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NCERT Class 11 Economics Important Chapter 4 भारत में मानव पूँजी का निर्माण

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NCERT Class 11 Economics Important Chapter 4 भारत में मानव पूँजी का निर्माण

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Chapter: 4

भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास
IMPORTANT SOLUTIONS

लघु उत्तरीय प्रश्न:

1. मानव पूंजी से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: समाज को ऐसे योग्य व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो पहले स्वयं प्रशिक्षित हो चुके हों और दूसरों को शिक्षित व प्रशिक्षित कर सकें, जैसे- नर्स, किसान, अध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर आदि। इन प्रशिक्षित और कौशल युक्त मानव संसाधनों को ही मानव पूंजी कहा जाता है।

2. मानव पूंजी निर्माण के प्रमुख स्रोत क्या हैं?

उत्तर: शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्य के दौरान प्रशिक्षण, प्रवासन तथा सूचना आदि मानव पूंजी निर्माण के प्रमुख स्रोत हैं।

3. भौतिक पूंजी और मानव पूंजी में एक मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: भौतिक पूंजी को बाजार में बेचा जा सकता है और यह दृश्य होती है, जबकि मानव पूंजी अदृश्य होती है और इसे बाजार में नहीं बेचा जा सकता, केवल उसकी सेवाओं की बिक्री की जा सकती है।

4. व्यक्ति शिक्षा पर निवेश क्यों करता है?

उत्तर: व्यक्ति अपनी भविष्य की आय को बढ़ाने के लिए शिक्षा पर निवेश करता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कंपनियाँ भविष्य के लाभ के लिए पूंजीगत वस्तुओं पर खर्च करती हैं।

5. स्वास्थ्य व्यय के विभिन्न रूप कौन-से हैं?

उत्तर: प्रतिषेधी आयुर्विज्ञान (टीकाकरण), चिकित्सकीय आयुर्विज्ञान (बीमारियों की चिकित्सा), सामाजिक आयुर्विज्ञान (स्वास्थ्य साक्षरता का प्रसार) और स्वच्छ पेयजल का प्रावधान स्वास्थ्य पर व्यय के विभिन्न रूप हैं।

6. लोग प्रवासन क्यों करते हैं?

उत्तर: व्यक्ति अपने मूल स्थान की आय से अधिक आय वाले रोजगार की तलाश में प्रवासन करते हैं। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर प्रवासन मुख्य रूप से गांवों में बेरोजगारी के कारण होता है।

7. फर्में अपने कर्मचारियों के कार्य के दौरान प्रशिक्षण पर खर्च क्यों करती हैं?

उत्तर: फर्में प्रशिक्षण पर इसलिए खर्च करती हैं क्योंकि ऐसे खर्च की तुलना में प्रशिक्षण के बाद श्रम उत्पादकता में वृद्धि से होने वाले लाभ कहीं अधिक होते हैं।

8. आर्थिक संवृद्धि का क्या अर्थ है?

उत्तर: आर्थिक संवृद्धि का अर्थ देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि से होता है।

9. मानव पूंजी और मानव विकास के बीच मूल अंतर क्या है?

उत्तर: मानव पूंजी शिक्षा और स्वास्थ्य को श्रम की उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम मानती है, जबकि मानव विकास इस विचार पर आधारित है कि शिक्षा और स्वास्थ्य मानव कल्याण के अभिन्न अंग हैं।

10. भारत में संघीय स्तर पर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कौन-सी मुख्य संस्थाएं कार्य करती हैं?

उत्तर: शिक्षा के लिए शिक्षा मंत्रालय, NCERT, UGC तथा AICTE और स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और ICMR कार्य करते हैं।

11. भारत सरकार ने बच्चों की शिक्षा के लिए कौन-सा महत्वपूर्ण कानून बनाया है?

उत्तर: भारत सरकार ने ‘बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ (RTE) कानून बनाया है। इसके अंतर्गत 6-14 वर्ष के आयु-वर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है।

12. शिक्षा आयोग (1964-66) ने शिक्षा पर कितना व्यय करने की सिफारिश की थी?

उत्तर: शिक्षा आयोग (1964-66) ने सिफारिश की थी कि शैक्षिक उपलब्धियों की संवृद्धि दर में सुधार लाने के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम-से-कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए।

13. सरकार द्वारा लगाया गया ‘शिक्षा उपकर’ किस उद्देश्य के लिए होता है?

उत्तर: सरकार ने सभी केंद्रीय करों पर 2 प्रतिशत ‘शिक्षा उपकर’ लगाना प्रारंभ किया है, जिससे प्राप्त राजस्व को केवल प्राथमिक शिक्षा पर व्यय करने हेतु सुरक्षित रखा गया है।

14. सूचना पर व्यय, मानव पूंजी निर्माण का स्रोत कैसे है?

उत्तर: व्यक्ति श्रम बाजार तथा शिक्षा और स्वास्थ्य (कौशल और लागत) से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए व्यय करते हैं ताकि वे मानव पूंजी का सदुपयोग कर सकें, इसलिए यह मानव पूंजी निर्माण का एक स्रोत है।

15. भारत का ‘शिक्षा पिरामिड’ नुकीला क्यों कहा गया है?

उत्तर: भारत में शिक्षा का पिरामिड बहुत ही नुकीला है, जो यह दर्शाता है कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के मुकाबले उच्चतर शिक्षा स्तर तक बहुत कम लोग ही पहुँच पाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न:

1. भौतिक पूंजी और मानव पूंजी के बीच विस्तार से अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: भौतिक पूंजी और मानव पूंजी के बीच निम्नलिखित मुख्य अंतर हैं:

(i) दृश्यता और बिक्री: भौतिक पूंजी किसी भी अन्य वस्तु की भाँति दृश्य होती है और इसे बाजार में बेचा जा सकता है। इसके विपरीत, मानव पूंजी अदृश्य होती है और इसे बाजार में बेचा नहीं जा सकता, केवल इसकी सेवाओं की बिक्री की जा सकती है।

(ii) मालिक से पृथक्करण: भौतिक पूंजी को उसके मालिक से अलग किया जा सकता है, किंतु मानव पूंजी का उसके मालिक से पृथक्करण संभव नहीं है।

(iii) गतिशीलता: भौतिक पूंजी (कुछ अपवादों को छोड़कर) विश्व भर में निर्बाध रूप से आ-जा सकती है, लेकिन मानव पूंजी का प्रवाह राष्ट्रीयता और संस्कृति की बाधाओं के कारण उतना निर्बाध नहीं होता।

(iv) मूल्य ह्रास: मशीन आदि के लगातार प्रयोग से भौतिक पूंजी में घिसावट आती है। मानव पूंजी में भी आयु के अनुसार ह्रास आता है, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य में निरंतर निवेश से इसकी काफी सीमा तक भरपाई की जा सकती है।

(v) लाभ का स्वरूप: भौतिक पूंजी प्रायः निजी लाभ को जन्म देती है, जबकि मानव पूंजी से व्यक्तिगत लाभ के साथ-साथ सामाजिक हितलाभों का भी सृजन होता है।

2. शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता क्यों होती है?

उत्तर: शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है:

(i) शिक्षा और स्वास्थ्य की देखभाल निजी तथा सामाजिक लाभों को उत्पन्न करती है और इन सेवाओं के बाजार में निजी और सार्वजनिक दोनों संस्थाओं का अस्तित्व होता है।

(ii) शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय महत्वपूर्ण दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं और उन्हें आसानी से बदला नहीं जा सकता है। यदि किसी बच्चे को खराब स्कूल या स्वास्थ्य देखभाल केंद्र में भेज दिया जाए, तो उसे दूसरी जगह स्थानांतरित करने से पहले ही काफी हानि हो चुकी होती है।

(iii) इन सेवाओं के व्यक्तिगत उपभोक्ताओं को सेवाओं की गुणवत्ता और लागतों के विषय में पूर्ण जानकारी नहीं होती है।

(iv) ऐसी परिस्थितियों में निजी सेवा प्रदाता एकाधिकार प्राप्त कर सकते हैं और शोषण करने लग सकते हैं। इसलिए सरकार की भूमिका आवश्यक है ताकि वह निजी सेवा प्रदाताओं को उचित मानकों के अनुसार सेवाएँ देने तथा उचित कीमत वसूलने के लिए बाध्य कर सके।

(v) भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ जनसंख्या का एक विशाल वर्ग गरीबी रेखा के नीचे है, लोग बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल का भार वहन नहीं कर सकते। इसलिए यह अनिवार्य है कि सरकार ये सुविधाएँ निःशुल्क प्रदान करे।

3. मानव पूंजी और मानव विकास की अवधारणाओं के बीच क्या अंतर है?

उत्तर: मानव पूंजी और मानव विकास की अवधारणाओं के बीच अंतर है:

मानव पूंजी (Human Capital): यह अवधारणा शिक्षा और स्वास्थ्य को श्रम की उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम मानती है। यह मानव को किसी साध्य की प्राप्ति (उत्पादकता में वृद्धि) का ‘साधन’ मानती है। इस मत के अनुसार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर किया गया निवेश अनुत्पादक है यदि उससे वस्तुओं और सेवाओं के निर्गत में वृद्धि न हो।

मानव विकास (Human Development): यह इस विचार पर आधारित है कि शिक्षा और स्वास्थ्य मानव कल्याण के अभिन्न अंग हैं। इस परिप्रेक्ष्य में मानव स्वयं ‘साध्य’ भी है। भले ही शिक्षा या स्वास्थ्य में निवेश से श्रम की उत्पादकता में कोई सुधार न भी हो, किंतु इनके माध्यम से मानव कल्याण का संवर्धन तो होना ही चाहिए। इसलिए श्रम की उत्पादकता में सुधार के पक्ष को अनदेखा करते हुए भी बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अपना अलग महत्व हो जाता है, और समाज के प्रत्येक सदस्य को साक्षर होने तथा स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार होता है।

4. आर्थिक संवृद्धि में मानव पूंजी किस प्रकार योगदान देती है?

उत्तर: आर्थिक संवृद्धि का अर्थ देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि से होता है। मानव पूंजी इसमें निम्न प्रकार से योगदान देती है:

(i) एक शिक्षित व्यक्ति का श्रम-कौशल अशिक्षित की अपेक्षा अधिक होता है, जिससे वह अपेक्षाकृत अधिक आय अर्जित कर पाता है और राष्ट्रीय आय में उसका योगदान अधिक होता है।

(ii) एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक समय तक व्यवधानरहित श्रम की आपूर्ति कर सकता है, इसलिए स्वास्थ्य भी आर्थिक संवृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।

(iii) मानव की संवर्धित उत्पादकता न केवल श्रम की उत्पादकता को बढ़ाती है, बल्कि यह परिवर्तन को प्रोत्साहित कर नवीन प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने की क्षमता भी विकसित करती है।

(iv) शिक्षा समाज में परिवर्तनों और वैज्ञानिक प्रगति को समझ पाने की क्षमता प्रदान करती है, जिससे आविष्कारों और नव परिवर्तनों में सहायता मिलती है।

(v) भारत की सातवीं पंचवर्षीय योजना में भी यह कहा गया है कि मानव संसाधनों के विकास को आर्थिक विकास की युक्ति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान देना होगा, क्योंकि उचित शिक्षण-प्रशिक्षण पाकर एक विशाल जनसंख्या आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाने वाली परिसंपत्ति बन सकती है।

5. भारत में शिक्षा क्षेत्र के संबंध में भविष्य की संभावनाओं और चुनौतियों की विवेचना कीजिए।

उत्तर: भारत में शिक्षा क्षेत्र के संबंध में भविष्य की निम्नलिखित संभावनाएँ और चुनौतियाँ हैं:

(i) सब के लिए शिक्षा: यद्यपि साक्षरता दरों में सुधार हुआ है, लेकिन आज भी देश में निरक्षरों की संख्या लगभग उतनी ही है जितनी स्वाधीनता के समय भारत की कुल जनसंख्या थी। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों का लक्ष्य (14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा) अभी भी पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सका है।

(ii) लिंग समता: साक्षरता में पुरुषों और महिलाओं के बीच का अंतर कम हो रहा है जो एक सकारात्मक विकास है। फिर भी, महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक स्तर में सुधार के लिए नारी शिक्षा को और प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है।

(iii) उच्च शिक्षा लेने वालों की कमी: भारत में शिक्षा का पिरामिड बहुत नुकीला है, जो यह दर्शाता है कि उच्चतर शिक्षा स्तर तक बहुत कम लोग ही पहुँच पाते हैं।

(iv) शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी: राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में शिक्षित युवाओं (विशेषकर महिलाओं) में बेरोजगारी दर अधिक रही है। हालांकि 2023-24 के सर्वेक्षण के अनुसार स्थिति में सुधार हुआ है, फिर भी सरकार को उच्च शिक्षा के लिए अधिक धन का आवंटन करना चाहिए तथा शिक्षण संस्थानों के स्तर में सुधार लाना चाहिए ताकि छात्रों को रोजगार योग्य कौशल प्राप्त हो सके।

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