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NCERT Class 11 Business Studies Chapter 2 व्यावसायिक संगठन के स्वरूप
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व्यावसायिक संगठन के स्वरूप
Chapter: 2
| भाग – 1: व्यवसाय के आधार |
| अभ्यास |
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय में नाबालिग की स्थिति की साझेदारी फर्म में उसकी स्थिति से तुलना कीजिए।
उत्तर: (i) संयुक्त हिंदू परिवार: इस व्यवसाय में एक बच्चा जन्म लेते ही व्यवसाय का सदस्य (सह-समांशी) बन जाता है। इसमें नाबालिग भी व्यवसाय के सदस्य हो सकते हैं।
(ii) साझेदारी फर्म: साझेदारी एक कानूनी अनुबंध पर आधारित होती है और एक नाबालिग अनुबंध नहीं कर सकता, इसलिए वह पूर्ण साझेदार नहीं बन सकता। हालाँकि, सभी साझेदारों की सहमति से उसे केवल फर्म के लाभों में भागीदार बनाया जा सकता है, जहाँ उसका दायित्व केवल लगाई गई पूँजी तक सीमित होता है और वह प्रबंधन में भाग नहीं ले सकता।
2. यदि पंजीयन ऐच्छिक है तो साझेदारी फर्म स्वयं को पंजीकृत कराने के लिए वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए क्यों इच्छुक रहती हैं? समझाइए।
उत्तर: यद्यपि साझेदारी फर्म का पंजीकरण कानून के अनुसार ऐच्छिक है, फिर भी अधिकांश साझेदारी फर्में स्वयं को पंजीकृत कराना पसंद करती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि पंजीकरण न कराने पर फर्म को कई कानूनी अधिकारों और सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है।
एक अपंजीकृत साझेदारी फर्म का कोई भी साझेदार अपने अधिकारों की रक्षा के लिए फर्म या अन्य साझेदारों के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा दायर नहीं कर सकता। इसी प्रकार, फर्म भी किसी बाहरी पक्ष से अपने संविदात्मक अधिकारों को लागू कराने के लिए न्यायालय की सहायता नहीं ले सकती तथा अपने साझेदारों के विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकती। इससे व्यावसायिक विवादों का समाधान कठिन हो जाता है और फर्म के हित प्रभावित हो सकते हैं।
इन्हीं कानूनी सीमाओं और संभावित समस्याओं से बचने, अपने अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा व्यवसाय को अधिक विश्वसनीय और सुरक्षित बनाने के लिए अधिकांश साझेदारी फर्में पंजीकरण कराने की वैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए इच्छुक रहती हैं।
3. एक निजी कंपनी को उपलब्ध महत्वपूर्ण सुविधाओं को बताइए।
उत्तर: एक निजी कंपनी को सार्वजनिक कंपनी की तुलना में कई विशेषाधिकार प्राप्त हैं:
(i) इसके निर्माण के लिए कम से कम केवल 2 सदस्यों की आवश्यकता होती है (सार्वजनिक के लिए 7)।
(ii) इसे जनता को अंश खरीदने के लिए आमंत्रित करने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए विवरण-पत्र जारी करने की आवश्यकता नहीं है।
(iii) यह न्यूनतम अभिदान प्राप्त किए बिना भी अंशों का आवंटन कर सकती है।
(iv) निजी कंपनी में केवल 2 निदेशकों की आवश्यकता होती है।
(v) इसे सदस्यों की अनुक्रमणिका (index) रखने की अनिवार्यता नहीं होती।
4. सहकारी समिति किस प्रकार जनतांत्रिक एवं धर्म-निरपेक्षता का आदर्श प्रस्तुत करती है?
उत्तर: सहकारी समिति कुछ इस प्रकार जनतांत्रिक एवं धर्म-निरपेक्षता का आदर्श प्रस्तुत करती है:
(i) जनतांत्रिक: सहकारी समिति ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के सिद्धांत पर कार्य करती है, चाहे सदस्य ने कितनी भी पूँजी क्यों न लगाई हो। इसका प्रबंधन एक निर्वाचित प्रबंध समिति द्वारा होता है।
(ii) धर्म-निरपेक्षता: इसकी सदस्यता स्वैच्छिक और खुली होती है। किसी भी धर्म, जाति अथवा लिंग का कोई भी व्यक्ति इसका सदस्य बन सकता है, जो धर्म-निरपेक्षता को दर्शाता है।
5. ‘प्रदर्शन द्वारा साझेदार’ का क्या अर्थ है? समझाइए।
उत्तर: कोई व्यक्ति प्रदर्शन (या विबंधन) द्वारा साझेदार तब माना जाता है, जब वह अपने आचरण या व्यवहार से दूसरों को यह आभास कराता है कि वह किसी फर्म का साझेदार है। भले ही वह पूँजी नहीं लगाता या प्रबंधन में भाग नहीं लेता, लेकिन यदि अन्य पक्ष उसके इस प्रदर्शन के आधार पर फर्म को ऋण देते हैं, तो वह उन ऋणों के भुगतान के लिए उत्तरदायी होता है।
6. 50 शब्दों में संक्षिप्त टिप्पणी करें:
(क) कर्ता।
उत्तर: कर्ता संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय का मुखिया होता है, जो सामान्यतः परिवार का सबसे वरिष्ठ (बड़ा) सदस्य होता है। व्यवसाय के प्रबंधन, संचालन और नियंत्रण की संपूर्ण जिम्मेदारी उसी के हाथों में होती है। वह व्यवसाय से संबंधित सभी महत्वपूर्ण निर्णय स्वतंत्र रूप से लेता है तथा परिवार के अन्य सदस्यों का मार्गदर्शन करता है। व्यवसाय के दैनिक कार्यों का संचालन, संपत्ति का प्रबंधन तथा बाहरी व्यक्तियों के साथ लेन-देन का अधिकार भी कर्ता के पास होता है। व्यवसाय के सभी ऋणों और दायित्वों के लिए उसका दायित्व असीमित होता है, अर्थात आवश्यकता पड़ने पर उसे अपने व्यक्तिगत धन-संपत्ति से भी ऋणों का भुगतान करना पड़ सकता है।
(ख) सार्वमुद्रा।
उत्तर: सार्वमुद्रा कंपनी की आधिकारिक मुहर होती है, जिसे कंपनी के आधिकारिक हस्ताक्षर के रूप में माना जाता है। चूँकि कंपनी एक कृत्रिम (Artificial) या विधिक व्यक्ति है, इसलिए वह प्राकृतिक व्यक्तियों की तरह हस्ताक्षर नहीं कर सकती। इस कारण कंपनी के महत्वपूर्ण दस्तावेजों, अनुबंधों तथा अन्य कानूनी अभिलेखों पर उसकी स्वीकृति और प्रामाणिकता दर्शाने के लिए सार्वमुद्रा का उपयोग किया जाता है। यह कंपनी की पहचान और आधिकारिक मान्यता का प्रतीक होती है।
(ग) कृत्रिम व्यक्ति।
उत्तर: कृत्रिम व्यक्ति: कंपनी का निर्माण कानून द्वारा किया जाता है, इसलिए इसे कृत्रिम या विधिक व्यक्ति कहा जाता है। यद्यपि यह प्राकृतिक व्यक्ति नहीं है, फिर भी कानून इसे कई अधिकार प्रदान करता है। कंपनी अपने नाम से संपत्ति खरीद और रख सकती है, उधार ले सकती है, अनुबंध कर सकती है तथा न्यायालय में मुकदमा दायर कर सकती है या उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन यह प्राकृतिक व्यक्तियों की तरह साँस नहीं ले सकती, खा-पी नहीं सकती या स्वयं कार्य नहीं कर सकती। इसी कारण कंपनी को कृत्रिम व्यक्ति कहा जाता है।
(घ) शाश्वत उत्तराधिकार।
उत्तर: कंपनी का अस्तित्व उसके सदस्यों से अलग और स्वतंत्र होता है। इसलिए किसी सदस्य की मृत्यु, दिवालियापन, सेवानिवृत्ति या मानसिक अस्वस्थता का कंपनी के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कंपनी का कार्य निरंतर चलता रहता है, जबकि इसके सदस्य समय-समय पर बदलते रहते हैं। इस प्रकार, सदस्य आते-जाते रहते हैं, लेकिन कंपनी का अस्तित्व तब तक बना रहता है जब तक उसे कानून के अनुसार समाप्त (विघटित) नहीं किया जाता। इसी विशेषता को शाश्वत उत्तराधिकार कहा जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. एकल स्वामित्व फर्म से आप क्या समझते हैं? इसके गुणों एवं सीमाओं को समझाइए।
उत्तर: एकल स्वामित्व वह व्यावसायिक संगठन है जिसका स्वामित्व, प्रबंधन और नियंत्रण एक ही व्यक्ति के हाथ में होता है। वही संपूर्ण लाभ का अधिकारी और हानि के लिए उत्तरदायी होता है।
(i) गुण: शीघ्र निर्णय लेने की स्वतंत्रता, व्यापारिक सूचनाओं की पूर्ण गोपनीयता, प्रत्यक्ष प्रोत्साहन (सारा लाभ खुद का), आत्म-संतोष (उपलब्धि का अहसास), और स्थापना व समापन में सुगमता (कम कानूनी औपचारिकताएं)।
(ii) सीमाएँ: सीमित संसाधन (व्यक्तिगत बचत और ऋण तक सीमित), सीमित जीवनकाल (मालिक की मृत्यु/बीमारी का सीधा प्रभाव), असीमित दायित्व (निजी संपत्ति जोखिम में), और सीमित प्रबंधकीय योग्यता।
2. साझेदारी के विभिन्न प्रकारों में व्यावसायिक स्वामित्व तुलनात्मक रूप से लोकप्रिय क्यों नहीं है? इसके गुणों एवं सीमाओं को समझाइए।
उत्तर: साझेदारी तुलनात्मक रूप से कम लोकप्रिय है क्योंकि इसमें असीमित दायित्व का जोखिम, साझेदारों के बीच विवाद की संभावना और निरंतरता की कमी होती है।
(i) गुण: इसकी स्थापना और समापन आसान है, विभिन्न साझेदारों की विशेषज्ञता से संतुलित निर्णय लिए जा सकते हैं, अधिक पूँजी जुटाई जा सकती है, जोखिम बँट जाता है और गोपनीयता बनी रहती है।
(ii) सीमाएँ: सभी साझेदारों का दायित्व असीमित और संयुक्त होता है। संसाधन सीमित होते हैं, आपसी विरोध या मतभेद की संभावना हमेशा रहती है, किसी एक साझेदार की मृत्यु/पागलपन से फर्म समाप्त हो सकती है और इसमें जनता के विश्वास की कमी होती है।
3. एक उपयुक्त संगठन का स्वरूप चुनना क्यों महत्वपूर्ण है? उन घटकों का विवेचन कीजिए जो संगठन के किसी खास स्वरूप के चुनाव में सहायक होते हैं।
उत्तर: एक उपयुक्त स्वरूप चुनना महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक स्वरूप के अपने लाभ और हानियां हैं, जो उद्यम के विकास, जोखिम और मुनाफे को सीधे प्रभावित करते हैं।
इसके निर्धारक घटक हैं:
(i) प्रारंभिक लागत: एकल स्वामित्व सबसे कम खर्चीला है, जबकि कंपनी निर्माण जटिल और महँगा है।
(ii) दायित्व: यदि कम जोखिम लेना है तो कंपनी (सीमित दायित्व) बेहतर है, अन्यथा एकल स्वामित्व/साझेदारी(असीमित दायित्व)।
(iii) निरंतरता: स्थायी ढांचा चाहिए तो कंपनी उपयुक्त है।
(iv) प्रबंधन योग्यता: पेशेवर प्रबंधन चाहिए तो कंपनी श्रेष्ठ है, साधारण कार्यों के लिए एकल/साझेदारी।
(v) पूँजी की आवश्यकता: बड़े पैमाने के लिए कंपनी और छोटे व्यवसाय के लिए एकल स्वामित्व उपयुक्त है।
4. सहकारी संगठन स्वरूप के लक्षण, गुण एवं सीमाओं का विवेचन कीजिए। विभिन्न प्रकार की सहकारी समितियों को भी संक्षेप में समझाइए।
उत्तर: सहकारी समिति उन लोगों का स्वैच्छिक संगठन है, जो सदस्यों के कल्याण और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एकजुट होते हैं।
(i) लक्षण: स्वैच्छिक सदस्यता, पृथक वैधानिक स्थिति, सीमित दायित्व, जनतांत्रिक नियंत्रण और सेवा भावना।
(ii) गुण: वोट की समानता (एक व्यक्ति एक वोट), सीमित दायित्व, स्थायी अस्तित्व, मितव्ययी संचालन, और सरकारी सहायता/छूट।
(iii) सीमाएँ: पूँजी के सीमित संसाधन, अक्षम प्रबंधन, गोपनीयता की कमी, सरकारी नियंत्रण और विचारों की भिन्नता से आतंरिक कलह।
(iv) प्रकार: उपभोक्ता सहकारी समितियां (उचित मूल्य पर वस्तुएं), उत्पादक सहकारी समितियां (कच्चा माल/उपकरण देना), विपणन सहकारी समितियां (उत्पाद बेचने में मदद), किसान सहकारी समितियां (बीज/खाद देना), सहकारी ऋण समितियां (कम ब्याज पर ऋण) और सहकारी आवास समितियां (मकान बनाना)।
5. एक संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय एवं साझेदारी में अंतर कीजिए।
उत्तर: एक संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय एवं साझेदारी में अंतर हैं:
| संयुक्त हिंदू परिवार व्यवसाय | साझेदारी |
| सदस्यता जन्म से प्राप्त होती है। इसमें न्यूनतम 2 सदस्य होते हैं। | साझेदारी आपसी समझौते (अनुबंध) द्वारा बनती है। इसमें न्यूनतम 2 तथा अधिकतम 50 साझेदार हो सकते हैं। |
| यह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 द्वारा शासित होता है। | यह भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 द्वारा शासित होती है। |
| केवल कर्ता (Karta) का दायित्व असीमित होता है, जबकि अन्य सदस्यों का दायित्व सीमित होता है। | सभी साझेदारों का दायित्व असीमित एवं संयुक्त होता है। |
| व्यवसाय का नियंत्रण और सभी महत्वपूर्ण निर्णय कर्ता द्वारा लिए जाते हैं। | व्यवसाय का संचालन और निर्णय सभी साझेदार मिलकर लेते हैं। |
| नाबालिग जन्म से ही संयुक्त हिंदू परिवार का पूर्ण सदस्य होता है। | नाबालिग पूर्ण साझेदार नहीं बन सकता, लेकिन उसे केवल साझेदारी के लाभों में शामिल किया जा सकता है। |
6. आकार एवं संसाधनों की सीमाओं के होते हुए भी लोग एकल व्यवसाय को अन्य संगठनों की तुलना में प्राथमिकता क्यों देते हैं?
उत्तर: लोग एकल व्यवसाय को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि यह छोटे आकार और कम पूँजी वाले व्यवसायों के लिए सर्वोत्तम है, जहाँ ग्राहकों को व्यक्तिगत सेवाओं की आवश्यकता होती है (जैसे- नाई की दुकान, परचून)। इसमें स्थापना में बहुत कम खर्च आता है, निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है, और अर्जित सारा लाभ सीधे स्वामी को मिलता है, जो कड़ी मेहनत के लिए प्रत्यक्ष प्रोत्साहन देता है।
व्यावहारिक प्रश्न
1. किस संगठन स्वरूप में एक स्वामी के व्यापारिक करार अन्य स्वामियों को भी बाध्य कर देते हैं, उत्तर के समर्थन में कारण बताइए।
उत्तर: यह साझेदारी फर्म में होता है।
कारण: साझेदारी फर्म में पारस्परिक अभिकरण का सिद्धांत लागू होता है। प्रत्येक साझेदार फर्म का स्वामी होने के साथ-साथ अन्य साझेदारों का अभिकर्ता (Agent) भी होता है। इसलिए, जब कोई साझेदार फर्म के व्यवसाय से संबंधित कोई वैध व्यापारिक कार्य या करार करता है, तो वह करार सभी साझेदारों पर कानूनी रूप से लागू होता है और सभी उसके लिए उत्तरदायी होते हैं।
2. एक संगठन की व्यावसायिक परिसंपत्तियों की राशि 50,000 रुपए है लेकिन अदत्त देय राशि 80,000 रुपए है, लेनदार निम्न स्थितियों में क्या कार्यवाही कर सकते हैं—
(क) यदि संगठन एक एकल स्वामित्व इकाई है।
उत्तर: एकल स्वामी का दायित्व असीमित होता है। 50,000 रुपये की व्यावसायिक संपत्तियों का उपयोग करने के बाद भी 30,000 रुपये का ऋण बचता है। लेनदार इस बकाया 30,000 रुपये की वसूली के लिए एकल स्वामी की व्यक्तिगत संपत्तियों (जैसे घर, कार) पर दावा कर सकते हैं।
(ख) यदि एक संगठन साझेदारी फर्म है जिसमें एंथोनी और अकबर साझेदार हैं, लेनदार इन दो में से किस साझेदार के पास अपनी लेनदारी के भुगतान हेतु संपर्क साध सकते हैं। कारण सहित समझाइए।
उत्तर: साझेदारी में भी साझेदारों का दायित्व असीमित और संयुक्त एवं पृथक होता है। लेनदार बकाया 30,000 रुपये के भुगतान के लिए एंथोनी या अकबर, किसी एक से या दोनों से एक साथ संपर्क साध सकते हैं। यदि लेनदार सारा पैसा एंथोनी से वसूल लेते हैं, तो एंथोनी बाद में अकबर से उसके हिस्से की राशि वसूल करने का अधिकार रखता है।
3. किरन एक एकल व्यवसायी है। पिछले दशक में उसका व्यवसाय पड़ोस के एक कोने की दुकान से, जिसमें वह नकली आभूषण, बैग, बालों की क्लिप, नेलपॉलिश आदि बेचती थी, से बढ़ कर तीन शाखाओं वाली फुटकर श्रृंखला में बदल गया है। यद्यपि वह सभी शाखाओं के विभिन्न कार्यों को स्वयं देखती हैं परंतु अब सोच रही है कि व्यवसाय के बेहतर प्रबंधन के लिए उसे एक कंपनी का निर्माण करना चाहिए या नहीं। उसकी योजना देश के अन्य भागों में शाखाएँ खोलने की भी है।
(क) एकल स्वामी बने रहने के दो लाभों को समझाइए।
उत्तर: एकल स्वामी बने रहने के दो लाभ है:
(i) शीघ्र निर्णय: किरन अपनी तीनों शाखाओं के संबंध में किसी से सलाह लिए बिना तुरंत फैसले ले सकती है।
(ii) प्रत्यक्ष प्रोत्साहन: व्यवसाय से होने वाला 100% मुनाफा सिर्फ किरन को ही मिलेगा।
(ख) संयुक्त पूँजी कंपनी में परिवर्तित करने के दो लाभ बताइए।
उत्तर: संयुक्त पूँजी कंपनी में परिवर्तित करने के दो लाभ है:
(i) विस्तार की संभावना (अधिक पूँजी): वह कंपनी बनाकर जनता या वित्तीय संस्थानों से भारी मात्रा में पूँजी जुटा सकती है, जो राष्ट्रीय स्तर पर शाखाएं खोलने के लिए ज़रूरी है।
(ii) सीमित दायित्व: बड़े व्यवसाय में जोखिम अधिक होता है। कंपनी बनाने पर उसका व्यक्तिगत दायित्व केवल उसके द्वारा निवेशित अंशों तक सीमित हो जाएगा।
(ग) राष्ट्रीय स्तर पर व्यवसाय करने के निर्णय पर संगठन के स्वरूप के चुनाव में उसकी भूमिका क्या होगी?
उत्तर: राष्ट्रीय स्तर पर व्यवसाय करने के निर्णय में भूमिका: राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार के लिए भारी पूँजी, पेशेवर प्रबंधकों (HR, Finance, Marketing विशेषज्ञ) और स्थायी संरचना की आवश्यकता होती है। एकल स्वामित्व में ये संसाधन जुटाना असंभव है। इसलिए, राष्ट्रीय विस्तार के लिए उसे संयुक्त पूँजी कंपनी का स्वरूप ही चुनना होगा।
(घ) कंपनी के रूप में व्यवसाय करने के लिए उसे किन-किन कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करना होगा?
उत्तर: कंपनी बनाने के लिए उसे कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों का पालन करना होगा। यह एक जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है जिसमें कई प्रलेख तैयार करने, रजिस्ट्रार के पास जमा करने और निगमन का प्रमाण पत्र प्राप्त करने जैसी वैधानिक औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी।


