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NCERT Class 11 Business Studies Chapter 5 व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ
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व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ
Chapter: 5
| भाग – 1: व्यवसाय के आधार |
| अभ्यास |
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. ई-व्यवसाय और पारंपरिक व्यवसाय में कोई तीन अंतर बताइए।
उत्तर: ई-व्यवसाय और पारंपरिक व्यवसाय में तीन प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं:
(i) निर्माण में आसानी: पारंपरिक व्यवसाय का निर्माण मुश्किल होता है, जबकि ई-व्यवसाय को प्रारंभ करना सरल है।
(ii) भौतिक उपस्थिति: पारंपरिक व्यवसाय के लिए भौतिक उपस्थिति आवश्यक है, जबकि ई-व्यवसाय के लिए यह आवश्यक नहीं है।
(iii) परिचालन लागत: पारंपरिक व्यवसाय में भौतिक सुविधाओं और स्थायी दायित्वों के कारण परिचालन लागत उच्च होती है, जबकि ई-व्यवसाय में भौतिक सुविधाओं की आवश्यकता न होने के कारण यह लागत निम्न होती है।
2. बाह्यस्रोतीकरण किस प्रकार व्यवसाय की नई पद्धति का प्रतिनिधित्व करता है?
उत्तर: बाह्यस्रोतीकरण (आउटसोर्सिंग) व्यवसाय की उभरती पद्धतियों में से एक है जो व्यवसाय करने के नए तरीके का प्रतिनिधित्व करता है। व्यावसायिक फर्मों द्वारा कार्यकुशलता और सुधार की खोज (आंतरिक शक्ति) तथा ग्राहकों की बढ़ती माँगों और प्रतिस्पर्धी दबाव (बाह्य शक्ति) के कारण बाह्यस्रोतीकरण जैसी नई प्रवृत्तियों को गति मिली है। ई-व्यवसाय के साथ मिलकर बाह्यस्रोतीकरण व्यवसाय को चलाने की वर्तमान और भविष्य की विधियों को लगातार नया आकार दे रहा है और पुनर्संरचित कर रहा है।
3. ई-व्यवसाय के किन्हीं दो अनुप्रयोगों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर: ई-व्यवसाय के दो प्रमुख अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:
(i) ई-अधिप्राप्ति: इसमें व्यावसायिक फर्मों के मध्य इंटरनेट आधारित क्रय-विक्रय लेन-देन संबद्ध होते हैं। इसमें विपरीत नीलामी और अंकीय बाज़ार स्थल शामिल होते हैं जो क्रेताओं और विक्रेताओं के मध्य ऑनलाइन व्यापार को सुगम बनाते हैं।
(ii) ई-बोली/ई-नीलामी: इसमें खरीदारी वेबसाइटों पर वस्तु और सेवाओं (जैसे एयरलाइन टिकट) के लिए अपने आप मूल्य प्रस्तुत करने की सुविधा होती है ताकि उपयोगकर्ता उनके लिए बोली लगा सकें।
4. ई-व्यवसाय में डाटा संग्रहण एवं प्रसारण जोखिमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: ई-व्यवसाय में महत्वपूर्ण सूचनाएं कंप्यूटर प्रणाली में संग्रहित हों या मार्ग में हों, उनके चोरी होने या स्वार्थी उद्देश्यों एवं मजाक के लिए संशोधित किए जाने का भारी जोखिम रहता है। इसमें वायरस का बड़ा खतरा होता है, जो एक प्रोग्राम है जो कंप्यूटर प्रणालियों पर अपनी पुनरावृत्ति करता है और स्क्रीन से छेड़छाड़ से लेकर समूची प्रणाली और डाटा फ़ाइलों को नष्ट कर सकता है। इसके अतिरिक्त, हैकिंग का खतरा होता है और प्रसारण के दौरान डाटा अवरुद्ध (intercept) भी हो सकते हैं, जिससे बचने के लिए एन्टी वायरस और क्रिप्टोग्राफी (कूटलेखन) का प्रयोग किया जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. ई-व्यवसाय और बाह्यस्रोतीकरण को व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ क्यों कहा जाता है? इन प्रवृत्तियों की बढ़ती महत्ता के लिए उत्तरदायी कारकों का विवेचन कीजिए।
उत्तर: ई-व्यवसाय और बाह्यस्रोतीकरण कोई नया व्यवसाय नहीं हैं, बल्कि ये व्यवसाय करने के नए तरीके हैं जो लगातार विकसित हो रहे हैं और भविष्य की व्यवसाय विधियों को पुनर्संरचित कर रहे हैं, इसलिए इन्हें व्यवसाय की “उभरती पद्धतियाँ” कहा जाता है।
इन प्रवृत्तियों की बढ़ती महत्ता के लिए निम्नलिखित आंतरिक और बाह्य कारक उत्तरदायी हैं:
आंतरिक कारक (कार्यकुशलता और सुधार): व्यावसायिक फर्मों की सुधार और कार्यकुशलता बढ़ाने की अपनी निरंतर खोज ने ई-व्यवसाय और बाह्यस्रोतीकरण को गति प्रदान की है। व्यवसाय प्रबंधक हमेशा उत्पादन, विपणन या मानव संसाधन में कार्य करने के नए एवं बेहतर तरीकों को विकसित करने में लगे रहते हैं।
बाह्य कारक (प्रतिस्पर्धा और ग्राहक की मांगें): लगातार बढ़ता प्रतिस्पर्धी दबाव और हमेशा अच्छी गुणवत्ता, कम मूल्य और तीव्र सुपुर्दगी की माँग करते ग्राहक इन परिवर्तनों के पीछे की मुख्य शक्तियां हैं। ई-व्यवसाय ग्राहकों को कोई भी चीज़, कहीं भी और कभी भी उपलब्ध कराने के अवसर प्रदान करता है, जिससे इसकी महत्ता काफी बढ़ गई है।
2. ऑनलाइन व्यापार में सम्मिलित कदमों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर: ऑनलाइन लेन-देन में मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं होती हैं:
(i) क्रय-पूर्व/विक्रय अवस्था।
(ii) क्रय/विक्रय अवस्था।
(iii) सुपुर्दगी अवस्था।
ऑनलाइन व्यापार की प्रक्रिया के प्रमुख कदम इस प्रकार हैं:
(i) पंजीकरण: ऑनलाइन खरीदारी से पूर्व व्यक्ति को एक पंजीकरण फॉर्म भरकर ऑनलाइन विक्रेता के पास अपना खाता बनाना पड़ता है। इसमें एक संकेत शब्द (पासवर्ड) होता है जो खाते और ‘शॉपिंग कार्ट’ को सुरक्षित रखता है ताकि कोई अन्य व्यक्ति उस नाम का दुरुपयोग न कर सके।
(ii) आदेश प्रेषित करना: ग्राहक वस्तुओं को चुनकर ‘शॉपिंग कार्ट’ (खरीदारी गाड़ी) में रख सकता है या छोड़ सकता है। यह सुनिश्चित करने के बाद कि क्या खरीदना है, ग्राहक आगे बढ़कर अपने भुगतान विकल्पों को चुनता है।
(iii) भुगतान तंत्र: ऑनलाइन खरीदे गए सामान का भुगतान कई तरीकों से किया जा सकता है। इसमें सुपुर्दगी के समय नकद, चेक, नेट बैंकिंग हस्तांतरण, और प्लास्टिक मुद्रा (क्रेडिट और डेबिट कार्ड) शामिल हैं। लगभग 95 प्रतिशत ऑनलाइन लेन-देन क्रेडिट या डेबिट कार्ड द्वारा होते हैं। इसके अतिरिक्त अंकीय (डिजिटल) नकद का भी प्रयोग किया जा सकता है जो केवल साइबर स्पेस में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक मुद्रा होती है।
3. फर्म से ग्राहक कॉमर्स के प्रमुख पहलुओं का विवेचन कीजिए।
उत्तर: फर्म से ग्राहक कॉमर्स में लेन-देन के एक छोर पर व्यावसायिक फर्म और दूसरे छोर पर इसके ग्राहक होते हैं।
इसके प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:
(i) व्यापक विपणन गतिविधियाँ: इसमें केवल ऑनलाइन खरीदारी ही नहीं बल्कि गतिविधियों को पहचानना, संवर्धन और उत्पादों (जैसे संगीत और फ़िल्में) की ऑनलाइन सुपुर्दगी भी शामिल है।
(ii) ग्राहकों के अनुरूप उत्पाद एवं सुविधा: आजकल ग्राहक समझदार हो गए हैं; वे न केवल अपनी जरूरत के अनुसार उत्पाद चाहते हैं बल्कि सुपुर्दगी की सहूलियत और इच्छानुसार भुगतान की सुविधा भी चाहते हैं, जो ई-कॉमर्स कम लागत और उच्च गति से सुगम बनाता है।
(iii) निरंतर संपर्क: ई-कॉमर्स का यह रूप व्यवसाय को हर समय ग्राहकों के संपर्क में रहने और ऑनलाइन सर्वेक्षण के माध्यम से उनकी संतुष्टि का स्तर जानने में मदद करता है।
(iv) ग्राहक से फर्म संपर्क: यह एकतरफा नहीं है; ग्राहक कंपनियों द्वारा स्थापित कॉल सेंटरों या हेल्पलाइनों का प्रयोग कर किसी भी समय मुफ्त फोन कर अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं और शंकाओं का समाधान पा सकते हैं।
4. व्यवसाय करने की इलेक्ट्रॉनिक पद्धति की सीमाओं का विवेचन कीजिए। क्या ये सीमाएँ इसके कार्यक्षेत्रों को प्रतिबंधित करने के लिए काफी हैं? अपने उत्तर के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर: व्यवसाय करने की इलेक्ट्रॉनिक पद्धति (ई-व्यवसाय) की प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैं:
(i) अल्प मानवीय स्पर्श: ई-व्यवसाय में अंतर-व्यक्ति पारस्परिक संपर्क की कमी होती है, इसलिए यह उच्च वैयक्तिक स्पर्श वाले उत्पादों (जैसे वस्त्र, प्रसाधन) के लिए कम उपयुक्त है।
(ii) आदेश और सुपुर्दगी की गति में अंतर: इंटरनेट पर सूचना पल भर में चली जाती है, लेकिन भौतिक वस्तुओं की सुपुर्दगी में समय लगता है, जो ग्राहक के सब्र पर भारी पड़ सकता है।
(iii) तकनीकी क्षमता की आवश्यकता: इसमें पक्षों को कंप्यूटर संसार से परिचित होने की आवश्यकता होती है, जो समाज में ‘अंकीय-विभाजन’ पैदा करता है।
(iv) जोखिम में वृद्धि: इंटरनेट पर लेन-देन साइबर व्यक्तियों के बीच होने से पक्षों की पहचान और उनके स्थान का पता लगाना मुश्किल होता है। इससे अप्रतिरूपण, गुप्त सूचनाओं के लीक होने, और वायरस तथा हैकिंग का खतरा बढ़ जाता है।
(v) जन प्रतिरोध और नैतिक पतन: नई तकनीक से तनाव पैदा होता है जिससे लोग इसका विरोध कर सकते हैं। साथ ही, कंपनियों द्वारा कर्मचारियों के ई-मेल आदि की निगरानी करने से नैतिक पतन के सवाल उठते हैं।


