकाशित करना, विद्यार्थियों के अभिभावकों के सामने प्रशंसा करना आदि। इससे सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है।

(iv) शैक्षिक पुरस्कार: जैसे—अधिक अंक प्राप्त करने पर छात्रवृत्ति देना, उच्च कक्षा में प्रमोशन, विशेष अध्ययन-सुविधा प्रदान करना आदि।

(v) नैतिक या आत्मिक पुरस्कार: जब छात्र अपने कार्य से आत्म-संतोष या नैतिक प्रसन्नता प्राप्त करता है, तो यह भी एक प्रकार का पुरस्कार है।

2. पुरस्कार देते समय ध्यान में रखने योग्य महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख कीजिए। या शिक्षा में पुरस्कार और दण्ड का महत्त्व अच्छी तरह से स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर: पुरस्कार (Reward) वह साधन है जिसके द्वारा विद्यार्थी के उत्तम आचरण, श्रेष्ठ कार्य, अध्ययन में रुचि तथा उत्कृष्ट उपलब्धियों को प्रोत्साहित किया जाता है। यह विद्यार्थियों के नैतिक, बौद्धिक तथा सामाजिक विकास में सहायक होता है।

पुरस्कार देते समय ध्यान रखने योग्य महत्त्वपूर्ण बातें:

(i) उचित उद्देश्य: पुरस्कार का उद्देश्य केवल प्रसन्न करना न होकर विद्यार्थियों में अच्छे गुण, आदर्श आचरण और परिश्रम की प्रवृत्ति को विकसित करना होना चाहिए।

(ii) न्याय और निष्पक्षता: पुरस्कार सबको समान अवसर देकर, बिना पक्षपात के, केवल योग्यता और प्रयास के आधार पर दिया जाना चाहिए।

(iii) व्यक्तिगत भिन्नता का ध्यान: प्रत्येक विद्यार्थी की रुचि, क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार पुरस्कार का चयन किया जाना चाहिए।

(iv) तत्काल प्रदान करना: पुरस्कार कार्य या सफलता के तुरंत बाद देना अधिक प्रभावी होता है क्योंकि इससे प्रेरणा बढ़ती है।

(v) अत्यधिक पुरस्कार न देना: बार-बार या अत्यधिक पुरस्कार देने से उसका प्रभाव कम हो जाता है; अतः सीमित और सार्थक पुरस्कार ही देने चाहिए।

(vi) नैतिक मूल्य का ध्यान: पुरस्कार ऐसे कार्यों के लिए न दिए जाएँ जिनसे अनुशासन या नैतिकता का ह्रास होता हो।

(vii) सार्वजनिक रूप से देना: पुरस्कार सार्वजनिक रूप से देने से विद्यार्थी में आत्मगौरव तथा अन्य विद्यार्थियों में प्रेरणा उत्पन्न होती है।

शिक्षा में पुरस्कार और दण्ड का महत्त्व:

(i) अनुशासन बनाए रखने में सहायक: पुरस्कार और दण्ड से कक्षा में अनुशासन बना रहता है।

(ii) प्रेरणा का साधन: पुरस्कार विद्यार्थियों को अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं जबकि दण्ड अनुचित कार्यों से रोकता है।

(iii) व्यवहार-संशोधन: दोनों के माध्यम से विद्यार्थियों के आचरण और आदतों में सुधार लाया जा सकता है।

(iv) अध्ययन में रुचि वृद्धि: पुरस्कार मिलने से विद्यार्थी अध्ययन में रुचि लेते हैं और बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

(v) चरित्र निर्माण: उचित पुरस्कार और संयमित दण्ड से विद्यार्थियों में सत्यनिष्ठा, परिश्रम और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।

3. दण्ड से आप क्या समझते हैं? छात्रों को दिये जाने वाले दण्ड के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: दण्ड (Punishment) से अभिप्राय यह है कि किसी अनुचित, अनुशासनहीन या अवांछनीय व्यवहार के प्रति अस्वीकृति प्रकट करने के लिए दी जाने वाली वह प्रतिक्रिया जिससे विद्यार्थी अपने दोष को समझ सके और भविष्य में सुधार कर सके। शैक्षिक क्षेत्र में दण्ड का उद्देश्य विद्यार्थियों को डराना या कष्ट पहुँचाना नहीं, बल्कि उनके आचरण का सुधार करना होता है।

दण्ड के मुख्य प्रकार निम्नलिखित है:

(i) शारीरिक दण्ड: इसमें शरीर को कष्ट पहुँचाया जाता है जैसे—खड़ा रखना, डांटना, थप्पड़ मारना आदि।

आधुनिक शिक्षा में इसे अनुचित और अमानवीय माना गया है तथा यह अधिकांश स्थानों पर प्रतिबंधित है।

(ii) मानसिक या मौखिक दण्ड: इसमें विद्यार्थी की भावनाओं को प्रभावित किया जाता है, जैसे—डाँटना, तिरस्कार करना, अपमानित करना, व्यंग्य करना आदि।

इसका उपयोग संयमपूर्वक और सुधार के उद्देश्य से ही किया जाना चाहिए।

(iii) सामाजिक दण्ड: इसमें विद्यार्थी को सामाजिक रूप से चेतावनी या अलगाव का अनुभव कराया जाता है, जैसे—सार्वजनिक रूप से चेतावनी देना, किसी विशेष गतिविधि से अस्थायी रूप से वंचित करना आदि।

(iv) शैक्षिक दण्ड: इसमें विद्यार्थी को उसके अनुचित कार्य से संबंधित सुधारात्मक कार्य कराए जाते हैं, जैसे—अतिरिक्त गृहकार्य देना, अनुशासन-नियम लिखवाना, विद्यालय सेवा में सहयोग लेना आदि।

4. दण्ड देते समय ध्यान में रखने योग्य महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख कीजिए। 

या 

विद्यालय में दण्ड देते समय किन-किन सावधानियों को ध्यान में रखना आवश्यक है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: विद्यालय में दण्ड का उद्देश्य विद्यार्थियों के अनुचित आचरण को सुधारना होता है, न कि उन्हें कष्ट पहुँचाना। 

इसलिए दण्ड देते समय शिक्षक को निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए—

(i) सुधारात्मक उद्देश्य: दण्ड का लक्ष्य विद्यार्थी में सुधार लाना होना चाहिए, प्रतिशोध लेना नहीं।

(ii) न्याय और निष्पक्षता: दण्ड बिना पक्षपात के, केवल गलती के आधार पर दिया जाए।

(iii) उचित मात्रा में दण्ड: अपराध की गंभीरता के अनुसार ही दण्ड दिया जाए, कठोर दण्ड से बचें।

(iv) शारीरिक दण्ड से बचें: शारीरिक दण्ड अमानवीय है; इससे विद्यार्थी में भय और विद्रोह की भावना उत्पन्न होती है।

(v) तत्काल और संबंधित हो: दण्ड गलती के तुरंत बाद दिया जाए ताकि विद्यार्थी उसे अपनी त्रुटि से जोड़ सके।

(vi) व्यक्तिगत भिन्नता का ध्यान: विद्यार्थी की आयु, मानसिक स्थिति और परिस्थिति को ध्यान में रखा जाए।

(vii) गोपनीय रूप से देना उचित: विद्यार्थी की आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए दण्ड सार्वजनिक रूप से न दिया जाए।

(viii) शांत और संयमित व्यवहार: शिक्षक क्रोध या भावावेश में आकर दण्ड न दे।

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