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NCERT Class 11 Economics Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था 1950-1990
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भारतीय अर्थव्यवस्था 1950-1990
Chapter: 2
| भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास |
| अभ्यास |
1. योजना की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: योजना वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत किसी देश के उपलब्ध संसाधनों का उचित एवं प्रभावी उपयोग करके एक निश्चित समयावधि में निर्धारित आर्थिक एवं सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। योजना के माध्यम से सरकार यह तय करती है कि किन क्षेत्रों का विकास करना है, संसाधनों का वितरण किस प्रकार करना है तथा उत्पादन और रोजगार कैसे बढ़ाना है। भारत में स्वतंत्रता के बाद आर्थिक विकास को गति देने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की गई। इन योजनाओं का उद्देश्य देश का संतुलित विकास, गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन तथा जनता के जीवन स्तर में सुधार करना था। भारत में योजना आयोग की स्थापना वर्ष 1950 में की गई थी, जिसने पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन किया।
2. भारत ने योजना को क्यों चुना?
उत्तर: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के नेताओं को यह तय करना था कि देश में कौन-सी आर्थिक प्रणाली सबसे उपयुक्त रहेगी जो केवल कुछ लोगों के लिए नहीं बल्कि सर्वजन कल्याण के लिए कार्य करे। उन्होंने एक ऐसी मिश्रित आर्थिक प्रणाली अपनाई जिसमें समाजवाद की श्रेष्ठ विशेषताएँ शामिल हों, लेकिन वह उसकी कमियों से मुक्त हो। इस प्रणाली में यह तय किया गया कि सरकार अर्थव्यवस्था के लिए योजना बनाएगी तथा निजी क्षेत्रक को भी योजना प्रयास का अंग बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। योजना को चुनने का मुख्य उद्देश्य विकास की एक ऐसी प्रक्रिया प्रारंभ करना था जो लोगों के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाए और उनके लिए समृद्ध व विविधतापूर्ण जीवन के नए अवसर उपलब्ध कराए।
3. योजनाओं के लक्ष्य क्या होने चाहिए?
उत्तर: योजनाओं के लक्ष्य निम्नलिखित होने चाहिए—
(i) संवृद्धि: देश में वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि करना ताकि राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय बढ़े तथा लोगों का जीवन स्तर ऊँचा हो।
(ii) आधुनिकीकरण: नई तकनीकों, आधुनिक मशीनों तथा वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना और सामाजिक सोच में भी आधुनिकता लाना।
(iii) आत्मनिर्भरता: विदेशों पर निर्भरता कम करके देश में ही आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाना तथा आयात पर निर्भरता घटाना।
(iv) समानता: आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाना, गरीबी कम करना, आय और संपत्ति की असमानताओं को घटाना तथा सभी नागरिकों को समान अवसर उपलब्ध कराना।
4. उच्च पैदावारवाली किस्म (HYV) बीज क्या होते हैं?
उत्तर: उच्च पैदावार वाली किस्म (HYV) के बीज वे बीज होते हैं जिनका प्रयोग करने से पुरानी किस्म के बीजों के स्थान पर खेतों की पैदावार और उत्पादकता में भारी वृद्धि होती है। विशेषकर गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में इन बीजों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन बीजों से सही लाभ प्राप्त करने के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों, कीटनाशकों तथा निश्चित जल पूर्ति (सिंचाई) की आवश्यकता होती है।
5. विक्रय अधिशेष क्या है?
उत्तर: किसानों द्वारा अपने कृषि उत्पादन का जो अंश बाज़ार में बेचा जाता है, उसे ही ‘विपणित अधिशेष’ (Marketed Surplus या विक्रय अधिशेष) कहा जाता है। यदि किसान उत्पादन का अधिकांश भाग बाज़ार में बेचने के बजाय स्वयं उपभोग कर लें, तो अर्थव्यवस्था पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु बाज़ार में बेचा गया यही अधिशेष अर्थव्यवस्था को लाभ पहुँचाता है।
6. कृषि क्षेत्रक में लागू किये गये भूमि सुधार की आवश्यकता और उनके प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: स्वतंत्रता के समय भारत की कृषि व्यवस्था जमींदारी, जागीरदारी तथा बिचौलिया प्रथा जैसी दोषपूर्ण भू-व्यवस्थाओं से प्रभावित थी। किसानों के पास भूमि का स्वामित्व नहीं था, जिससे वे कृषि में निवेश करने के लिए प्रेरित नहीं होते थे। परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन बहुत कम था। इन समस्याओं को दूर करने के लिए भूमि सुधार लागू किए गए।
भूमि सुधार की आवश्यकता:
(i) जमींदारी और बिचौलिया प्रथा समाप्त करना।
(ii) वास्तविक किसानों को भूमि का स्वामित्व देना।
(iii) कृषि उत्पादन बढ़ाना।
(iv) किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारना।
(v) भूमि के समान वितरण को बढ़ावा देना।
भूमि सुधार के प्रमुख प्रकार:
(i) जमींदारी एवं बिचौलिया प्रथा का उन्मूलन।
(ii) काश्तकारों को भूमि का स्वामित्व प्रदान करना।
(iii) भूमि की अधिकतम सीमा (Ceiling) निर्धारित करना।
(iv) अतिरिक्त भूमि का भूमिहीन किसानों में वितरण।
(v) जोतों का एकीकरण करना।
7. हरित क्रांति क्या है? इसे क्यों लागू किया गया और इससे किसानों को कैसे लाभ पहुँचा? संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर: हरित क्रांति (Green Revolution) कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए अपनाई गई एक आधुनिक कृषि नीति थी। इसकी शुरुआत भारत में 1960 के दशक के मध्य में हुई। इसके अंतर्गत उच्च पैदावार वाले बीज (HYV), सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा आधुनिक कृषि यंत्रों का व्यापक उपयोग किया गया।
हरित क्रांति लागू करने के कारण:
(i) खाद्यान्न की कमी को दूर करना।
(ii) बढ़ती जनसंख्या की खाद्यान्न आवश्यकता पूरी करना।
(iii) विदेशी खाद्यान्न आयात पर निर्भरता कम करना।
(iv) कृषि उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना।
किसानों को लाभ: इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई, जिससे किसानों को बाज़ार में बेचने के लिए पर्याप्त अधिशेष प्राप्त हुआ और उनकी आय बढ़ी। सरकार द्वारा दिए गए कम ब्याज वाले ऋणों और उर्वरकों पर आर्थिक सहायता (सब्सिडी) के कारण छोटे किसान भी इसका लाभ उठा सके, जिससे छोटे और बड़े दोनों किसानों की पैदावार और उत्पादकता बढ़ी।
8. योजना उद्देश्य के रूप में ‘समानता के साथ संवृद्धि’ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: योजना के उद्देश्य के रूप में इसका अर्थ है कि केवल संवृद्धि (उत्पादन बढ़ना), आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के द्वारा ही जनसामान्य के जीवन में सुधार नहीं आ सकता। उच्च संवृद्धि दर के बावजूद अधिकांश लोग गरीब रह सकते हैं। इसलिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आर्थिक समृद्धि के लाभ केवल धनी लोगों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के निर्धन वर्ग को भी प्राप्त हों। इसके अंतर्गत यह लक्ष्य रखा गया कि प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ मिलें और धन-संपत्ति के वितरण की असमानताएँ कम हों।
9. ‘क्या रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा करता है?’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर: आधुनिकीकरण का अर्थ है उत्पादन में नई तकनीकों, आधुनिक मशीनों तथा वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग करना। इससे उत्पादन क्षमता और कार्यकुशलता बढ़ती है। लेकिन रोजगार सृजन की दृष्टि से आधुनिकीकरण कभी-कभी विरोधाभास उत्पन्न करता है।
नई मशीनों के प्रयोग से कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है। परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में रोजगार के अवसर घट सकते हैं और बेरोजगारी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, आधुनिक तकनीक उत्पादन बढ़ाती है, उद्योगों का विस्तार करती है तथा नए उद्योगों और सेवाओं का विकास करती है, जिससे लंबे समय में नए रोजगार भी उत्पन्न होते हैं।
इसलिए योजनाकारों के सामने चुनौती यह थी कि आधुनिक तकनीक अपनाते हुए भी अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध कराया जाए। इसी कारण भारत ने ऐसी विकास नीति अपनाने का प्रयास किया जिसमें आधुनिक तकनीक और श्रम-प्रधान गतिविधियों के बीच संतुलन बनाया जा सके। यही कारण है कि आधुनिकीकरण और रोजगार सृजन के बीच कभी-कभी विरोधाभास दिखाई देता है, परंतु उचित योजना द्वारा दोनों उद्देश्यों को साथ-साथ प्राप्त किया जा सकता है।
10. भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना क्यों आवश्यक था?
उत्तर: भारत जैसे हाल ही में विदेशी शासन से मुक्त हुए विकासशील देश के लिए आत्मनिर्भरता का पालन करना अत्यंत आवश्यक था। किसी भी राष्ट्र का आधुनिकीकरण और आर्थिक संवृद्धि आयातित संसाधनों के प्रयोग से हो सकती है, लेकिन भारत की प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में आत्मनिर्भरता को विशेष महत्त्व दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य उन चीज़ों के आयात से बचना था जिनका उत्पादन देश में ही संभव था। विशेष रूप से खाद्यान्न के लिए अन्य देशों (जैसे अमेरिका) पर निर्भरता कम करने के लिए यह नीति आवश्यक समझी गई। इसके अतिरिक्त, नीति-निर्माताओं को यह आशंका भी थी कि आयातित खाद्यान्न, विदेशी प्रौद्योगिकी और विदेशी पूँजी पर निर्भरता किसी न किसी रूप में हमारी नीतियों में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ा सकती है, जिससे देश की संप्रभुता में बाधा पड़ सकती थी।
11. किसी अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन क्या होता है? क्या यह आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था के जी.डी.पी. (GDP) में सेवा क्षेत्रक को सबसे अधिक योगदान करना चाहिए? टिप्पणी करें।
उत्तर: किसी देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों (कृषि क्षेत्रक, औद्योगिक क्षेत्रक और सेवा क्षेत्रक) से प्राप्त होता है। इन क्षेत्रकों के अलग-अलग योगदान से ही अर्थव्यवस्था का ढाँचा या ‘क्षेत्रक गठन’ तैयार होता है।
सामान्यतः, विकास की प्रक्रिया के साथ-साथ GDP में कृषि का अंश कम होता जाता है और उद्योगों का अंश बढ़ता है। जब अर्थव्यवस्था विकास के उच्चतर स्तर पर पहुँच जाती है, तो GDP में सेवा क्षेत्रक का अंशदान अन्य दोनों क्षेत्रकों (कृषि और उद्योग) से अधिक हो जाता है, जो कि विकसित देशों की एक प्रमुख विशेषता है। भारत के संदर्भ में 1950 में GDP में कृषि का अंश 50 प्रतिशत से अधिक था, लेकिन 1990 तक सेवा क्षेत्रक का अंश बढ़कर 40.59 प्रतिशत हो गया, जो कि कृषि तथा उद्योग दोनों से अधिक था। अतः यह आवश्यक नहीं है कि शुरुआत से ही सेवा क्षेत्रक का योगदान सर्वाधिक हो, बल्कि यह अर्थव्यवस्था के विकास और संरचनात्मक परिवर्तन का एक सूचक होता है।
12. योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक को ही अग्रणी भूमिका क्यों सौंपी गई थी?
उत्तर: योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक को अग्रणी भूमिका सौंपने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
(i) पूँजी का अभाव: स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के निजी उद्योगपतियों के पास अर्थव्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश करने के लिए अपेक्षित पूँजी का अभाव था।
(ii) बाज़ार का छोटा आकार: उस समय देश का बाज़ार इतना बड़ा नहीं था कि वह उद्योगपतियों को मुख्य परियोजनाएँ शुरू करने के लिए प्रोत्साहित कर सके, भले ही उनके पास पूँजी उपलब्ध हो।
(iii) समाजवादी समाज की स्थापना: द्वितीय पंचवर्षीय योजना में भारत की अर्थव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने का निर्णय लिया गया था। इसका अर्थ यह था कि सरकार उन बड़े और भारी उद्योगों पर पूरा नियंत्रण रखेगी जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण थे। इसलिए यह तय किया गया कि निजी क्षेत्रक की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्रक की पूरक होंगी और सार्वजनिक क्षेत्रक अग्रणी भूमिका निभाएगा।
13. इस कथन की व्याख्या करें: ‘हरित क्रांति ने सरकार को खाद्यान्नों के प्रापण द्वारा विशाल सुरक्षित भंडार बनाने के योग्य बनाया, ताकि वह कमी के समय उसका उपयोग कर सके’।
उत्तर: हरित क्रांति के दौरान उच्च पैदावार वाले बीजों (HYV), उर्वरकों और सिंचाई सुविधाओं के प्रयोग से कृषि उत्पादन (विशेषकर गेहूँ और चावल) में भारी वृद्धि हुई। किसानों द्वारा अपने कुल उत्पादन का जो अंश बाज़ार में बेचा जाता है, उसे ‘विपणित अधिशेष’ (Marketed Surplus) कहा जाता है। हरित क्रांति के फलस्वरूप किसान अपने उपभोग के बाद उत्पादन का एक बहुत बड़ा भाग बाज़ार में बेचने लगे। बाज़ार में अनाज की पर्याप्त आपूर्ति होने के कारण सरकार पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न प्राप्त (Procure) कर सकी और अपना सुरक्षित स्टॉक (Buffer Stock) बनाने में सफल रही। इस विशाल सुरक्षित स्टॉक का सबसे बड़ा लाभ यह था कि सरकार देश में खाद्यान्नों की कमी या आपातकाल के समय इसका उपयोग लोगों की आवश्यकता पूरी करने के लिए कर सकती थी।
14. सहायिकी किसानों को नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने को प्रोत्साहित तो करती है पर उसका सरकारी वित्त पर भारी बोझ पड़ता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर सहायिकी की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर: कृषि क्षेत्रक में दी जाने वाली सहायिकी (Subsidy) एक बहुत ही बहस का मुद्दा रहा है।
सहायिकी के पक्ष में तर्क (उपयोगिता): अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कृषि एक जोखिम भरा व्यवसाय है और अधिकांश किसान बहुत गरीब हैं। नई प्रौद्योगिकी (जैसे HYV बीज, उर्वरक) को जोखिमपूर्ण माना जाता है, इसलिए छोटे किसानों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु शुरुआत में सहायिकी देना आवश्यक था। यदि सहायिकी समाप्त कर दी जाती है, तो गरीब किसान इन आधुनिक आगतों का प्रयोग नहीं कर पाएंगे, जिससे अमीर और गरीब किसानों के बीच असमानता बहुत बढ़ जाएगी और ‘समानता’ के लक्ष्य का उल्लंघन होगा।
सहायिकी के विपक्ष में तर्क (सरकारी वित्त पर बोझ): कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि जब नई प्रौद्योगिकी का व्यापक प्रचलन हो जाए और उसका उद्देश्य पूरा हो जाए, तो सहायिकी धीरे-धीरे समाप्त कर देनी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि उर्वरक-सहायिकी का अधिकांश लाभ लक्षित गरीब किसानों के बजाय उर्वरक उद्योगों तथा समृद्ध क्षेत्र के बड़े किसानों को ही मिलता है। इससे लक्षित समूह को लाभ नहीं होता बल्कि सरकारी कोष (वित्त) पर अनावश्यक भारी बोझ पड़ता है। अतः निष्कर्ष के रूप में उचित नीति यह है कि सहायिकी को पूरी तरह समाप्त न किया जाए, बल्कि ऐसे कदम उठाए जाएं जिससे इसका लाभ केवल निर्धन किसानों को ही मिले।
15. हरित क्रांति के बाद भी 1990 तक भारत की 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्रक में ही क्यों लगी रही?
उत्तर: यद्यपि हरित क्रांति के कारण 1960 के दशक के अंत तक भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया था और 1950 से 1990 की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि के अंशदान में भारी कमी आई थी। इसके बावजूद, कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात में कोई ख़ास कमी नहीं आई (1950 में यह 67.50% थी और 1990 तक घटकर केवल 64.90% ही हो पाई)। इसका मुख्य कारण यह था कि औद्योगिक क्षेत्रक और सेवा क्षेत्रक, कृषि क्षेत्रक में काम करने वाले अधिशेष लोगों को अपने यहाँ खपाने (रोज़गार देने) में विफल रहे। अनेक अर्थशास्त्री उद्योगों और सेवाओं के इस धीमे रोज़गार-सृजन को 1950-1990 के दौरान अपनाई गई नीतियों की एक बड़ी विफलता मानते हैं।
16. यद्यपि उद्योगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्रक बहुत आवश्यक रहा है, पर सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उपक्रम ऐसे हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं और इस क्षेत्रक के अर्थव्यवस्था के संसाधनों की बर्बादी के साधन बने हुए हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के उपक्रमों की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर: स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक क्षेत्र ने भारत के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने इस्पात, बिजली, कोयला, रेल तथा भारी उद्योगों की स्थापना की, जहाँ निजी क्षेत्र निवेश करने में सक्षम नहीं था। इससे रोजगार के अवसर बढ़े, आधारभूत संरचना का विकास हुआ तथा देश आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ा।
हालाँकि, कई सार्वजनिक उपक्रम खराब प्रबंधन, भ्रष्टाचार, अधिक खर्च तथा कम उत्पादन के कारण घाटे में चले गए। फिर भी रक्षा, ऊर्जा, परिवहन और सार्वजनिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में इनकी भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है। इसलिए घाटे वाले उपक्रमों में सुधार की आवश्यकता है, न कि उन्हें पूरी तरह समाप्त करने की।
17. आयात प्रतिस्थापन किस प्रकार घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करता है?
उत्तर: आयात प्रतिस्थापन वह व्यापार नीति है जिसका उद्देश्य विदेशी आयातों के बदले घरेलू उत्पादन द्वारा देश की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है (जैसे विदेशों से वाहन मँगाने की जगह उन्हें भारत में ही निर्मित करना)।
इस नीति के अंतर्गत सरकार घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्द्धा से बचाने के लिए दो मुख्य प्रकार से संरक्षण प्रदान करती है:
(i) प्रशुल्क (Tariffs): यह आयातित वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर (Tax) है। प्रशुल्क लगने से आयातित विदेशी वस्तुएँ अधिक महँगी हो जाती हैं, जिससे लोग उनका प्रयोग कम करते हैं और वे हतोत्साहित होती हैं।
(ii) कोटा (Quotas): इसके अंतर्गत आयात की जाने वाली वस्तुओं की अधिकतम मात्रा (Limits) निश्चित कर दी जाती है, जिससे अधिक मात्रा में विदेशी सामान देश में नहीं आ पाता। प्रशुल्क और कोटा, दोनों के प्रभाव से आयात प्रतिबंधित हो जाते हैं और विदेशी सामान बाज़ार में न आने से देशी फर्मों (घरेलू उद्योगों) की रक्षा होती है तथा उन्हें विकसित होने का अवसर मिलता है।
18. औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 में निजी क्षेत्रक का नियमन क्यों और कैसे किया गया था?
उत्तर: औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 के अंतर्गत निजी क्षेत्रक का नियमन इसलिए किया गया ताकि समाजवादी स्वरूप की स्थापना की जा सके, बड़े और आधारभूत उद्योगों पर सरकार का नियंत्रण बना रहे तथा आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण रोका जा सके। स्वतंत्रता के समय निजी उद्योगपतियों के पास पर्याप्त पूंजी और संसाधन नहीं थे, इसलिए सरकार को औद्योगिक विकास में अग्रणी भूमिका निभानी पड़ी। साथ ही, पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को बढ़ावा देकर क्षेत्रीय समानता स्थापित करना तथा सीमित संसाधनों का उचित उपयोग सुनिश्चित करना भी इसका उद्देश्य था।
निजी क्षेत्रक का नियमन उद्योगों को तीन वर्गों में विभाजित करके किया गया, जिसमें महत्वपूर्ण उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित रखे गए और निजी क्षेत्र को मुख्यतः तीसरे वर्ग में कार्य करने की अनुमति दी गई। निजी उद्योगों के लिए लाइसेंस प्रणाली लागू की गई, जिसके बिना कोई नया उद्योग स्थापित नहीं किया जा सकता था। उत्पादन क्षमता बढ़ाने या नई वस्तुओं का निर्माण करने के लिए भी सरकारी लाइसेंस आवश्यक था। सरकार आवश्यकता के अनुसार ही लाइसेंस जारी करती थी। साथ ही, पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करने वाले उद्यमियों को लाइसेंस, कर में छूट तथा सस्ती बिजली जैसी विशेष रियायतें दी जाती थीं।
19. निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए:
| 1. प्रधानमंत्री | (क) अधिक अनुपात में उत्पादन देने वाले बीज |
| 2. सकल घरेलू उत्पाद | (ख) आयात की जा सकने वाली मात्रा |
| 3. कोटा | (ग) भूमि आयोधन के अध्यक्ष |
| 4. भूमि-सुधार | (घ) किसी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष में उत्पादित की गई सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य |
| 5. उच्च उत्पादकता वाले बीज | (ड.) कृषि क्षेत्र में उत्पादकता वृद्धि के लिए किए गए सुधार |
| 6. सब्सिडी | (च) उत्पादन कार्यों के लिए सरकार द्वारा दी गई मौद्रिक सहायता |
उत्तर:
| 1. प्रधानमंत्री | (ग) भूमि आयोधन के अध्यक्ष |
| 2. सकल घरेलू उत्पाद | (घ) किसी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष में उत्पादित की गई सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य |
| 3. कोटा | (ख) आयात की जा सकने वाली मात्रा |
| 4. भूमि-सुधार | (ड.) कृषि क्षेत्र में उत्पादकता वृद्धि के लिए किए गए सुधार |
| 5. उच्च उत्पादकता वाले बीज | (क) अधिक अनुपात में उत्पादन देने वाले बीज |
| 6. सब्सिडी | (च) उत्पादन कार्यों के लिए सरकार द्वारा दी गई मौद्रिक सहायता |
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